विशेष लेख


अंक 13, 29 जून - 5 जुलाई 2019

सामाजिक सामंजस्य के लिए गांधीवादी अहिंसक संचार

डॉ. वेदव्यास कुंडू

हात्मा गांधी ने दुनिया को व्यक्तियों और समूहों के बीच सामाजिक सामंजस्य और एकजुटता को बढ़ावा देने के लिए एक अनूठा सिद्धांत दिया. महात्मा की 150 वीं जयंती के अवसर पर यह उचित होगा कि अहिंसा के इस सिद्धांत के तत्वों पर गंभीर चिंतन किया जाए और अपने दैनिक जीवन में उसे लागू किया जाए. यदि हमारे समाज का व्यापक उद्देश्य राष्ट्र निर्माण की दिशा में विभिन्न पृष्ठभूमि और समुदायों के लोगों को एक साथ लाना है, तो अहिंसा का सिद्धांत एक तरह का गोंद है जो आत्मा से आत्मा के आदान-प्रदान, सहानुभूति पूर्ण संबंधों, करुणा और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देता है. यदि शिक्षा और प्रशिक्षण के विभिन्न स्तरों पर देखा जाए तो अधिक से अधिक लोग अहिंसक व्यवहार के विभिन्न तत्वों को एकीकृत कर सकते हैं और यह एक अधिक जिम्मेदार और दयालु समाज की दिशा में योगदान देगा.

महात्मा गांधी के अहिंसा सिद्धांत के पांच स्तंभ हैं: सम्मान, समझ, सहिष्णुता, प्रशंसा और करुणा. एक बार जब हम अहिंसा के इन मूलभूत गुणों का अनुसरण करना शुरू कर देते हैं, तो हम इसका सृजन करने लगते हैं और यह अनुभव करने लगते हैं कि कैसे हम न केवल अपने भीतर बल्कि समाज में बड़े पैमाने पर बदलाव ला रहे हैं. महात्मा गांधी के पोते अरुण गांधी ने अपनी पुस्तक, द गिफ्ट ऑफ एंगर में अहिंसा के पांच स्तंभों को खूबसूरती से समझाया है:

 अन्य लोगों का सम्मान करना और उन्हें समझना, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, नस्ल या देश के हों, दुनिया को आगे बढ़ाने का एकमात्र तरीका है. दीवारें खड़ी करने और भेदभाव की परिणति, हमेशा प्रतिहिंसा के रूप में सामने आती है, जो क्रोध, विद्रोह और हिंसा का कारण बनती है. इसके विपरीत, जब हम एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और समझते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से उस तीसरे स्तंभ सहिष्णुता का विकास करते हैं. अन्य के विचारों और स्थिति को स्वीकार करने की क्षमता हमें मजबूत और समझदार बनने में मदद करती है. अहिंसा-प्रशंसा और करुणा के अन्य दो स्तंभ व्यक्तिगत खुशी और पूर्ति के साथ-साथ दुनिया में अधिक सद्भाव लाने में मदद करते हैं.

रॉबर्ट बोडे ने अहिंसक व्यवहार के लिए गांधीवादी दृष्टिकोण को समझाने का प्रयास किया है. अपने लेख में, रॉबर्ट बोडे ने अहिंसक व्यवहार के गांधीवादी दृष्टिकोण की व्याख्या की. उनके अनुसार इस सिद्धांत में चार पहलू शामिल हैं. ये हैं: (1) अहिंसक अभिव्यक्ति और कर्म (2) रिश्तों का रख-रखाव और व्यक्तित्व का संवर्धन, (3) खुलापन और (4) लचीलापन. बोडे के अनुसार: गांधी के लिए, अभिव्यक्ति का लक्ष्य मानवीय संबंधों का निर्माण और रखरखाव है, जिससे व्यक्तित्व में वृद्धि होती है. अहिंसा पर गांधी के आग्रह ने दूसरों के महत्व को पहचाना, मानवता को महत्व दिया और मानवीय रिश्तों और व्यक्तित्व के महत्व को समझा. गांधी के अहिंसक व्यवहार के सिद्धांत में दुनिया भर में व्यक्तित्व का मूल्यांकन शामिल था, लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों और मित्रता के महत्व पर भी जोर दिया. गांधी के भाषणों में खुलापन प्रकट हुआ और यह उनके अहिंसक अभिव्यक्ति सिद्धांत की विशेषता है. गांधी के लिए, खुलेपन में स्वतंत्र भाषण और प्रेस, सार्वजनिक चर्चा और सीधे बातचीत जैसे संचार सिद्धांत शामिल थे.

