विशेष लेख


Vol.29, 2017

मानसिक विकार या मूड डिसऑर्डर

डॉ. राखी मेहरा

शरीर और मन के स्वास्थ्य का वास्तविक राज वर्तमान को सार्थक जीने में है न कि भूत के पश्चाताप या भविष्य की चिंता में है. कुछ नहीं होता कि आपका भूत कितना कठिन था आप हमेशा फिर से आंरभ कर सकते हैं.
महात्मा बुद्ध
प्राचीनतम् यह तथ्य, कितना सार्थक लग रहा है कि जब आज स्वार्थ से परिपूर्ण प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ कम समय में लोलुपता वश जीवन के हर सुख को शीघ्र से शीघ्र प्राप्त करने के लिये हर सही-गलत तरीके से अपने शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने में लगा है. फलत: स्वयं के साथ अपने समाज और संपूर्ण मानवता को विकृत करने में अपना योगदान दे रहा है.
एक स्वास्थ्य सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि केवल भारत में स्थापित मानसिक रोगियों का प्रतिशत ०.७ से ३६% हो गया है और उसमें से सिर्फ ३-५% रोगी चिकित्सा तक पहुंच पाते हैं जिसका एक बड़ा कारण जनमानस में मानसिक रोग के प्रति अज्ञानता व उदासीनता ही अधिक है. परिणामत: आये दिन अनेक व्यवहारिक एवं भावानात्मक रोगों से युक्त मानसिक विकृतियों का परिचय होता रहता है. जो नित प्रति बिना चिकित्सा के उस व्यक्ति एवं समाज के लिये एक भयावह रूप में ही सामने आता है साथ ही देश की मृत्युदर भी बढ़ती जाती है. आंकड़े बताते हैं कि विश्व में व्याधियों के बोझ को १३% व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन में प्राय: दैनिक मानसिक विकलांगता के रूप में झेलते हैं. एक अध्ययन यह भी बताता है कि भारत में ही तकरीबन १ करोड़ मानसिक रोगियों को चिकित्सा की आवश्यकता है. लेकिन आये दिन सडक़ पर होने वाली लड़ाइयाँ, पड़ोसी की असहनीय परस्परता, सही गलत कुछ से भी अधिक धन, अधिक शक्ति और अधिक स्व का बोलबाला, आज प्राय: हर दूसरे भारतीय को मानसिक स्वच्छता की आवश्यकता पर जोर देता है.
मानसिक विकार से निरंतर अपनी भावनाओं पर नियत्रण नहीं रहता और फलत: व्यवहार में विनाशकारी परिवर्तन होने लगता है जो व्यक्ति व समाज के लिये हानिकारक होने लगता है. अब प्रश्न है कि इन सब भावनाओं का आधार एक ह्दय या दिल ही है, तो क्यों नहीं इसी पर आश्रित मन को नियंत्रित करने के उपायों को ढूंढ़ा जाये.
प्राचीनतम रूप से विख्यात है कि मन ही जो उचट जाये या मन नहीं लगे तो कुछ भी ग्रहण नहीं होता. इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि जब अचानक चलते-चलते मन कहीं और होने से हमारी १० इंद्रियंा अपने-अपने को ठीक से कार्य फल नहीं दे पाती और इकट्ठे दो कदम सीढ़ी से उतर जाते हैं, चलती गाड़ी में सहसा ब्रेक लगाना पड़ जाता है. अब सवाल ये उठता है कि दृष्टि या नज़रें तो सडक़ पर ही थी फिर अचानक ब्रेक क्यों लगाना पड़ा वो तो समय से मन का पैर से संबंध हो गया और ब्रेक लग गया वरना ....... इसी क्रम में रोटी बनाते अक्सर अगर गरम तवा छू जाना, कक्षा में या किसी सभा में बैठे-बैठे अचानक मन का मीलों दूर पहुंच जाना, ये सब मन का एकाग्र नहीं होना ही बताता है. इसीलिए एकाग्रता को बढ़ाने एवं उसके नियंत्रण हेतु योग ध्यान आदि द्वारा इसके आधार चित्त के कार्य पर स्थिरता लाने की बात करता है ताकि उसकी विभिन्न स्थितियों की गुलामी न कर विचारों की आजादी प्राप्त हो और मनुष्य अपने मनुष्यत्व के प्रथम गुण अर्थात् सही-गलत को सोच कर कार्य कर सके. एक योगी का मन के भावों से संन्यास होता है और उसको बेवजह मन के भावों की उथल-पुथल नहीं होती अर्थात् उसका गुस्सा, दु:ख, जलन, लालच, शक्ति, घमंड इन छ: मन के शत्रु पर नियंत्रण होता है और वह मन की गतिविधियों पर लगाम कसता है न कि मन व्यक्ति पर हावी रहता है.
