विशेष लेख


ताज़ा अंक-16, 20 - 26 जुलाई 2019

देश में बैंकिंग क्षेत्र का विकास

विजय प्रकाश श्रीवास्तव

आज हमारे आसपास किसी बैंक की शाखा होना एक स्वाभाविक बात है. चाहे हम शहर में रह रहे हों अथवा गांव में, हमें अपने आसपास बैंक की शाखा मिल जाती है. आज बैंकिंग सेवाएं हर किसी को वहनीय लागत पर उपलब्ध हैं. परंतु, कुछ दशक पहले तक यह स्थिति नहीं थी. हमारे देश में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से बहुत बदलाव आए हैं. कुछ परिवर्तन बड़े हैं और कुछ छोटे. बैंकिंग एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें पहुंच और सेवाएं प्रदान करने के मामले में अधिकतम बदलाव दिखाई देते हैं.

इस वर्ष 19 जुलाई को भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के ५० वर्ष पूरे हो रहे हैं. 1969 में इसी दिन देश के बड़े 14 बैंकों, जिनकी जमा पूंजी 50 करोड़ रुपये थी, का सरकार द्वारा राष्ट्रीयकरण किया गया था ताकि वे राष्ट्रीय नीति के लक्ष्यों के अनुरूप अर्थव्यवस्था की विकास की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सकें. 15 अप्रैल, 1980 को छह और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया.

भारत में बैंकिंग का इतिहास बड़ा दिलचस्प रहा है. द बैंक ऑफ हिंदुस्तान देश का प्रथम बैंक था, जिसकी स्थापना 1770 में हुई थी. इसके बाद 1786 में जनरल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुई, लेकिन यह पांच वर्ष बाद विफल हो गया. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1806 और 1843 के बीच बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना की थी,  जिन्हें प्रेजिडेंसी बैंक कहा जाता था. 1920 में इन तीनों बैंकों का एकीकरण करते हुए इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई. इलाहाबाद बैंक भारतीय नागरिकों द्वारा स्थापित पहला बैंक था. इसके बाद पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना हुई. इन दोनों बैंकों की स्थापना क्रमश: 1865 और 1894 में की गई. 1906  और 1913 के बीच 5 और बैंकों की स्थापना की गई जिनमें बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा, केनरा बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ मैसूर शामिल थे. बैंकिंग कार्य  और गतिविधियों को संगठित करने के लिए सरकार ने 1949 में बैंकिंग कंपनी अधिनियम शुरू किया, जिसे बाद में बैंकिंग विनियमन अधिनियम में बदल दिया गया. 1955 में सरकार ने इम्पीरियल बैंक का स्वामित्व अपने हाथ में ले लिया और उससे कहा कि वह देशभर में लोगों को व्यापक बैंकिंग सेवाएं प्रदान करे.

बैंकों का राष्ट्रीयकरण: पहली बार जिन 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया उनमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन बैंक, देना बैंक, यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, यूनाइटेड  बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, इलाहाबाद बैंक, आंध्रा बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, कॉर्पोरेशन बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया शामिल थे.

दूसरे चरण में पंजाब और सिंध बैंक, न्यू बैंक ऑफ इंडिया, ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स और विजया बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया.

1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो गया.

सभी बड़े प्राइवेट बैंकों पर किसी एक या अन्य औद्योगिक घराने का नियंत्रण था. परिणामस्वरूप इन बैंकों की संपदा और आर्थिक शक्ति का इस्तेमाल केवल कुछ घरानों तक सीमित था और बृहत्त जनसंख्या बैंकिंग प्रणाली के लाभ से वंचित थी. यह भी महसूस किया गया था कि भारतीय वाणिज्यिक बैंकों के विकास की गति अत्यंत धीमी और प्रतिबंधात्मक थी. आम आदमी को इन बैंकों से कोई लाभ नहीं पहुंच रहा था. बैंकों की उधार देने की नीति भेदभावपूर्ण थी. बैंकों द्वारा ज्यादातर ऋण बड़े और मध्यम आकार के उद्यमों और पहले से स्थापित व्यापारिक प्रतिष्ठानों को दिए जाते थे. ऋणों का अंतिम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नियंत्रण प्रणाली नहीं थी और यह कोई असामान्य बात नहीं थी कि बैंकों से लिए गए धन का इस्तेमाल जमाखोरी, कालाबाजारी और सट्टेबाजी आदि समाज विरोधी लक्ष्यों के लिए किया जा रहा था. कुल मिला कर देश में बैंकिंग प्रणाली अच्छी स्थिति में नहीं थी और उसमें आमूल-चूल परिवर्तनों की आवश्यकता थी. 1967 में बैंकों के सामाजिक नियंत्रण के विचार पर बल दिया गया. सरकार के पूर्ण स्वामित्व और यथास्थिति के बीच मध्यम मार्ग के रूप में बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण प्रस्तावित किया गया. इसका अर्थ यह था कि सरकारी हस्तक्षेप के जरिए बैंक अर्थव्यवस्था में अधिक भागीदारी निभाएं. यह महसूस किया गया कि बैंकिंग प्रणाली देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकती है और जरूरत इस बात की है कि उसके लिए उपयुक्त नीतियां बनाई जाएं और उन्हें कारगर ढंग से लागू किया जाए.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण यह उम्मीद थी कि  सरकार का राजस्व बढ़ेगा, क्योंकि बैंकों द्वारा अर्जित मुनाफा उसे मिलेगा. सरकारी स्वामित्व का लक्ष्य बैंकों में जमाकर्ताओं के धन को अधिक सुरक्षा प्रदान करना भी था. जहां तक ऋण मंजूर करने का प्रश्न है, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि खेती और लघु उद्योगों के लिए ऋण का समुचित प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके ताकि वे निचले स्तर पर विकास में अपनी भूमिका अदा कर सकें.

वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले अंधाधुंध ऋण दिए जा रहे थे. 1980 में राष्ट्रीयकरण के बाद सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि बैंक ऋण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राथमिकता क्षेत्रों को आवंटित किया जाए, जिनमें कृषि, लघु उद्योग, कम लागत वाले आवास आदि शामिल थे. समय गुजरने के साथ प्राथमिकता क्षेत्र में अधिक गतिविधियों को शामिल करते हुए उसका विस्तार किया गया.

राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण और अद्र्ध शहरी केंद्रों पर अधिक संख्या में बैंक शाखाएं खोली गई, जो अभी तक इन सुविधाओं से वंचित थीं. बैंक शाखाओं के इतने व्यापक विस्तार का उदाहरण विश्व में और कहीं नहीं मिलता.

भारत में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने आम भारतीय नागरिकों के बीच बैंकिंग की आदत विकसित की, उन्हें बैंकों में बचत करने के लिए प्रेरित किया और उचित दर पर जरूरत मुताबिक ऋण प्रदान किए. देश की निर्धन और बहिष्कृत आबादी ने भी यह महसूस किया कि वे बैंकों तक अपनी पहुंच कायम कर सकते हैं.

इन बैंकों के जरिए विभिन्न सरकारी कार्यक्रम चलाए गए. इनमें से प्रमुख कार्यक्रमों में एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आईआरडीपी), शहरी निर्धनों के लिए स्वरोज़गार कार्यक्रम (एसईपीयूपी), शिक्षित बेरोज़गार युवकों के लिए स्वरोज़गार कार्यक्रम (एसईईयूवाई), भेदक ब्याज दर कार्यक्रम (डीआरआई) आदि शामिल थे. हमने यहां प्रारंभिक कार्यक्रमों की चर्चा की है. हाल ही में अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल किए गए हैं, जिनमें सुकन्या समृद्धि योजना, मुद्रा योजना आदि शामिल हैं.

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक : देश की दो तिहाई से अधिक आबादी गांवों में रहती है. इसे देखते हुए देश की सरकार ने यह महसूस किया कि बैंकों की एक परत विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की सेवा करने वाली होनी चाहिए. 26 सितंबर 1975 को एक अध्यादेश जारी किया गया, जिसे बाद में 1976 के क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम में परिवर्तित किया गया. इसका लक्ष्य कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पर्याप्त संस्थागत ऋण सुनिश्चित करना था. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन मजदूरों, कामगारों आदि की ऋण जरूरतें पूरी करने के उद्देश्य से की गई. इन बैंकों को कम लागत वाले वित्तीय मध्यस्थों का दायित्व सौंपा गया. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से यह उम्मीद की गई कि वे राष्ट्रीयकृत वाणिज्यिक बैंकों की विशेषज्ञता के साथ स्थानीय जरूरतों को महसूस करें और लोगों को समान सेवाएं उपलब्ध कराएं. पहले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के रूप में प्रथमा बैंक की स्थापना 2 अक्तूबर 1975 को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर की गई थी. किसी भी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में प्रायोजक बैंक केंद्र सरकार और राज्य सरकार की हिस्सेदारी होती है. पुनर्गठन के बाद देश में अब करीब 56 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं.

बैंकिंग सुधार : भारतीय बैंकिंग प्रणाली को प्रतिस्पर्धात्मक और वैश्विक रूप में स्वीकृत पद्धतियों के अनुसार बनाने के लिए सुधार के विभिन्न उपाय किए गए. प्रारंभिक सुधारों का संबंध ब्याज दरों के ढांचे और विभिन्न क्षेत्रों को ऋण आवंटन के साथ था. कुछ विशेष वर्गों को छोडक़र, बैंकिंग क्षेत्र में ब्याज दरें अधिकतर विनियमित रही हैं. सरकारी बैंकों की कार्य क्षमता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्हें निजी बैंकों की स्पर्धा में खड़ा किया गया. नए प्राइवेट बैंकों और विदेशी बैंकों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए ताकि अधिक उदार शर्तों पर उनकी स्थापना की जा सके. 1993 के बाद अनेक प्राइवेट बैंकों की स्थापना हुई. निजी बैंकिंग क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति 74 प्रतिशत तक दी गई, जो अन्य दिशा-निर्देशों के अधीन थी.

बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और नियामक मानदंडों को सुदृढ़ करने के लिए अनेक उपाय किए गए. प्रकटीकरण मानदंड भी सख्त बनाए गए. बैंक लाइसेंस नीति को युक्तिसंगत बनाया गया ताकि निजी बैंक खोलने, बंद करने और अपनी शाखाओं का विलय करने में अधिक स्वतंत्रता दी जा सके.

सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर विशेषज्ञों की अध्यक्षता में कार्य समूहों का गठन किया गया. उदाहरण के लिए श्री एम. नरसिम्हन की अध्यक्षता में वित्तीय प्रणाली समिति और बकाया भुगतान के बारे में डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया.

भारत बैंकिंग पर्यवेक्षण के बारे में बासेल समिति से सम्बद्ध रहा है. बासेल-2 मानदंडों के कार्यान्वयन के साथ हमारे देश में वाणिज्यिक बैंक ऋण जोखिम और प्रचालनगत जोखिम के लिए बुनियादी संकेतक दृष्टि के अंतर्गत वैश्विक रूप में स्वीकृत मानदंड अपनाते हैं.

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पर उपरोक्त सुधारों का व्यापक रचनात्मक प्रभाव पड़ा है. भारतीय बैंकों की वर्तमान पूंजी पर्याप्तता की तुलना अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बैंकों से की जा सकती है. बैंकों के मुनाफे और परिसंपत्तियों पर लाभ में सुधार हुआ है. जन शक्ति लागत को अनुकूलतम रखते हुए बैंक प्रति कर्मचारी अधिक उत्पादकता का लक्ष्य हासिल कर पाए हैं.

बैंकों में टेक्नोलॉजी : भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव प्रौद्योगिकी के आविष्कार के साथ हुआ है. अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक लेजर पोस्टिंग मशीनों से आगे बढ़ते हुए बैंकों ने कोर बैंकिंग सोल्यूशन सफलतापूर्वक अपनाए, जिनकी बदौलत किसी समय, कहीं भी बैंकिंग कार्य संभव हुए. ज्यादातर बैंकिंग प्रचालन अब कम्प्यूटरीकृत हैं, जो वास्तविक समय पर सेवा प्रदान करना संभव बनाते हैं. पहली स्वचालित टेलर मशीन (एटीएम) देश में 1987 में लगाई गई थी. आज आप देशभर में कहीं भी एटीएम देख सकते हैं और लोगों को उनके इस्तेमाल की आदत पड़ गई है. पासबुक प्रिंटिंग मशीनों, कैश डिपोजिट मशीनों, नोटों की गिनती करने वाली मशीनों का इस्तेमाल व्यापक रूप में किया जा रहा है. देश में सुदृढ़ भुगतान और निपटान प्रणाली कायम करने में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने महत्वपूर्ण योगदान किया है. नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर (एनईएफटी) और रीयल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) के जरिए धन अंतरण की प्रक्रिया आसान हुई है और कागजी कार्रवाई में कमी आई है.

देश में कार्ड संस्कृति को बढ़ावा मिला है और अधिकाधिक लोग डेबिट और क्रेडिट कार्डों के जरिए भुगतान कर रहे हैं. एक बड़ी क्रांति के रूप में मोबाइल वालेट सामने आए हैं और ज्यादातर बैंकों ने अपने वालेट बाजार में उतार दिए हैं. मोबाइल फोन बैंकिंग उपकरण के रूप में परिवर्तित हो चुका है जिस पर धन अंतरण, शेष राशि पूछताछ, लेनदेन संबंधी अलर्ट जैसी सेवाओं का लाभ उठाया जा रहा है. इंटरनेट बैंकिंग भी समान रूप से लोकप्रिय हुई है. ये सभी प्रौद्योगिकी विषयक घटनाएं हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत तौर पर बैंक शाखाओं में जाने की आवश्यकता को कम कर दिया है. अधिकाधिक लोग अपने बैंकिंग कार्य चलते फिरते पूरे कर रहे हैं.

प्रौद्योगिकी अपनाने के बारे में वर्तमान दशक अधिक क्रांतिकारी सिद्ध होने जा रहा है. बैंकों में ब्लॉकचेन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और चैट बॉक्स का प्रवेश हो रहा है और जल्दी ही एक रोबोट बैंकिंग संबंधी आपके सवालों का जवाब देने लगेगा.

बैंकिंग क्षेत्र का योगदान: आज भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. बुनियादी ढांचा बेहतर स्थिति में है और उपभोक्ता खर्च बढ़ रहा है. इन सभी गतिविधियों में बैंकिंग क्षेत्र ने महत्वपूर्ण योगदान किया है. भारत जैसे विशाल देश में वित्तीय समावेशन एक बड़ी चुनौती थी. हम इसका सामना करने में सफल रहे हैं. कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों और विद्यार्थियों (उच्चतर शिक्षा के लिए ऋण) जैसे क्षेत्रों को बैंकिंग वित्त पोषण से देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है. पेमेंट बैंकों और लघु वित्त बैंकों से बैंकिंग तक पहुंच बढ़ी है. इंडिया पोस्ट पेमैंट बैंक इस क्षेत्र में अपनी तरह का बेजोड़ उदाहरण है.

बैंकिंग की वर्तमान स्थिति : बैंकों के तुलनपत्रकों को मजबूती प्रदान करने के लिए एक व्यापक क्लीन-अप अभियान चलाया गया. सघन प्रयासों की बदौलत बैंक अपने फंसे हुए कर्जों का एक बड़ा हिस्सा वसूल करने में सफल हुए. शीघ्र सुधारात्मक कार्रवाई जैसे प्रतिबंधात्मक उपायों को अब सरल बनाया जा रहा है और सरकार बैंकों की हालत सुधारने के लिए उनका पुन: पंजीकरण कर रही है.  5 जुलाई, 2019 को पेश किए गए नवीनतम बजट में भी सरकारी बैंकों में पंूजी प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार ने 70,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.

बैंकों के समक्ष चुनौतियां : बैंकों को अभी भी अपने खराब ऋणों को वसूल करना है तथा इस दिशा में अपने प्रयासों को नया रूप देना है ताकि वे सशक्त और उचित प्रस्तावों के लिए वित्त पोषण जारी रख सकें. उभरती हुई चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी कार्मिक शक्ति को सुसज्जित करना बैंकों के समक्ष एक अन्य चुनौती है. उन्हें सामाजिक दायित्व और वित्तीय विवेकशीलता के बीच एक संतुलन स्थापित करना होगा और अपने पिछले अनुभवों से सबक लेना होगा. देना बैंक और विजया बैंक के बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विलय की एक नई लहर पहले ही शुरू हो चुकी है. कुछ और बैंकों का भी शीघ्र विलय होगा. हालांकि विलय के बाद कैसे सुदृढ़ होकर उभरना है, यह एक अन्य चुनौती होगी.

(लेखक बैंकिंग क्षेत्र के साथ संबद्ध और मुंबई स्थित हैं) ई-मेल:v2j252@Yahoo.In)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हंै.