विशेष लेख


volume-43, 26 January - 1 February ,2019

भारतीय गणतंत्र और युवा

डॉ. संजय कुमार

स्वतंत्र देश के रूप में हमारे विकास के साथ-साथ, राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है. देश के 60 प्रतिशत से अधिक नागरिकों के 35 वर्ष से कम उम्र और आधी जनसंख्या के 25 वर्ष से कम आयु के साथ ही यह बिल्कुल स्पष्ट है कि राष्ट्र निर्माण की दिशा युवाओं से निर्धारित होगी. ब्लूमबर्ग न्यूज रिपोर्ट के अनुसार 2027 तक एक करोड़ जनसंख्या के 15 से 64 वर्ष की आयु में होने के साथ ही भारत विश्व का सबसे बड़ा सक्षम कार्यशक्ति वाला देश बन जाएगा. यह आबादी का वह हिस्सा होगा, जिस पर भीतर और बाहर से देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होगी. इस वर्ष हम 70वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं, देश के युवाओं को यह समझना होगा कि उनके पूर्वजों ने ब्रिटिश शासकों का बहादुरी से मुकाबला किया और हमें एक स्वतंत्र राष्ट्र का उपहार सौंपा. अब यह युवाओं का दायित्व है कि वे इस तरह देश को आकार दें, उसका नव निर्माण करें कि उनकी आकांक्षाएं पूरी हों और साथ ही भारतीय संविधान के सिद्धांतों की मूल भावना भी बनी रहे. एक अरब तीस करोड़ की जनसंख्या और देश के विभिन्न क्षेत्रों के असमान विकास के साथ देश की कार्यशक्ति और विचार शक्ति, दोनों के समक्ष एक कड़ी चुनौती है. सबसे पहले युवाओं को अपनी आकांक्षाएं पूरी करने का माहौल बनाना होगा. इसके बाद उन्हें देश के विकास के लिए योगदान करना होगा. भारतीय लोकतंत्र अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि नागरिक सब कुछ सरकार पर छोड़ दें और स्वयं देश की प्रगति की कोई चिंता न करें. गांधीजी का मानना था कि युवा सामाजिक परिवर्तन के वाहक हैं. उनमें सत्य

और अहिंसा के शाश्वत सिद्धांतों के आधार

पर एक आदर्श समाज बनाने की क्षमता है. आज युवाओं को व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ  संघर्ष करना होगा, संकल्प और सेवा की सुदृढ़ भावना जागृत करनी होगी और भारतीय गणतंत्र की गरिमा के अनुरूप सहिष्णुता के सिद्धांत का पालन करना होगा.

अपने भीतर की अनंत क्षमताओं का पता लगाने और देश के विकास में योगदान के लिए युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेताओं तथा संविधान निर्माताओं के बतलाए मार्ग पर चलना होगा. हम सभी अपने जीवन में सर्वोत्तम आचरण के लिए अतीत और वर्तमान की प्रमुख हस्तियों से प्रेरणा लेते हैं. अब तक हमारे आदर्श रहे हैं स्वतंत्रता सेनानी या वे लोग, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक, खिलाड़ी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या अन्य प्रमुख रूपों में देश की सेवा की है. अब तक की पीढ़ी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है. लेकिन प्रतिदिन एक बेहतर भविष्य को आकार देने के लिए आज के युवाओं पर राष्ट्रीय दायित्वों को निभाने और आने वाले कल के लिए आदर्श बनने की जिम्मेदारी है. वर्तमान की युवा पीढ़ी के लिए इतिहास में उनका समय आज है. उनके योगदान और राष्ट्र के प्रति नि:स्वार्थ सेवा के आधार पर ही आने वाले कल का स्वरूप निर्भर है. उन्हें स्वयं के लिए और अपने परिवार के लिए आर्थिक रूप से सशक्त होना होगा. हालांकि हमारे देश में ऐसे अनेक अवसर उपलब्ध हैं, जिनसे वे दूसरों और समाज की मदद करने योग्य भी बन सकते हैं.

वे लोग, जो सरकारी सेवा में आने का लक्ष्य रखते हैं, निश्चित रूप से उनके पास राष्ट्र की सेवा के लिए विभिन्न माध्यमों से अनेक अवसर उपलब्ध होंगे. लेकिन, यह प्रतिशत बहुत कम होगा. विभिन्न सरकारी एजेंसियां लगभग 3 प्रतिशत औपचारिक रोज़गार सौंपती हैं. इसीलिए देश की शेष कार्यशक्ति या तो औपचारिक निजी क्षेत्र में लगी है, जो कि एक अनुमान के आधार पर 3 प्रतिशत है और शेष 94 प्रतिशत कार्यशक्ति विशाल अनौपचारिक क्षेत्र का हिस्सा है. अनौपचारिक क्षेत्र से उन्हें किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा या नियमित सेवाकाल नहीं मिलता. चूंकि युवाओं के एक बड़े हिस्से को अनौपचारिक क्षेत्र में कॅरिअर ढूंढना है, इसलिए स्वयं को बनाए रखने और साथ-साथ किसी स्वैच्छिक माध्यम से राष्ट्र की सेवा करने का संघर्ष हमेशा एक चुनौती बना रहेगा.

