विशेष लेख


Special Article Volume-34

जीएसटी: महत्वपूर्ण कर सुधार

के. आर. सुदामन

दूरगामी और परिवर्तनकारी प्रत्यक्ष कर सुधारों-वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में भारत की आर्थिक वृद्धि दर को कम से कम दो प्रतिशत बिंदु तक ऊपर ले जाने की क्षमता है। इसका अर्थ है यह हुआ कि भारत, जो इस समय 76 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि के साथ सबसे तेज़ी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है, अगले दशक या दो दशकों में श्रम, बिजऩेस करना आसान होने, अवसंरचना सुधारों जैसे अन्य क्षेत्रों में मामूली और वृद्धिशील उपाय किये जाने से 96 प्रतिशत अथवा यहां तक कि दोहरे अंकों की वार्षिक वृद्धि दर हासिल कर लेगा।

पहली अप्रैल, 2017 से जीएसटी लागू हो जाने से निश्चित रूप से कुछ हद तक कर ढांचे में सुधार होगा। इससे प्रत्यक्ष करों का प्रशासन आसान हो जायेगा जिससे लालफीताशाही पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी और करों में देरी और बेहतर स्पष्टता आयेगी। इसमें सीमा शुल्क को छोडक़र, उत्पाद कर, सेवा कर, प्रवेश कर, केंद्रीय बिक्री कर, चुंगी कर और राज्य स्तरीय मूल्य वद्र्धित कर जैसे सभी अप्रत्यक्ष करों का विलय हो जायेगा। यद्यपि इस वक्त, कुछेक अप्रत्यक्ष कर जैसे कि पेट्रोल और पेट्रोलियम उत्पादों, शराब और तम्बाकू पर उत्पाद कर और अन्य शुल्क जीएसटी के दायरे से बाहर रहेंगे। जहां तक अप्रत्यक्ष करों का संबंध है, इससे देश में एकीकृत बाज़ार व्यवस्था कायम होगी, जिससे  भ्रष्टाचार में कमी आयेगी और विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली देरी में कमी होगी जिससे संभारतंत्र लागत कई गुणा अधिक हो जाती थी। एक अनुमान के अनुसार ट्रकों के विभिन्न क्षेत्रों से घूमावदार चक्कर लगाने और जांच चौकियों पर इंतज़ार के कारण ईंधन की लागत बढऩे से होने वाले 1.8 लाख करोड़ रु. से अधिक की बचत हो सकेगी। इससे अप्रत्यक्ष कर का दायरा भी बढ़ जायेगा जिससे केंद्र और राज्य दोनों के राजस्व में वृद्धि होगी। बहुल दरों के बावजूद जीएसटी के कार्यान्वयन के फायदे और सुधार अवश्य फलीभूत होंगे।

केंद्र और राज्य सरकारें राजस्व तटस्थ दरें और विलासिता तथा अभाव वाली वस्तुओं के लिये उपकर की दर 28 प्रतिशत से ऊपर जाकर शुरू करना चाहते हैं। सरकार का तर्क है कि उपकर लगाना राज्यों को राजस्व की प्रतिपूर्ति करने के लिये अपेक्षित है क्योंकि जीएसटी के लागू होने के परिणामस्वरूप शुरूआती वर्षों में उनके राजस्व में कमी आ सकती है।

प्रस्तावित जीएसटी दरें 0 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत हैं। इसके अलावा, उपकर भी होगा जो कि तम्बाकू, लग्जरी कारों और विलासिता की अन्य मदों जैसे कि ज्वैलरी और महंगी घडिय़ों तथा पैनों आदि पर दर को 40 प्रतिशत तक लगाया जा सकता है। वर्तमान में वैट और उत्पाद कर सहित विलासिता की वस्तुओं पर कर की दर 31 प्रतिशत होती है।

जीएसटी का उद्देश्य कर संवीक्षा में कमी लाना, कर आधार का विस्तार करना, कर से बचने और चोरी में कमी लाना है। इन सब में विनिर्माण और सेवाओं में अनुपालन सुधार और संवेदनशीलता में सुधार होने की आशा है जिससे केंद्र और राज्यों के विकास और राजस्व में वृद्धि होगी। कर की दरें कम करने से उपभोक्ताओं की मांग में बढ़ोतरी हो सकती है परंतु ऐसा नहीं होने जा रहा है परंतु जीएसटी से वर्तमान में कर प्रशासन में सरलता और कर अनुपालन में सुधार होगा।

खाद्य जैसी अनिवार्य वस्तुओं पर कोई कर नहीं होगा-इससे मंहगाई कम होने की आशा है, जिसने मुख्यत: खाद्य वस्तुओं को ग्रसित कर रखा है। दरें तय करने के लिये गठित जीएसटी परिषद की नई दिल्ली में हुई बैठक के पहले दिन के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘‘मुझे आशा है कि आम आदमी के लिये अप्रत्यक्ष कर प्रवाह में थोड़ी कमी होगी’’

श्री जेटली ने कहा, ‘‘आम आदमी द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले खाद्यान्नों सहित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के दायरे में आने वाली आधी वस्तुओं सहित शून्य कर दर लागू होगी। श्री जेटली ने कहा कि करदाताओं पर उपकर का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा क्योंकि 28 प्रतिशत और उपकर का जोड़ वर्तमान करों से अधिक नहीं होगा। इस उपकर से एक पूल का सृजन होगा जो कि राज्यों को पूर्व की कर संरचना से जीएसटी में तबदील होने पर होने वाली राजस्व की हानि की भरपाई करेगा क्योंकि जीएसटी में उत्पादकर, सेवा कर और वैट जैसे सभी कर समाहित हो जायेंगे। अकेले पहले वर्ष

में ही 50,000 करोड़ रु। की राजस्व हानि होने

का अनुमान है। यह उपकर पांच वर्षों के बाद समाप्त हो जायेगा।

बिपिन सपरा, कंसलटेंसी एवं ऑडिट फर्म ईवाई के कर प्रमुख ने हालांकि कहा है कि बहुल दरों से वस्तुओं और सेवाओं के वर्गीकरण के मुद्दे पैदा होंगे और विवाद बढ़ जायेंगे। महत्वाकांक्षी युवाओं की विशाल आबादी के अलावा, जो कि मात्र खाद्यान्नों और बुनियादी जरूरतों के लिये खरीददारी नहीं करते हैं, केंद्र और राज्यों में इतनी उच्च कर दरों के साथ राजस्व तटस्थ दरों वाले जीएसटी से मंहगाई भी बढ़ सकती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र सीजीएसटी और एसजीएसटी के अधीन जीएसटी प्राधिकरणों की परिसीमा-सशक्तिकरण का है।

विभिन्न शिखर दर उत्पादों, जो कि विलासिता या इसी तरह की अन्य संबंधित वस्तुओं की श्रेणी में आते हैं, उपकर की बहुल दरों को लेकर हाल की वार्ताएं वास्तव में उद्योग और व्यापार के लिये एक उत्तेजना के रूप में सामने आई हैं। इस तथ्य के अधीन कि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा जीएसटी से लाभान्वित होने वाला है, विलासिता और इसी तरह की अन्य संबंधित वस्तुएं भी वास्तव में कुछ वित्तीय राहत की अपेक्षाएं रखता है।

सूचना प्रौद्योगिकी और आईटी समर्थित सेवाओं के संबंध में भी कुछेक मुद्दे हैं। देश में सेवा क्षेत्र की जीडीपी में 59 प्रतिशत की गणना होती है और अब तक सेवा कर केंद्रीय सरकार द्वारा लगाया जाता है। अब जीएसटी लागू किये जाने से राज्य भी सेवा कर लागू करेंगे जिससे राज्यों का कर आधार भी व्यापक होगा। इस समय सभी उपकरों सहित सेवा कर कऱीब 15 प्रतिशत है। समूची राशि केंद्र को प्राप्त होती है जिसका एक हिस्सा आपस में बांटा जाता है क्योंकि यह वित्त आयोग की सिफारिशों के अधीन करों के विभाज्य पूल का हिस्सा है जिसे राज्यों के साथ बांटा जाना है। जीएसटी के अधीन सेवाकर में एक चुनौती इनपुट सेवाओं, विशेषकर सेवाओं के निर्यात पर सेवा कर पर केंद्रीय मूल्य योजित कर की होगी जिस पर वास्तव में कोई कर नहीं है। ऐसे संकेत हैं कि इन सेवाओं पर 18 प्रतिशत जीएसटी दर होगी और यह देखना दिलचस्प होगा कि किस प्रकार केंद्रीय मूल्य योजित कर की वापसी की जायेगी। यह निर्यात सेवाओं के लिये पर्याप्त राशि होगी। यह भी देखा जाना है कि सेवाओं पर जीएसटी किस प्रकार लागू किया जायेगा। वर्तमान में केवल केंद्र सेवा कर लागू करता है और एक प्रस्ताव इसे उस रूप में बरकरार रखने का है। यह देखने वाली बात है कि इस पर राज्य सहमत होते हैं या नहीं। क्योंकि राज्यों को जीएसटी के तहत सेवा कर से काफी मात्रा में राजस्व मिलने की आशा है जिन्हें इस समय कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा है। राजस्व का ये हिस्सा विशेषकर उन विनिर्माण राज्यों के लिये महत्वपूर्ण है जिन्हें जीएसटी के लागू होने के साथ विनिर्माण की ओर से कुछ राजस्व हानि हो सकती है क्योंकि यह एक गंतव्य आधारित कर है जिससे अधिक उपभोज्य राज्यों को लाभ होने वाला है।

कुल मिलाकर वर्तमान जीएसटी कर सुधारों को आगे ले जाने में मददगार होगा। बहु दर कर ढांचा एकल दर अथवा बगैर उपकर के सर्वाधिक दो दरों में समाहित होने की आवश्यकता है। जीएसटी के लागू होने के बाद, जिसमें अब और देरी नहीं की जानी चाहिये, केंद्रीय और राज्य सरकारों को शीघ्रातिशीघ्र और निश्चित तौर पर अधिकतम पांच वर्षों के लिये एकल दर संरचना की तरफ कदम बढ़ाना होगा। इसके साथ ही सरकार प्रत्यक्ष कर सुधारों और सभी पुरातन कर कानूनों को समाप्त करने और रियायतों को हटाने की दिशा में काम करना होगा ताकि देश के कर ढांचे में बगैर किसी छूट के निचले स्तरों पर करों में स्थिरता लाये जाने के बारे में पूर्ण सुधार लाये जा सकें जिससे एकसमानता कायम हो सके और अल्प कर पैमाने को, विशेषकर गरीब और मध्यम वर्ग को शामिल करते हुए, व्यापक बनाया जा सके।  

(के.आर. सुदामन प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में संपादक और फाइनेंशियल क्रोनिकल एंड टिकरन्यूज में आर्थिक संपादक रहे हैं। वे पेईचिंग और इस्लामाबाद में विदेश संवाददाता भी रहे हैं। उनके द्वारा व्यक्त विचार स्वयं के हैं)