विशेष लेख


Volume-10, 8 - 14 June 2019

पर्यावरण के बुनियादी सिद्धांतों की समझ-II

श्रेया भट्टाचार्य

सभी जीव समूहों के स्थायी विकास, बढ़ोतरी और प्रजनन के लिए संतुलित वातावरण अनिवार्य है. जीव समूहों के लिए अपेक्षित सभी घटक पर्यावरण में विद्यमान हैं. किसी एक या अन्य कारण से पर्यावरण का संतुलन बिगडऩे पर जीव समूहों का अस्तित्व कठिन हो जाता है. पर्यावरण का संतुलन वातावरण में कुछ हानिकारक और अवांछित घटकों के प्रवेश से बिगड़ सकता है. पर्यावरण पर विशेष शृंखला के इस दूसरे आलेख में हम विभिन्न प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण और उनके दुष्प्रभावों पर विचार करेंगे. पर्यावरण प्रदूषण सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दों में से एक है, जिनका सामना आज धरती पर मानव और अन्य जीवों को करना पड़ रहा है.

प्रदूषण

प्रदूषण पर्यावरण में विषाक्त तत्वों के प्रवेश के कारण होता है, जो मानव, पशुओं, पौधों और अन्य जीव समूहों पर दुष्प्रभाव डालता है और हानि पहुंचाता है. पर्यावरण प्रदूषण को इस रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है, ‘‘धरती/वायुमंडल प्रणाली के भौतिक और जैविक घटकों का इस हद तक विषाक्त होना कि सामान्य पर्यावरण प्रक्रियाओं पर उनका दुष्प्रभाव पड़े’’. यह स्थिति उस समय उत्पन्न होती है, जब पर्यावरण मानव गतिविधियों के नुकसानदायक सह-उत्पादों के निपटान और उन्हें निष्क्रिय करने में विफल रहता है. इन सह-उत्पादों में ठोस औद्योगिक कचरा या ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन शामिल हैं, जिन्हें उपयुक्त अवधि में पर्यावरण प्रणाली को ढांचागत या कार्यात्मक क्षति पहुंचाए बिना, निष्क्रिय करने की आवश्यकता होती है. हमारे आसपास के वातावरण में पूर्ण या व्यापक प्रतिकूल बदलाव मनुष्य के क्रियाकलापों का सह-उत्पाद है. यह हमारे संसाधनों के सदुपयोग पर भी विपरीत असर डालता है. प्रदूषण की उत्पत्ति ठोस, तरल या गैसीय रासायनिक तत्वों, अथवा तापमान, प्रकाश या ध्वनि जैसी ऊर्जा के रूप में होती है.

प्रदूषक

प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को प्रदूषकों के रूप में जाना जाता है. ये प्राकृतिक रूप में घटित होने वाले तत्व या ऊर्जा हैं, लेकिन वातावरण में इनकी मौजूदगी प्राकृतिक स्तरों से अधिक होने पर उन्हें विषाक्त तत्व समझा जाता है. प्रदूषकों में नाइट्रोजन ऑक्साइड अथवा सल्फर ऑक्साइड जैसे रसायन, धूल या अवसादी जैसे भूरासायनिक तत्व, बायोलॉजिकल जीव समूह या उत्पाद, अथवा तापमान, विकिरण या ध्वनि तरंगें शामिल हैं, जो मानव द्वारा वातावरण में छोड़े जाते हैं, जिनका वास्तविक या संभावित, नुकसानदायक या असुविधाजनक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है. प्रदूषकों की प्रकृति और उनका संकेंद्रण प्रदूषण की भीषणता का निर्धारण करते हैं. पारिस्थितिकी दृष्टि से प्रदूषकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

1.            अपघटीय अथवा अस्थाई प्रदूषक: ऐसे प्रदूषक, जिन्हें तेजी से प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए अपघटित किया जा सकता है, अपघटीय अथवा अस्थाई प्रदूषक कहलाते हैं. उदाहरण के लिए मल-जल, कागज उत्पाद, सब्जियां, जूस, बीज और पत्तियां. ये तभी नुकसान पहुंचाते है. जब इनकी मात्रा पर्यावरण में बहुत अधिक होती है. इन प्रदूषकों को प्रकृति में स्वाभाविक, नुकसान रहित तत्वों के रूप में अपघटित किया जा सकता है, जो बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्म जीव समूहों की सक्रियता से निर्धारित अवधि में अपघटित हो जाते हैं.

2. गैर-अपघटीय प्रदूषक: कुछ प्रदूषक ऐसे होते हैं, जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए नष्ट नहीं किए जा सकते. उन्हें गैर-अपघटीय प्रदूषक कहा जाता है. इन प्रदूषकों को स्वाभाविक, नुकसान रहित तत्वों में अपघटित नहीं किया जा सकता. प्लास्टिक, पोलिथीन की थैलियां, डीडीटी, कीटनाशक, जीवाणुनाशक, पारा, सीसा, आर्सेनिक आदि प्रदूषक इसके उदाहरण हैं.

प्रदूषण का वर्गीकरण

पर्यावरण प्रदूषण को निम्नांकित रूपों में विभाजित किया जा सकता है:

1.            वायु प्रदूषण

2.            जल प्रदूषण

3.            ध्वनि प्रदूषण

4.            समुद्री प्रदूषण

5.            मृदा प्रदूषण

6.            ताप प्रदूषण

7.            परमाणु खतरे

इस आलेख में हम दो प्रमुख पर्यावरण प्रदूषणों पर विचार करेंगे, ये हैं - वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण

विश्वभर में 92 प्रतिशत लोग स्वच्छ हवा में सांस नहीं लेते है.

वायु प्रदूषण से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हर वर्ष 5 ट्रिलियन डॉलर की लागत आती है, जो प्रदूषण से निपटने के लिए कल्याण कार्यों पर खर्च होते हैं.

जमीनी स्तर के ओज़ोन प्रदूषण से 2030 तक प्रमुख फसलों की पैदावार में 26 प्रतिशत कमी आएगी।

1. वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण को इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है कि वातावरण में विद्यमान तत्वों का उनके प्राकृतिक स्तरों से अधिक संकेंद्रण और मानव, अन्य जीव समूहों और सामान्यत: पारिस्थितिकी प्रणाली को दुष्प्रभावित करने की विपरीत क्षमता. इन तत्वों या वायु प्रदूषकों में गैस, तरल पदार्थ और ठोस कण शामिल हैं. उत्सर्जन के स्रोत के अनुसार इन्हें दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है: प्राथमिक और गौण प्रदूषक.

प्राथमिक प्रदूषक: प्राकृतिक घटनाओं या मानव गतिविधियों से प्रत्यक्ष रूप में उत्सर्जित प्रदूषकों को प्राथमिक प्रदूषक कहा जाता है. प्राकृतिक घटकों में आंधी; ज्वालामुखी आदि तथा मानव गतिविधियों में वाहनों, औद्योगिक कचरे से होने वाला उत्सर्जन शामिल है. वैश्विक वायु प्रदूषण में 5 प्रदूषकों का करीब 90 प्रतिशत योगदान है. ये हैैं:

1. कार्बन मोनो-आक्साइड (सीओ): कार्बन मोनो-आक्साइड (सीओ) रंग रहित, गंध रहित और विषाक्त वायु प्रदूषक हैं, जिनकी उत्पत्ति उस समय होती है, जब गैसोलिन, प्राकृतिक गैस, तेल, कोयला और लकड़ी जैसे ईंधनों में कार्बन पूरी तरह से नहीं जल पाता है. यह आमतौर पर मोटर वाहनों और उद्योग से पैदा होता है. कार्बन मोनो-आक्साइड का स्तर शीत ऋतु में सबसे अधिक होता है, क्योंकि शीत तापमान ज्वलनशीलता में कमी लाते हैं और प्रदूषकों को जमीन के निकट एकत्र होने में मदद करते हैं. कार्बन मोनो-ऑक्साइड का स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है. वायु प्रदूषक सांस के जरिए शरीर में पहुंचते हैं और रक्त हिमोग्लोबिन से जुडक़र कार्बोक्सिल हिमोग्लोबिन की उत्पत्ति ऑक्सिहिमोग्लोबिन के सृजन की दर से 210 गुना अधिक तेजी से करते हैं, जिससे स्वशन प्रक्रिया बाधित होती है. ये मस्तिष्क, हृदय और शरीर के अन्य अंगों तथा ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुंचने की मात्रा में कमी लाते हैं. कार्बन मोनो-आक्साइड का स्तर बहुत ऊंचा होने पर मृत्यु तक हो सकती है.

2. हाइड्रोकार्बन्स: हाइड्रोकार्बन एक कार्बनिक मिश्रण है, जिसमें केवल हाइड्रोजन और कार्बन अणु होते हैं. लगभग सभी हाइड्रो कार्बन आधुनिक सभ्यता की संचालक शक्ति समझे जाने वाले खनिज तेल जैसे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं. कुछ सामान्य हाइड्रोकार्बन्स के अंतर्गत मिथेन (सीएस 4), ईथेन (सी2एच6), प्रोपेन (सी3एच8), बूटेन (सी4एच10), पेनटेन (सी5एच12), और हेक्सेन (सी6एच14) आते हैं. हाइड्रोकार्बन स्वयं कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, लेकिन जब वे धूप अथवा नाइट्रोजन ऑक्साइड के संपर्क में आते हैं, तो उससे एक रासायनिक अनुक्रिया होती है, जिसका ग्रीन हाउस पर विपरीत असर पड़ता है और उससे ओज़ोन की परत का ह्रास होता है. वे पौधों की फोटोसिन्थेटिक क्षमता को कम करते हैं, मानव और पशुओं में श्वसन के रोग बढ़ाते हैं तथा कैंसर की दर में बढ़ोतरी करते हैं.

3. नाइट्रोजन ऑक्साइड : नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रकाश और मृदा में सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं से प्राकृतिक रूप में उत्पन्न होते हैं. परंतु वे शहरी क्षेत्रों में मुख्य रूप से जीवाष्म ईंधन (गैसोलिन और डीजल ईंजन) के दहन से उत्सर्जित होते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में खेती पद्धतियों, मुख्य रूप से कृत्रिम उर्वरकों के इस्तेमाल से पैदा होते हैं. नाइट्रोजन ऑक्साइड से श्वसन प्रणाली पर कई तरह के दुष्प्रभाव पड़ते हैं.

4. कणिक पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर): कणिक पदार्थ, जो कणिक प्रदूषण अथवा पीएम के रूप में भी जाने जाते हैं, का अर्थ है, बहुत छोटे ठोस कण अथवा वायु में छोड़ी गई तरल बूंदें. ये विभिन्न घटकों से बनते हैं, जिनमें नाइट्रेट्स, सल्फेट्स, आर्गेनिक रसायन, धातुएं, मृदा या धूल कण शामिल हैं. यह प्रदूषण मुख्य रूप से मोटर वाहनों, लकड़ी जलाने और उद्योग से उत्पन्न होता है.

5. सल्फर डाइऑक्साइड: सल्फर डाइऑक्साइड अत्यंत रिएक्टिव गैस है, जिसकी गंध बहुत तेज होती है. इसका मुख्य स्रोत एन्थ्रोपोजेनिक है और ये बिजली संयंत्रों तथा अन्य औद्योगिक केंद्रों में जीवाष्म ईंधन के जलने से बनते हैं. ज्वालामुखी फटने, जैविक पदार्थ के अपघटन और दहन, जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से भी सल्फर गैसों की उत्पत्ति होती है. इससे कणिक पदार्थ प्रदूषण होता है. सल्फर डाइऑक्साइड नाक, गला और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है और इससे अस्थमा जैसी विद्यमान श्वसन संबंधी बीमारी और भी बढ़ जाती है. इससे कार्डियोवेस्कुलर बीमारी के और बढऩे की भी आशंका रहती है.

गौण प्रदूषक: गौण प्रदूषक एक वायु प्रदूषक है, जो स्वयं प्राथमिक प्रदूषकों के बीच और अन्य वायुमंडलीय घटकों के बीच रासायनिक या भौतिक अनुक्रियाओं का परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए इनमें जमीनी स्तरीय ओज़ोन, एसिड रेन और पोषक तत्व बढ़ाने वाले रसायन शामिल हैं.