बापू का लेखन और उनके कार्य  अहिंसक अभिव्यक्ति के मार्गदर्शक हैं. उदाहरण के लिए, हरिजन में, उन्होंने लिखा था: ‘‘मेरे आलेख जहरीले नहीं हो सकते, वे क्रोध से मुक्त होने चाहिएं, क्योंकि यह मेरा विशेष धार्मिक विश्वास है कि हम वास्तव में दुर्भावना को बढ़ावा देकर अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते. मेरे लेखन में असत्य के लिए जगह नहीं हो सकती है, क्योंकि यह मेरा अटल विश्वास है कि वहां सत्य के अलावा कोई धर्म नहीं है, मेरा लेखन किसी भी व्यक्ति के प्रति घृणा से मुक्त है, क्योंकि यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह प्रेम ही है जो पृथ्वी को बनाए रखता है.’’ महात्मा गांधी एक उत्साही पत्र लेखक थे. अहिंसक संचार के विकास में पत्र लेखन की भूमिका गांधी जी ने स्वयं स्पष्ट की है. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘मेरे लिए यह सभी रूपों और प्रकारों में मानव प्रकृति के अध्ययन का एक साधन बन गया, जैसा कि मैंने हमेशा संपादक और पाठकों के बीच एक अंतरंग और स्वच्छ संबंध की स्थापना का लक्ष्य रखा था. मुझे अपने संवाददाताओं के अनेक ऐसे पत्र मिलते थे, जिनमें उनके दिल की बात होती थी. लेखक के स्वभाव के अनुसार वे मित्रवत, आलोचनात्मक या कटु थे. इस सारे पत्राचार का अध्ययन, पाठन और उत्तर देना मेरे लिए एक अच्छी शिक्षा थी. यह ऐसा था जैसे समुदाय ने मेरे साथ इस पत्राचार के माध्यम से श्रवण किया. इसने मुझे एक पत्रकार की जिम्मेदारी को अच्छी तरह से समझा और इस समुदाय के ऊपर मैंने जो पकड़ हासिल की, उसने भविष्य के अभियान को काम करने योग्य, सम्मानजनक और अडिग बनाया.’’

अहिंसक अभिव्यक्ति की अधिक समझ के लिए, अपने आप को यह बताना उचित होगा कि अहिंसक अभिव्यक्ति का वास्तव में क्या मतलब है. वरिष्ठ गांधीवादी, श्री नटवर ठक्कर (पिछले अक्टूबर में उनका निधन हो गया) अहिंसक संचार के केंद्रीय विचार की बारीक व्याख्या करते हैं. गांधीवादी समझ का उपयोग करते हुए, उन्होंने लिखा था:  मेरे लिए अहिंसक संचार साक्षरता का मतलब होगा कि हमारे संचार प्रयास कैसे अहिंसक होने चाहिएं, कैसे हमारी क्षमता और योग्यता न केवल स्वयं हमारे लिए, बल्कि हमारे परिवार और समाज के साथ संवाद करने के सभी पहलुओं में अहिंसक हो सकती है,बल्कि कैसे कुल मिलाकर संचार की पूरी प्रक्रिया चाहे वह व्यक्तियों, समूहों, समुदायों और बड़े पैमाने पर दुनिया के बीच हो, अपनी प्रकृति में अहिंसक हो सके. इसमें अहिंसा की कला और विज्ञान की गहरी समझ और हमारे सभी दैनिक कार्यों के केन्द्र में उनकी मौजूदगी अपरिहार्य होगी. यह केवल मौखिक और अशाब्दिक संचार नहीं है, अहिंसक संचार साक्षरता में यह भी शामिल होगा कि हमारी भावना और विचार अहिंसक हैं या नहीं. इसका मतलब यह भी होगा कि हम अपने विचारों को कैसे अभिव्यक्त करें इस बात का मूल्यांकन करना बंद करें कि अभिव्यक्ति हमारे विचारों के अनुरूप है या नहीं. अक्सर हम ऐसे नैतिक निर्णयों के संदर्भ में सोचने के लिए तैयार हो जाते हैं जो हमारे स्वयं के बनाए हो सकते हैं. अहिंसा की कला और विज्ञान की गहरी समझ विकसित करने और उसे अपनी संचार पद्धतियों में एकीकृत करके हम पक्षपाती और नैतिक निर्णय ले सकते हैं; बदले में यह भावनात्मक सेतु कायम करने में योगदान कर सकता है.

