विशेष लेख


volume-49,9 -15 march, 2019

मन की बातकी 53वीं कड़ी में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ (24.02.2019)

मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार. मन की बातशुरू करते हुए आज मन भरा हुआ है. 10 दिन पूर्व, भारत-माता ने अपने वीर सपूतों को खो दिया. इन पराक्रमी वीरों ने, हम सवा-सौ करोड़ भारतीयों की रक्षा में खुद को खपा दिया. देशवासी चैन की नींद सो सकें, इसलिए, इन हमारे वीर सपूतों ने, रात-दिन एक करके रखा था. पुलवामा के आतंकी हमले में, वीर जवानों की शहादत के बाद देश-भर में लोगों को, और लोगों के मन में, आघात और आक्रोश है. शहीदों और उनके परिवारों के प्रति, चारों तरफ संवेदनाएं उमड़ पड़ी हैं. इस आतंकी हिंसा के विरोध में, जो आवेग आपके और मेरे मन में है, वही भाव, हर देशवासी के अंतर्मन में है और मानवता में विश्वास करने वाले विश्व के भी मानवतावादी समुदायों में है. भारत-माता की रक्षा में,अपने प्राण न्योछावर करने वाले, देश के सभी वीर सपूतों को, मैं नमन करता हूं. यह शहादत, आतंक को समूल नष्ट करने के लिए हमें निरन्तर प्रेरित करेगी,हमारे संकल्प को और मजबूत करेगी. देश के सामने आयी इस चुनौती का सामना, हम सबको जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद और बाकि सभी मतभेदों को भुलाकर करना है ताकि आतंक के खिलाफ़ हमारे कदम पहले से कहीं अधिक दृढ़ हों, सशक्त हों और निर्णायक हों. हमारे सशस्त्र बल हमेशा ही अद्वितीय साहस और पराक्रम का परिचय देते आये हैं. शांति की स्थापना के लिए जहां उन्होंने अद्भुत क्षमता दिखायी है वहीं हमलावरों को भी उन्हीं की भाषा में जबाव देने का काम किया है. आपने देखा होगा कि हमले के 100 घंटे के भीतर ही किस प्रकार से कदम उठाये गये हैं. सेना ने आतंकवादियों और उनके मददगारों के समूल नाश का संकल्प ले लिया है. वीर सैनिकों की शहादत के बाद, मीडिया के माध्यम से उनके परिजनों की जो प्रेरणादायी बातें सामने आयी हैं उसने पूरे देश के हौंसले को और बल दिया है. बिहार के भागलपुर के शहीद रतन ठाकुुर के पिता रामनिरंजन जी ने, दु:ख की इस घड़ी में भी जिस ज़ज्बे का परिचय दिया है, वह हम सबको प्रेरित करता है. उन्होंने कहा कि वे अपने दूसरे बेटे को भी दुश्मनों से लडऩे के लिए भेजेंगे और जरुरत पड़ी तो ख़ुद भी लडऩे जाएंगे. ओडि़शा के जगतसिंह पुर के शहीद प्रसन्ना साहू की पत्नी मीना जी के अदम्य साहस को पूरा देश सलाम कर रहा है. उन्होंने अपने इकलौते बेटे को भी CRPF join कराने का प्रण लिया है. जब तिरंगे में लिपटे शहीद विजय शोरेन का शव झारखण्ड के गुमला पहुंचा तो मासूम बेटे ने यही कहा कि मैं भी फौज़ में जाऊंगा. इस मासूम का जज़्बा आज भारतवर्ष के बच्चे-बच्चे की भावना को व्यक्त करता है. ऐसी ही भावनाएं, हमारे वीर, पराक्रमी शहीदों के घर-घर में देखने को मिल रही हैं. हमारा एक भी वीर शहीद इसमें अपवाद नहीं है, उनका परिवार अपवाद नहीं है. चाहे वो देवरिया के शहीद विजय मौर्य का परिवार हो, कांगड़ा के शहीद तिलकराज के माता-पिता हों या फिर कोटा के शहीद हेमराज का छ: साल का बेटा हो - शहीदों के हर परिवार की कहानी, प्रेरणा से भरी हुई हैं. मैं युवा-पीढ़ी से अनुरोध करूंगा कि वो, इन परिवारों ने जो जज़्बा दिखाया है, जो भावना दिखायी है उसको जानें, समझने का प्रयास करें. देशभक्ति क्या होती है, त्याग-तपस्या क्या होती है - उसके लिए हमें इतिहास की पुरानी घटनाओं की ओर जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी. हमारी आंखों के सामने, ये जीते-जागते उदहारण हैं और यही उज्ज्वल भारत के भविष्य के लिए प्रेरणा का कारण हैं.

मेरे प्यारे देशवासियो, आजादी के इतने लम्बे समय तक, हम सबको, जिस War Memorial का इन्तजार था, वह अब ख़त्म होने जा रहा है. इसके बारे में देशवासियों की जिज्ञासा, उत्सुकता बहुत स्वाभाविक है. Narendramodiapp पर उडुपी, कर्नाटक के श्री ओंकार शेट्टी जी ने National War Memorial तैयार होने पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की है. मुझे आश्चर्य भी होता था और पीड़ा भी कि भारत में कोई National War Memorial  नहीं था. एक ऐसा मेमोरियल, जहां राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों की शौर्य-गाथाओं को संजो कर रखा जा सके. मैंने निश्चय किया कि देश में, एक ऐसा स्मारक अवश्य होना चाहिये.

हमने National War Memorial  के निर्माण का निर्णय लिया और मुझे खुशी है कि यह स्मारक इतने कम समय में बनकर तैयार हो चुका है. कल, यानि 25 फरवरी को, हम करोड़ों देशवासी इस राष्ट्रीय सैनिक स्मारक को, हमारी सेना को सुपुर्द करेंगे. देश अपना कर्ज चुकाने का एक छोटा सा प्रयास करेगा.

दिल्ली के दिल यानि वो जगह, जहां पर इंडिया गेट और अमर जवान ज्योति मौजूद है बस उसके ठीक नज़दीक में, ये एक नया स्मारक बनाया गया है. मुझे विश्वास है ये देशवासियों के लिए राष्ट्रीय सैनिक स्मारक जाना किसी तीर्थ स्थल जाने के समान होगा. राष्ट्रीय सैनिक स्मारक स्वतंत्रता के बाद सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है. स्मारक का डिजाइन, हमारे अमर सैनिकों के अदम्य साहस को प्रदर्शित करता है. राष्ट्रीय सैनिक स्मारक का Concept Four Concentric Circles यानी चार चक्रों पर केंद्रित है, जहां एक सैनिक के जन्म से लेकर शहादत तक की यात्रा का चित्रण है. अमर चक्र की लौ, शहीद सैनिक की अमरता का प्रतीक है. दूसरा Circle वीरता चक्र का है जो सैनिकों के साहस और बहादुरी को प्रदर्शित करता है. यह एक ऐसी Gallery है जहां दीवारों पर सैनिकों की बहादुरी के कारनामों को उकेरा गया है. इसके बाद, त्याग चक्र है यह Circle सैनिकों के बलिदान को प्रदर्शित करता है. इसमें देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं. इसके बाद रक्षक चक्र, सुरक्षा को प्रदर्शित करता है. इस Circle में घने पेड़ों की पंक्ति है. ये पेड़ सैनिकों के प्रतीक हैं और देश के नागरिकों को यह विश्वास दिलाते हुए सन्देश दे रहे हैं कि हर पहर सैनिक सीमा पर तैनात है और देशवासी सुरक्षित है. कुल मिला कर देखें तो राष्ट्रीय सैनिक स्मारक की पहचान एक ऐसे स्थान के रूप में बनेगी जहां लोग देश के महान शहीदों के बारे में जानकारी लेने, अपनी कृतज्ञता प्रकट करने, उन पर शोध करने के उद्देश्य से आयेंगे. यहां उन बलिदानियों की कहानी है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हैं ताकि हम जीवित रह सकें ताकि देश सुरक्षित रहे और विकास कर सके. देश के विकास में हमारे सशस्त्र बलों, पुलिस और अद्र्धसैनिक बलों के महान योगदान को शब्दों में अभिव्यक्त करना संभव नहीं है. पिछले साल अक्टूबर में मुझे National Police Memorial को भी देश को समर्पित करने का सौभाग्य मिला था. वह भी हमारे उस विचार का प्रतिबिम्ब था जिसके तहत हम मानते हैं कि देश को उन पुरुष और महिला पुलिसकर्मियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो अनवरत हमारी सुरक्षा में जुटे रहते हैं. मैं आशा करता हूं कि आप राष्ट्रीय सैनिक स्मारक और National Police Memorial को देखने जरुर जायेंगे. आप जब भी जाएं वहां ली गयी अपनी तस्वीरों को Social Media  पर अवश्य share करें ताकि दूसरें लोगों को भी इससे प्रेरणा मिले और वे भी इस पवित्र स्थल, इस Memorial को देखने के लिए उत्सुक हों.

मेरे प्यारे देशवासियो, ‘मन की बातके लिए आपके हजारों पत्र और comment, मुझे अलग-अलग माध्यमों से पढऩे को मिलते रहते हैं. इस बार जब मैं आपके comment पढ़ रहा था तब मुझे आतिश मुखोपाध्याय जीकी एक बहुत ही रोचक टिप्पणी मेरे ध्यान में आई. उन्होंने लिखा है कि वर्ष 1900 में 3 मार्च को, अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार किया था तब उनकी उम्र सिर्फ 25 साल की थी ये संयोग ही है कि 3 मार्च को ही जमशेदजी टाटा की जयंती भी है. और वे आगे लिखते हैं ये दोनों व्यक्तित्व पूरी तरह से दो अलग-अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि से हैं जिन्होंने झारखण्ड की विरासत और इतिहास को समृद्ध किया. मन की बातमें बिरसा मुंडाऔर जमशेदजी टाटाको श्रद्धांजलि देने का एक प्रकार से झारखण्ड के गौरवशाली इतिहास और विरासत को नमन् करने जैसा है. आतिश जी मैं आपसे सहमत हूं. इन दो महान विभूतियों ने झारखण्ड का नहीं पूरे देश का नाम बढ़ाया है. पूरा देश उनके योगदान के लिए कृतज्ञ है. आज, अगर हमारे नौजवानों को मार्गदर्शन के लिए किसी प्रेरणादायी व्यक्तित्व की जरुरत है तो वह है भगवान बिरसा मुंडा’. अंग्रेजों ने छिप कर, बड़ी ही चालाकी से उन्हें उस वक्त पकड़ा था जब वे सो रहे थे. क्या आप जानते हैं कि उन्होंने ऐसी कायरतापूर्ण कार्यवाही का सहारा क्यों लिया? क्योंकि इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा करने वाले अंग्रेज भी उनसे भयभीत रहते थे. भगवान बिरसा मुंडाने सिर्फ अपने पारंपरिक तीर-कमान से ही बंदूकों और तोपों से लैस अंग्रेजी शासन को हिलाकर रख दिया था. दरअसल, जब लोगों को एक प्रेरणादायी नेतृत्व मिलता है तो फिर हथियारों की शक्ति पर लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति भारी पड़ती है. भगवान बिरसा मुंडाने अंग्रेजों से ना केवल राजनीतिक आज़ादी के लिए संघर्ष किया बल्कि आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए भी लड़ाई लड़ी. अपने छोटे से जीवन में उन्होंने ये सब कर दिखाया. वंचितों और शोषितों के अंधेरे से भरे जीवन में सूरज की तरह चमक बिखेरी. भगवान बिरसा मुंडा ने 25 वर्ष की अल्प आयु में ही अपना बलिदान दे दिया. बिरसा मुंडा जैसे भारत मां के सपूत, देश के हर भाग में हुए है. शायद हिंदुस्तान का कोई कोना ऐसा होगा कि सदियों तक चली हुई आज़ादी की इस जंग में, किसी ने योगदान ना दिया हो. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इनके त्याग, शौर्य और बलिदान की कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंची ही नहीं. अगर, भगवान बिरसा मुंडाजैसे व्यक्तित्व ने हमें अपने अस्तित्व का बोध कराया तो जमशेदजी टाटा जैसी शख्सियत ने देश को बड़े-बड़े संस्थान दिए. जमशेदजी टाटा सही मायने में एक दूरदृष्टा थे, जिन्होंने ना केवल भारत के भविष्य को देखा बल्कि उसकी मजबूत नींव भी रखी. वे भली-भांति जानते थे कि भारत को Science, Technology और Industry का Hub बनाना भविष्य के लिए आवश्यक है. ये उनका ही Vision था जिसके परिणामस्वरूप Tata Institute Of Science की स्थापना हुई जिसे अब Indian Institute of Science कहा जाता है. यही नहीं उन्होंने Tata Steel जैसे कई विश्वस्तरीय संस्थानों को और उद्योगों की भी स्थापना की. जमशेदजी टाटाऔर स्वामी विवेकानंद जीकी मुलाकात अमेरिकी यात्रा के दौरान Ship में हुई थी, तब उन दोनों की चर्चा में एक महत्वपूर्ण Topic भारत में Science  और Technology के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ था. कहते हैं... इसी चर्चा से Indian Institute of Science   की नींव पड़ी.

मेरे प्यारे देशवासियो, हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई का जन्म 29 फरवरी को हुआ था. जैसा कि आप सभी जानते हैं कि यह दिन 4 वर्ष में एक बार ही आता है. सहज, शांतिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी, मोरारजी भाई देश के सबसे अनुशासित नेताओं में से थे. स्वतंत्र भारत में संसद में सबसे अधिक बजट पेश करने का Record मोरारजी भाई देसाई के ही नाम है. मोरारजी देसाई ने उस कठिन समय में भारत का कुशल नेतृत्व किया, जब देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को खतरा था. इसके लिए हमारी आने वाली पीढिय़ां भी उनकी आभारी रहेंगी. मोरारजी भाई देसाई ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल के खिलाफ आन्दोलन में खुद को झोंक दिया. इसके लिए उन्हें वृद्धावस्था में भी भारी कीमत चुकानी पड़ी. उस समय की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. लेकिन 1977 में जब जनता पार्टी चुनाव जीती तो वे देश के प्रधानमंत्री बने. उनके कार्यकाल के दौरान ही 44वां संविधान संशोधन लाया गया. यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि Emergency के दौरान जो 42वां संशोधन लाया गया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को कम करने और दूसरे ऐसे प्रावधान थे, जो हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करते थे - उनको वापिस किया गया. जैसे 44वें संशोधन के जरिये संसद और विधान सभाओं की कार्यवाही का समाचार पत्रों में प्रकाशन का प्रावधान किया गया. इसी के तहत, सुप्रीम कोर्ट की कुछ शक्तियों को बहाल किया गया. इसी संशोधन में यह भी प्रावधान किया गया कि संविधान के अनुछेद 20 और 21 के तहत मिले मौलिक-अधिकारों का आपातकाल के दौरान भी हनन नहीं किया जा सकता है. पहली बार ऐसी व्यवस्था की गई कि मंत्रिमंडल की लिखित अनुशंसा पर ही राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा करेंगे, साथ ही यह भी तय किया गया कि आपातकाल की अवधि को एक बार में छ: महीने से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है. इस तरह से मोरारजी भाई ने यह सुनिश्चित किया कि आपातकाल लागू कर, 1975 में जिस प्रकार लोकतंत्र की हत्या की गई थी, वह भविष्य में फिर दोहराया ना जा सके. भारतीय लोकतंत्र के महात्म्य को बनाए रखने में उनके अमूल्य योगदान को, आने वाली पीढिय़ां हमेशा याद रखेंगी. एक बार फिर ऐसे महान नेता को मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.

मेरे प्यारे देशवासियो, हर साल की तरह इस बार भीपद्म अवार्ड को लेकर लोगों में बड़ी उत्सुकता थी. आज हम एक न्यू इंडिया की ओर अग्रसर हैं. इसमें हम उन लोगों का सम्मान करना चाहते हैं जो Grass-Root Level पर अपना काम निष्काम भाव से कर रहे हैं. अपने परिश्रम के बल पर अलग-अलग तरीके से दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं. दरअसल वे सच्चे कर्मयोगी हैं, जो जनसेवा, समाजसेवा और इन सबसे से बढक़र राष्ट्रसेवा में नि:स्वार्थ जुटे रहते हैं. आपने देखा होगा जब पद्म अवार्ड की घोषणा होती है तो लोग पूछते हैं कि ये कौन है? एक तरह से इसे मैं बहुत बड़ी सफलता मानता हूं क्योंकि ये वो लोग हैं जो T.V., magazine या अख़बारों के Front Page पर नहीं हैं. ये चकाचौंध की दुनिया से दूर हैं, लेकिन ये ऐसे लोग हैं, जो अपने नाम की परवाह नहीं करते बस जमीनी स्तर पर काम करने में विश्वास रखते हैं. योग: कर्मसु कौशल:गीता के सन्देश को वो एक प्रकार से जीते हैं. मैं ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में आपको बताना चाहता हूं. ओडिशा के दैतारी नायक के बारे में आपने जरुर सुना होगा उन्हें Canal Man of The Odisha’ यूं ही नहीं कहा जाता, दैतारी नायक ने अपने गांव में अपने हाथों से पहाड़ काटकर तीन किलोमीटर तक नहर का रास्ता बना दिया. अपने परिश्रम से सिंचाई और पानी की समस्या हमेशा के लिए ख़त्म कर दी. गुजरात के अब्दुल गफूर खत्री जी को ही लीजिए, उन्होंने कच्छ के पारंपरिक रोगन पेंटिंग को पुनर्जीवित करने का अद्भुत कार्य किया. वे इस दुर्लभ चित्रकारी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बड़ा कार्य कर रहे हैं. अब्दुल गफूर द्वारा बनाई गई Tree of Life  कलाकृति को ही मैंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को उपहार में दिया था. पद्म पुरस्कार पाने वालों में मराठवाड़ा के शब्बीर सैय्यद गौ-माता के सेवक के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने जिस प्रकार अपना पूरा जीवन गौमाता की सेवा में खपा दिया ये अपने आप में अनूठा है. मदुरै चिन्ना पिल्लई वही शख्सियत हैं, जिन्होंने सबसे पहले तमिलनाडु में कलन्जियम आन्दोलन के जरिए पीडि़तों और शोषितों को सशक्त करने का प्रयास किया. साथ ही समुदाय आधारित लघु वित्तीय व्यवस्था की शुरुआत की. अमेरिका की Tao Porchon-Lynch के बारे में सुनकर आप सुखद आश्चर्य से भर जाएंगे. Lynch आज योग की जीती-जागती संस्था बन गई है. सौ वर्ष की उम्र में भी वे दुनिया भर के लोगों को योग का प्रशिक्षण दे रही हैं और अब तक डेढ़ हज़ार लोगों को योग शिक्षक बना चुकी हैं. झारखण्ड में Lady Tarzanके नाम से विख्यात जमुना टुडू ने टिम्बर माफिया और नक्सलियों से लोहा लेने का साहसिक काम किया उन्होंने न केवल 50 हेक्टेयर जंगल को उजडऩे से बचाया बल्कि दस हज़ार महिलाओं को एकजुट कर पेड़ों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रेरित किया. ये जमुना जी के परिश्रम का ही प्रताप है कि आज गाँववाले हर बच्चे के जन्म पर 18 पेड़ और लडक़ी की शादी पर 10 पेड़ लगाते हैं. गुजरात की मुक्ताबेन पंकज कुमार दगली की कहानी आपको प्रेरणा से भर देगी, खुद दिव्यांग होते हुए भी उन्होंने दिव्यांग महिलाओं के उत्थान के लिए जो कार्य किए, ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है. चक्षु महिला सेवाकुन्ज नाम की संस्था की स्थापना कर वे नेत्रहीन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के पुनीत कार्य में जुटी हैं. बिहार के मुजफ्फरपुर की किसान चाची, यानि राजकुमारी  देवी की कहानी बहुत ही प्रेरक है. महिला सशक्तिकरण और खेती को लाभकारी बनाने की दिशा में उन्होंने एक मिसाल पेश की है. किसान चाची ने अपने इलाके की 300 महिलाओं को Self Help Group  से जोड़ा और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने गांव की महिलाओं को खेती के साथ ही रोजग़ार के अन्य साधनों का प्रशिक्षण दिया. खास बात यह है कि उन्होंने खेती के साथ Technology को जोडऩे का काम किया और मेरे देशवासियों, शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि इस वर्ष जो पद्म पुरस्कार दिए गए उसमें 12 किसानों को पद्म पुरस्कार मिले हैं. आमतौर पर कृषि जगत से जुड़े हुए बहुत ही कम लोग और प्रत्यक्ष किसानी करने वाले बहुत ही कम लोग पद्मश्री की सूची में आये हैं. ये अपने आप में, ये बदलते हुए हिन्दुस्तान की जीती-जागती तस्वीर है.

मेरे प्यारे देशवासियो, मैं आज आप सब के साथ एक ऐसे दिल को छूने वाले अनुभव के बारे में बात करना चाहता हूं जो पिछले कुछ दिनों से मैं महसूस कर रहा हूं. आजकल देश में जहां भी जा रहा हूं, मेरा प्रयास रहता है कि आयुष्मान भारतकी योजना PM-JAYयानि PM जन आरोग्य योजना के कुछ लाभार्थियों से मिलूं. कुछ लोगों से बातचीत करने का अवसर मिला है. अकेली मां उसके छोटे बच्चे पैसों के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रही थी. इस योजना से उसका इलाज हुआ और वो स्वस्थ हो गई. घर का मुखिया, मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार की देखभाल करने वाला Accident का शिकार हो गया, काम नहीं कर पा रहा था - इस योजना से उसको लाभ मिला और वो पुन: स्वस्थ हुआ, नई जि़न्दगी जीने लगा.

भाइयों-बहनों पिछले पांच महीनों में लगभग बारह लाख गऱीब परिवार इस योजना का लाभ उठा चुके हैं. मैंने पाया कि गऱीब के जीवन में इससे कितना बड़ा परिवर्तन आ रहा है. आप सब भी यदि किसी भी ऐसे गऱीब व्यक्ति को जानते है जो पैसों के अभाव में इलाज नहीं करा पा रहा हो. तो उसे इस योजना के बारे में अवश्य बताइये. यह योजना हर ऐसे गऱीब व्यक्ति के लिए ही है.

मेरे प्यारे देशवासियो, स्कूलों में परीक्षा का समय शुरू होने ही वाला है. देशभर में अलग-अलग शिक्षा बोर्ड अगले कुछ हफ़्तों में दसवीं और बारहवीं कक्षा के board के इम्तिहान के लिए प्रक्रिया प्रारंभ करेंगें. परीक्षा देने वाले सभी विद्यार्थियों को, उनके अभिभावकों को और सभी teachers को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं हैं.

कुछ दिन पहले दिल्ली में परीक्षा पे चर्चाका एक बहुत बड़ा आयोजन town hall के format  में हुआ. इस town hall कार्यक्रम में मुझे technology के माध्यम से, देश-विदेश के करोड़ों students के साथ, उनके अभिभावकों के साथ, teachers के साथ, बात करने का अवसर मिला. परीक्षा पे चर्चाइसकी एक विशेषता यह रही कि परीक्षा से जुड़ें विभिन्न विषयों पर खुल कर बातचीत हुई. कई ऐसे पहलू सामने आए जो निश्चित रूप से विद्यार्थियों के लिए लाभदायक हो सकते हैं. सभी विद्यार्थी, उनके शिक्षक, माता-पिता YouTube पर इस पूरे कार्यक्रम की recording देख सकते हैं, तो आने वाली परीक्षा के लिए मेरे सभी exam warriors को ढेरों शुभकामनाएं.

मेरे प्यारे देशवासियो, भारत की बात हो और त्यौहार की बात न हो. ऐसा हो ही नहीं सकता. शायद ही हमारे देश में कोई दिन ऐसा नहीं होता है, जिसका महत्व ही न हो, जिसका कोई त्यौहार न हो. क्योंकि हज़ारों वर्ष पुरानी संस्कृति की ये विरासत हमारे पास है. कुछ दिन बाद महाशिवरह्यह्यात्रि का पर्व आने वाला है और इस बार तो शिवरात्रि सोमवार को है और जब शिवरात्रि सोमवार को हो तो उसका एक विशेष महत्व हमारे मन-मंदिर में छा जाता है. इस शिवरात्रि के पावन पर्व पर मेरी आप सब को बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं.

मेरे प्यारे देशवासियो, कुछ दिन पहले मैं काशी गया था. वहां मुझे दिव्यांग भाई-बहनों के साथ समय बिताने का मौका मिला. उनसे कई विषयों पर चर्चा हुई और उनका आत्मविश्वास वाकई प्रभावित करने वाला था- प्रेरक था. बातचीत के दौरान उनमें से एक प्रज्ञाचक्षु नौजवान से जब मैं बात कर रहा था तो उसने कहा मैं तो stage artist हूं. मैं मनोरंजन के कार्यक्रमों में mimicry करता हूं, तो मैंने ऐसे ही पूछ लिया आप किसकी  mimicry करते हो ? तो उसने बताया कि मैं प्रधानमंत्री की mimicry करता हूं. तो मैंने उनसे कहा जऱा कर के दिखाइये और मेरे लिए बड़ा सुखद आश्चर्य था, तो उन्होंने मन की बातमें जिस प्रकार से मैं बात करता हूं उसी की पूरी mimicry की, और मन की बातकी ही mimicry की. मुझे ये सुनकर बहुत अच्छा लगा कि लोग न सिर्फ मन की बातसुनते हैं बल्कि उसे कई अवसरों पर याद भी करते हैं. मैं सचमुच में उस दिव्यांग नौजवान की शक्ति से बहुत ही प्रभावित हुआ.

मेरे प्यारे देशवासियो, ‘मन की बातकार्यक्रम के माध्यम से आप सब से जुडऩा मेरे लिए एक अनोखा अनुभव रहा है. रेडियो के माध्यम से मैं एक तरह से करोड़ों परिवारों से हर महीने रूबरू होता हूं. कई बार तो आप सब से बात करते, आपकी चिट्ठियां पढ़ते या आपके फोन पर भेजे गए विचार सुनते मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपने मुझे अपने परिवार का ही हिस्सा मान लिया है. यह मेरे लिए एक बहुत ही सुखद अनुभूति रही है.

दोस्तों, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव होता है. अगले दो महीने, हम सभी चुनाव की गहमा-गहमी में व्यस्त होगें. मैं स्वयं भी इस चुनाव में एक प्रत्याशी रहूंगा. स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करते हुए अगली मन की बातमई महीने के आखरी रविवार को होगी. यानी कि मार्च महीना, अप्रैल महीना और पूरा मई महीना ये तीन महीने की सारी हमारी जो भावनाएं हैं उन सबको मैं चुनाव के बाद एक नए विश्वास के साथ आपके आशीर्वाद की ताकत के साथ फिर एक बार मन की बातके माध्यम से हमारी बातचीत के सिलसिले का आरम्भ करूंगा और सालों तक आपसे मन की बातकरता रहूंगा. फिर एक बार आप सबका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं.

-पसूका