विशेष लेख


volume-51, 16 - 22 March, 2019

प्लास्टिक संकट से बचने के उपाय

डॉ. श्री नाथ सहाय

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्लास्टिक के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई और आज प्लास्टिक का सर्वत्र इस्तेमाल किया जा रहा है. विभिन्न रूपों और आकारों में हर जगह प्लास्टिक छाया हुआ है. वर्ष 2015 में दुनिया में 44 करोड़ 80 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन हुआ, जो 1998 की तुलना में दोगुने से अधिक था. प्लास्टिक का सबसे अधिक उत्पादन चीन में होता है. इसके बाद उत्तरी अमरीका और यूरोप का स्थान है. भारत में 2018 के दौरान घरेलू  उपयोगके लिए लगभग 17 करोड़ 80 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन किया गया. प्लास्टिक के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हो रही है, जिसमें कमी आने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है.

प्लास्टिक का उपयोग अब बोतलों, सभी प्रकार के उपभोक्ता सामान, सेलफोन, रेफ्रिजरेटर जैसी चीजों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. इसका उपयोग घरेलू फर्नीचर, भवन निर्माण सामग्री और पाइप आदि  बनाने में किया जाता है. कारों, दो पहिया वाहनों और कपड़ों के लिए, आमतौर पर पॉलिएस्टर और अन्य माइक्रोफाइबर सामग्री के रूप में भी प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है. उत्पादित प्लास्टिक का 35 प्रतिशत से अधिक उपयोग पानी की बोतलों की तरह पैकेजिंग के लिए  किया जाता है.

प्लास्टिक अपशिष्ट का उपयोग जहां एक ओर व्यापक रूप में किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ यह तुरंत-त्वरित-कचरा बना दिया जाता है. जॉर्जिया विश्वविद्यालय के सह-लेखक जेना जमबेक के एक अध्ययन से पता चलता है कि कुल उत्पादित 9.1 अरब टन प्लास्टिक में से लगभग 7 अरब टन का  फिर से उपयोग नहीं हो पाता है. केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक का इस्तेमाल पुन: किया गया और अन्य 12 प्रतिशत का निपटान जला कर किया गया. इस तरह 5.5 अरब टन प्लास्टिक कचरा जमीन और पानी में डंप किया जा रहा है.

अन्य पदार्थों के विपरीत, प्लास्टिक एक ऐसा स्टॅफ  है जो स्वयं गल-सड़ कर नष्ट नहीं होता  है. अत: प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का लगभग 75 प्रतिशत भाग कचरे के रूप में सामने आता  है, जो भूमि पर बिखरा,  लैंडफिल स्थलों पर डंप और झीलों, नदियों और समुद्रों में तैरते हुए दिखायी देता है.

प्लास्टिक कचरे का अंबार: साइंटिफिक रिपोट्र्समें प्रकाशित एक अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि प्रशांत महासागर में बोतलें, बच्चों के खिलौने, टूटे हुए इलेक्ट्रॉनिक्स, कंटेनर, मछली पकडऩे के परित्यक्त जाल और माइक्रोप्रार्टिकल्स के विशाल डंप अब फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के संयुक्त आकार से बड़ा रूप धारण कर चुके  हैं. समुद्र में लगभग 80,000 टन प्लास्टिक पाया गया है, जो 500 जंबो जेटों के वजन के बराबर है. यह पहले से उजागर प्लास्टिक कचरे से 16 गुना अधिक है. हर वर्ष 80 लाख टन से अधिक प्लास्टिक महासागरों में डाला जा रहा है, जो पृथ्वी के चारों ओर पांच विशाल कचरा खंडों के रूप में जमा होता है.          

प्लास्टिक पर प्रतिबंध: प्लास्टिक कचरा आज एक बड़ा मुद्दा है. प्लास्टिक का प्रवेश हमारी खाद्य शृंखला में हो चुका है, इस संकट से छुटकारा पाने के लिए, यूरोपीय संघ ने एकल उपयोग वाले प्लास्टिक, स्टिरर, बैलून स्टिक और कॉटन बड्स पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया है. इसने 2025 तक अधिकांश प्लास्टिक की बोतलों के संग्रह का आग्रह किया है. प्रस्ताव में सदस्य देशों से कहा गया है कि वे प्लास्टिक खाद्य कंटेनरों और पीने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कपों का प्रयोग कम से कम करें. पूरी दुनिया में प्लास्टिक की समस्या का सबसे बुरा

असर खाद्य शृंखला पर पड़ता है. समुद्री कछुए प्लास्टिक के कचरे से मारे जाते हैं और इससे वन्यजीव भी दुष्प्रभावित होते हैं.

यूरोपीय संघ ने विश्वभर में समुद्री जीवों की समस्याओं के समाधान के लिए वैश्विक अनुसंधान और विकासशील देशों में कचरे के प्रबंधन में सुधार के लिए 61.4 पाउंड स्टर्लिंग (576 करोड़ रुपये) देने का वायदा किया है.

भारत में, कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया है. उत्तर प्रदेश में, उच्च न्यायालय ने 18 नवंबर, 2015 को राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए अधिसूचना जारी करे. सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया है, जिसमें 50 माइक्रोन से कम के पॉलीथीन, प्लास्टिक बैग और थर्माेकोल के विनिर्माण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है. 15 अगस्त, 2018 से प्लास्टिक और थर्मोकोल से कप, प्लेट, ग्लास और चम्मच आदि के विनिर्माण, भंडारण और वितरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है. इस अध्यादेश की अवहेलना  करने पर रु. 25,000/- तक जुर्माना और कारावास का प्रावधान है. सडक़ों पर और नालियों, झीलों, नदियों और महासागरों में प्लास्टिक सामग्री को फेंकना भी दंडनीय है. रेलवे विभाग ने भी पर्यावरण को बचाने के लिए इस प्रतिबंध को लागू करना स्वीकार किया है.

विकल्प: लोग यह अनुभव करते हैं, कि योजना अच्छीहै, लेकिन उनकी आशंका  है कि प्लास्टिक के विकल्प अधिक खर्चीले होंगे. पॉलिथीन के विकल्पों की बहुत कमी है और जो भी उपलब्ध है, उनकी कीमतों में बड़ी असमानता है. कपड़े और पटसन के थैलों के दामों में बेेेेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, जिससे उपभोक्ताओं पर वित्तीय दबाव बढ़ता है. कपड़ेे के थैले, पहले आमतौर पर 350-400 रुपये में मिल जाते थे, पर अब उनके लिए दुकानों पर 600/- रु. प्रति बैग वसूल किया जा रहा है. पैकेजिंग की लागत बढऩे के कारण सडक़ किनारे मिलने वाले भोजन अब महंगे हो गए हैं. भोजन स्थलों, रेस्तरांओं, कैफे, ढाबों के उपभोक्ता उनके प्रबंधकों से भी अधिक परेशान हैं. समान कीमत पर भोजन परोसने के लिए इको-फ्रेंडली, सस्ते उत्पाद बनाने की जरूरत है. प्लास्टिक के कटोरे के स्थान पर अन्य क्रॉकरी का उपयोग, व्यंजन को महंगा बनाता है. वितरण कार्य के लिए टिकाऊ अखबार या कपड़े के थैले, पुन: प्रयोज्य कांच के बर्तन और क्रॉकरी की आवश्यकता है. टिकाऊ विकल्पों की कमी प्लास्टिक को नहींकहने के उद्देश्य को विफल कर देती है.

वूलवर्थ और कोल्स ने पर्यावरण के अधिक अनुकूल, पुन: प्रयोज्य बैग की पेशकश करने की घोषणा की है. उत्तर प्रदेश में एक नव गठित माटी कला बोर्ड प्लास्टिक के विकल्प के रूप में कुल्हड़ (मिट्टी के कप) के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है. राज्य सरकार इस कार्य के लिए कारीगरों को कर से पूर्ण छूट प्रदान करने के साथ ही पट्टे पर भूमि उपलब्ध कराएगी तथा मुफ्त बिजली और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण जैसी सुविधाएं प्रदान करेगी. विशेष पॉटरी हब भी स्थापित किए जाएंगे. यह पर्यावरण के अनुकूल उपाय होगा, और इससे कुम्हार समुदाय को आर्थिक लाभ होगा, जिसकी उत्तर प्रदेश की आबादी में लगभग दो करोड़ की हिस्सेदारी है.

कितना नुकसानदायक?: प्रयुक्त सामग्री के कारण, 1 किलो प्लास्टिक के निर्माण में 6 किलो कार्बनडाई ऑक्साइड (सीओ2) उत्पन्न होती है. महाराष्ट्र में, 15 वर्षों में प्लास्टिक के उपयोग के कारण, प्रत्येक परिवार द्वारा 1800 किलो कार्बनडाई ऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जित की गई. राज्य के 4 करोड़ परिवारों द्वारा 15 वर्षों में उत्सर्जित कार्बनडाई ऑक्साइड (सीओ2) को अवशोषित करने के लिए 24 करोड़ पेड़ों की आवश्यकता होगी.

वापसी खरीद व्यवस्था: महाराष्ट्र में प्रति दिन 2400 टन प्लास्टिक-कचरा उत्पन्न होता है. राज्य में 15  वर्षों के दौरान, 131.4 लाख टन प्लास्टिक-कचरा उत्पन्न हुआ है. समस्या से निपटने के लिए, महाराष्ट्र सरकार ने अपशिष्ट-प्लास्टिक के लिए बायबैक यानी वापस खरीद योजना शुरू की है. यह योजना अमरीका, जर्मनी और नॉर्वे  जैसे 40 देशों में पहले से लागू है. ब्रिटेन भी जल्द ही इसे शुरू करने की योजना बना रहा है. योजना के तहत, निर्माताओं द्वारा प्लास्टिक के बोतलबंद या पाउच उत्पाद के क्रेता से एक वापसी योग्य राशि ली जाएगी. बोतलबंद या पाउच उत्पाद को रिटेलर के साथ या रिवर्स वेंडिंग मशीनों को लौटाने पर यह राशि वापस कर दी जाती है. पीईटी (पॉलीथीन टेरेफेलेट) की बोतलों और दूध के पाउचों को इकट्ठा करने और पुनर्चक्रण करने का दायित्व निर्माताओं का है. पुनर्चक्रण को प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 में विनिर्माण लाइसेंस का मानदंड बनाया गया है. कोका-कोला, पेप्सिको और बिसलेरी जैसी शीर्ष पेय-पदार्थ निर्माता कंपनियां महाराष्ट्र में बेची गई पीईटी बोतलों पर बायबैक मूल्य छाप रही हैं. इससे कोई भी उपभोक्ता पीईटी बोतलों और पाउचों को भूमि या नदियों में फेंकने, जो कानूनी अपराध है, के बजाय विनिर्माता के पास जमा कराएगा और जमा राशि की वापसी का दावा करेगा. सुझाई गई दरों के अनुसार एक लीटर या उससे अधिक की बोतल के लिए एक रुपया प्रति बोतल, 200 मिलीलीटर से एक लीटर तक की बोतल के लिए दो रुपये और प्रति दूध पाउच 50 पैसे निर्धारित किए गए हैं. रीसाइकिल किए गए प्लास्टिक का उपयोग औद्योगिक ईंधन और सडक़ एवं भवन निर्माण आदि के लिए किया जाएगा. रीसाइकलिंग को प्रोत्साहित करने के लिए फ्रांस ने प्लास्टिक से पहली बार बनी बोतलों का दाम अधिक निर्धारित किया है और उन्हें रीसाइक्ल्डि प्लास्टिक से बनी सस्ती बोतलों के साथ बदले का विकल्प प्रदान किया है. उसने लैंडफिल पर करों में वृद्धि करने, रीसाइकलिंग गतिविधियों पर मूल्य संवर्धित कर कम करने और उत्पाद मूल्य पर 10 प्रतिशत तक छूट देने की भी योजना बनाई है।

ई-कचरा और जैव चिकित्सा अपशिष्ट: केंद्रीय सरकार ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तहत निगरानी के लिए ई-कचरे और जैव-चिकित्सा कचरे के बेहतर प्रबंधन और संशोधित लक्ष्य के लिए मौजूदा नियमों में संशोधन किया है. निर्माता संगठनों के लिए अब यह आवश्यक है कि वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ खुद को पंजीकृत करें, ताकि  उन पर बेहतर नियंत्रण रखा जा सके. इलेक्ट्रॉनिक सामान निर्माताओं को यह दायित्व सौंपा गया है कि वे अब उपभोक्ताओं से ई-कचरे को एकत्र करेंगे और उसे अधिकृत विघटनकर्ताओं और रिसाइकर्ताओं को सौंपेंगे. पर्यावरण मंत्रालय ने ई-कचरा प्रबंधन नियमों में संशोधन किया है ताकि उन्हें पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सके. बायोमेडिकल कचरे के लिए, अस्पतालों और संबद्ध क्लीनिकों पर क्लोरीनयुक्त प्लास्टिक बैग और दस्तानों के उपयोग पर पाबंदी लगाई गई है. रेलवे ने प्लास्टिक की बोतलों को नष्ट करने के लिए स्टेशनों पर मशीनें लगाई हैं.

प्लास्टिक - ईटिंग बैक्टीरिया और एंजाइम:   मॉर्गन वेग नामक एक विद्यार्थी (रीड कॉलेज, ओरेगन) ने एक ऐसेे बैक्टीरिया की खोज की है जो प्लास्टिक को खानेमें सक्षम है और संभवत: इसे हानिरहित उप-उत्पादों में तोड़ देता है.

कुछ साल पहले, जापानी शोधकर्ताओं ने एक प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले जीवाणु की खोज की थी, जिसे इडेनेला सकाइन्सिस के रूप में जाना जाता है, जो प्लास्टिक की बोतलों में इस्तेमाल होने वाले एक विशेष तरह के प्लास्टिक, पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) को खा जाता है. यह पता लगाने के प्रयास के दौरान कि पेटासे नाम का इसका एक एंजाइम कैसे काम करता है, वैज्ञानिकों ने कवक और बैक्टीरिया में क्यूटिनासे नाम के एक और एंजाइम की खोज की. उन्होंने यह पाया कि उत्परिवर्तित एंजाइम उससे भी बेहतर था, जिससे प्लास्टिक की पूर्ण रीसाइकलिंग हो सकती है. अब शोधकर्ता औद्योगिक उपयोग के लिए एंजाइम के और सुधार पर काम कर रहे हैं.

प्लास्टिक के खिलाफ युद्ध: प्लास्टिक प्रदूषण का खात्मा करेंयह वर्ष 2018 के विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून, 2018) का विषय रहा था. इस अवसर पर भारत में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था. भारत सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पत्र लिखा है कि वे एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के उपयोग के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू करें और मोटाई में 50 माइक्रोन से कम के कैरी-बैग के उपयोग को अवैध घोषित करें. पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यों में काफी हद तक जागरूकता पैदा की है. कई राज्यों ने अपनी कार्ययोजना बना ली है, और कुछ कॉरपोरेट घरानों ने बैग आदि बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया है.

इससे पहले भी वर्ष 2016 में भारत सरकार  ने उक्त मोटाई के पॉलीथीन बैग के उपयोग पर प्रतिबंध जारी किया था, लेकिन अधिकांश राज्य इसे लागू नहीं कर सके, उसे विशेषकर विकल्पों की कमी का सामना करते हुए, विक्रेताओं और छोटे व्यवसायियों के विरोध का सामना करना पड़ा. इस बार, पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यों को काफी हद तक संवेदनशील बनाया है. कई राज्यों ने अपनी कार्ययोजना बना ली है, और कुछ कॉरपोरेट घरानों ने बैग आदि बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया है. भारत प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए वैश्विक नेता की भूमिका संभालने का प्रयास करता है.

जन जागरूकता पैदा करना: विद्यार्थी प्लास्टिक के बढ़ते खतरे के प्रति अधिक सजग हैं. इसके प्रति जनता में जागरूकता पैदा करने के लिए पोस्टर, बैनर, नारों, गीतों और नुक्कड़-नाटकों का प्रयोग किया जा रहा है. ला मार्टिनियर गल्र्स कॉलेज, लखनऊ (उ.प्र) में प्रयुक्त कपड़ों और अपशिष्ट पदार्थों से बनाए गए शॉपिंग बैग, पाउच, बड़े कैरी-बैग और कुशन कवर आदि सामान प्रदर्शित किया गया, जिसका लक्ष्य लोगों को यह जानकारी देना था कि उनका इस्तेमाल  प्लास्टिक के विकल्प के रूप में किया जा सकता है. प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचने के लिए लोगों को पूरी तरह जागरूक बनाने की जरूरत है.

लेखक लखनऊ में शिक्षाविद् हैं. ई-मेल shrinsahai29in@yahoo.com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.