जो लोग सरकारी नौकरी में भर्ती होने जा रहे हैं, उन्हें पूरी निष्ठा से अपनेे कर्तव्यपालन का संकल्प लेना होगा, इस भावना के साथ कि वे सीधे राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं, इस कारण उन्हें स्वयं को भाग्यशाली और गौरवान्वित समझना होगा. उन्हें हमारी व्यवस्था में गहराई तक जड़ जमा चुकी भ्रष्टाचार की समस्या से निपटना होगा. पारदर्शिता और अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार सूची के अनुसार 180 देशों में भारत का स्थान 81वां है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में वह भ्रष्टाचार से ग्रस्त प्रमुख देशों में एक है. कॉलेज से अध्ययन पूरा कर भ्रष्टाचार रहित और निष्पाप मन से आने वाले युवाओं को ऐसी सादगीभरी जीवनशैली अपनानी होगी, जिसमें वे अपनी जायज आमदनी के भीतर अपनी इच्छाएं पूरी कर सकें. समाज में पश्चिमी देशों की जीवनशैली अपनाने की ओर हमारी रुचि रहती है और ऐसे में हम जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर भूल जाते हैं. यह विभिन्न प्रकार की इच्छाएं ही हैं, जो हमें पथ से विचलित करती हैं और हम गैर-कानूनी तरीके से हासिल साधनों के जाल में फंसते चले जाते हैं. आज के युवा को यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार राष्ट्र के सबसे बड़े शत्रुओं में एक है और राष्ट्र को सबल बनाने के लिए गहराई तक जाकर भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करना जरूरी है.

यह कहना सही नहीं है कि भ्रष्टाचार केवल सार्वजनिक क्षेत्र में है, निजी क्षेत्र या व्यवसाय भी जल्द से जल्द धन कमाने के लिए अनैतिक रास्ते अपनाते हैं और भ्रष्ट साधनों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए यह देश के युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है कि वे अपने संसाधनों के प्रबंधन की शुरुआत स्वयं पर अनुशासन से करें. इसके लिए जरूरी है कि आमदनी के अनुसार जीवन यापन किया जाए. आज लोगों में, विशेषकर युवाओं में सुदृढ़ नैतिकता की जरूरत है, जिससे वे न केवल अपने आसपास भ्रष्टाचार को रोक सकें, बल्कि स्वयं भी किसी तरह इसके चंगुल में न आएं. निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में काम कर रहे युवाओं की भूमिका देश से इस बुराई को दूर करने में महत्वपूर्ण है.

युवा एक और माध्यम से देश और समाज को महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. यह माध्यम है आगे बढ़ कर सेवा करने का संकल्प, जिसे लगातार सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है. भारत में ऐसे संकल्प का इतिहास प्राचीनकाल से देखा जा सकता है, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन से पहले के माहौल में यह काफी महत्वपूर्ण हो गया. यह संकल्प आजादी के बाद भी मजबूती से बना रहा. देश के विभिन्न भागों में सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के समय तथा प्राकृतिक  आपदाओं के दौरान भी आगे बढ़कर सेवा करने की यह तत्परता देखी जा सकती है. हालांकि ऐसी तत्परता के लिए केवल इन कारणों तक सीमित रहना जरूरी नहीं है. हम राष्ट्र निर्माण में अपनी ऊर्जा और समय लगा कर लगातार ऐसी सेवा कर सकते हैं. स्कूल और कॉलेज स्तर से ही बच्चों और युवाओं में सेवा की यह तत्परता डालनी होगी ताकि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में प्रत्येक नागरिक अपना दायित्व समझ सके. देश में आज भी एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रह रही है. आबादी के इस बड़े हिस्से को श्रम क्षेत्र में आने से पहले शिक्षित किए जाने की जरूरत है. गरीबी और निरक्षरता या शिक्षा के निम्न स्तर का योग आबादी के एक बड़े हिस्से को उन लोगों के पीछे कर देता है, जो बेहतर संसाधनों और अवसरों के कारण शिक्षा और धन कमाने के दोनों मोर्चों पर सशक्त स्थिति में हैं. हमारे देश में कई मूलभूत क्षेत्रों में समान अवसर सृजित किए जाने की बुनियादी आवश्यकता है, जहां युवा भरपूर योगदान दे सकें. शिक्षा भी ऐसा क्षेत्र हो सकता है, जिसमें वे अपना समय दे सकते हैं और दूसरों की मदद कर सकते हैं.

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में हमने नागरिक के रूप में एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प लिया है, जिसमें सभी लोगों को समान दर्जा और अवसर मिल सके और सबको साथ लेकर बढ़ने का मौका मिले. हमें यह दायित्व सरकार पर नहीं छोड़ना है. युवा पीढ़ी को ऐसे रचनात्मक रास्ते तलाशने होंगे, जिनमें वे कम से कम अपने आसपास के बच्चों को शिक्षित कर सकें या सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाकर अपनी विशेषज्ञता और रुचि के अनुरूप अतिरिक्त गतिविधियों का संचालन करें. जिन लोगों को जीवन में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला है, वे समाज को इसे वापस देने के लिए सप्ताह में कुछ घंटे निकाल सकते हैं. स्वेच्छा और तत्परता से हम जो भी नि:स्वार्थ कार्य करते हैं, वह हमें जीवन में कई पाठ पढ़ाता है, ऐसे पाठ, जो सामान्य रूप से हमें स्कूल-कॉलेज और व्यावसायिक कक्षाओं में सीखने को नहीं मिलते. आज कई युवा समाज के वंचित लोगों के उत्थान और विकास में योगदान कर रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका प्रभावी असर तभी देखने को मिलेगा, जब इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में अपनाया जाए. ऐसे आंदोलन के दूरगामी चमत्कारी प्रभावों की सहज कल्पना तक नहीं की जा सकती. वे शिक्षा के अलावा खेलकूद, कॅरिअर परामर्श और मार्गदर्शन, पर्यावरणीय शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, स्त्री-पुरुष समानता, नैतिक शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों में से चयन कर सकते हैं. एक युवा आसानी से पांच अन्य युवाओं के जीवन में बदलाव ला सकता है. इस प्रकार एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने पर यह संख्या तेजी से आगे बढ़ती जाएगी.

संविधान की प्रस्तावना का दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है,  जिसे सभी युवाओं को जीवन में अपने मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाना चाहिए. यह है, व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने का भाईचारा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता. विविधता भारतीय समाज की सुंदरता है और यह हमें विविध संस्कृति और मूल्यों से सीखने का अवसर देती है. यह ज्ञान हम जीवनभर बनाए रखते हैं और लगातार विकसित करते जाते हैं. यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है, विशेषकर युवाओं का कि वे विभिन्न धर्मों और सांस्कृतिक समूहों की नीतिगत मान्यताओं के प्रति उदार और सहिष्णु बनें. इससे हमें स्वयं का व्यक्तित्व संवारने में मदद मिलती है और यह व्यक्तित्व हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू में यह प्रतिबिम्बित होता है. यह एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में हमारे विकास को प्रभावित करता है. हमें संविधान निर्माताओं द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए. मनुष्य और राष्ट्र की प्रगति के लिए एकता और निष्ठा अनिवार्य है. इसमें कोई भी विचलन युवाओं की शक्ति को दिग्भ्रमित करेगा और उन्हें सबसे अधिक भुगतभोगी भी बनना होगा क्योंकि सिद्धांतों से अलग हटने के दुष्परिणाम स्वयं उन्हीं को भुगतने हैं. दूसरी तरफ आज के समस्त सद्प्रयासों के लाभान्वित भी वही बनेंगे.

हम सभी भाग्यशाली और गौरवशाली हैं कि हमारा जन्म भारत जैसे विशिष्ट देश में हुआ है. आज के युवाओं में चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने और सही दिशा में सहेजने की अपरिमित ऊर्जा है. बस उन्हें स्वयं के लिए और अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए कुछ आदर्श और मूल्य विकसित करने और उन पर चलने की आवश्यकता है. उन्हें कुछ ऐसे आदर्श विकसित करने होंगे, जो उनकी भौतिक उपलब्धियों से कहीं ऊपर हों. देश और देशवासियों के प्रति उनका प्रेम विकास के सोपान में कहीं पीछे रह गया है.

आइए, गणतंत्र दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर हम स्वयं को बधाई देते हुए संविधान के निर्माताओं के प्रति गहरा आभार व्यक्त करें और कामना करें कि देश के युवा बेहतर भारत के निर्माण की दिशा में प्रत्येक दिन आगे कदम बढ़ाएं.

 

(डॉ. संजय कुमार द लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टिट्यूट, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के निदेशक के रूप में सेवारत हैं. ई-मेल आईडी:sanjay_kumar@harvard.edu)

ये उनके निजी विचार हैं.