श्री नटवर ठक्कर ने आगे कहा, ‘अहिंसक संचार साक्षर होने से, एक व्यक्ति समूहसमुदाय यह आत्म-आत्मनिरीक्षण करने में सक्षम होगा कि क्या वे जिस संदेश को साझा करना चाहते हैं उसमें हिंसा के तत्व हैं और क्या इस तरह के संदेश से दूसरों को नुकसान होगा. अहिंसक संचार साक्षरता स्वचालित रूप से रिश्तों को मजबूत और गहरा बनाने में मदद करेगी. जब हम दूसरों के साथ भावनात्मक रूप से सेतु बनाने  में सक्षम होते हैं, तो हम उनके विचारों के साथ सहानुभूति रखने में सक्षम होंगे. उनका कहना है कि अहिंसक संचार से संवाद और संबद्धता, आपसी सम्मान और सहिष्णुता के लिए नए आयाम खुल सकते हैं.

त्वरित संदर्भ के लिए, यह उपयोगी होगा कि अहिंसक संचार के विभिन्न तत्वों की रूप रेखा तय कर ली जाये. इसमें निम्नांकित तत्व शामिल हैं:

1) दूसरों के साथ संवाद करते समय किसी तरह की कोई हिंसा न होना, चाहे वह भाषिक, गैर-भाषिक हो, या फिर हमारी भावनाएं या विचार हों.

2) हमें अपने आप से संवाद करना सीखना चाहिए और आत्मनिरीक्षण करना चाहिए.

3) उपयुक्त और सकारात्मक भाषा का उपयोग. हमारी भावनात्मक शब्दावली का विस्तार.

4) संचार प्रयासों में रूढिय़ों से बचना.

5) नैतिक निर्णयों से बचें.

6) क्रूर और मूल्यांकन भाषा से बचें.

7) आक्रामक होने से बचें.

8) संचार में पारस्परिक सम्मान की भूमिका.

9) सहानुभूति की शक्ति. सहानुभूति पूर्ण संचार हमें दूसरों के दृष्टिकोण को समझने में मदद करता है.

10) करुणा की शक्ति में दृढ़ विश्वास.

11) दूसरों की जरूरतों से जुडऩा.

12) हमारे संचार में लचीलापन का महत्व

13) गहन और अनुभवजन्य सुनने के कौशल का अभ्यास करना.

14) हमारे दैनिक जीवन में आभार व्यक्त करना.

उपरोक्त तत्वों के संदर्भ में, यह तर्क दिया जा सकता है कि अहिंसक संचार के टूल किट का उपयोग करके हम अपने जीवन के हर पल में मानवतावाद का अभ्यास कर सकते हैं, यह हमें सबसे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी मानवीय रूप से कार्य करने में मदद करेगा. जैसे-जैसे हमारी भावनात्मक शब्दावली का विस्तार होता है, हम इस बात पर फिर से विचार करना शुरू कर देंगे कि हम कैसे खुद को अभिव्यक्त करते हैं और दूसरों को सुनते हैं. हमें सहानुभूति पूर्ण संबंध बनाने की आदत पड़ेगी और हम अधिक आत्म-जागरूक बनेंगे. आज की दुनिया में जहां विचारों का मतभेद संघर्षों का लगातार कारण है, विकासशील संबंध महत्वपूर्ण हैं. गांधी ने उपयुक्त रूप से कहा था, ‘दुनिया में तीन चौथाई दुख और गलतफहमियां गायब हो सकती हैं, अगर हम अपने विरोधियों की समस्याओं को समझें और उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें. फिर हम अपने विरोधियों के साथ जल्दी से सहमत होंगे या उनके बारे में सोच समझकर काम करेंगे. साथ ही, एक अहिंसक संचारक के रूप में, हम अपनी गहरी जरूरतों और दूसरों के बारे में सुनने में सक्षम हैं. बड़ी संख्या में संघर्ष आसानी से हल हो जाते हैं जब हम अन्य व्यक्तियों की जरूरतों को गंभीरता से समझने में सक्षम होते हैं. जिद्दू कृष्णमूर्ति ने कहा था, ‘‘मूल्यांकन के बिना निरीक्षण करने की क्षमता बुद्धि का उच्चतम रूप है.’’ यही वह बात है जो अहिंसक संचार हमें करने में सक्षम बनाता है.

अहिंसक संचार में एक प्रशिक्षक, मायरा वाल्डेन का अहिंसक संचार के महत्व के बारे में कहना है कि हम में से कई लोगों का पालन-पोषण ऐसे वातावरण में हुआ है जहां प्रतिस्पर्धा, निर्णय, मांग और आलोचना संचार मानक हैं;  सबसे अच्छे तरीके से सोचने और बोलने में बाधा डालने की  ये आदतेें  दूसरों और खुद में गलतफहमी और निराशा पैदा करती हैं. इससे भी बदतर, वे गुस्से और दर्द का कारण बनती हैं और यहां तक कि हिंसा भी हो सकती है. सर्वोत्तम इरादों के साथ भी, हम अनावश्यक संघर्ष उत्पन्न कर सकते हैं. अहिंसक संचार की प्रणाली. यह मानकर शुरु होती है कि हम सभी स्वभाव से दयालु हैं और उन हिंसक रणनीतियों, चाहे मौखिक हो या भौतिक, को व्यवहार से सीखते  हैं, जो प्रचलित संस्कृति द्वारा समर्थित है. अहिंसक संचार लोगों को यह जानने में मदद करता है कि एक-दूसरे के साथ प्रभावी ढंग़ से संवाद कैसे किया जाए ताकि उनके जीवन और रिश्ते रूपांतरित हों.’’

अंत में, हम सभी अपने पोषण और स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ भोजन लेना पसंद करते हैं. अस्वास्थ्यकर भोजन हमें बीमार बनाता है. इसी तरह, हम सभी को अपनी भलाई के लिए ताजी हवा की जरूरत है. प्रदूषित हवा हमें उदास करती है और विभिन्न बीमारियों का कारण हो सकती है. भोजन और ऑक्सीजन की तरह संचार भी उतना ही महत्वपूर्ण है. हम संवाद के अभाव में अपने को अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं और यह हमारे अस्तित्व का हिस्सा है, यह महत्वपूर्ण है कि हम स्वस्थ संचार में लिप्त हों जो हमें पोषण देगा. कई बार, हम अस्वस्थ संचार में लिप्त होते हैं. हमारा अहंकार, आधिपत्य की भावना और श्रेष्ठता, दूसरों के साथ मतभेद, हमारे स्वयं के जीवन की स्थिति और कई अन्य कारण ऐसे कारण हो सकते हैं जिनके कारण हम अस्वस्थ संचार का अभ्यास करते हैं. हमारे पास दूसरों को सुनने के लिए धैर्य नहीं है, हम स्वयं जागरूक नहीं हैं और जानबूझकर या अनजाने में हम क्षुद्र वार्ता में शामिल होते हैं या ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जो न केवल खुद के लिए बल्कि दूसरों के लिए भी दुख का कारण बन सकते हैं. ये सभी अवसाद, तनाव, क्रोध और असुरक्षा की भावनाओं का कारण हैं. ये एक स्वस्थ जीवन शैली के लक्षण नहीं हैं. इसलिए, हमें एक ऐसी संचार प्रक्रिया में शामिल होने की आवश्यकता है जो हमें तनाव-रहित करती है और हमें कल्याण की भावना प्रदान करती है. हमारा संचार सुख असमानता की खाई को पाटने और सकारात्मक भावनाओं के पोषण में योगदान करने में सक्षम होना चाहिए. इसलिए यह इन सभी कारणों के लिए है, हमारे सभी संस्थानों में अहिंसक संचार में शिक्षा शामिल  की जानी चाहिए. प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालयों तक और शासन संरचना के विभिन्न रूपों में, अहिंसक संचार के एकीकरण से सामाजिक सामंजस्य और एकजुटता में योगदान करने वाली  एक मानवीय और खुशहाल नागरिकता प्राप्त होगी.

निष्कर्ष रूप में हमारे दैनिक जीवन में अहिंसक संचार की केंद्रीयता पर भगवान बुद्ध को उद्धृत करना उचित होगा: शब्दों में नष्ट करने और चंगा करने की शक्ति दोनों हैं. जब शब्द सच्चे और दयालु दोनों हों, तो वे हमारी दुनिया बदल सकते हैं.

लेखक गांधी स्मृति और दर्शन समिति में प्रोग्राम अधिकारी हैं, ई-मेल: askunda.ahima@gmail.com व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं