विशेष लेख


Special Article 43

सुभाष चंद्र बोस: चिरंजीवी नेताजी

सोमेन चक्रवर्ती

भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक करिश्माई नेता और प्रेरक व्यक्तित्व के धनी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 1897 में कटक में हुआ था. एक स्वाभाविक इच्छा शक्ति, दृढ़ संकल्प और नेतृत्व कौशल के साथ सुभाष का पालनपोषण ब्रिटिश सरकार के एक शिष्ट नौकरशाह बनने के लिये अपने वकील पिता की निकट देखरेख में हुआ था. यथार्थ में उन्होंने इसे हासिल भी कर लिया. इंडियन सिविल सर्विस में चौथा रैंक हासिल करने के उपरांत सुभाष ने ब्रिटिश नौकरशाह नहीं बनने का फ़ैसला किया. उन्होंने पद की बलि चढ़ा दी, जो कि किसी भी भारतीय के लिये बेहद प्रतिष्ठित होता है, और अपना शेष जीवन भारत को उसके ब्रिटिश औपनिवेशक शासनसे मुक्त कराने के लिये समर्पित करने का फ़ैसला किया.

सुभाष में अपनी युवावस्था से ही इस तरह के राष्ट्रवादी स्वभाव की चंचलता थी. स्कूल के दिनों से ही उनमें यह उभरकर दिखाई देने लगा था और उम्र बढऩे के साथ ही इसमें गंभीरता आ गई. व्यापक समाज के साथ उनकी बातचीत, विशेषकर कोलकाता में उनके कालेज के दिनों के दौरान, लोगों के दुखों के प्रति उनकी जागरूकता ने उनके मन में अमिट छाप छोड़ी और भारत को स्वतंत्र कराने के लिये उनके निश्चय और विश्वास को मज़बूत बना दिया. उन्होंने प्रोफेसर ई.एफ. ओटेन पर हुए हमले के इर्दगिर्द पनपे विवाद पर प्रेसीडेंसी कालेज ऑफ कोलकाता के छात्रों का दृढ़ता के साथ समर्थन किया. हालांकि इसके होने वाले परिणामों की जानकारी उन्हें थी, लेकिन उन्होंने अनुनय और दबाव को नकार दिया तथा वे ब्रिटिश प्रोफेसर से भारत विरोधी कथनों और छात्रों पर नस्लीय टिप्पणी के लिये माफी की मांग पर दृढ़ता से डटे रहे. अपने निष्कासन की सूचना पर उन्होंने अपने मेंटर्स को शांतिपूर्वक तरीके से सिर्फ ‘‘धन्यवाद’’ कहा और इस प्रतिष्ठित संस्थान में अपने ढाई साल के कार्यकाल को एक क्षण में त्याग दिया. इस तरह उन्होंने जीवन में व्यक्तिगत लाभों के सामने देशभक्ति के लिये साहस का परिचय दिया. इसी जोश के साथ वे आईसीएस बनने के बाद इंग्लैंड से भारत लौटे ताकि वे अपनी यात्रा अर्थात भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के अंतिम मार्ग के वास्ते समर्पित कर सकें. एक सुशिक्षित, उपलब्धियां हासिल करने वाले, एक योग्य संयोजक, एक मुखर वक्ता और चतुर पर्यवेक्षक सुभाष पर शीघ्र ही कांग्रेस नेतृत्व की नजऱ पड़ी. 1930 में वह कलकत्ता निगम का मेअर बन गये. 1938 में वह कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गये.

