विशेष लेख


Special article vol.26

आतंकवाद और कर चोरी के बारे में भारत की चिंताओं ने
जी-20 में ध्यान आकर्षित किया

प्रकाश चावला

दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों के संगठन यानी जी-20 का हांगझोउ शिखर सम्मेलनसदस्य देशों की जनता को ‘’आतंकवाद के समस्त स्वरूपों और अभिव्यक्तियों’’ से मुकाबला करने के लिए एकजुट होने के उसके संकल्प से अवगत कराने वाले एक रस्मी घोषणा पत्र के साथ संपन्न हो गया। भारत, चीन, रूस, जर्मनी, अमेरिका और कई अन्य विकसित और विकासशील देशों की सदस्यता वाले इस समूह ने यह संकल्प ऐसे समय में व्यक्त किया गया है, जब दुनिया के समस्त महाद्वीपों और ज्यादातर देशों - चाहे वे देश यूरोप या अमेरिका, या फिर दक्षिण एशिया या दक्षिण पूर्व एशिया में हों, उनमें आतंकवाद का खतरा बढ़ गया है ।

चीन की विशाल ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के गृहनगर में आयोजित इस दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के अंतिम घोषणा पत्र के लिए जहां भारतीय शिष्टमंडल ने निश्चित तौर पर कड़ी मेहनत की होगी, वहीं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी बहुत साफगोई से अपनी बात रखते हुए कहा,’’दक्षिण एशिया में केवल एक ही देश है, जो आतंक के एजेंटों को हमारे क्षेत्र में फैला रहा है।‘’ इस अकेले राष्ट्र का अभिप्राय स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान है, जिसका उल्लेख संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) से पूर्व किया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उल्लेख पाकिस्तान के करीबी सहयोगी देश चीन में किया गया है । प्रधानमंत्री ने यह बात केवल समापन सत्र के दौरान अपने हस्तक्षेप में ही जोरदार तरीके से नहीं उठायी, बल्कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान भी उन्होंने आतंकवाद का मुद्दा उठाया। भारत का यह दावा इस दृष्टि से महत्पूर्ण है कि चीन पाकिस्तान ने शरण प्राप्त मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित कराने के मामले पर भारत का समर्थन नहीं करता है।

जहां एक ओर इस घोषणा पत्र में आतंकवाद द्वारा अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत किए जाने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जारी प्रयासों का जिक्र किया गया है, वहीं इस संकट की वजह से समस्त भूराजनीतिक क्षेत्र के लिए उत्पन्न हो रहे जोखिमों के बारे में भी विस्तार से का उल्लेख किया गया है। ‘’भूराजनीतिक घटनाओं से उत्पन्न हो रही चुनौतियों ने, शरणार्थियों की संख्या, आतंकवाद और संघर्षों में वृद्धि कर दी है और साथ ही साथ वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को भी उलझा दिया है।‘’

 दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलु, जिस पर हांगझोउ शिखर सम्मेलन में चर्चा की गयी, वह था भ्रष्टाचार और सीमा-पार कर चोरी का घातक मिश्रण। यह मामला भारत के लिए महत्वपूर्ण है, जो भ्रष्ट, मुकद्दमों का सामना कर रहे, लेकिन अलग अधिकार क्षेत्रों में पनाह पाने वाले व्यक्तियों द्वारा की गयी कर चोरी, काले धन को वैध बनाए जाने जैसी समस्या से जूझ रहा है। घोषणा पत्र में इस मामले पर यह कहकर बल दिया गया है, ‘’भ्रष्टाचार और धन के अवैध प्रवाह के सार्वजनिक संसाधनों, सतत आर्थिक वृद्धि, वैश्विक वित्तीय प्रणाली की सत्यता और कानून के शासन पर पडऩे वाले घातक परिणामों को स्वीकार करते हुए जी-20 भ्रष्टाचार के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि करेगा.....‘’

 घोषणा पत्र में कहा गया है, ‘’हम सभी जी-20 के सदस्य देश भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र समझौते के अनुमोदन का आह्वान करते हैं और इसकी समीक्षा व्यवस्था के दूसरे चरण के प्रारंभ होने का स्वागत करते हैं। हम उपरोक्त समझौते तथा अन्य लागू अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के प्रत्यर्पण, परस्पर कानूनी सहायता और परिसम्पत्ति बरामद करने संबंधी प्रावधानों को लागू करने का प्रयास करेंगे। हम जी-20 की 2017-2018 भ्रष्टाचार निरोधी कार्य योजना का समर्थन करते हैं ताकि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में पारदर्शिता और सत्यता को बेहतर बनाया जा सके, आतंकवाद को कतई बर्दाश्त न करने की नीति लागू की जा सके, हमारी संस्थाएं त्रुटियों से पूर्णत: मुक्त हों और हमारे कार्यों में एक भी रुकावट न हो।‘’ 

लेकिन आतंकवाद की ही तरह, कर चोरी और काले धन को वैध बनाने के मामले पर भी प्रधानमंत्री श्री मोदी इस मामले की आवश्यकता पर बल देने के लिए एक कदम आगे बढ़ गये। कर चोरी करने वालों की पनाहगाहों का सफाया करने पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने विश्व के नेताओं से ‘’काले धन को वैध बनाने वालों और कर चोरी करने वालों का पता लगाने और उन्हें बिना शर्त प्रत्यार्पित करने का अनुरोध किया।‘’

कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दर शून्य या शून्य से भी कम होने के बावजूद, विश्व के वित्तीय बाजार नकदी से भरे हैं, जो उत्पादक विनिर्माण क्षेत्र या ढांचागत विकास जैसी अन्य प्रमुख जरूरतों तक नहीं पहुंचती, बल्कि जोखिम भरे शेयर बाजारों में पहुंचकर मूल्यांकन को संदेहास्पद बना देती है। जी-20 नेताओं ने विकास के मामले को भी संज्ञान में लिया और भारत के लिए पूर्वानुमान व्यक्त किया, क्योंकि आकर्षक उभरते हुए बाजार होने के नाते, भारतीय बाजार भी अतिशय नकदी से भरे हैं जिससे विनिमय दरों में भी अस्थिरता आ सकती है। ‘’हम दोहराते हैं कि विनिमय दरों में अतिशय अस्थिरता और अव्यवस्थित गतिविधियां आर्थिक और वित्तीय स्थायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।‘’

 जलवायु परिवर्तन के मामले में भी भारत इन मायनों में अपनी बात मनवाने में सफल रहा कि वह पृथ्वी को पर्यावरण के अनुकूल बनाने का पक्षधर तो है, लेकिन वह ईंधन पर सब्सिडी समाप्त करने और अन्य उपायों के लिए कठोर समय-सीमा दिए जाने के विरुद्ध है, जो वृद्धि की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। निस्संदेह देश स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बढ़-चढ़ कर पहल कर रहा है। इसलिए, जी-20 हांगझोउ दस्तावेज में ऐसे उपायों के लिए समय-सीमा का निर्धारण टाल दिया गया।

जी-20 देशों द्वारा इंटरनेट की ताकत, उसकी निष्पक्ष भूमिका और ई-कॉमर्स पर चर्चा किया जाना बिल्कुल उचित है, क्योंकि इसका आयोजन जिस शहर में किया गया वह जैक मा के स्वामित्व वाली अलीबाबा का मुख्यालय है, जो आभासी दुनिया में हलचल पैदा कर रही है। व्यापक विचार-विमर्श का केंद्र रहे नेट न्यूट्रेलिटी जैसे विषयों को शीर्ष नेताओं का समर्थन मिला।

‘’ हमारा लक्ष्य निजता के सम्मान और व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश, उद्यमिता, डिजिटल बदलाव, ई-कॉमर्स सहयोग, संवर्धित डिजिटल समावेशन और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों का विकास सुनिश्चित करते हुए, विस्तारित और बेहतर एवं किफायती ब्रॉडबैंड तक पहुंच, आर्थिक वृद्धि के लिए सूचना के प्रवाह, विश्वास एवं सुरक्षा के माध्यम से इसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियों को प्रोत्साहन देना और डिजिटल भेद दूर करना है। हम अंतालया घोषणापत्र के डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास के लिए मुक्त और सुरक्षित वातावरण को नीतिगत सहायता की पेशकश करने के लिए प्रतिबद्ध तथा उपयुक्त और प्रभावी आईपीआर संरक्षण तथा प्रवर्तन की प्रमुख भूमिका को स्वीकार करने वाले अनुच्छेद 26 की एक बार फिर से पुष्टि करते हैं। हम डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रमाण के लिए आर्थिक सहयोग एवं विकास के लिए संगठन (ओईसीडी), आईएमएफ, से संबंधित राष्ट्रीय और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा किए गए प्रयासों का स्वागत करते हैं तथा इस बात को स्वीकार करते हैं कि और ज्यादा अनुसंधान और आदान-प्रदान किए जाने की आवश्यकता है।‘’

यूं तो जी-20 बैठकों और घोषणापत्रों का कोई विधिसम्मत आधार नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वे विश्व पर और मानवता के कल्याण के लिए आवश्यक मार्गदर्शन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।

 

(प्रकाश चावला वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं)