विशेष लेख


Special article vol.26

जी 20 और भारत

ज़ाफरी मुदासर नोफिल

जी20 को अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय मुद्दों पर सहयोग के लिये 19 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुखों तथा यूरोपीय संघ का एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली मंच माना जाता है।

क्लब की स्थापना 1997 के पूर्वी एशियाई संकट के बाद 19 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गर्वनरों तथा यूरोपीय संघ के एक मंच के तौर पर सितंबर 1999 में किया गया था।

सात प्रमुख औद्योगिक देशों-कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका-ने इनमें से कुछेक देशों की वैश्विक आर्थिक मुद्दों से संबंधित चर्चाओं और निर्णयों में अपर्याप्त संबद्धता को देखते हुए, यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में इनकी दखलंदाज़ी बढ़ती जा रही थी, उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ परामर्श और समन्वय के लिए प्रोत्साहन के वास्ते इस समूह के सृजन के लिए कदम उठाये थे।

2008 में, तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के निमंत्रण पर 19 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्राध्यक्षों और यूरोपीय संघ के नेताओं की 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद की स्थिति पर विचारविमर्श के लिये बैठक हुई और यह निर्णय लिया गया कि जी20 एक संकट प्रबंधन समूह के तौर पर कार्य करे।

जी20 सदस्य देश विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 85 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्जेंनटीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन, अमरीका और यूरोपीय संघ को मिलाकर जी20 समूह बना।

2019 में जी20 सम्मेलन की मेज़बानी भारत करेगा। जर्मनी अगले वर्ष इस सम्मेलन की मेज़बानी करेगा। अभी हाल में संपन्न सम्मेलन में भारत ने जी20 के मंच को इस तथ्य पर ज़ोर देने के लिये किया कि यदि भ्रष्टाचार और काले धन से सफलतापूर्वक निपटा जाये तो वित्तीय शासन नियमन सुनिश्चित किया जा सकता है।  इस वर्ष का जी20 शिखऱ सम्मेलन 4-5 सितंबर को पूर्वी चीन के हांगझोऊ शहर में आयोजित किया गया।

जी20 नेताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे आर्थिक अपराधियों के लिये आश्रय स्थलों को समाप्त करने, धन के अवैध लेनदेन को बिना शर्त बंद किये जाने और अत्यधिक बैंकिंग गोपनीयता, जिससे भ्रष्टाचार को छिपाये जाने का अवसर प्राप्त होता है, का अंत किये जाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा, ‘‘जी20 के प्रयास भ्रष्टाचार और कालेधन को बिल्कुल भी बर्दाश्त न किये जाने, प्रशासन, नीति और संधि में कमियों को दूर करने, बाधाएं समाप्त किये जाने और कार्रवाई के लिये पूर्ण प्रतिबद्धता के लिये होने चाहिये।

उन्होंने कहा कि प्रभावी वित्तीय शासन हासिल करने के लिये ‘‘हमें आर्थिक अपराधियों के लिये सुरक्षित जगहों को समाप्त करने, धन का अवैध लेने देन करने वालों  का पता लगाने और उन पर बिना शर्त अंकुश तथा उन जटिल अंतर्राष्ट्रीय विनियमों तथा अत्यधिक गोपनीय बैंकिंग व्यवस्थाओं को समाप्त करने की दिशा में काम करना चाहिये, जिनकी आड़ में भ्रष्टाचार और इससे जुड़े कृत्य छिप जाते हैं।

उनके अनुसार विकास के लिये एक स्थिर वैश्विक आर्थिक और वित्तीय प्रणाली होना अनिवार्य है क्योंकि इससे समावेशी और सतत विकास को प्रोत्साहन मिलता है तथा वैश्विक वित्तीय संरक्षा दायरे को भी और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम ऐसे समय मुलाकात करते हैं जब वैश्विक स्थितियां गंभीर राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही होती हैं। एक स्पष्टवादिता, यहां तक कि कठोर बातचीत पर्याप्त नहीं होगी। जी20 के लिये आवश्यक है कि सामूहिक, समन्वित और लक्षित कार्रवाइयों का कार्य उन्मुख एजेंडा होना चाहिये।‘‘ उन्होंने वित्तीय प्रणाली में सुधार करने, घरेलू उत्पादन में तेज़ी लाने, बुनियादी ढांचा निवेश को बढ़ाने और मानवीय पूंजी का एक पूल सृजित करने पर ज़ोर दिया।

पिछले वर्ष तुर्की में अंातल्य में हुए शिखर सम्मेलन में भी प्रधानमंत्री ने कहा था कि जी20 को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई को प्राथमिकता देनी चाहिये और निजी क्षेत्र की पारदर्शिता तथा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहन दिये जाने के प्रयासों की प्रशंसा की थी। उन्होंने लक्षित वित्तीय प्रतिबंधों तथा अधिक प्रभावी आतंकवाद विरोधी वित्तीय कार्रवाइयों सहित आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ सहयोग को मज़बूत किये जाने के संबंध में भी आवाज़ उठाई थी।

विदेशों में जमा अवैध धन की वापसी के लिये व्यापक वैश्विक सहयोग का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘हमें इस दिशा में अत्यधिक व्यापक बैंकिंग बाधाओं और जटिल कानूनी तथा विनियामक ढांचे की बाधाओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिये।‘‘

जी20 अपनी भ्रष्टाचार निरोधक कार्रवाई योजना का कार्यान्वयन कर रहा है जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ वैश्विक एकजुटता की मज़बूती में सहायता मिल रही है जिसमें घूसखोरी को लेकर कार्रवाइयों, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वालों की सुरक्षा में सुधार, पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र समझौता जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के लिये बृहत अनुपालना के जरिये अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मज़बूत करना शामिल है। सदस्य विशेष देशों में विकास और लचीले एजेंडा के ऊपर पारदर्शिता को लेकर जी20 के कार्यों से कर, निवेश और बाज़ार पारदर्शिता की समस्या हल हो रही है। जी20 का यह भी मानना है कि विकास के सभी चरणों में देशों के लिये सूचना पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।

सम्मेलन में भारत को जाहिर तौर पर प्रोत्साहन भी मिला क्योंकि सदस्य देश जलवायु परिवर्तन पर समझौते की पुष्टि करने के लिये आम सहमति पर नहीं पहुंच सके थे।

पिछले वर्ष पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान 190 से अधिक राष्ट्र वैश्विक गर्मी से निपटने के लिये महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के निर्धारण और जलवायु प्रभावों का सामना कर रहे गऱीब देशों को अरबों डॉलर की सहायता करने पर सहमत हुए थे। समझौता कम से कम 5 देशों द्वारा इसकी पुष्टि किये जाने के बाद लागू हो जायेगा जो कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के 55 प्रतिशत हिस्से का उत्सर्जन करते हैं। जबकि अमरीका सहित पश्चिमी देश समझौते की शीघ्र पुष्टि किये जाने का समर्थन कर रहे हैं, भारत अपनी राष्ट्रीय प्रक्रियाओं को पूरा करने के वास्ते अधिक समय चाह रहा है क्योंकि इसे डर है कि जल्दबाज़ी में लिया गया कोई भी फै सला इसकी विकास परियोजनाओं पर असर डाल सकता है। श्री मोदी के अनुसार यद्यपि पेरिस समझौते ने आगे की राह दिखाई है, ‘‘फ़ोकस इसके शीघ्र पुष्टि करने मात्र पर नहीं बल्कि पूर्ण सफलता पर होना चाहिये।’’

उन्होंने जी20 नेताओं को बताया कि ‘‘बहुत से वैश्विक मुद्दे आर्थिक नहीं हो सकते हैं परंतु इनकी महत्वपूर्ण आर्थिक लागत होती है’’ उन्होंने कहा कि हमें जलवायु अपक्षपात को सुरक्षित रखना होगा और इसके लिये विकासशील देशों को किफायती वित्तपोषण तथा पर्यावरण अनुकूल मज़बूत प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है।

भारत ने शिखर सम्मेलन में चीन और अमरीका के दबाव को दरकिनार कर दिया क्योंकि इन दोनों देशों ने समझौते की पुष्टि करने के उपरांत संयुक्त राष्ट्र को कानून सौंपे जाने के बाद जलवायु समझौते की पुष्टि के लिये 2016 की समय-सीमा निर्धारित करने की कोशिश की थी।

भारत ने कहा कि वह और कई अन्य देश विश्वास करते हैं वे विभिन्न कानूनी बाधाओं के कारण समझौते की पुष्टि नहीं कर सकते हैं। भारत ने आगे कहा कि वह घरेलू कार्रवाइयों के दृष्टिगत 2016 से पहले पुष्टि किये जाने को लेकर तैयार नहीं था परंतु वह शीघ्रातिशीघ्र ऐसा करना चाहेगा।

अंतत: जी20 सदस्य पेरिस समझौते की पुष्टि के लिये अपनी घरेलू कानूनी औपचारिकाताओं को शीघ्रातिशीघ्र पूरा करने पर सहमत हो गये, जैसे कि उनकी ‘‘राष्ट्रीय प्रक्रियाएं इसकी अनुमति प्रदान करती हैं।‘‘ इससे भारत को अपने विकास लक्ष्यों को साथ रखते हुए अपनी स्वयं की रणनीति पर कार्य करने के वास्ते अधिक समय मिल जायेगा।

जी20 शिखऱ सम्मेलन के अंत में जारी एक संयुक्त विज्ञप्ति में कहा गया है कि, ‘‘हम जलवायु परिवर्तन के हल की दिशा में सतत विकास, मज़बूत और प्रभावी समर्थन और कार्रवाइयों के लिये हमारी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं। हम जैसे ही हमारी राष्ट्रीय प्रक्रियाएं अनुमति प्रदान करती हैं पेरिस समझौते में शामिल होने के लिये अपनी संबंधित घरेलू प्रक्रिया को पूरा करने के लिये वचनबद्ध हैं।‘‘

पिछले कुछ वर्षों से जी20 सुसंगत तरीके से प्रासंगिक व्यवसाय चक्रों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय नीतिगत सहयोग सुनिश्चित करने, वित्तीय प्रणाली को सुदृढ़ करने, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संरचना में सुधार और वैश्विक वित्तीय संकट को टालने और इसकी रोकथाम के लिये परस्पर संबद्ध विश्व में विनियम सुनिश्चित करने के वास्ते काम कर रहा है। यह मौजूदा आर्थिक समस्याओं को हल करके, उपायों का सुझाव देते हुए और कार्रवाइयां संचालित करते हुए आर्थिक विकास और सतत विकास को भी प्रोत्साहन दे रहा है।

जी20 का उद्देश्य पारदर्शी वित्तीय नीति, वैश्विक कर नेटवर्क और धन के अवैध लेनदेन से निपटने तथा आतंकवाद वित्तपोषण जैसे क्षेत्रों में इसके सदस्यों द्वारा निर्धारित मिसालों के जरिये अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मान्यता प्राप्त मानदंडों को प्रोत्साहन देना और इन्हें अपनाना है।

भारतीय नेताओं ने वर्षों से वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार, व्यापक वैश्विक आर्थिक असंतुलन निगरानीसंरक्षणवादी उपायों की निगरानी के जरिये वैश्विक शासन का पुनर्संतुलन तथा अन्य उपायों के साथ विकास से जुड़े मुद्दों को शामिल करने के लिये जी20 कार्यसूची के विस्तार के प्रति अपनी चिंताओं को लेकर आवाज़ उठाई है। विभिन्न अन्य अधिकारियों ने भी, जिन्होंने जी20 कार्य समूह की बैठकों में भाग लिया है, इन चिंताओं को लेकर आवाज़ उठाई है।

जी20 नेताओं के सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमंत्री करते हैं जबकि वित्त मंत्री और भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर वित्त मंत्रियों तथा केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की बैठकों में प्रतिनिधित्व करते हैं। मंत्रिस्तरीय बैठकों में संबंधित मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्री भाग लेते हैं। अन्य अधिकारी स्तर की बैठकों में जी20 सचिवालय के संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव शामिल होते हैं।

सरकार में जी20 से संबंधित सभी मामलों पर कार्य के समन्वय के वास्ते आर्थिक कार्य विभाग, वित्त मंत्रालय के बहुपक्षीय संबंध प्रभाग में जी20 इंडिया सेक्रेटेरिएट की स्थापना की गई थी।

वित्त मंत्री की अध्यक्षता में जी20 से संबद्ध मुद्दों पर सर्वोच्च परिषद को जी20 इंडिया सेक्रेटेरिएट सचिवालय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है जिसकी स्थापना जी20 में अवेक्षित मुद्दों पर नीति तथा देश का प्रत्युत्तर तैयार के लिये दिशानिर्देश उपलब्ध करवाना और प्रधानमंत्री को यथापेक्षित सलाह देना, और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के किसी अन्य मुद्दे अथवा व्यापक नीतिगत असर ऐसे मुद्दों पर विचार करना है जिन्हें आर्थिक कार्य विभाग द्वारा सर्वोच्च परिषद के पास भेजा जा सकता है।

जी20 में यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष करते हैं। 2008 में शासनाध्यक्षों की बैठक का उद्घाटन करने के उपरांत मंच की द्विवार्षिक बैठक 2009 और 2010 में हुईं और इसके बाद 2011 से हर वर्ष इसकी बैठकें आयोजित की जाती हैं।

जी20 वेबसाइट के अनुसार ‘‘विचारविमर्शों और सहयोग के जरिये मंच ने संकट प्रबंधक के तौर पर प्रमुख भूमिका निभाई है और वैश्विक वित्तीय संकट के आगे गंभीर दुष्प्रभावों को टालने में सफलतापूर्वक योगदान किया है। इस संबंध में कुछ प्रमुख निर्णयों का उल्लेख करना उचित होगा। नवंबर 2008 में, जी20 नेता हेज-फंडों तथा रेटिंग कंपनियों के नियमन को लेकर सहमत हुए, और लेखाकरण और डेरिवेटिव्स के लिये मानदंडों को सुदृढ़ करने को कहा। अप्रैल, 2009 में नेताओं ने मंदी के प्रभावों को कम करने के वास्ते उभरते बाज़ार देशों की सहायता के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक को 1 खरब अमरीकी डॉलर दिये जाने की शपथ ली। सितंबर 2009 में नेताओं ने वित्तीय सुधार लागू करने के लिये वित्तीय स्थिरता बोर्ड की स्थापना की। उन्होंने कर चोरियों और बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों में अपेक्षा से अधिक कार्यपालक वेतन बढ़ोतरी के नियमन का भी निर्णय लिया। जून 2010 में नेता 2013 तक अपने बजट घाटों को आधा कम करने और तीन वर्षों बाद संपूर्ण बजट घाटा समाप्त करने के लिये सहमत हुए। नवंबर 2010 में जी20 नेता विकास कार्यसूची को जी20 चर्चाओं के अधीन लाने पर सहमत हुए थे।

जी20 को अब प्रासंगिक महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों के लिये निर्णयकर्ता मंच के तौर पर माना जाता है जो कि सतत विकास हासिल करने और स्थिरता बनाये रखने के लिये महत्वपूर्ण है। जी20 अब वित्तीय प्रणाली सुदृढ़ करने और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिये वित्तीय समावेशन तेज़ करने, परस्पर संबद्ध विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संरचना में सुधार करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और वस्तु मूल्य परिवर्तनशीलता को हल करने, और सतत विकास को बढ़ावा देने, हरित विकास और जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई लडऩे की दिशा में कार्यरत है।

वर्तमान समय में जी20 के लिये प्रमुख चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि अंतर्राष्ट्रीय नीति सहयोग स्थाई और व्यवसाय चक्रों के अनुरूप हो। जी20 का उद्देश्य पारदर्शी वित्तीय नीति, वैश्विक कर नेटवर्क और धन के अवैध लेनदेन से निपटने तथा आतंकवाद वित्तपोषण जैसे क्षेत्रों में इसके सदस्यों द्वारा निर्धारित मिसालों के जरिये अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मान्यता प्राप्त मानदंडों को प्रोत्साहन देना और इन्हें अपनाना है।

अपने अस्तित्व के पिछले कुछ वर्षों में जी20 ने एक प्रणाली और कार्य प्रक्रिया विकसित की है। जी20 का कोई स्थाई सचिवालय नहीं है। सदस्य देश बारी-बारी से अध्यक्षता करते हैं। तीन देशों-पूर्ववर्ती अध्यक्ष, मौजूदा अध्यक्ष और भविष्य के अध्यक्ष-इन तीनों को जी20 में ‘‘ट्रोइका‘‘ के तौर पर जाना जाता है।

मोटे तौर पर दो चैनल होते हैं जिनके जरिए चर्चाएं आयोजित की जाती हैं, सिफारिशें की जाती हैं: (द्ब) वित्त चैनल और (द्बद्ब) शेरपा चैनल। वित्त चैनल में वित्त मंत्री और सेंट्रल बैंक गवर्नर और उनके अधीनस्थ शामिल होते हैं। शेरपा चैनल में जी20 के प्रत्येक सदस्य देश ने विकास एजेंडा चर्चाओं में नेतृत्व करने के लिये एक शेरपा को मनोनीत किया है। शेरपाओं को उनके नेताओं ने उनकी ओर से दस्तावेजों पर विचारविमर्श करने का कार्य सौंपा है। इस प्रकार नेताओं की घोषणाओं को शेरपा अंतिम रूप देते हैं। नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफोर्मिंग इंडिया) के प्रमुख अरविंद पनगढिय़ा हांगझोऊ सम्मेलन में भारत के शेरपा थे।

जी20 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ भी निकट संपर्क बनाये रखता है जो कि विशेषज्ञ समर्थन प्रदान करते हैं और कार्यसूची मदों से संबंधित प्रतिवेदन तथा स्थिति पत्रकों के अलावा अपनी संगत सक्षमता के अनुरूप परामर्श देते हैं। इनमें से कुछेक संगठन हैं: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), विश्व बैंक (डब्ल्यूबी), वित्तीय स्थिरता बोर्ड, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी), विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ), संयुक्त राष्ट्र, अंकटाड और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ)।

जी20 के उद्देश्य हैं-वैश्विक आर्थिक स्थिरता और सतत विकास हासिल करने के वास्ते इसके सदस्यों के बीच नीतिगत समन्वय, जोखिम कम करने और भविष्य के वित्तीय संकटों की रोकथाम के लिये वित्तीय विनियमों को बढ़ावा देना और एक नई अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संरचना का सृजन करना है।

इन उद्देश्यों को संयुक्त एजेंडा के जरिये आगे बढ़ाया जाता है जो कि एक सतत प्रक्रिया है और वर्षों से जारी हैं। इसके अलावा हर वर्ष जी20 अध्यक्षीय मण्डल के पास इन व्यापक उद्देश्यों के भीतर अपनी प्राथमिकताओं पर निर्णय लेने का विशेषाधिकार है। अध्यक्ष का पदभार संभालने के पश्चात प्राथमिकताओं की घोषणा की जाती है। इन प्राथमिकताओं पर वर्ष के दौरान होने वाली जी20 बैठकों में ध्यान दिया जाता है।

 

(लेखक नई दिल्ली स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ई-मेल: znofil@gmail.com  उनके द्वारा व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)