            सुभाष में देशभक्ति का सूत्रपात समाज और लोगों के दु:खों को देखने के उनके तरीके से हुआ. उन्होंने अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों से अपने अंदर दार्शनिकता का निर्माण किया. उन्होंने गांधी जी के अहिंसा के मार्ग को न तो गले लगाया और न ही इसके उपयोग और प्रभाव को पूरी तरह से अस्वीकृत किया. न ही वे अपने समय के क्रांतिकारी आंदोलन के हिंसा के मार्ग से प्रेरित हुए. आर्थर ग्रीनवुड और क्लीमेंट एटली जैसे श्रमिक नेताओं के साथ उनके निकट संपर्क ने उनमें सेवा भावना को प्रेरित किया. हारोल्ड लस्की, एक फेबियन समाजवादी और बहुलवादी विचारक, ने उनमें समाजवादी विचारधारा और संपूर्णता की सीमाओं का प्रवेश कराया. सुभाष की स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति अैर भविष्य के भारत के बारे में उनका दृष्टिकोण कई प्रकार से तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क से प्रभावित था जिसने देश को सुप्रशिक्षित सशस्त्र बलों के समर्थन से सैन्य कार्रवाइयों के जरिये ओटोमैन साम्राज्य से मुक्त कराया था. अतातुर्क शासन के अधीन तुर्की का सघन राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सुधारों के जरिये एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के तौर पर निर्माण हुआ. वे स्वतंत्र तुर्क में महिलाओं को प्राप्त अधिकारों और आज़ादी से प्रेरित हुए. देश में, ‘गांधी की चरणबद्ध स्वतंत्रता की अपेक्षा, वे ब्रिटिशों से तत्काल और बिना शर्त स्वराजके लिये खड़े हो गये. वे अतातुर्क के समाजवादी अधिनायकवाद में विश्वास करते थे. उनकी देशभक्ति भारत की अपनी स्वयं की ताकत और महत्ता पर आज़ादी के लिये एक विशिष्ट रोडमैप के तौर पर खड़ी थी. उनके विचार में, ‘‘मैं आश्वस्त हूं  कि यदि हम आजादी चाहते हैं हमें अपना खून बहाने के लिये अवश्य तैयार रहना चाहिये’’.

सुभाष पूरी तरह आश्वस्त थे कि गांधी जी  का अहिंसा, असहयोग और सत्याग्रह कभी भी भारत की स्वतंत्रता हासिल करने के लिये पर्याप्त नहीं हो सकता. 1939 के त्रिपुरा कांग्रेस सत्र में उन्होंने भारत की आज़ादी हासिल करने के बारे में अपनी विचारधारा को साफ तौर पर उजागर किया. उन्होंने ब्रिटिश सरकार से आज़ादी दिये जाने के बारे में छह माह की समय-सीमा की मांग की. यदि ऐसा नहीं किया गया तो उन्होंने राष्ट्रव्यापी नागरिक अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया. उनका विश्वास था कि, ‘‘...देश पहले की अपेक्षा क्रांति के लिये आंतरिक तौर पर अधिक परिपक्व हो चुका था.’’ युद्ध में ब्रिटिश सरकार को कोई समर्थन देने की बजाय उन्होंने बगैर पूर्व विचारविमर्श के भारत पर युद्ध घोषित करने के ब्रिटिश सरकार के निर्णय के विरुद्ध विरोध दर्शाने के लिये व्यापक नागरिक अवज्ञा का आह्वान किया.

उनके विचार में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरा अंतर्राष्ट्रीय संकट भारत के लिये अपनी मुक्ति हासिल करने का एक सुअवसर था. ये वह समय था जब उनके विचार में ब्रिटिश बलों के खिलाफ गठबंधन खड़ा करने की बात आई और यदि आवश्यक हुआ तो ब्रिटिश बलों को भारत से खदेडऩे के लिये भारत में आक्रमण संचालित किया जा सकता है. दरअसल उन्होंने कभी भी हिटलर के अधिनायकवाद और दूसरे अक्षरेखा बलों का समर्थन नहीं किया, जबकि वे भारत में औपनिवेशक शासन को समाप्त कराने के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य के लिये तानाशाही समर्थक बलों के साथ अल्पावधि गठबंधन करने के पक्ष में थे. इसके लिये उन्होंने कोई भी ब्रिटिश बलों और राज्य के साथ सहयोग का मार्ग खुला रखा. समान उद्देश्य के साथ उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग ऑफ रासबिहारी बोस जैसे दूसरे राजनीतिक गुटों के साथ संयुक्त प्रयास किये और भारतीय राष्ट्रीय सेना को पुनर्संगठित किया. उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय मूल के लोगों को एकजुट किया और स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल होने के लिये प्रेरित किया. अतातुर्क की राजनीतिक कार्रवाइयों के प्रभाव की पृष्ठभूमि में, आईएनए में यहां तक कि एक अलग महिला इकाई रानी ऑफ झांसी रेजिमेंटका गठन किया गया जो कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और एशिया के राजनीतिक आंदोलन में अपनी तरह की पहली रेजीमेंट थी.

सुभाष चंद्र बोस एक महान रणनीतिकार थे. उन्होंने आज़ादी पर कांग्रेस की स्थिति के प्रति असहमति प्रकट की, अध्यक्ष के तौर पर अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाया और कड़े विरोध के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष बन गये. उन्होंने कांग्रेस के सभी पक्षों को एक मंच पर लाने के लिये कांग्रेस के भीतर वाम संयुक्त समिति को प्रोत्साहित किया. उन्होंने अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिये पार्टी के भीतर ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लाक नाम से एक राजनीतिक संगठन बनाया. उनके गांधी जी के साथ गंभीर मतभेद हो गये थे हालांकि उन्होंने कभी भी गांधी जी का अनादर नहीं किया. राष्ट्रीय कांग्रेस से स्वयं को अलग करने की बजाय उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के साथ मिलकर स्वतंत्रता के लिये काम जारी रखा. यहां तक कि कई वर्षों के बाद 1944 में एक रेडियो प्रसारण में, सुभाष पहले व्यक्ति थे जिन्होंने गांधी जी को राष्ट्रपितापुकारा.

यद्यपि वे कट्टरता अथवा कट्टरवाद के खिलाफ सदैव डटे रहे, आजादी के लिये उनमें दृढ़ निश्चयता के निर्माण तथा ब्रिटिशों के विरुद्ध संघर्ष के लिये भगवद् गीता एक प्रमुख स्रोत थी. वे न तो नास्तिक थे और न ही उन्होंने धर्म को माक्र्सवादियों की तरह एक नशे के तौर पर देखा. उनके राष्ट्रवादी विचार, उनकी अवधारणा में सार्वभौमिकता और उनकी मानवीय अवधारणाएं स्वामी विवेकानंद के लेखन से प्रभावित थी. अम्बेडकर के सोच विचार ने उन्हें इस बात से अवगत कराया कि भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था किस तरह अपनी जड़ें जमा चुकी थीं  जिसकी वजह से लाखों भारतीय असमानता का शिकार हो रहे थे. जबकि हैजा रोगियों के साथ कार्य करते हुए वे भारत में गरीबी और दुर्दशा झेल रहे लोगों के सीधे संपर्क में आये.

सुभाष भारत की आजा़दी को लेकर बेचैन थे. वे लाखों भारतीयों को विश्वास दिलाना चाहते थे कि आज़ादी उनके द्वार पर खड़ी है. वे आज़ाद भारत के राष्ट्र और शासनाध्यक्ष बन गये जिसकी उन्होंने बर्मा में 1943 में स्थापना की थी. दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय इसके नागरिकबन गये. उन्होंने आईएनए को भारत की राष्ट्रीय सेना के तौर पर मान्यता प्रदान करने के लिये इस सरकार की कमांड के अधीन कर दिया. आगे अपने प्रचालन को व्यवस्थित करने के लिये आज़ाद हिंद सरकार ने अपनी स्वयं की करंसी, डाक टिकटें, अदालत और स्वयं की नागरिक संहिता का निर्माण किया. भारत की राष्ट्रीय सरकार के रूप में अपनी स्थिति को और मज़बूत करने के लिये सुभाष ने जर्मनी, जापान, इटली, चीन, क्रोएशिया, बर्मा की अनंतिम सरकार और फिलीपीन्स से मान्यता हासिल कर ली. तब उन्होंने ब्रिटिशों से मातृभूमि हासिल करने के लिये मार्च करने का आह्वान किया.

सुभाष की राजनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनता को जगाने के लिये महत्वपूर्ण नारों का चयन था. आईएनए की बहाली करते हुए वे यह अहसास कराना चाहते थे कि स्वतंत्रता बहुत नजदीक है और उनका नारा था, ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’’. दक्षिण एशिया में भारतीय समुदायों को एकजुट करते हुए उन्होंने ‘‘इत्तेफाक, इतेमद और कुर्बानी’’ का प्रयोग किया. एक बार अपनी सेना के साथ तैयार होने पर उन्होंने ‘‘दिल्ली चलो’’ का आह्वान कर दिया. भारतीय प्रदेश की तरफ आगे बढ़ते हुए उनका नारा ‘‘इन्कलाब जिं़दाबाद’’ हो गया और भारतीय प्रदेश में अपने पहला ध्वजारोहण में उन्होंने मणिपुर में भारत की धरती पर भारतीय तिरंगा फहराते हुए ‘‘जय हिंदका उद्घोष किया. सुभाष चंद्र ने, जो भी मतभेद हों, गांधी, चंद्रशेखर आज़ाद और जवाहरलाल नेहरू का सह-साथियों के तौर पर सम्मान किया. भारत के आक्रमण के प्रयास के दौरान आज़ाद हिंद फौज की दो ब्रिगेडों के नाम गांधी और नेहरू का नाम दिया जाना उनकी इन नेताओं के बलिदान के प्रति व्यक्तिगत श्रद्धांजलि थी.

सुभाष चंद्र बोस को लगभग सभी राजनीतिक बलों से फासीवादी ताकतों के साथ उनकी निकटता के लिये आलोचना का शिकार होना पड़ा.

भविष्य के भारत के बारे में उनका दृष्टिकोण रंगून में गठित अंतरिम भारतीय सरकार के बाद अधिक स्पष्टता के साथ उभरकर आया. उनके विचार में समाजवादी सोच के साथ आर्थिक सुधार लाये जाने से देश में कथित लोकतांत्रिक प्रणाली बहाल नहीं की जा सकती. तुर्की के मॉडल पर उन्होंने सुधारों में तेजी लाने के लिये कुछ वर्षों के लिये भारत में सत्तावादी शासन का पक्ष लिया.

भारत के लोग अब उन्हें सुभाष की अपेक्षा ‘‘नेताजी’’ के तौर पर अधिक जानते हैं. उन्होंने यह नई पहचान बर्लिन में उनके प्रवास के दौरान हासिल की. वहां नागरिकों और सैनिकों को उन्हें पूरे सम्मान के साथ संपर्क करने में परेशानियां होती थीं. एक दिन एक युवा सैनिक आगे आया और एकाएक उन्हें ‘‘हमारे नेता’’ के तौर पर पुकारा जो कि किसी मार्गदर्शक और नेता के रूप में संबोधन की भारतीय शैली है. ‘‘नेताजी’’ की नई पहचान के साथ प्यार और सम्मान के संयोजन की एक नई यात्रा की शुरूआत हो गई. लाखों भारतीयों के लिये नेताजीआज भी उनके बीच मौजूद हैं क्योंकि वे हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के एक महान व्यक्ति सुभाष चंद्र बोस के प्रति सर्वाधिक सम्मान की भावना रखते हैं.

(लेखक एक शोधकर्ता और शिक्षाविद हैं. ई-मेल:  c_somen@yahoo.com उनके द्वारा व्यक्त किये गये विचार व्यक्तिगत हैं)