विशेष लेख


ताज़ा अंक-15, 13 - 19 जुलाई 2019

बढ़ती जनसंख्या को रोकने की जरूरत

चन्दन कुमार चौधरी

ढ़ती आबादी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है. बाजारवादी व्यवस्था में किसी भी देश की बढ़ती आबादी उसकी ताकत मानी जाती है लेकिन जब यह आबादी बहुत अधिक बढ़ जाती है तो यह संसाधनों पर बोझ बनने लगती है और फिर समस्या यहीं से शुरू होती है. भारत जैसा विकाशील देश भी जनसंख्या के मामले में इसी तरह की चुनौतियों से जूझता नजर आ रहा है. संयुक्त राष्ट्र की हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2027 तक भारत की आबादी चीन की जनसंख्या से अधिक हो जाएगी और विश्व की जनसंख्या में वर्ष 2050 तक 2 अरब 20 करोड़ आबादी और जुड़ जाएगी. इसके अलावा 2050 तक भारत की जनसंख्या में 27.3 करोड़ की वृद्धि हो सकती है. इसके साथ ही भारत इस शताब्दी के अंत तक दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बना रह सकता है. इस समय भारत की अनुमानित आबादी 1.37 अरब है जबकि चीन की जनसंख्या 1.43 अरब है. इस तरह अगर हम देखें तो भारत जनसंख्या के मामले में चीन से करीब छह करोड़ ही पीछे रह गया है. 2027 में अब ज्यादा समय शेष नहीं रह गया है और इसमें अब केवल करीब आठ साल का ही समय बच गया है. ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश में बढ़ती आबादी निश्चित रूप से एक चिंता का सबब बनती जा रही है. ऐसा नहीं है कि आबादी की समस्या से केवल भारत जैसा देश ही जूझ रहा है बल्कि इससे पूरी दुनिया जूझ रही है और परेशान है. हमारे पास संसाधन सीमित हंै और जितना संसाधन है वही लोगों के लिये पर्याप्त नहीं हो रहा है. ऐसे में जब जनसंख्या बढ़ेगी तो अतिरिक्त लोगों के लिए हमारे सामने अतिरिक्त संसाधनों का प्रबंध करने की चुनौती होगी. संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के आंकड़ों को अगर हम गौर से देखें तो पता चलता है कि इस समय दुनिया की आबादी 7.7 अरब है जो तीस साल में बढ़ कर 9.7 अरब हो जाएगी. संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग में जनसंख्या संकाय ने द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2019’ नाम से जारी रिपोर्ट में जनसंख्या संबंधी उक्त दावा किया है. इसके मुताबिक सदी के अंत तक वैश्विक आबादी 11 अरब तक हो जाएगी. यही नहीं 2050 में दुनिया की आधी जनसंख्या केवल नौ देशों में ही होगी. इनमें भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो, इथियोपिया, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिस्र और अमेरिका शामिल हैं.

विश्व जनसंख्या दिवस

संयुक्त राष्ट्र की गवर्निंग काउंसिल ने 1989 में पहली बार 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की थी. तेजी से बढ़ती दुनिया की आबादी ने हमारे सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. दुनिया की आबादी हर दिन, हर घंटे, हर सेकेंड बढ़ती जा रही है. बढ़ती आबादी से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के मकसद से ही हर साल 11 जुलाई को वल्र्ड पॉप्युलेशन डे यानि विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है.

चीन से सीखने की जरूरत

भारत को जब ब्रिटेन से वर्ष 1947 में आजादी मिली थी तब यहां की आबादी 33 करोड़ थी जो अब 135 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है. पिछले सत्तर साल में इसमें चार गुणा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. दुनिया की कुल आबादी में अब भारत की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत हो गई है. यानि दुनिया का हर छठा आदमी भारतीय है. भारत की जनसंख्या वृद्धि दर 2010-15 के दौरान 1.24 प्रतिशत प्रति वर्ष रही है जबकि इसी समयावधि के दौरान चीन की जनसंख्या वृद्धि दर प्रति वर्ष 0.61 प्रतिशत रही. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यानि यूएनएफपीए द्वारा जारी स्टेट ऑफ वल्र्ड पॉपुलेशन 2018’ रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 से 2019 के बीच दुनिया में जनसंख्या वृद्धि दर का औसत 1.1 फीसदी रही वहीं भारत की जनसंख्या हर साल 1.2 फीसदी की दर से बढ़ी. हालांकि, इसी समयावधि के दौरान चीन में सालाना जनसंख्या वृद्धि दर 0.5 फीसदी रही. ऐसे में स्पष्ट है कि भारत का जनसंख्या बढऩे का आंकड़ा चीन से दोगुना से अधिक है. चीन ने जिस तरह से अपनी बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित किया है और उसे थाम सा लिया है, उससे अगर भारत सीखे तो निश्चित रूप से उसे फायदा मिलेगा.

भारत में जनसंख्या बढऩे का कारण

भारत की जनसंख्या बढऩे का प्रमुख कारण शिक्षा और जागरूकता की कमी को माना जाता है. इसके अलावा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी और अंधविश्वास भी जनसंख्या बढऩे के प्रमुख कारणों में शामिल रहा है. इसकी  वजह से भारत में संसाधनों का अभाव हो रहा है, भूख और कुपोषण बढ़ रहा है. विश्व में बीमारियों का जो बोझ है, उसमें से 20 प्रतिशत केवल भारत में है. बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक चीजें घट रही हैं, सुविधाओं का अभाव हो रहा है और बेरोजगारी की दर बढ़ रही है.

संसाधनों की कमी

हमें समझना होगा कि हमारे पास प्राकृतिक और मानव निर्मित संसाधन सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हैं. ऐसे में बढ़ती जनसंख्या के कारण भारी मात्रा में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो रहा है. इसके कारण देश में भुखमरी, पानी और बिजली की समस्या, आवास की समस्या, शिक्षा के प्रसार-प्रचार की समस्या, चिकित्सा की बदइंतजामी और रोज़गार के कम होते विकल्प संबंधित कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है. बढ़ती आबादी से हम खाद्यान्न संकट, पेयजल, आवास और शिक्षा  पर बोझ बढ़ाने का खतरा मोल ले रहे हैं और लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील कर देश की गरीबी को ही बढ़ा रहे हैं.

प्रजनन दर को सीमित करना

आंकड़ों के मुताबिक, 1804 में पूरी दुनिया की आबादी एक अरब थी जो 1960 में बढ़ कर तीन अरब हो गई. दुनिया की वही आबादी 2000 में बढ़ कर छह अरब हो गई. इस समय अध्ययनों और रिपोर्टों के मुताबिक, दुनिया में हर सकेंड 4.2 लोगों का जन्म होता है और 1.8 लोगों की मौत होती है. यानि जन्म लेने वाले हर चार व्यक्ति पर मरने वालों की संख्या सिर्फ दो है. ऐसे में दो अतिरिक्त लोगों के लिए हमें भोजन, पानी और अन्य संसाधनों का इंतजाम करना पड़ता है. भारत में हर मिनट करीब 25 बच्चों का जन्म होता है. इस समय जनसंख्या के मामले में पहले स्थान पर जहां चीन है, वहीं दूसरे स्थान पर भारत और तीसरे स्थान पर अमेरिका है. साथ ही वर्ष 2050 तक 70 प्रतिशत आबादी के शहरों में रहने की संभावना है. ऐसे में हमें शहरों में बढ़ती आबादी को रोकने के लिए संसाधनों और सुविधाओं को विकेन्द्रित करना होगा और गांवों को भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर सदृढ़ करना पड़ेगा. साथ ही बढ़ती आबादी को रोकने के लिए व्यापक पैमाने पर जागरूकता फैलाना पड़ेगा और गर्भ निरोध का उपाय करना पड़ेगा और अनचाहे गर्भ जैसे मामलों को रोकना पड़ेगा. लोगों को कंडोम, गर्भ निरोध के बारे में जानकारी देनी पड़ेगी. परिवार नियोजन और परिवार कल्याण कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार और विस्तार करना पड़ेगा.

नारों पर जोर

एक समय था जब हमारे देश में परिवार नियोजन पर जोर देने के लिए हम दो हमारे दोजैसे नारे लगाए जाते थे. हालांकि, ऐसा लगता है कि यह नारा लोगों के मनो-मस्तिष्क पर प्रभाव छोडऩे में व्यापक तौर पर सफल नही रहा. अगर यह सफल होता तो शायद हमारे देश की आबादी में इस तरह बेतहाशा बढ़ोतरी नहीं हुई होती. बावजूद इसके हमें इस तरह के नारे बनाने से बचना नहीं चाहिए. इस तरह के नारे से व्यापक असर भले ही नहीं हुआ हो लेकिन अगर थोड़ा भी असर हो रहा है तो इसे सफल माना जाएगा. ऐसे में अब हमें हम दो हमारे दोनहीं बल्कि हम दो हमारे एक  जैसे नारे गढऩे होंगे और उस पर जोर देना पड़ेगा.

सरकारी योजना

उत्तर प्रदेश सरकार ने 2017 में 11 जुलाई यानी विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर एक योजना शुरू करने की घोषणा की थी. इस योजना के तहत नवविवाहितों को नई पहलनामक किट देने की बात की गई थी. इस किट में कॉन्डोम और गर्भनिरोधक गोलियों के अलावा सुरक्षित सेक्स और परिवार नियोजन की महत्ता पर एक संदेश, तौलियों-रूमालों का एक पैकेट, एक नेल-कटर, एक कंघा और आईना रहता है. यह नई पहलकिट आशा  कार्यकर्ताओं द्वारा वितरित की जा रही है. राज्य सरकार की यह योजना केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा सबसे ज्यादा जन्म दर वाले सात राज्यों के लिए शुरू की गई मिशन परिवार विकासयोजना के अंतर्गत चलाई जा रही हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम शामिल हैं. इस योजना का उद्देश्य युगलों के बीच संवाद को बढ़ावा देना तथा परिवार नियोजन पर मिलकर फैसला करने के लिए प्रेरित करना है. बढ़ती आबादी के लिए उत्तर प्रदेश राज्य से देश के अन्य राज्यों को भी सीख लेनी चाहिए और समय-समय पर इस तरह के छोटे-बड़े उपाय करते रहने चाहिएं.

भविष्य की कई नई चुनौतियां

माल्थस एक बहुत चर्चित अर्थशास्त्री रहे हैं. माल्थस के करीब दो सौ साल पहले जनसंख्या सिद्धांत के मुताबिक मानव जनसंख्या ज्यामितीय आधार पर बढ़ती है लेकिन वहीं भोजन और प्राकृतिक संसाधन अंकगणितीय आधार पर बढ़ते हैं. यही वजह है कि जनसंख्या और संसाधनों के बीच का अंतर उत्पन्न हो जाता है. कुदरत इस अंतर को पाटने के लिए आपदाएं लाती है. कभी सूखा पड़ता है, तो कभी बाढ़ जैसी घटनाएं सामने आती हैं. इसी तरह डार्विनवाद के प्रणेता चाल्र्स डार्विन के सिद्धांत के मुताबिक जीवन के लिए संघर्षहोता रहता है. ऐसे में अगर हम भविष्य में संतुलन बनाने के लिए माल्थस और डार्विन के सिद्धांतों का पालन करने के भरोसे बैठे रहेंगे तो हमें ज्यादा परेशानी मोल लेनी पड़ेगी. हमें जनसंख्या संतुलन के लिए बाढ़ और महामारी जैसी समस्याओं का इंतजार करना पड़ेगा. ऐसे में संघर्ष और अशांति बढ़ेगी. अगर हम आराम से जीना चाहते हैं और संघर्ष से बचना चाहते हैं तो जनसंख्या वृद्धि को रोकना होगा.

भविष्य संवरता है

यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड ऐक्टिविटीज (यूएनएफपीए) के मुताबिक परिवार नियोजन से न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य भी संवरता है. भारत सरकार इन दिनों परिवार नियोजन को लेकर काफी प्रचार कर रही है. परिवार नियोजन से जनसंख्या पर तो नियंत्रण होता ही है, साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य और देश की अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यूएनएफपीए का कहना है कि दुनिया के विकासशील देशों में एक अनुमान के मुताबिक 214 मिलियन यानि 21 करोड़ 40 लाख महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी आधुनिक गर्भनिरोधों की जरूरत अभी तक पूरी नहीं हो पाई है. ऐसे में अगर हम उन्हें आधुनिक गर्भनिरोधों को पूरा करने में सफल होते हैं तो बढ़ती आबादी पर काबू पाने में हमें सहूलियत होगी.

खतरे का संकेत

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, जनसंख्या वृद्धि मुख्य तौर पर उत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि में होगी. इन राज्यों में मानव विकास सूचकांक पहले से ही काफी गंभीर हालत में है. उद्योगों के मामले में भी ये राज्य काफी पीछे हैं यानी संसाधनों के मामले में भी इनके हाथ तंग है. ऐसे में समस्याएं बढ़ेंगी और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पलायन का दौर जारी होगा. लोगों के विस्थापित होने और पलायन के कारण राजनीतिक संकट और दूसरे तरह का दुष्प्रभाव नजर आने लगेगा जो खतरा बढ़ाएगा. ऐसे में बढ़ती आबादी के खतरे के संकेत को भांप कर उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए.

सरकार की भूमिका

भारत में जनसंख्या बढ़ोतरी को लेकर सरकार की नीति बहुत मायने रखती है. आपातकाल के दौरान एक बार अलोकतांत्रिक तरीके से जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए प्रयास किया गया था लेकिन इसके बाद अभी तक देखने में आया है कि जनसंख्या बढ़ोतरी रोकने के लिए सरकार ने कभी सख्त उपाय किए हों या कानून बनाया हो. भारत में जनसंख्या को लेकर एक स्पष्ट नीति कभी नहीं रही है. पूरे विश्व में ऐसा देखा गया है कि शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के द्वारा इस पर आसानी से नियंत्रण हो रहा है. हमें बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतिओं पर लगाम लगाना होगा और लोगों के बीच जागरूकता बढ़ानी होगी. भारत जैसे देशों में समय आ गया है कि परिवार नियोजन के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाए. साथ ही हमें बढ़ती आबादी की एक समस्या के रूप में पहचान करनी होगी और उसका ठोस एवं स्थायी निवारण करने के लिए प्रयास करने होंगे.