विशेष लेख


Volume-11, 15 - 21 June 2019

तनाव से मुक्ति के लिये योग अपनाएं

आधुनिक जीवन में तनाव एक आम समस्या है. अर्थात यह रोज़मर्रा की जिंदगी में एक गंभीर स्थिति बन चुका है.  भारत में लगभग 8९ प्रतिशत जनसंख्या तनाव से ग्रसित है. इसके अलावा हर आठ में से एक व्यक्ति तनाव से निपटने की गंभीर परेशानी का सामना कर रहा है जबकि सहस्राब्दि अन्य समूहों की तुलना में अधिक पीडि़त है. तनाव उस वक्त की एक असामान्य प्रतिक्रिया होती है जब शरीर में बदलाव होता है. यह शरीर की वह प्रतिक्रिया है जो कठिन परिस्थितियों में होती है. शरीर शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से इन परिवर्तनों के प्रति प्रतिक्रिया करता है. आमतौर पर यह माना जाता है कि तनाव हमेशा नकारात्मक परिवर्तनों के कारण होता है, लेकिन यहां तक कि सकारात्मक जीवन में परिवर्तन, जैसे कि पदोन्नति या परीक्षा में सफलता भी कई बार तनाव पैदा करती है. स्ट्रेसशब्द, जैसा कि वर्तमान में प्रयोग किया जाता है, 1936 में हंस स्लोई ने खोज़ा था, जिन्होंने इसे ‘‘शरीर के किसी भी विशिष्ट परिवर्तन के लिये ग़ैर विशिष्ट प्रतिक्रिया’’ के रूप में परिभाषित किया. जीवन का वास्तविक तरीका, यदि सच्चे अर्थों में अपनाया जाये तो वह हमें तनाव से निपटने और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिये सशक्त बनाता है. भगवद गीता के छठे अध्याय का सत्रहवां श्लोक हमें योग के पांच आयामों के बारे में अवगत कराता है:-

युक्ताहारविहारस्ययुक्तचेष्टस्यकर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्ययोगोभवतिदु:खहा॥

योग जीवन के घटकों के नाम हैं:

        I.            आहार (खाद्य)

      II.            विहार (छूट)

    III.            आचार (आचरण)

    IV.            विचार (सोचना)

      V.            व्यवहार (क्रियाएं अथवा व्यवहार)

1. आहार (खाद्य)

आहार स्वास्थ्यवद्र्धक और एक मज़बूत शरीर तथा मस्तिष्क का विकास करने में मददगार होना चाहिये. एक योगिक आहार बेहतर स्वास्थ्य, मज़बूत बुद्धिमत्ता तथा शांत मस्तिष्क और हृदय प्राप्त करने में सहायक होता है. एक योगिक आहार पौष्टिकता और महत्वपूर्ण ऊर्जा से परिपूर्ण होता है. अक्सर कहा जाता है कि, ‘‘आप वही खाते हैं जो आप खाते हैं’’. इसलिए, योग आपके द्वारा सेवन किये जाने वाले आहार की प्रकृति पर ज़ोर देता है. आहार अथवा खाद्य की योगिक अवधारणा प्रकृति के तीन गुणों पर खड़ी होती है.

·         सत्व

·         रज

·         तम

सत्व प्यार, प्रकाश और जीवन की गुणवत्ता है. दूसरी ओर, रज गतिविधि और जुनून की गुणवत्ता, स्थिरता की कमी है, और तमस अंधकार तथा जड़ता की गुणवत्ता, हमें अज्ञान और मोह में घसीट रही होती है. योग भोजन को प्राण नामक प्राण शक्ति का वाहक माना जाता है और प्राण की गुणवत्ता हमारी चेतना को प्रभावित करती है.

भगवद गीता में सात्विक आहार का जीवन, गुण, स्वास्थ्य, शक्ति और संतुष्टि को बढ़ावा देने के रूप में वर्णन किया गया है. यह राजसी आहार को अत्यधिक तीख़ा, खट्टा, नमकीन, गर्म, कठोर, कसैला और जला हुआ बताता है, जिससे दर्द, दुख और बीमारी होती है, जबकि तामसिक खाद्य पदार्थ शक्ति, बेस्वाद, बदबूदार, बचे हुए, सड़े हुए और निकृष्ट के तौर पर वर्णित हैं. सात्विक भोजन दिलकश, चिकना, शक्तिवद्र्धक और पेट के लिये सुखद होता है.

भोजन की यह श्रेणी वह है जो शुद्ध, स्वच्छ और पौष्टिक है. सात्विक आहार वह भोजन होता है जो जीवन, शक्ति, ऊर्जा, साहस और आत्मनिर्भरता प्रदान करता है. दूसरे शब्दों में, सात्विक भोजन प्रोटीन, कार्टस और वसा आदि के उचित मिश्रण की सकल भौतिक आवश्यकताओं से परिपूर्ण है. यह हमें जीवन शक्ति और चेतना के लिये आवश्यक सूक्ष्म पोषण भी प्रदान करता है. अपने आपको तनाव मुक्त, खुश, शांत और जीवन ऊर्जा से भरपूर रखने के लिये व्यक्ति को आहार को सात्विक रखना चाहिये. योग भोजन की सही परीक्षा लेने के लिये ध्यान पर ज़ोर देता है और सात्विक आहार का स्वाद विकसित करने तथा शांत मन में भी मदद करता है. भगवद गीता में कहा गया है कि जब सत्व प्रधान होता है तो शरीर के प्रत्येक द्वार से ज्ञान का प्रकाश चमकता है.

2. विहार (विश्राम)

आधुनिक समाज जीवनशैली से संबंधित बीमारियों जैसे मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग आदि का सामना कर रहा है जिसका मुख्य कारण तनाव, अनुचित आहार और अनियमित या गतिहीन जीवनशैली है. योगिक दर्शन के अनुसार, स्वस्थ जीवन या आरोग्य को प्राप्त करने और बनाये रखने के लिये एक स्वस्थ विहार या विश्राम का अभ्यास करना आवश्यक है. विहार को व्यायाम, मनोरंजन और रचनात्मक गतिविधियों जैसे चित्रकारी, पेंटिंग, गायन आदि से लाया जा सकता है.

योगिक दर्शन के अनुसार, श्वास- ये गतिविधियां हमारी भावनाओं को नियंत्रित और चैनेलाइज़ करने में मदद करती हैं और हमें आनंद और खुशी प्रदान करती हैं. आसन, प्राणायाम और ध्यान की योग साधनाएं शरीर और मन को शांत करती हैं. योग स्वास्थ्यवृत्ति प्राप्त करने के लिये कुछ स्वस्थ प्रथाओं को निर्धारित करता है या एक स्वस्थ जीवन शैली की अनुशंसा करता हैै. दिनचर्या या जीवन शैली एक स्वस्थ और स्थाई पद्धति, प्रकृति के जैविक चक्रों का पालन करना, योगिक अभ्यास का अनिवार्य घटक है. योगिक दिनचर्या में सुबह जल्दी उठना, हमारे प्राकृतिक कचरे को खत्म करना, मौखिक स्वच्छता बनाए रखना, यानी दांतों और जीभ की सफाई, गरारे करना आदि, नियमित रूप से व्यायाम करना, शरीर की मालिश, स्नान, कपड़े, आंखों की देखभाल, नाक की देखभाल आदि शामिल हैं. गहरी नींद या आरामदायक नींद का न होना तनाव का एक लक्षण है. योगिक विज्ञान के अनुसार,

स्वस्थ जीवन के लिये गहरी नींद आवश्यक है. यह तभी संभव है जब मन इंद्रियों से पूरी तरह से अलग हो जाए. ध्वनि निद्रा, मन को फिर से जीवंत करती है और मानसिक शक्ति में भी सुधार करती है. तनाव मुक्त जीवन के लिये गहरी नींद की एक नियमित पद्धति आवश्यक है.

3. आचार (आचरण)

योग बताता है कि एक स्वस्थ और तनाव मुक्त जीवन को बनाए रखने के लिये व्यक्ति का आचरण नैतिक होना चाहिये. अच्छे आचरण में ईमानदार, सच्चा व्यवहार, घृणा और ईष्र्या, करूणा से बचना, आदि शामिल हैं. यह हमें स्वस्थ दिनचर्या का निर्माण भी सिखाता है जो पूरे दिन, पूरे वर्ष और अंतत: जीवन भर हमारे प्रयासों को संतुलित रखेगा. स्वस्थ दिनचर्या हमें अपने समय का कुशलतापूर्वक उपयोग करने में मदद करती है. योग को ‘‘पुरानी दिनचर्या/आदतों को छोडऩे और स्वास्थ्य के निर्माण’’ के रूप में भी परिभाषित किया गया है. प्राचीन योगिक ने देखा कि सबसे बड़ी दिमागी समस्या क्षण-दर-क्षण जीवन को सहन करना है. जीवन की वास्तविकता का सामना करना सबसे मुश्किल काम होता है. वर्तमान क्षण पर पकड़ खोना बहुत आसान है क्योंकि मन अतीत की यादों, छापों, दिवास्वप्न, कल्पना और अज्ञान में भागने की क्षमता रखता है. हमें अपनी इच्छाओं, प्रवृत्ति, भावनाओं, आदतों और दृष्टिकोण पर नियंत्रण रखना चाहिये. यहां, योग महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अच्छे आचरण को प्रोत्साहित करता है.

योग सकारात्मक भावनाओं और स्वयं तथा अन्य व्यक्तियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण की वकालत करता है. यम (संयम) और नियम (पालन) के योग सिद्धांत हमारी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण विकसित करने और शांति तथा सदभाव लाने में मदद करते हैं.

4. विचार (सोच विचार करना)

विचार एक अभ्यासी का स्वयं के साथ आंतरिक संवाद (अपने स्वयं के मन के साथ) है. यह किसी के अपने मन के साथ बात करना है. विचार आत्ममंथन होता है. विचार किसी व्यक्ति के अपने मद के साथ संबंध विकसित करने में सहायता करता है. यह कहा जाता है कि आत्ममंथन को समझने का एकमात्र तरीका इसका अभ्यास करना है. अपने ध्यान के साथ शुरू करने से पहले दैनिक रूप से विचार या आत्म मंथन का अभ्यास करना सबसे अच्छा होता है. मन को अपने सभी संदेहों, प्रश्नों और भय के साथ प्रस्तुत करने की अनुमति दें. इन्हें आगे आने के लिये आमंत्रित करें ताकि आपके ध्यान के दौरान मन आपको इनसे परेशान न करे. कोई भी अपने आपसे सवाल पूछ सकता है, जैसे ‘‘ए मन तुम क्या चाहते हो?’’ जिं़दगी का उद्देश्य क्या है? जीवन का लक्ष्य क्या है? व्यक्ति मन को प्रकाश और आत्मज्ञान के मार्ग से विग्रह के लिये समर्पित कर सकता है. यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि विकार एकालाप नहीं बनना चाहिये. किसी की चेतना को सुनना चाहिये और जवाब आपके दिमाग से आयेगा. सुनना व्यायाम की कुंजी है. विचार आत्म खोज़ की प्रक्रिया की ओर जाता है. एक समय आता है, जब आपका मन एक यात्रा और विकास में आपका सबसे अच्छा साथी बन जाता है. यह व्यवसायी का दोस्त, शिक्षक, मार्गदर्शक और संरक्षक बन जाता है. योग बताता है कि व्यक्ति को सकारात्मक विचार रखने चाहियें. सकारात्मक विचार हमें जीवन के दुखों को सहन करने की शक्ति देते हैं. प्रत्याहार और ध्यान जैसे योगाभ्यास हमारे विचारों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और इस तरह जीवन में आशावाद को बढ़ावा देते हैं.

5. व्यवहार (व्यवहार या अनुयोजन)

व्यवहार, आहार, विहार, आचार और विग्रह का परिणाम है. योगिक दर्शन के अनुसार, हमारे कर्म सही होने चाहियें. हमें गलत गतिविधियों में लिप्त नहीं होना चाहिये. दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार उचित होना चाहिये. आज हम जो अनुभव करते हैं, वह हमारे कर्म का परिणाम है-अच्छे और बुरे दोनों-हमारे पिछले कार्यों से निर्मित. कर्म-योग का प्रस्ताव है हमें परिणामों की चिंता किये बिना पूर्ण समर्पण के साथ ही कार्य करना चाहिये. हमें परिणाम से जुड़े बिना, 100 प्रतिशत प्रयास करना चाहिये. आपके द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों पर इसे लागू किया जा सकता है: सबसे तुच्छ, साधारण कार्यों से लेकर अधिक से अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य. भगवद गीता में इसे निम्नलिखित श्लोक में समझाया गया है, जब अर्जुन महाभारत के महान युद्ध में लडऩे के लिये तैयार नहीं थे और कृष्ण उन्हें अपने कत्र्तव्यों का पालन करने के लिये समझाते हैं:

कर्मणयेवाधिकारस्तेमाफलेषुकदाचन।

माकर्मफलहेतुर्भूर्मातेसङ्गोऽस्त्वकर्मणि।

इसमें कहा गया है, ‘‘बदले में किसी भी इनाम की उम्मीद किये बिना अपने कत्र्तव्यों का पालन करते रहो, एक निस्वार्थ जीवन जीओ.

जब कार्रवाई पूरी निष्ठा और ध्यान से निस्वार्थ भाव से की जाती है तो यह पूर्णता और स्वतंत्रता लाती है. किसी के कर्मों के फल से जुड़े बिना अभिनय करना- यह अकेले आत्मा के साथ मिल सकता है, जो योग का लक्ष्य है. हम तनाव मुक्त रह सकते हैं और खुश रह सकते हैं यदि हम दर्शन का पालन करें और तदनुसार कार्य करें.

तनाव से मुक्ति के लिये योग आसन

·         अद्र्धमत्स्येन्द्रासान: यह शब्द अद्र्ध (आधा), मत्स्येन्द्र (योगी मत्स्येन्द्रनाथ के नाम से) और आसन (आसन) से आया है. योगी मत्स्येन्द्रनाथ हठ योग और नाथ परंपरा के संस्थापक थे. पूर्ण स्पाइनल ट्विस्ट स्थिति ऋषि का पसंदीदा ध्यान मुद्रा थी इसलिये यह मुद्रा उनके नाम पर है. हालांकि, जैसा कि एक सरलीकृत रूप का अभ्यास करना थोड़ा मुश्किल है, हाफ स्पाइनल ट्विस्ट के बारे में कुछ ऐसा ही है.

·         भुजंगासन

भुजंगासन या कोबरा मुद्रा एक झुकता हुआ पीछे की ओर झुकने वाला आसन है. यह आमतौर पर सूर्य नमस्कार में आसनों के एक चक्र में किया जाता है. यह नाम भुजंग (सांप) और आसन (आसन) शब्दों से बना है. तनाव मुक्ति में यह आसन बहुत सहायक है. भुजंगासन में अंत: स्रावी तंत्र के अंग विशेष रूप से अधिवृक्क ग्रंथियों और अग्न्याशय सक्रिय होते हैं जो उन्हें मज़बूत बनाने में मदद करते हैं. 

·         हस्तोत्तनासन

यह नाम तीन शब्दों से बना है: हस्त (बाजू), उत्तन (स्ट्रेच अप) और आसन (दशा). इस दशा में, बाजुओं को ऊपर की तरफ स्टे्रच किया जाता है, इसलिये इसे हस्तोत्तनासन पुकारा जाता है. यह संपूर्ण शरीर को आराम प्रदान करता है और गर्दन, कंधे तथा बाजुओं के दर्द को कम करता है.

·         मक्रासन

यह नाम मकर से आया है जिसका अर्थ होता है मगरमच्छ और आसन का अर्थ है स्थिति. इस आसन का वर्णन 17वीं शताब्दी के घेरारांडा संहिता में किया गया है. मगरमच्छ मुद्रा एक आराम योग आसन है. यह पीठ और कंधे की समस्याओं के लिये एकदम सही है. मुद्रा एक मगरमच्छ जैसी दिखाई देती है जो पानी में आराम करता है, और चेहरे और गर्दन को सतह से जल के स्तर से ऊपर रखता है. यह कंधे और रीढ़ के लिये बहुत आराम प्रदान करता है. यह शरीर को पूरी तरह से सक्रिय कर देता है और अभ्यास करने वाले का कायाकल्प कर देता है. मक्रासन उच्च रक्तचाप, हृदय रोगों और मानसिक विकार का इलाज करता है.

·         मत्स्यासन

यह नाम मत्स्य (मछली) और आसन (मुद्रा) से आया है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार मत्स्य भगवान विष्णु का एक अवतार था, जिसे ब्रह्मांड का संरक्षक माना जाता है. इस आसन का उद्देश्य ध्यान केंद्रित करना और लचीला होना है, जब कोई संतुलन से बाहर महसूस करता है. यह चिंता में विशेष रूप से सहायक होता है. इसे करने के बाद अभ्यासकर्ता व्यक्ति ऊर्जावान औन जीवन से परिपूर्ण महसूस करता है.

·         पादहस्तासन

यह नाम तीन शब्दों से मिलकर बना है, पाद (पैर), हस्त (हाथ) और आसन (आसन). इस आसन में हाथों को पैरों के पास लाया जाता है, इसलिए इसे पादहस्तासन कहा जाता है. यह हस्त योग के 12 मूल आसनों में से एक है. यह सूर्य नमस्कार की तीसरी मुद्रा भी है. यह माना जाता है कि तमस को कम करना, जिसका अर्थ है शरीर में भारीपन या जड़ता को कम करना. अभ्यास करने वाला हल्का और स्फूर्तिवान महसूस करने में मदद करता है. यह मानसिक और शारीरिक थकावट दोनों से राहत देते हुए दिल की धडक़न को धीमा करने के लिये भी किया जाता है.

·         सर्वांगासन

इस नाम में सर्व का अर्थ होता है सभी, इसके नाम से पता चलता है, आसन आपके शरीर के सभी भागों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है. सर्वांगासन एक आसन है जिसे पूरा शरीर कंधों पर संतुलित करता है. यह मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति बढ़ाता है और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को मज़बूत करता है जिससे व्यक्ति तनाव से प्रेरित समस्याओं को दूर कर सकता है. यह आसन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में अत्यधिक लाभदायक है और इसे आसनों की रानीभी कहा जाता है.

·         शशांकासन

नाम में शशांक (खरगोश) और आसन (मुद्रा) शामिल है. यह आसन अंतिम स्थिति में एक खरगोश जैसा दिखता है. इस आसन के कई लाभ हैं जिनमें विश्राम, अवसाद से राहत और बहुत कुछ शामिल है. यह उन में से एक है जो कि बहुत आसानी से किया जा सकता है और किसी भी आयु के व्यक्ति इसे कर सकते हैं.

·         शवासन

इस आसन का नाम एक मृत शरीर के लेटे हुए आसन से प्राप्त हुआ है. यह आसन शरीर और मन को तनाव मुक्त करने के लिये बहुत प्रभावी है. इस आसन में व्यक्ति और मन आराम की अवस्था में रहते हैं. यह ऊतकों और अंगों की मरम्मत में मदद करता है और इस तरह शरीर और मन को फिर से जीवंत करता है. यह रक्तचाप, चिंता और अनिद्रा को कम करने में मदद करता है.

त्रिकोणासन

यह नाम त्रिकोण शब्द से आया है जिसका अर्थ त्रिकोणीय आसन है. यह एक स्थाई योग आसन है जिसमें शक्ति, संतुलन और लचीलेपन की आवश्यकता होती है. इस आसन में दोनों हाथ पैरों को फैलाकर अलग कर दिया जाता है और एक पैर 90 डिग्री के कोण पर मुड़ जाता है. ऊपरी शरीर मुख्य पैर की ओर झुकता है ताकि यह एक हाथ की ओर पहुंच जाए, लेकिन उसे जमीन से छूना जरूरी नहीं है, और दूसरा आकाश की ओर होना चाहिये.

उष्ट्रासन

इस नाम में उष्ट्र अर्थात ऊंट तथा आसन (मुद्रा) सम्मिलित हैं.  इस आसन की अंतिम स्थिति में शरीर ऊंट जैसा दिखता है. इसलिये इसे उष्ट्रासन कहा जाता है. इस आसन का अभ्यास सर्वांगासन के बाद करना चाहिये. यह हृदय चक्र को खोलने और शक्ति तथा लचीलेपन को बढ़ाने में सहायक माना जाता है.

श्वेता सरस

ई-मेल: Shweta82saras@gmail.com.

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.