विशेष लेख


volume-43, 26 January - 1 February, 2019

प्रार्थना-सभा में बापू का अंतिम भाषण

भाईयो और बहनो,

मेरे सामने कहने को चीज तो काफी पड़ी हैं, उनमें से जो आज के लिए चुननी चाहिए, वे चुन ली हैं. छ: चीजें हैं. पंद्रह मिनट में जितना कह सकूंगा कहूंगा. एक बात तो देख रहा हूं कि थोड़ी देर हो गई है-यह होनी नहीं चाहिए थी. सुशीला बहन बहावलपुर चली गई हैं-दूसरा अधिकार तो कोई है नहीं और न हो सकता था. फ्रेंड्स सर्विस के लेसली क्रॉस के साथ चली गई हैं. फ्रेंड्स यूनिट में से किसी को भेजने का मैंने इरादा किया था, ताकि वह वहां लोगों को देखें, मिलें और मुझको वहां के हाल बता दें. उस वक्त सुशीला बहन के जाने की बात नहीं थी, लेकिन जब सुशीला बहन ने सुन लिया तो उसने मुझसे कहा कि इजाजत दे दो तो मैं क्रॉस साहब के साथ चली जाऊं. वह जब नोआखली में काम करती थी तबसे वह उनको जानती थी. वह आखिर कुशल डॉक्टर है और पंजाब के गुजरात की है, उसने भी काफी गंवाया है क्योंकि उसकी तो वहां काफी जायदाद है, फिर भी दिल में कोई जहर पैदा नहीं हुआ है. तो उसने बताया कि मैं वहां क्यों जाना चाहती हूं. क्योंकि पंजाबी बोली जानती हूं, हिन्दुस्तानी जानती हंू, उर्दू और अंग्रेजी भी जानती हूं तो वहां मैं क्रॉस साहब को मदद दे सकंूगी. तो मैं यह सुनकर खुश हो गया. वहां खतरा तो है; लेकिन उसने कहा कि मुझको क्या खतरा है, ऐसा डरती तो नोआखली क्यों जाती? पंजाब में बहुत लोग बिलकुल मटियामेट हो गये हैं, लेकिन मेरा तो ऐसा नहीं; खाना-पीना सब मिल जाता है, ईश्वर सब करता है. अगर आप भेज दें और क्रॉस साहब मेरे को ले जाएं तो मैं वहां के लोगों को देख लूंगी. तो मैंने क्रॉस साहब से पूछा कि क्या आपके साथ सुशीला बहन को भेजंू तो वे खुश हो गये और कहा कि वह तो बड़ी अच्छी बात है. मैं उनके मारफत दूसरों से अच्छी तरह बातचीत कर सकूंगा. मित्रवर्ग में हिन्दुस्तानी जानने वाला कोई रहे तो वह बड़ी भारी चीज हो जाती है. इससे बेहतर क्या हो सकता है? वे रेडक्रॉस के हैं. रेडक्रॉस माने यह है कि लड़ाई में जो मरीज हो जाते हैं उनको दवा देने का काम करना. अब तो दूसरा-तीसरा भी काम करते हैं. तो डॉक्टर सुशीला क्रॉस साहब के साथ गई हैं या डॉक्टर सुशीला के साथ क्रॉस साहब गये हैं यह पेचीदा प्रश्न हो जाता है. लेकिन पेचीदा है नहीं; क्योंकि दोनों एक-दूसरे के दोस्त हैं और दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं, मोहब्बत करते हैं. वे सेवा-भाव से गये हैं, पैसा कमाना तो है नहीं. वे जो देखेंगे मुझे बतायेंगे और सुशीला बहन भी बतायेगी. मैं नहीं चाहता कि कोई ऐसा गुमान रखे कि वह तो डॉक्टर है और क्रॉस साहब दूसरे हैं. कौन ऊंचा है कौन नीचा है, ऐसा कोई भेदभाव न करें; लेकिन क्रॉस साहब, उनके साथ औरत है तो औरत को आगे कर देते हैं और अपने को पीछे रखते हैं. आखिर वे उनके दोस्त हैं. मैं एक बात और कह देना चाहता हूं, नवाब साहब तो मुझको लिखते रहते हैं, मुझको कई लोग झूठी बात भी लिखते हैं तो उसे मानने का मेरा क्या अधिकार है. मैंने सोचा कि मुझको क्या करना चाहिए. तो बहावलपुर के जो आये हैं उनको बता दूं कि वे वहां से आयेंगे तो मुझको सब बता देंगे.

अभी बन्नू के भाई लोग मेरे पास आ गये थे-शायद चालीस आदमी थे. वे पेरशान तो हैं, लेकिन ऐसे नहीं हैं, कि चल नहीं सकते थे. हां किसी की अंगुली में घाव लगे थे, कहीं कुछ था, कहीं कुछ था, ऐसे थे. मैंने तो उनका दर्शन ही किया और कहा कि जो-कुछ कहना है ब्रजकिशनजी से कह दें. लेकिन इतना समझ लें कि मैं उन्हें भूला नहीं हूं. वे सब भले आदमी थे. गुस्से से भरे होना चाहिए था, लेकिन फिर भी वे मेरी बात मान गये. एक भाई थे, वे शरणार्थी या कौन थे, मैंने पूछा नहीं. उसने कहा कि तुमने बहुत खराबी तो कर ली है, क्या और करते जाओगे? इससे बेहतर है कि जाओ. बड़े हैं, महात्मा हैं तो क्या, हमारा काम तो बिगाड़ते ही हो. तुम हमको छोड़ दो, भूल जाओ, भागो. मैंने पूछा, कहां जाऊं? उन्होंने कहा, तुम हिमालय जाओ. तो मैंने डांटा. वे मेरे जितने बुजुर्ग नहीं हैं-वैसे बुजुर्ग हैं, तगड़े हैं, मेरे-जैसे पांच-सात आदमी को चट कर सकते हैं. मैं तो महात्मा रहा, घबराहट में पड़ जाऊं तो मेरा क्या हाल होगा. तो मैंने हंसकर कहा कि क्या मैं आपके कहने से जाऊं, किसकी बात सुनूं? क्योंकि कोई कहता है कि यहीं रहो, कोई कोई तारीफ करता है, कोई डांटता है, कोई गाली देता है. तो मैं क्या करूं? ईश्वर जो हुक्म करता है वही मैं करता हूं. आप कह सकते हैं कि आप ईश्वर को नहीं मानते हैं तो इतना करें कि मुझे अपने दिल के अनुसार करने दें. आप कह सकते हैं कि ईश्वर तो हम हैं. मैंने कहा तो परमेश्वर कहां जायेगा. ईश्वर तो एक है. हां, यह ठीक है कि पंच परमेश्वर है, लेकिन यह पंच का सवाल नहीं है. दु:खी का बेली परमेश्वर है; लेकिन दु:खी खुद परमात्मा नहीं. जब मैं दावा करता हूं कि जो हर एक स्त्री है, मेरी सगी बहन है, लड़की है तो उसका दु:ख मेरा दु:ख है. आप ऐसा क्यों मानते हैं कि मैं दु:ख को नही जानता, आपके दु:खों में हिस्सा नहीं लेता, मैं हिंदुओं और सिखों का दुश्मन हूं और मुसलमानों का दोस्त हूं. उसने साफ-साफ कह दिया. कोई गाली देकर लिखता है, कोई विवेक से लिखता है कि हमको छोड़ दो, चाहे हम दोजख में जायें तो क्या? तुमको क्या पड़ी है, तुम भागो? मैं किसी के कहने से कैसे भाग सकता हूं, किसी के कहने से मैं खिदमतगार नहीं बना हूं, किसी के कहने से मैं मिट नहीं सकता हूं. ईश्वर चाहे तो मुझको मार सकता है. मैं समझता हूं कि मैं ईश्वर की बात मानता हूं. एक डांटता है, दूसरे लोग मेरी तारीफ करते हैं तो मैं क्या करूं? मैं हिमालय क्यों नहीं जाता? वहां रहना तो मुझको पसंद पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि मुझको वहां, खाने-पीने ओढ़ने को नहीं मिलेगा-वहां जाकर शांति मिलेगी, लेकिन मैं अशांति में शांति चाहता हूं, नहीं तो उस अशांति में मर जाना चाहता हूं. मेरा हिमालय यहीं है. आप सब हिमालय चलें तो मुझको भी आप लेते चलें.

मेरे पास शिकायतें आती हैं-सही शिकायतें हैं-कि यहां शरणार्थी पड़े हैं, उनको खाना देते हैं, पीना देते हैं, पहनने को देते हैं, जो हो सकता है सब करते हैं; लेकिन वे मेहनत नहीं करना चाहते हैैं, काम नहीं करना चाहते हैं. जो उनकी खिदमत करते हैं उन लोगों ने लम्बा-चौड़ा लिखकर दिया है, उसमेेें से मैं इतना ही कह देता हूं. मैंने तो कह दिया है कि अगर दु:ख मिटाना चाहते हैं, दु:ख में से सुख निकालना चाहते हैं, दु:ख में भी हिन्दुस्तान की सेवा करना चाहते हैं, साथ में अपनी भी सेवा हो जाती है, तो दु:खियों को काम तो करना ही चाहिए. दु:खी को ऐसा हक नहीं है कि वह काम न करे और मौज-शोक करे. गीता में कहा है, ''यज्ञ करो और खाओÓÓ-यज्ञ करो और शेष रह जाता है उसको खाओ. यह मेरे लिए है और आपके लिए नहीं है ऐसा नहीं है-सबके लिए है. जो दु:खी हैं उनके लिए भी है. एक आदमी कुछ करे नहीं, बैठा रहे और खाये तो ऐसा हो नहीं सकता. करोड़पति भी काम न करे और खाये, तो वह निकम्मा है, पृथ्वी पर भार है. जिस आदमी के घर पैसा भी है वह भी मेहनत करके खाये तब बनता है. हां कोई लाचारी है, पैर से नहीं चल सकता है या अंधा है, या वृद्ध हो गया है तो बात दूसरी है, लेकिन जो तगड़ा है, वह क्यों न काम करे? जो काम कर सकता है वह काम करे. शिविर में जो तगड़े पड़े हैं, वे पाखाना भी उठायें. चरखा चलायें. जो काम बन सकता है करें. जो काम नहीं जानते हैं वे काम लड़कों को सिखायें, इस तरह से काम लें. लेकिन कोई कहे कि कैम्ब्रिज में जैसे सिखाते हैं वैसे सिखायें. मै, मेरा बाबा तो कैम्ब्रिज में सीखा था तो लड़कों को भी वहां भेजें, तो यह कैसे हो सकता है? मैं तो इतना ही कहंूगा कि जितने शरणार्थी हैं वे काम करके खायें? उन्हें काम करना ही चाहिए.

आज एक सज्जन आये थे. उनका नाम तो मैं भूल गया. उन्होंने किसानों की बात की. मैंने कहा, मेरी चले तो हमारा गवर्नर-जनरल किसान होगा, हमारा बड़ा वजीर किसान होगा, सब-कुछ किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है. मुझे बचपन से सिखाया था- एक कविता है ''हे किसान, तू बादशाह है.ÓÓ किसान जमीन से पैदा न करे तो हम क्या खायेंगे? हिन्दुस्तान का सचमुच राजा तो वही है. लेकिन आज हम उसे गुलाम बनाकर बैठे हैं. आज किसान क्या करे? एम.ए. बने? बी.ए. बने? ऐसा किया, तो किसान मिट जायेगा. पीछे वह कुदाली नहीं चलाएगा. प्रधान बने, तो हिंदुस्तान की शक्ल बदल जायेगी. आज जो सड़ा पड़ा है वह नहीं रहेगा.

मद्रास में खुराक की तंगी है. मद्रास सरकार की तरफ से दूत यह कहने के लिए श्री जयरामदास के पास आये थे कि वे उस सूबे के लिए अन्न देने का बंदोबस्त करें. मुझे मद्रास वालों के इस रुख से दु:ख होता है. मैं मद्रास के लोगों को यह समझाना चाहता हूं कि वे अपने ही सूबे में मूंगफली, नारियल और दूसरे खाद्य पदार्थ के रूप में काफी खुराक पा सकते हैं. उनके यहां मछली भी काफी है, जिन्हें उनमें से ज्यादातर लोग खाते हैं. तब उन्हें भीख मांगने के लिए बाहर निकलने की क्या जरूरत है? उनका चावल का आग्रह रखना-वह भी पालिश किया हुआ चावल, जिसके सारे पोषक तत्व मर जाते हैं- या चावल न मिलने पर मजबूरी से गेहंू मंजूर करना ठीक नहीं है. चावल के आटे में वे मूंगफली या नारियल का आटा मिला सकते हैं और इस तरह अकाल के भेड़िये को आने से रोक सकते हैं. उन्हें जरूरत है आत्मविश्वास और श्रद्धा की. मद्रासियों को मैं अच्छी तरह से जानता हूं और दक्षिण अफ्रीका में उस प्रांत के सभी भाषा वाले हिस्सों के लोग मेरे साथ थे. सत्याग्रह-कूच के वक्त उन्हें रोजाना के  राशन में सिर्फ डेढ़ पौंड़ रोटी और एक औंस शक्कर दी जाती थी. मगर जहां कहीं उन्होंने रात को डेरा डाला, वहां जंगल की घास में से खाने लायक चीजें चुनकर और मजे से गाते हुए उन्हें पकाकर उन्होंने मुझे अचरज में डाल दिया. ऐसे सूझ-बूझ वाले लोग कभी लाचारी कैसे महसूस कर सकते हैं? यह सच है कि हम सब मजदूर थे और ईमानदारी से काम करने में ही हमारी मुक्ति और हमारी सभी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति निहित है.

प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित संपूर्ण गांधी वाङमय, खंड 9० से.