विशेष लेख


Volume 49

कम नकद वाले भारत की ओर
डिजिटल भुगतान के लिए भारत क्यूआर कोड, भीम और कई अन्य एप

प्रकाश चावला

९ नवंबर को बड़े मूल्य के नोटों के विमुद्रीकरण से पहले से ही भारतीय रिज़र्व बैंक से तालमेल रखते हुए अनेक बैंक धन के इलेक्ट्रॉनिक हस्तांतरण के लिए कई प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के विकास पर काम करने में जुटे थे. बैंकों में ऐसी प्रणालियां उपलब्ध थीं, जिनके माध्यम से कोई व्यक्ति कुछेक घंटे में एक बैंक अथवा शाखा से अन्य बैंक अथवा शाखा में धन अंतरण कर सकता था.

यह अपने-आप में एक अच्छी सुविधा थी, जो चेकों के माध्यम से काफी पुरानी धन-अंतरण प्रणाली के स्थान पर काफी तेजी से आई. उस प्रणाली में सबसे पहले लाभार्थी को चेक प्राप्त करना होता है, उसके बाद शाखा में जमा करना होता है, फिर निर्धारित खाते में धन-अंतरित करने के लिए उसे निपटान हेतु भेजा जाता है. ऐसा नहीं है कि चेकों का दौर समाप्त हो गया है, बल्कि उसके इस्तेमाल में तेजी से गिरावट आ रही है.

९ नवंबर से पहले ही इन सभी उपायों पर काम चल रहा था, किंतु जल्दी में इसकी सख्त आवश्यकता के बारे में पता नहीं था. इसके अलावा, अनेक भुगतान प्रणालियों के बीच पूरा तालमेल दिखाई नहीं पड़ता था, जबकि जिंसों और सेवाओं के विक्रय के लिए भुगतान के्रडिट अथवा डेबिट कार्ड तक सीमित था, जिसका इस्तेमाल या तो लैपटॉपों के द्वारा होता था अथवा व्यापारियों अथवा सेवा प्रदाताओं के पास सीमित मात्रा में उपलब्ध पीओएस मशीनों के द्वारा होता था. इसकी तात्कालिकता का कोई अहसास नहीं था, क्योंकि इसकी कोई सख्त आवश्यकता नहीं थी. किन्तु ५०० रुपये और १००० रुपये के नोटों को वापस लेने से नकदी के एक कारगर और तात्कालिक विकल्प की सख्त आवश्यकता हो गई, क्योंकि प्रचलन में इन नोटों की ८५ प्रतिशत हिस्सेदारी थी.

कालाधन और भ्रष्टाचार की त्रासदी से अर्थव्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के उद्देश्य से अपने-अभियान में भारतीय समाज  को कम नकद आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता से संपूर्ण नियामक, संचालनात्मक और नीति-निर्माता तंत्र को काफी सक्रिय बनाया गया. इसके परिणामस्वरूप चार महीने के भीतर ही इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के कई विकल्प तैयार करके, उनकी जांच के पश्चात् उनकी शुरूआत की गई है. कम लागत वाले स्मार्ट फोनों की मदद से इन सबका इस्तेमाल किया जा सकता है. इन एपों के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि ये बड़े तौर पर अलग-थलग तौर पर लक्षित हैं और विश्व के सबसे बड़े वित्तीय समावेशन कार्यक्रम में उत्प्रेरक साबित होंगे.

भीम-एप की शुरूआत के बाद, भारत क्यूआर कोड नवीनतम है, जो पेटीएम के प्रारूप में कार्य करता है, जिसमें ग्राहक पहले जिन्सों के क्यूआर कोड को स्कैन करता है और फिर अपने वालेट से धन-अंतरित करता है. भारत क्यूआर कोड से एकमात्र अंतर है कि भीम के जैसा ही, खरीददारी के स्थान पर ग्राहकों को वॉलेट से धन तैयार करके उसके बाद प्राप्त करना नहीं होता है. ग्राहक के खाते से धन सीधे तौर पर अंतरित हो जाता है तथा जिन्सों अथवा सेवा प्रदाता के पास तत्काल अंतरित हो जाता है. विक्रय स्थानों पर क्रेडिट अथवा डेबिट कार्डों के इस्तेमाल से भिन्न इसमें कोई शुल्क शामिल नहीं है. एक ओर तो इसका उपयोग आसानी से हो सकता है, तो वहीं दूसरी और इस पर कोई लागत नहीं है. जहां तक इस प्रणाली की निष्ठा और सुरक्षा का सरोकार है, तो भारतीय रिज़र्व बैंक इसके बारे में आश्वासन देता है.

भारतीय रिज़र्व बैंक के उप-गवर्नर श्री आर. गांधी के अनुसार, ‘हमारी प्रणालियां न केवल विश्व की किसी प्रणाली से तुलना योग्य है, बल्कि हमारी प्रणालियां ऐसे मानदंड तथा अच्छी परंपराएं कायम करती हैं, जो विश्व के लिए अनुसरण के लायक हैं. हम भुगतान प्रणालियों की सुरक्षा और मजबूती सुनिश्चित करने के लिए सतर्क हैं तथा ग्राहकों की सुरक्षा तथा सुविधा के लिए प्रतिबद्ध हैं.

कम लागत, अंतर-संचालनात्मकता और मास्टर कार्ड, वीजा, नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया तथा अमेरिकन एक्सप्रेस जैसे अत्यधिक प्रतिस्पद्र्धी होने के बावजूद इन भुगतान नेटवर्कों द्वारा विशिष्ट सहयोग आधारित पहुंच के कारण भारत क्यूआर कोड बेजोड़ साबित होता है. मुंबई में २० फरवरी, २०१७ को नये एप की शुरूआत पर गर्व के साथ श्री गांधी ने कहा, ‘भुगतान के क्षेत्र में भारत ने एक अन्य मानदंड स्थापित किया है, जो दूसरों के लिए अनुकरणीय है.

ऐसे कई और कारण हैं, जिनके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक भारत को एक कम नकद समाज बनाने पर जोर दे रहा है. विजन-२०१८ के अधीन यह एक कारगर नियमन, सशक्त बुनियादी ढांचा, निगरानी व ग्राहक-केंद्रित भुगतान संरचना के लिए एक ऐसे बहु-कोणीय रणनीति पर काम कर रहा है, जो साइबर सुरक्षा से जुड़ी सख्त जरूरतों को पूरा करे.

डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन देने के उपाय सुझाने हेतु सरकार ने नीति आयोग के प्रधान सचिव श्री रतन वाताल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी. नियामक और विधायी संरचना की जांच के बाद, वाताल समिति ने सुझाव दिया कि एक बेहतर नियामक शासन, प्रतिस्पद्र्धा और अभिनवता, उपभोक्ता सुरक्षा, खुली पहुंच, डाटा संरक्षण व सुरक्षा, अपराध के लिए जुर्माने के लिए भुगतान और निपटारा प्रणाली अधिनियम २००७ संशोधन होना चाहिए. इन सुझावों को स्वीकार करते हुए, वित्त विधेयक २०१७ में विधायी बदलाव किए गए हैं.

इस दिशा में, डिजिटल लेन-देन के इस्तेमाल के लिए बड़ा नकद पुरस्कार प्रदान करने वाले एनपीसीआई ने अब तक लगभग १० लाख उपभोक्ताओं और व्यापारियों को लकी ग्राहक योजना और डिजिधन व्यापार योजना के माध्यम से १५३ करोड़ रुपये से भी अधिक वितरित किए हैं. इन योजनाओं का उद्देश्य डिजिटल भुगतान को एक जन आंदोलन बनाना है. इन पहलों पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है तथा महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और दिल्ली परम्परा स्थापित करने वाले के रूप में उभर रहे हैं. समाज के सभी वर्गों और उम्र-समूहों से इस पहल के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है. आगामी कुछेक सप्ताहों में अर्थव्यवस्था के पूर्णरूपेण पुनर्मुद्रीकृत होने के बाद इस उत्साह को कायम केवल एक चुनौती होगी. डिजिटल अभियान को निश्चित तौर पर एक तर्कसंगत समाधान तक पहुंचना होगा.

(लेखक नई दिल्ली में एक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा अधिकांशत: राजनीतिक-आर्थिक मुद्दे पर लिखते रहे हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं.)

 

चित्र: गूगल के सौजन्य से