विशेष लेख


अंक 13, 29 जून - 5 जुलाई 2019

 

अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां विकसित करना सबसे बड़ी चुनौती: सीएसआईआर प्रमुख

रोजग़ार समाचार ने देश के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. शेखर सी. मांडे से बातचीत की. वे वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), नई दिल्ली महानिदेशक हैं.

कृपया हमें पिछले 2-3 दशकों में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान के क्षेत्र में सीएसआईआर की महत्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में बतायें.

आपने पिछले 2-3 दशकों की बात की है लेकिन मैं शुरुआत से बताना चाहूंगा. जब हम 1947 में स्वतंत्र हुए, हम किसी भी क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं थे. हम खाद्य का आयात कर रहे थे, हम कपड़ों का आयात कर रहे थे और हर वस्तु बाहर से आ रही थी तथा राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की थी और वास्तव में सीएसआईआर ने शुरुआत से ही इस उद्देश्य के प्रति काम करना शुरू कर दिया था. और सीएसआईआर की पहली उपलब्धियों में से एक यह थी कि देश के प्रत्येक नागरिक को मतदान के लिये किस प्रकार सशक्त किया जाये. चुनावों में इस्तेमाल होने वाली अमिट स्याही मैसूर इंक के तौर पर सीएसआईआर द्वारा प्रदान की गई प्रौद्योगिकी है. सीएसआईआर ने 1960 में बेहद महत्वपूर्ण हरित क्रांति में भाग लिया. कृषि से संबंधित सभी यंत्रों के अन्वेषण में सीएसआईआर की प्रयोगशालाएं अग्रणी थीं जिनमें पहले स्वदेशी ट्रैक्टर स्वराज का विकास करना शामिल है जो कि हमारी दुर्गापुर प्रयोगशाला में विकसित किया गया था. हमने अनेक कीटनाशकों आदि का भी विकास किया. इसके बाद 1970 से 1990 तक विश्व का भारत को प्रौद्योगिकी से इन्कार करने वाला युग था. इसलिये हमें रिवर्स इंजीनियरिंग से स्वदेश में प्रौद्योगिकी का विकास करना पड़ा.

स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में सीएसआईआर के योगदान के बारे में हमें बताएं.

हम 1970 और 80 के दशक में पीछे मुडक़र देखते हैं जब एडस जैसी नई बीमारियां उभरकर आईं. एचआईवी थेरेपी के लिये उपलब्ध कराई गई पहली औषधि असाधारण रूप से मंहगी थी और अफ्रीका तथा उप सहारा देशों की बात छोडिए, कोई भी भारतीय इसे वहन करने में समर्थ नहीं था. सीएसआईआर ने इनमें से कुछेक रसायनों के पुन: निर्माण से इसे एक हजार गुणा सस्ता बनाया. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बात का समर्थन किया कि इसका भारत में उत्पादन किया जा सकता है और सिपला ने हमसे इसकी प्रौद्योगिकी ग्रहण की. हमें गर्व है कि कि हमने बहुत ही सस्ती दवाइयां बनाईं और भारत में एक अन्य क्रांति जेनेरिक फार्मा इंडस्ट्री है. अत: जेनेरिक फार्मा इंडस्ट्री सीएसआईआर का सीधे योगदान है.

आइए कुछ अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में बात करते हैं जहां सीएसआईआर ने महत्वपूर्ण योगदान किया है.

आज हम एक वैश्वीकृत दुनिया में रह रहे हैं और हमारे सामने चुनौती है कि प्रौद्योगिकियां कैसे विकसित करें जो कि अत्याधुनिक हों और जो दुनिया में अन्य उद्देश्यों के लिये किस प्रकार टिकी रह सकती हैं.

आपने देखा होगा कि वास्तव में हम पिछले 10 वर्षों में बहुत सी नई चीजें विकसित कर रहे हैं. यदि आपने देखा होगा, पिछले कुछ सीजऩों से दिल्ली हवाई अड्डे पर पहले की भांति उड़ानों में देरी नहीं हुई. दिल्ली हवाई अड्डा सहित देश के प्रमुख हवाई अड्डों में हमने जो तकनीक तैनात की है उस प्रणाली का नाम दृष्टि है और यह एक ट्रांसमिसोमीटर है, जो विमान के धरती पर उतरने से पहले हवाई अड्डे पर दृश्यता का आकलन करता है और ऑनलाइन पायलट को सूचना उपलब्ध होती है. दृष्टि प्रौद्योगिकी अत्याधुनिक है और दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है तथा हमारे प्रतिद्वंद्वी पश्चिमी यूरोप से हैं तथा हमारी प्रौद्योगिकी बहुत अच्छी होने के साथ-साथ उसकी लागत कऱीब 1/5वें भाग तक सस्ती है.

आपके पास देशभर में प्रयोगशालाओं का व्यापक नेटवर्क है लेकिन क्या ये सभी ठोस परिणाम दे रही हैं.

 जी हां, हमें गर्व है कि हमारी सभी 37 प्रयोगशालाएं अपने विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में परिणाम दे रही हैं. मैं आपको कई उदाहरण देता हूं. सीएसआईआर के देहरादून में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान को पेट्रोलियम प्रौद्योगिकियों में कई विशेषज्ञताएं प्राप्त हैं. और उन्होंने वैक्स के लिसे असम में इंडियन ऑयल के पास जुमालिगढ में एक संयंत्र लगाया है जिससे साल में कऱीब 500 करोड़ रु. वैक्स के आयात में कमी आई है. अब पूर्णत: भिन्न, खनन क्षेत्र की बात करते हैं, धनबाद में खनन क्षेत्र प्रयोगशाला कई सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के लिये सामान्य तौर पर कोयला का गुणवत्ता परीक्षण कर रही है. बंगलुरू में नेशनल एयरोस्पेस लैबोरेट्रीज ने ग्रामीण संपर्क में सुधार के लिये एक नये स्वदेशी विमान सारस का विकास किया है, यह विमान कई परीक्षण उड़ानें पहले ही भर चुका है. दो विमान विकास अधीन हैं, एक 19 सीटों वाला विमान और एक थोड़ा बड़ा 70 सीटों वाला विमान, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि इनसे आने वाले वर्षों में ग्रामीण संपर्क में बहुत बदलाव आयेगा.

अधिकतर प्रयोगशालाएं जिनके बारे में बात की जा रही है, दशकों पहले स्थापित की गई थीं. क्या आप भी पिछले 10-15 वर्षों में उभरकर आई प्रौद्योगिकियों पर फोकस करते हुए नई प्रयोगशालाओं की स्थापना की दिशा में विचार कर रहे हैं.

जी हां बिल्कुल सही कहा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी कभी गतिहीन नहीं होते हैं और निरंतर विकास होता रहता है. हमारी बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि हम किस प्रकार आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े रहें. उदाहरण के लिये कुछेक नये क्षेत्र जो उभरकर आये हैं उनमें एक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, बिग डॉटा, मशीन लर्निंग, ये सब बातें पिछले कुछ वर्षों में सामने आई हैं और हमें विश्वास है कि इन सभी की लगभग सभी क्षेत्रों में भूमिका होगी. अब सवाल यह है कि इससे संबंधित आवश्यकताओं को हम कैसे पूरा करें, यदि हमारे पास ऐसे लोगों का समर्पित समूह नहीं है जो इन क्षेत्रों में काम कर सके.

साक्षात्कार

 

 इस क्षण हम पूर्ण रूचि के साथ यह पता लगा रहे हैं कि हमारे पास इसके लिये कोई अलग संस्थान होना चाहिये अथवा हमारे पास अपनी अनेक मौजूदा प्रयोगशालाओं में काम करने वाले लोग हों. हमारी इन प्रयोगशालाओं में कार्मिकों की संख्या बढ़ाने की योजना है. परंतु हम इसके लिये नया संस्थान और प्रयोगशालाएं स्थापित करने पर भी विचार कर सकते हैं.

प्रयोगशाला से उद्योग तक का मार्ग बहुत लंबा है. कई बार जब आपको नवाचारों की जानकारी होती है जो कि प्रयोगशाला में तैयार किये जाते हैं परंतु ये दिन के उजाले में दिखाई नहीं देते, ये कभी भी वाणिज्यिक तौर पर व्यवहार्य और सफल नहीं होते. ऐसा क्यों है?

एक पैमाना होता है जिसे प्रौद्योगिकी तैयारी स्तर अथवा टीआरएल कहा जाता है. नासा ने कई साल पहले प्रस्ताव किया था कि टीआरएल 1, 2, 3 अनिवार्य रूप से खोज़ का बहुत शुरुआती चरण है, हम प्रयोगशाला में क्या करते हैं. टीआरएल 7,8 और 9 सर्वोच्च स्तर है और टीआरएल 9 तब होता है जब यह बहुत बड़े पैमाने पर क्षेत्र में तैनाती के लिये तैयार हो जाता है. इस बीच एक अंतर होता है और वह अंतर मुख्यत: शैक्षणिक प्रयोगशालाओं में होता है जिसे हम ट्रांसलेशनल रिसर्च पुकारते हैं, जिसे भरना उतना आसान नहीं होता है क्योंकि हमें उत्पाद के पैमाने को दर्शाना होता है, आपको प्रोटोटाइप्स बनाने होते हैं, हमें यह पक्का करना होता है कि ये प्रोटोटाइप्स काम कर रहे हैं और सभी काम कर रहे हैं तथा इस अंतर को पाटना आसान नहीं है. इस अंतर को पाटने के कई अन्य रास्ते हैं, अंतर पाटने का एक रास्ता है उद्योग और शैक्षणिक संगठन मिलकर सुनिश्चित करें कि जो भी प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाओं से उभरकर आ रही है हम एक दूसरे का हाथ पकड़े रहें और तब हम आगे बढ़ें तथा प्रोटोटाइप्स का निर्माण करें तथा क्षेत्र में प्रदर्शित करें.

परंतु उद्योग को निवेश पर आय और लाभ की चिंता अधिक होती है. क्या यह बात सही नहीं है.

बिल्कुल सही, यही समस्या की जड़ होती है. उद्योग अनेक बार खोज़ के शुरुआती चरण में आगे आने को तैयार नहीं होते हैं. इसे करने का एक शक्तिशाली मार्ग है कि इसे स्टार्ट-अप्स के जरिए किया जाये. भारत में स्टार्ट-अप्स की क्रांति आ रही है और स्टार्ट-अप्स इस अंतर को पाटने की चुनौती से निपट सकते हैं. प्रौद्योगिकी को टीआरएल 3 से टीआरएल 7 तक ले जाना और इसे स्टार्ट अप कर सकते हैं तथा अंतर पाटने का यह एक अन्य रास्ता है. और जैसा आप देख रहे हैं पिछले 5 वर्षों में स्टार्ट अप आंदोलन की दिशा में एक प्रमुख क्रांति आई है और स्टार्ट-अप इंडिया इसका एक हिस्सा है.

आज के दिन जिन मुद्दों का दबाव है उनमें से एक जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की तलाश करना है. यद्यपि जहां तक बिजली से चलने वाले वाहनों का संबंध है, इस दिशा में बहुत काम हो चुका है परंतु हमारे पास व्यावसायिक तौर पर व्यवहार्य इलेक्ट्रिक कारें नहीं हैं. क्या सीएसआईआर इस दिशा में काम कर रहा है?

जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता को कम करने से संबंधित दो मुद्दे हैं-एक है फसलों से जीवाश्म ईंधन प्राप्त करना-आप जानते हैं यह बहुत सामान्य है परंतु अनेक प्रकार की फसलें हैं जो आपको ईंधन दे सकती हैं और हम इस पर पहले ही प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन कर चुके हैं. आप ने इस वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड में देखा होगा कि वायुसेना के एएन 32 विमान ने उड़ान भरी थी जो कि जठरोपा ईंधन से उड़ा था जिसे हमारी देहरादून प्रयोगशाला ने विकसित किया था. इसके हल के दूसरे मार्ग के लिये तमिलनाडु में कराईकुडी में हमारी इलेक्ट्रोकेमिकल प्रयोगशाला काम कर रही है. प्रयोगशाला वाहनों के लिये बैटरी तैयार कर रही है. उनकी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं जिसका हम अगले कुछ महीनों में खुलासा करेंगे.

सरकार की 2022 तक सब के लिये आवास की महत्वाकांक्षी योजना है. संभवत: आवास क्षेत्र के लिये मोबाईल फोन क्रांति जैसी एक क्रांति की आवश्यकता है. क्या सीएसआईआर किफायती आवास सामग्री की दिशा में काम कर रहा है?

आवास क्षेत्र पर फोकस कर रही दो विशिष्ट प्रयोगशालाएं हैं. एक है केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रूडक़ी और दूसरा चेन्नै में संरचनात्मक अभियांत्रिकी अनुसंधान केंद्र है. दोनों ही न केवल भारत में बल्कि पड़ौसी देशों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में किफायती आवास का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में काम कर रही हैं. प्रयोगशालाएं पूर्व निर्मित आवास परंतु स्थाई आवास के विकल्प तलाश रही हैं. सीबीआरआई प्रयोगशाला ने भूकंप रोधी आवास के संबंध में नेपाल सरकार को एक परियोजना प्रस्तुत की है.

सीएसआईआर में वैज्ञानिकों के लिये रोजग़ार के अवसरों के बारे में हमें बताएं.

हमारे पास 37 प्रयोगशालाओं और नई दिल्ली मुख्यालय में 6000 की संख्या में वैज्ञानिकों के पद हैं. इनमें से लगभग 3000 पद भरे हुए हैं. हम इन्हें अगले 10-15 वर्षों में भरने की दिशा में काम कर रहे हैं. हम इन्हें एक बार में भरना नहीं चाहते हैं परंतु उभरते क्षेत्रों को देख रहे हैं जहां लोगों की जरूरत है. हम लगभग 10-15 प्रतिशत रिक्तियां हर साल भरना चाहते हैं.

क्या सीएसआईआर में ग़ैर तकनीकी कार्मिकों के लिये पर्याप्त संभावनाएं हैं?

सीएसआईआर में प्रशासनिक नौकरियां मुख्यत: तीन प्रकार की हैं-एक है सामान्य प्रशासन और स्थापना, दूसरी है भण्डार और क्रय तथा तीसरी वित्त और लेखा से संबंधित है. हमारे पास इनमें भी बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं और हम इन्हें निकट भविष्य में भरने के लिये प्रयास कर रहे हैं.

क्या आप प्रतिभा बनाये रखने के लिये अतिरिक्त कदम उठाते हैं, क्या सीएसआईआर आकर्षक पैकेज के साथ वेतन देने में अग्रणी है?

जी हां, ऐसा वास्तव में होता है. सीएसआईआर अत्याधुनिक किस्म की अवसंरचना का सृजन करता है जो कि कोई अन्य प्रयोगशाला सपना भी नहीं ले सकती है. उदाहरण के लिये नेशनल एयरोस्पेस लैबोरेट्री में विंड टनल, भारत में एकमात्र स्थान है जो वहां पर है. यहां तक कि रक्षा क्षेत्र और अंतरिक्ष क्षेत्र हमारी विंड टनल को मिसाइलों और स्पेस शटल्स के परीक्षण के लिये इस्तेमाल करते हैं. यह लोगों को हमारे पास आने का सबसे आकर्षक बिंदु है. हम अपनी सभी प्रयोगशालाओं में आकर्षक वैज्ञानिक वातावरण प्रदान करते हैं.

क्या आप अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों को हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ जोड़ रहे हैं.

यह निश्चित तौर पर अनिवार्य है. देश में किसी भी संगठन के लिये राष्ट्र की तत्कालिक प्राथमिकताएं उस संगठन की भी प्राथमिकताएं होती हैं. यह बात सीएसआईआर के मामले में भी सत्य है. सभी कार्यक्रम जो आप देखते हैं कि सरकार ने शुरू किये हैं जैसे कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, हम इन सब कार्यक्रमों में पूर्ण भागीदारी करते हैं. सरकार जो कुछ भी देश के लिये अथवा समाज के लिये सही समझती है सीएसआईआर इन सब कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक साझेदारी करती है.

आपके अगले 5-10 वर्षों में सीएसआईआर की भूमिका के बारे में क्या विचार हैं?

सीएसआईआर की प्रमुख भूमिका उद्योग को शिक्षण के साथ जोडऩे की है. हम ऐसी प्रौद्योगिकियों पर काम करते हैं जिनसे समाज को तत्काल लाभ पहुंचेगा. बड़ी संख्या में लोगों को फायदा होना चाहिये और वे एक सम्मानजनक जीवन जी सकें, एरोमा मिशन की तरह जिसका मैंने उल्लेख किया है कि वह एक विशेष प्रयास का हिस्सा है. हम तब तक समाज के पास नहीं पहुंच जायेंगे जब तक कि हमारा उद्योग से मज़बूत संपर्क नहीं होगा. हम अपने आप प्रौद्योगिकियों को क्षेत्र में नहीं पहुंचा सकते, हमें उद्योग के साथ साझेदारी करनी होगी. हम सीएसआईआर में जो भी काम करते हैं वह उद्योग उन्मुख होता है. अनेक बड़े कार्पोरेट ने हम सेे प्रौद्योगिकी ली है. सफलता की अनेक गाथाएं हैं जिनके बारे में हम चर्चा कर सकते हैं. अमूल मिल्क पाउडर हमारी प्रौद्योगिकी है, टाटा आयोडाइज्ड नमक, टाटा स्वच्छ और कई अन्य उत्पाद हमारी प्रौद्योगिकी से बने हैं. हम लघु और मझौले उद्योगों के साथ मिलकर भी काम करते हैं, वे नवाचार और प्रौद्योगिकी बदलाव के लिये प्रोत्साहन करने के हमारे सामाजिक उत्तरदायित्व बन चुके हैं. वे समाज में पहुंचने के लिये हमारे वाहक भी बने हैं. एक अन्य महत्वपूर्ण पहलु है कि किसी भी प्रौद्योगिकी के पीछे बहुत ही मज़बूत विज्ञान होना चाहिये और इस प्रकार सीएसआईआर प्रयोगशालाएं बहुत गहन विज्ञान पर काम करती हैं।

(साक्षात्कारकर्ता एस. रंगाबशियम नई दिल्ली स्थित आकाशवाणी से जुड़े समाचार एंकर हैं)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.