विशेष लेख


Volume-10, 8 - 14 June 2019

भारतीय चिंतन और पर्यावरण की चिंता

प्रवीण दत्त शर्मा

ज हम पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं. जल, थल, गगन सबको हमने प्रदूषित कर दिया है. लेकिन यदि हम भारत के ग्रंथ, वेद, आध्यात्मिक विभूतियों की जीवनियों का अवलोकन करें, तो पाएंगे कि प्राचीन काल पर्यावरण संरक्षण के प्रति कितना सजग था. धर्म और आध्यात्म के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उसे पल्लवित और पोषित भी किया. यदि हम अपनी संास्कृतिक अवधारणाओं को आत्मसात करते तो स्वत: ही प्रकृति का संरक्षण हो जाता और आज इस पर इतना चिंतित होने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.

पर्यावरण और पौराणिक व प्रागैतिहासिक काल : हमारे पूर्वजों, महापुरुषों को प्रकृति की महत्ता का भली-भांति भान था. कमोबेश सभी कालखंडों में पौराणिक पात्रों, इतिहास पुरुषों ने पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखा और प्रकृति को सहेजने की दिशा में जितने प्रयास किए जा सकते थे, किए. वैदिक काल में तो वनों को देवता की तरह पूजा गया है. वृक्षों की पूजा उन दिनों देवी-देवताओं की तरह की जाती थी. धरती को हमारी संस्कृति में माता माना गया है और उसकी रक्षा का संकल्प लिया गया है.  भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है और लिखा गया है- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी. नारद पुराण में प्रभु भक्तों को वृक्ष लगवाने, तालाब खुदवाने, बाग लगाने जैसे सुझाव दिए गए हैं.

अथर्ववेद में वायु की शुद्धता, पानी की स्वच्छता एवं घनी वनस्पति का उल्लेख किया गया है. मतस्यपुराण में वृक्ष महोत्सव का वर्णन है. यहां एक वृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर बताया गया है. वराह पुराण में वृक्षारोपण को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बताया गया है. भारतीय संस्कृति की देन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति, वनस्पति और जड़ी बूटियों पर आधारित है.

गीता में तो अनेक स्थानों पर प्रकृति के महत्व का वर्णन कर, लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित किया गया है. श्रीकृष्ण ने तो नदियों, वन आदि को संरक्षित करने के अनेक प्रयास उस समय में किए हैं. श्रीमद्भागवत के अनुसार कृष्ण ने नागराज वासुकि को इसलिए दंड दिया, क्योंकि वह यमुना के अन्दर रहकर यमुना के पवित्र जल को अपने विष से प्रदूषित कर रहा था. मौर्यकाल में तो प्रकृति का संरक्षण करना और उसके प्रति लोगों को सचेत करना शासन का प्रमुख कार्य बन गया था. सम्राट अशोक ने तो प्रकृति को सहेजने के लिए अपने शासन काल में पेड़-पौधों और उपवनों काननों की स्थापना की.

पर्यावरण और महात्मा गांधी: इस वर्ष महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई जा रही है. महात्मा गांधी ने भी पर्यावरण पर समग्र चिंतन किया है. बापू ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के विभिन्न कारकों और उसे संरक्षित रखने के विभिन्न उपायों पर अपने विचार रखे हैं. अपने लेख स्वास्थ्य की कुंजी में उन्होंने स्वच्छ वायु पर अपने विचार व्यक्त किए हैं. इसमें उन्होंने कहा है कि तीन प्रकार के प्राकृतिक पोषण की आवश्यकता होती है-हवा, पानी और भोजन, लेकिन स्वच्छ वायु सबसे आवश्यक है.

गांधीजी ने अपने चिंतन में पर्यावरण शब्द का सीधा जिक्र नहीं किया है, लेकिन उनके चिंतन में पर्यावरण की चिंता अवश्य झलकती है. अपनी पुस्तक हिन्द स्वराजमें उन्होंने मशीनों का विरोध किया है और हाथ के श्रम को महत्व दिया है. मशीनीकरण के विरोध के जरिए उन्होंने लोगों को समझाया है कि अनावश्यक मशीनीकरण पर्यावरण को हानि पहुंचाता है, इसलिए हाथ के हुनर को महत्व देना चाहिए. गांधीजी ने भारतवासियों का परिचय चरखे से करवाया. लोगों को चरखे से सूत कातने व उससे बुने वस्त्र पहनने को पहने के लिए प्रेरित किया. इसके पीछे उनका उद्देश्य स्वदेशी के प्रति अलख जगाना तो था ही, साथ ही कपड़ा मिलों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों और कचरे को कम करना भी था. गांधी जी प्रकृति प्रेमी थे और चाहते थे कि इस सुंदर प्रकृति को निज स्वार्थ हेतु मानव खराब ना करे.

वास्तव में हमारे पूर्वज पर्यावरण की महत्ता को जानते थे. वे जानते थे कि मानव जीवन के लिए वन, नदियों, तालाबों, वायु का कितना महत्व है. इसलिए उन्होंने इनकी पूजा कर, इन्हें माता या देवता का दर्जा देकर लोगों को ये संदेश दिया कि हमें इनका विनाश करने की बजाय संरक्षण करना चाहिए. सत्यं शिवम् सुन्दरम् का मंत्र हम भारतीयों के जीवन का आधार रहा है. गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था, ‘‘पर्यावरण से मानव का अभिप्राय कुछ ग्रहण करना नहीं, बल्कि संपूर्ण रूप से उसे जानना और अपने चारों ओर के वातावरण के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रहना था.’’

वर्ष 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर में भारी वर्षा के कारण भारी तबाही आप सबको याद ही होगी, जिसमें अनेक श्रद्धालु काल कलवित हो गए. हालांकि इस तबाही का कारण भारी वर्षा माना गया. लेकिन इस त्रासदी के बाद पर्यावरणविदें, प्रबुद्ध जनों के आकलन में यह बात निकलकर सामने आई कि इस त्रासदी का एक कारण वहां 70 के करीब चल रही जल विद्युत परियोजनाएं हैं. इन परियोजनाओं के चलते नदियों के प्रवाह पर प्रभाव पड़ा और भूस्खलन और बाढ़ की स्थिति बनी. यह खतरा अभी टला नहीं है और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रकृति से छेड़छाड़ खत्म नहीं की गई, तो फिर ऐसी दुखद घटनाएं सामने आ सकती हैं.

वर्तमान समय में पर्यावरण की चिंता सबसे ज्यादा की जा रही है. लेकिन उस चिंता में गंभीर चिन्तन दिखाई नहीं दे रहा. वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित सम्मेलन से ही 4 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की परंपरा का आरंभ हुआ. लेकिन यह दिवस एक परंपरा ही बनकर रह गया. पूरा वर्ष हम पर्यावरण के संतुलन के विरूद्ध कार्य करते हैं, लेकिन एक दिन पर्यावरण की चिंता करते हैं. पर्यावरण दिवस को हमने एक रस्म बना दिया है. लेकिन अब हमें चेतना ही होगा. पर्यावरण संबंधी जो आंकड़ें प्राप्त हो रहे हैं, वे हमारे लिए खतरे की घंटी हैं. एक अनुमान के मुताबिक देश में प्रतिवर्ष 13 लाख हैक्टेयर वन नष्ट हो रहे हैं. देश की लगभग 8 लाख हैक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष बीहड़ होती जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग एक लाख टन कीटनाशक रसायनों का उपयोग प्रतिवर्ष हो रहा है, जिससे 96000 टन कृषि उपज की हानि होती है. हमारा भारत नदियों का देश कहलाता है. लेकिन अधिकांश नदियों का जल पीने योग्य नहीं है. गौमुख से निकलने वाली गंगा की निर्मल धारा कानपुर तक आते-आते यहां के उद्योगों के अपशिष्टों के हवाले होकर गंदा नाला नजर आती है. दिल्ली में यमुना का प्रदूषण किसी से छुपा नहीं है. मध्य प्रदेश में शिप्रा जैसी नदियां भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. वहीं देश के अधिकांश बड़े शहर वायु प्रदूषण के संकट से जूझ रहे हैं. राजधानी दिल्ली में तो हर सर्दी में वायु में प्रदूषण की मात्रा अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर रही. पर्यावरण के संरक्षण हेतु अनेक कानून और नियम हैं. राज्य स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हैं. भारत सरकार ने पर्यावरण सुरक्षा संबंधी 1986 के कानून में 19941997 में संशोधन किया है और नये उद्योगों को लगाने व पर्यावरण के अन्य मानकों की नई मर्यादाएं तय की हैं. लेकिन ये नियम कानून और बोर्ड तब तक पूर्ण प्रभावी नहीं होंगे, जब तक हम लोग इसमें भागीदार नहीं होंगे.

जैसा कि हमने आरंभ में जिक्र किया कि हमारे पूर्वज प्रकृति से प्रेम करते थे और स्वत: ही पर्यावरण को संभालकर रखते थे, वही भाव हमें भी अपने अंदर लाना होगा. अब यह अनिवार्य हो गया है कि सरकारी प्रयासों के अतिरिक्त हमें भी पर्यावरण रक्षा के लिए सजग होना होगा. सांसारिक सुविधाओं पर अपनी निर्भरता त्यागकर पर्यावरण का प्रबंधन करना होगा. हम अपने प्राचीन गं्रथों, पूर्वजों की बातों का अनुसरण करें. आज हमें ‘‘सामाजिक वानिकी’’ की ओर लौटना होगा. यह सामाजिक वानिकी समाज सेवा के उद्देश्य से किए जाने वाला वनीकरण है. यह प्राचीन ग्रामीण विधि है. प्रसिद्ध समाज विज्ञानी एम सीताराम राव ने अपनी पुस्तक ‘‘ सोशल फोरेस्ट्री में सामाजिक वानिकी के प्रमुख कार्यों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार खेतों पर वायु अवरोध लगाना, सुरक्षा पट्टियां तैयार करना, सडक़ के दोनों और सघन वृक्षावली लगाना, तालाबों के पास घना वृक्षारोपण, भूमि संरक्षण हेतु वृक्षारोपण आदि सामाजिक वानिकी के प्रमुख कार्य हैं. इससे प्रदूषण में कमी आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी. विकास योजनाओं के तहत निर्मित बांधों, तालाबों, नहरों, सडक़ों आदि को भूमि कटाव से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा व वन सुरक्षित रह सकेंगे.

हमें अपना दृष्टिकोण व्यापक बनाना होगा और पृथ्वी को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लेना होगा. ध्यान रखिए प्रकृति है, तभी हम हैं और हमारी जड़ें प्रकृति में ही हैं.

गंगा भवानी भवन,

शिव कॉलोनी, नारनौल (हरियाणा)

Praveen.parag@gmail.com व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.