1. जमीनी-स्तरीय ओज़ोन: धूप और गतिहीन वायु में मौजूद हाइड्रोकार्बन्स और नाइट्रोजन ऑक्साइड मिल कर ओजोन का निर्माण करते हैं. यह एक रंगहीन, अत्यंत ज्वलनशील गैस है, जिसमें भीनी सुगंध होती है. इसके प्रभाव से समय पूर्व मृत्यु हो सकती है और यह स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख समस्याओं में से एक है. ओजोन का दुष्प्रभाव वनस्पति, फसल उत्पादकता पर भी पड़ता है और यह कपास और पोलिएस्टर जैसे कृत्रिम पदार्थों और कपड़ों को भी हानि पहुंचाती है.

2. एसिड रेन : एसिड रेन एक तरह की वर्षा का स्वरूप है, जिसमें सल्फरिक या नाइट्रिक एसिड जैसे अम्लीय घटक पाए जाते हैं,  जो आद्र्र या खुश्क रूप में वायुमंडल से जमीन पर गिरते हैं. इनमें वर्षा, हिमपात, कोहरा, ओले अथवा अम्लीय आंधी भी शामिल है. वायु अम्लीय मिश्रणों को वातावरण में समाहित करती है और वे बाद में खुश्क या आद्र्र रूप में जमीन पर गिरते हैं. धरती पर आकर अम्लीय वर्षा पौधों और वृक्षों को नुकसान पहुंचाती है और जल निकायों एवं मृदा के अम्लीय स्तरों को बढ़ा देती है, जिससे पारिस्थितिकी प्रणाली को नुकसान पहुंचता है. अम्लीय वर्षा भवनों को भी नुकसान पहुंचाती है और इससे आंखों में जलन हो सकती है.

2. जल प्रदूषण: जल प्रदूषण का अर्थ है झीलों, नदियों, समुद्रों और अन्य जल निकायों का जहरीले पदार्थों अथवा प्रदूषकों से विषाक्त होना, जो इन निकायों के पानी में घुल जाते हैं और तल में जमा होते रहते हैं. इससे जल की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव पड़ता है. प्रदूषण का दुष्प्रभाव सतह जल और भूजल, दो तरह के जल संसाधनों पर पड़ता है. प्रदूषण के भी दो अलग अलग प्रकार हो सकते हैं.

1. बिंदु स्रोत प्रदूषण: जब प्रदूषण एकल स्रोत से आता है, जैसे किसी फैक्टरी से सम्बद्ध डिस्चार्ज पाइप, तो उसे बिंदु स्रोत प्रदूषण कहते हैं. बिंदु स्रोत प्रदूषण के अन्य उदाहरणों में किसी टैंकर से तेल का रिसना, फैक्टरी की चिमनी से निकलने वाला धुआं, अथवा किसी की कार से नाली में तेल का बहना भी शामिल है. जब बिंदु स्रोत प्रदूषण पर्यावरण में प्रवेश करता है, तो उस स्रोत के तत्काल इर्दगिर्द सर्वाधिक दुष्प्रभाव पड़ता है.

2. डिफ्यूज़ अथवा गैर-बिंदु स्रोत प्रदूषण: जब प्रदूषण एकल स्रोत से नहीं बल्कि विभिन्न स्रोतों से होता है, तो उसे गैर-बिंदु स्रोत प्रदूषण कहा जाता है और इस प्रकार वह बहु-स्रोतों से पैदा होता है.

जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत

·         मल जल

·         पोषक तत्व

·         उत्सर्जित जल

·         औद्योगिक कचरा

·         रासायनिक कचरा

·         रेडियो एक्टिव कचरा

·         तेल प्रदूषण

·         प्लास्टिक

इनमें सर्वाधिक प्रदूषण मल जल और औद्योगिक कचरे से होता है, जो नदियों में गिराए जाते हैं. देश में मल जल उपचार की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं और बड़ी मात्रा में प्रदूषक जल निकायों में डाले जाते हैं. इससे प्रदूषक भूजल, नदियों और अन्य जल निकायों में प्रवेश करते हैं. बेहद विषाक्त और बीमारी फैलाने वाला पानी अंतत: हमारे घरों में पहुंचता है. खेती से निकलने वाला पानी अथवा खेतों से नदियों में पहुंचने वाला पानी भी जल प्रदूषण का एक अन्य प्रमुख स्रोत है, क्योंकि उसमें उर्वरक और कीटनाशक मिले होते हैं. जल प्रदूषण पर विचार करते समय यह उचित होगा कि कुछ महत्वपूर्ण धारणाओं की बात की जाए, जैसे विघटित आक्सीजन, बायोकैमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और कैमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी). जल प्रणाली ऑक्सीजन को पैदा भी करती है और उसे खपाती भी है. मंथन के कारण बहता जल अधिक मात्रा में ऑक्सीजन विघटित करता है जबकि स्थिर जल में ऑक्सीजन का अपघटन कम होता है. जलीय जीवों द्वारा श्वसन, अपघटन और विभिन्न रासायनिक अनुक्रियाओं में आक्सीजन की खपत होती है. मल जल उपचार संयंत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट जल में अक्सर जैविक पदार्थ होते हैं, जो सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित किए जाते हैं, और इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन अपघटित होती है. यदि पैदा होने से अधिक ऑक्सीजन की खपत होगी, तो विघटित ऑक्सीजन के स्तर में कमी आएगी और कुछ संवेदनशील पशु उससे दूर भाग सकते हैं, कमजोर हो सकते हैं या उनकी मृत्यु हो सकती है. विघटित ऑक्सीजन जल गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में एक महत्वपूर्ण मानदंड है, क्योंकि उसका दुष्प्रभाव किसी जल निकाय में रह रहे जीव समूहों पर पड़ता है. विघटित ऑक्सीजन का स्तर बहुत अधिक होना और बहुत कम होना जलीय जीवन के लिए खतरनाक है और उसका प्रभाव पानी की गुणवत्ता पर पड़ता है. 8.0 एमजी एल-1 से कम मात्रा में विघटित ऑक्सीजन का स्तर होने की स्थिति में जल को अत्यधिक विषाक्त समझा जाता है जबकि विघटित ऑक्सीजन का स्तर 4.0 एमजी एल-1 होने की स्थिति में जल को अत्यधिक प्रदूषित समझा जाता है. कार्बनिक कचरे द्वारा जल प्रदूषण को जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के संदर्भ में मूल्यांकित किया जाता है. बीओडी जल में कार्बनिक पदार्थ चयापचयी की जैविक प्रक्रिया में जीव समूहों द्वारा प्रयुक्त विघटित ऑक्सीजन की मात्रा का नाम है. बीओडी जल निकायों में जैविक पदार्थ की गुणवत्ता के प्रत्यक्ष अनुपात में होता है. बीओडी अधिक होने का अर्थ है, मछलियों जैसे बड़े जीव जंतुओं के लिए विघटित ऑक्सीजन की मात्रा कम होना. गंदे पानी को किसी जल स्रोत में डालने से पहले उसका उपचार करने का प्रमुख कारण उसमें बीओडी की मात्रा कम करना है, अर्थात् उसकी ऑक्सीजन की आवश्यकता कम करना है, और इस तरह धाराओं, झीलों, नदियों या समुद्र, जहां उसे छोड़ा जाना है, से उसकी मांग में कमी आती है. बीओडी का संबंध केवल जैव अपघटीय पदार्थ के साथ है, अत: इसे जल प्रदूषण मापने के भरोसेमंद तरीके के रूप में नहीं देखा जाता. जल प्रदूषण मापने का एक बेहतर तरीका कैमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) है. इसका अर्थ है, सीओ2 और एच20 से सम्बद्ध समस्त जैविक कार्बन को अपेक्षित मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान की जा सके. सीओडी परीक्षण में एक सशक्त रासायनिक आक्सीडाइजिंग एजेंट (पोटेशियम डाइक्रोमेट अथवा पोटेशियम परमेग्नेट) का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि ऊष्मा और सुदृढ़ अम्लीय स्थितियों में मल जल के नमूने में कार्बनिक पदार्थ को रासायनिक दृष्टि से आक्सीडाइज किया जा सके.

(लेखक मुम्बई स्थित पत्रकार हैं उनका ईमेल आईडी है: Shreyabh.Journo@Gmail.com)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

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