मैनें अपने चिकित्सा अनुभव में अक्सर देखा है कि बच्चों और किशोरों की मिर्गी या ePILEPSY का निदान केवल  EEG (Electroencephalogram) जो मस्तिष्क की गतिविधियों को मापता है, से नहीं हो पाता. बल्कि असली कारण जो कभी बचपन का डर, दु:ख, हताशा, असमंजस से उलझे हुए भाव मात्र ही होते हैं जिनकी परते खोल कर सुलझाने से ही रोगी का इलाज हो जाता है. शायद इसीलिए इसे neurological disorder माना जाता है किंतु मन की परतें खोलने से उसका ठीक हो जाना, वस्तुत: शरीर-व-मन के परस्पर जटिल संबंध को ही दिखाता है.
इसीलिये प्राय: प्रत्येक रोग में मनोवैज्ञानिक परामर्श (Counselling) को वर्तमान में अनिवार्य कर दिया है. जो मुख्यत: मन की व्यवस्था को व्यवस्थित कर उसके भावों की असमानता को सामान्य कर व्यक्ति को सकारात्मक व्यवहार हेतु सांत्वना ही देती है. यह कार्य योग सहज रूप में स्वयं की स्वयं से पहचान कराके की जा सकती है. आयुर्वेद का आचरण चिकित्सा, सत्वा-जय (सत्व यानि मन की विजय) भी इसी बात को स्पष्ट करती है. साथ ही आहार-व्यवस्था, पोषण के साथ मन को सकारात्मक करने के लिए दी गई है. निद्रा की आवश्यकता समझाकर जीवन के उपस्तम्भ के रूप में कहा गया है. अपने हित के साथ दूसरे के हित का भी ख्याल रखने को कहा गया है. इसी तरह योग में स्वयं के लिये, समाज के लिये कर्तव्य, आसन (शारीरिक स्थिति), प्राणों का breating या सांसों से नियमन, ध्यान (meditation) का उल्लेख मन के नियमन में लाभकर होते हैं.
अब सवाल ये उठता है कि जब इतने उपाय भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक विधियों का चिकित्सा विज्ञान उल्लेखित है तब वर्तमान में व्यवहार जनित दुर्भावनायें, दुर्घटनायें या मानसिक रोग लगातार बढ़ क्यों रहे हैं क्यों नहीं एक व्यक्ति अपनी वाणी और अपने मनोभावों पर लगाम कस पा रहा है और क्यों मानसिक अस्वस्थता के दल-दल में फंसता जा रहा है. इसका बहुत बढ़ा कारण वर्तमान शिक्षण प्रणाली में इन दो विधाओं का परिचर न देना है. वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में kindergarten से (नर्सरी के पूर्व) से ही सिर्फ आधुनिकीकरण और अंकों की होड़, विद्यालय की टारगेटेड गोल (goal) में नैतिकता, स्वयं का आकलन और मानवता का मूल्यांकन पीछे छूटता जाता है. अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय के ऐसे ही आधुनिक शिक्षाप्राप्त न्यायधीश की सोच योग-आयुर्वेद जैसे जीवन के विज्ञान को प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षा में अनिवार्य करने के खिलाफ ही दिखती है. आजादी के ७० वर्ष बाद भी भारतीयता के मूलत: सिद्धांत अपनी गुलामी की दासता के समान प्रायश: दम तोड़ते जाते हैं. फलत: एक नहीं दो नहीं, न जाने कितनी पीढिय़ां अपनी मूलभूत शिक्षा से रहित होते जा रहे हैं. जिससे भाषा, जाति, परंपरा धर्म के नाम पर परस्पर भेद-भाव बढ़ता जा रहा है. और अवसरवादी लगातार अपना फायदा पहुंचाने के लिये व्यक्ति-व्यक्ति के बीच मानसिक विकार फैलाने में कामयाब होते जा रहे हैं, तभी तो भगवद् गीता के सिद्धांत जीवन सत्य न मानकर धर्मादि के वैमनस्य में उलझ कर रहे जाते हैं.
धर्म के नाम पर धर्म के स्व ठेकेदार आयुर्वेद-योग को सर्वमान्य करने में बाधा पहुंचाते हैं. तब जन साधारण तक चेतना व जागरूकता पहुंचाने का कार्य मीडिया पूरी जिम्मेदारी से करता है. विश्व मानसिक स्वास्थ्य महीने के रूप में मनाने के दौरान इस विषय पर रोज़गार समाचार पत्र का यह प्रयास और सार्थक हो जाता है.
भारतीय सभ्यता में लगातार परिवर्तित जीवन शैलियां सामाजिक व आर्थिक असमानतायें अत्यंत तेजी से व्यक्ति व समाज के नैतिक मूल्यों को बदल रहा है और लगातार बढ़ते तनावों से मानसिक रोगों की बढ़ोतरी कर रहा है. परिणामत: अपना-अपना करता हुआ प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ को पूरी ईमानदारी से निभाने में लगा हुआ है. फलत: जिसकी चल गई उसकी आर्थिक स्थिति में परिवर्तन होकर स्वार्थ को और बड़े स्तर पर करने के लिये प्रेरित करता जाता है. अत: मानसिक रोगों के इस महत्वपूर्ण कारण पर संज्ञान लेते हुये भारत सरकार ने कई योजनायें और कार्यक्रमों को भी अपनी कार्यशैली में शामिल किया है. इन योजनाओं के कार्यान्वयन से न केवल मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलेगी बल्कि मानसिक रोगियों को चिकित्सा व आर्थिक सामाजिक उन्नतियों की ओर अग्रसर भी करेगी. जिससे भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकता के मूल्यों का समन्वय भी होगा. ये योजनायें मनोदैहिक से मनो-सामाजिक अड़चन के साथ मानसिक रोगियों की स्थितियों में धनात्मक स्वास्थ्य की ओर ध्यान देती है और अधिक सकारात्मक रूप से जन समाज को तनाव रहित जीवन को प्रदान करती हैं.
मानसिक रोगों में कुछ साधारण रोगों की जानकारी, जागरूकता की आवश्यकता है शाइजोफ्रेनिया (Schizophrenia) Biploar Disorder, अवसाद (Depression),OCD (Obsessive Compulsive Disorder), मूड बदलना (Mood Disorder), Chemical Abuse, Eating Disorder फोबिया, मानसिक विकलांगता, कुछ मानसिक रोग हैं जिनके बारे में जन साधारण को जानकारी होनी चाहिये जिससे एक मानसिक रोगी की चिकित्सा में उसके परिवार एवं परिचारक भी पूर्ण रूप से सहायक हो सकें और शीघ्रातिशीघ्र एक मानसिक रोगी अपने रोग से स्वतंत्र हो सके.
जब विश्व स्वास्थ्य संगठन अपने सर्वेक्षण में विश्व की १०% जनता को मानसिक रोगों से ग्रस्त बता रहा है और २०२० तक डिप्रेशन को सबसे व्याप्त रोग कह रहा है, जब ब्लू व्हेल जैसे games छोटे-छोटे बच्चों में व्याप्त हो रहे हों, जब आत्महत्या करने की चाह बढ़ रही हो जब बलात्कार, Road Rage, हिसंक वारदात मानसिक दिवालियापन बढ़ रहा हो जब समाज में निरंतर नैतिक पतन हो रहा हो, जीवन की गुणवत्ता घट रही हो तब मानसिक रोग बिना चिकित्सा के एक धुन की तरह समाज, देश और संपूर्ण मानवता को निगलने लगा हो. तब सरकारी-गैर सरकारी प्रयासों की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है.
भारत सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य योजना और उसका Action Plan का कार्यान्वयन किया है. जिसमें राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सिफारिशों और भारतीय उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों का भी ध्यान रखा गया है.
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने NIMHANS को अपने मानसिक रोग उन्मूलन अभियान हेतु Commission (कमीशन) किया है. जिसमें क्रम से वैज्ञानिक आधार पर इस हेतु स्रोत व सेवाएं देता है. क्योंकि एक मानसिक रोगी अपनी मानसिक स्थिति के कारण जीवन की गुणवत्ता स्वयं, कार्यक्षेत्र, परिवार और अपने सामाजिक परिवेश में नित प्रति प्रभावित होता रहता है. इसलिये इस ओर किये गये प्रत्येक प्रयास और प्रत्येक सेवा में समन्वय अति आवश्यक है. यहां सर्व सामान्य बेवजह मूड बदलना, व्यवहार परिवर्तन को समझने की नितांत आवश्यकता होती है. पूर्ण व शुद्ध रूप से मानसिक रोग सामान्यत: Neurological Disorder कहलाते हैं जहां शारीरिक लक्षण Autonomic Nervous System से संबंधित होकर अनेक मानसिक दुर्बलता या विकृति के लक्षण होते हैं. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के द्वारा एकत्र आंकड़े भी जागरूकता का ही प्रयास है.
७ अप्रैल, २०१७ विश्व स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष्य में भी इसी क्रम में अवसाद, आओ बात करेंजैसे विषय पर अधिक ध्यान देना भी विशेष चेतना को दर्शाता है. जो समाज में अवसाद या किसी भी मानसिक रोगी के प्रति रोगी की तरह ही व्यवहार करने को प्रेरित करता है न कि उसे तिरस्कृत कर अवहेलना करने से बचने हेतु अधिक जन चेतना फैला रहा है.
कभी-कभी तंत्रिका तंत्र या Neurological Symptoms इतने प्रभावी रूप से दिखते है कि निदान तुरंत हो जाता है लेकिन पर्सनेलिटी रोग (Personality Disorder) जिसमें मानसिक परेशानियों के साथ सामान्य व्यक्तित्व की विशेषताओं को व्यग्र रूप में व्यक्त होने लगती है कि स्वयं सामाजिक सामंजस्य में कष्ट होने लगते हैं. और Personality Disorder से पीडि़त रोगी का कार्य, परिवार एवं सामाजिक पहलू बुरी तरह प्रभावित होने लगते हैं. और यह दिन प्रतिदिन बिना उपायों के मृदु से गंभीर होते जाते हैं और शरीर की प्राकृतिक Physiology को, अंग प्रत्यंग, नींद, व्यवहार, उत्साह, इच्छा रोग प्रतिरोधक क्षमता सभी को प्रभावित करने लगते हैं. और फलत: अनेक Autommune Noncommunical Disorder, Psycho Physiologic Disorder जिसमें कोशिका, ऊत्तक और सभी संस्थान प्रभावित होकर अपने-अपने कार्यों में त्रुटियां, कमी या अधिकता करने लगता है. इसलिये प्रायश: देखा गया है कि एक मनोरोगी में ह्दय, रक्त वाहिनी, अमाशय आंत और त्वचा संबंधित लक्षण मिलते हैं.
मूड डिसऑर्डर- मूड डिसऑर्डर को कभी-कभी Affective Disorder भी कहते हैं और इस श्रेणी में सभी प्रकार के अवसाद एवं Bipolar डिसऑर्डर आते हैं. हालांकि बच्चे एवं वयस्क इसे भिन्न तरह से लक्षणित करते हैं और बच्चों में इसका निदान कठिन हो जाता है क्योंकि वे अपने मन की स्थिति को सही तरह से व्यक्त नहीं कर पाते और अभिभावक बचपना कह कर अक्सर टाल जाते हैं. और इसका मुख्य उपद्रव Depression या अवसाद रूप में स्पष्ट दिखने लगता है.
प्रकार- मूड डिसऑर्डर के निम्न प्रकार होते हैं-
Major Depression - दो सप्ताह तक यदि अवसाद लगातार दिखने लगता है. रोगी किसी भी आनंद या उत्सव में उत्साही नहीं रहता है और मूड डिसऑर्डर के लक्षणों से युक्त हो जाता है तब Major Depression का शिकार हो जाता है.
Dysthymic Disorder- इसमें मूड चिर कालीन हो जाये और थोड़ी-थोड़ी चिड़चिड़ाहट या अवसाद एक वर्ष तक बना रहता है.
Manic Depression (Bipolar Disorder) - चिड़चिड़ाहट भरा या अवसाद पूर्ण मूड का कम से कम एक प्रकरण एवं एक स्तर तक लगातार बढ़ता हुआ Manic (मैनिक) मूड इस श्रेणी में आता है.
अन्य साधारण शारीरिक रोगों के कारण मूड परिवर्तन- कैंसर, चोट, संक्रमण या किसी अन्य चिर चिकित्सकीय रोगों के कारण उत्पन्न अवसाद आता है.
अन्य जन्य मूड डिसऑर्डर- इसमें अवसाद का कारण कोई, द्रव्य, औषध, नशा, विष या अन्य के द्वारा होता है.
कारण व लक्षण-
मूड डिसऑर्डर में वैसे तो वास्तव में सही एक कारण नहीं कहा जा सकता. शरीर व मस्तिष्क की कार्यशैली में कई रासायनिक क्रियायें भाग लेती हैं. इसमें सकारात्मकता के लिये Endorphin (एन्डॉर्फीन) जिम्मेदार होती हैं. और उसे रसायनिक Neurotransmittersनियमित करते हैं. और इसी Chemical की दुव्र्यवस्था होने पर अवसाद हो जाता है.
जीवन की कई घटनायें भी अवसादित मूड को बढ़ाते जाते है.
 पारिवारिक आदि कई कारण अवसाद के लिये जिम्मेदार हो सकते हैं. जो मुख्यत: Genetic या पर्यावरण जनित हो सकते हैं.
लक्षण- उम्र एवं मूड के प्रकार से अवसाद के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलग हो सकते हैं.
*लगातार दुखी रहना.
*असहाय महसूस करना.
*आत्म विश्वास में कमी हो जाना.
*अपर्याप्त महसूस करना.
*जरूरत से ज्यादा पश्चाताप होना.
*मरने की इच्छा होना.
*सामान्य गतिविधियों जिसमें पहले आनंद आता था, अब मन नहीं लगता.
*भूख और वजन में परिवर्तन हो जाना.
*सामान्य संबंधों में परेशानी हो जाना.
*नींद में अवरोध होने लगना.
*उत्साह में कमी हो जाना.
*एक निर्णय लेने में कष्ट होना.
*दया भाव में कमी होना.
*रिश्तेदारों और संबंधों में अरुचि होना.
*आत्म-हत्या की भावना.
*सिरदर्द, पेट दर्द व थकावट जैसे शारीरिक कष्टों का लगातार होना.
*डर के मारे घर में ही कैद होने लगना.
*फेल होने, अस्वीकार होने के प्रति अति प्रतिक्रियाशील.
*क्रोध व चिड़चिड़ाहट का हमेशा या जल्दी-जल्दी होना.
इन लक्षणों के होने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में संकोच नहीं करना चाहिये.
चिकित्सा- मूड डिसऑर्डर वास्तव में एक मानसिक रोग है अतएव एक कुशल मानसिक चिकित्सा विशेषज्ञ को दिखाना आवश्यक हो जाता है. जो मानसिक अव्यवस्था का निदान वैज्ञानिक तरीके से कर यथा शीघ्र सांत्वना, परामर्श एवं औषध द्वारा चिकित्सा करते हैं. इसमें विशेष चिकित्सा में निम्न बातों का ध्यान विशेष रूप से रखा जाता है.
*आयु, पूर्ण स्वास्थ्य, शारीरिक मानसिक व चिकित्सकीय इतिहास का सर्वेक्षण.
*मानसिक स्थिति का सही आकलन.
*सही रूप से मानसिक विकृति के प्रकार का पता लगाना.
*औषध का उचित रूप रोगी का शरीर, मन की स्थिति के अनुसार से प्रयोग.
चिकित्सा औषध का निम्न प्रकार हो सकता है.
*Anti Depression औषध (विशेष रूप से मनो-वैज्ञानिक परामर्श के साथ अधिक लाभकारी होती है)
*पारिवारिक परामर्श
*योगिक- आसन प्राणायाम, ध्यान 
*भगवद् गीता पाठ
मध्य रसायन- ब्राह्मी, शंखपुष्पी, ज्योतिष्मती जैसे हर्बल औषधियों, बादाम, दूध जैसे एंटी ऑक्सीडेंट आहार, भरपूर शांत नींद, सकारात्मक सोच, मन का नियमन, स्वयं का आकलन, परायों का सुख, स्वयं के हित के साथ वस्तुत: मानवता का ही ज्ञान है और भारतीय प्राचीनतम विज्ञान का मूलभूत सिद्धांत है. जो न केवल मन की स्वच्छता बल्कि मूड डिसऑर्डर जैसे मनोरोग हेतु अत्यंत ही उपयोगी है. अतएव जीवन का विज्ञान की साक्षरता सही मायने में शरीर के साथ, मन, इंद्रियां और आत्मा की प्रसन्नता देता है. इसलिये भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी  का स्वच्छता से संकल्प सिद्धि का नारा वस्तुत: एकत्व कुटुम्ब यानि पूरे विश्व की मानवता को मूलत: मानसिक स्वच्छता का संदेश देता है. यह मानसिक स्वच्छता ही मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है जो नैतिक, आत्मिक प्रसन्नता के साथ भाई-चारा, मैत्रेय और सबका सम्मान का द्योतक हो जाता है और इसका पालन सच्चे मायने में राष्ट्रपिता के प्रति श्रद्धांजलि होती है.
यदि स्वयं में विश्वास करना और अधिक
आध्यात्मिकता पढ़ाया जाता
तो मानसिक स्वास्थ्य आज संपूर्ण मानवता में होता
जैसे मोमबत्ती बिना आग के नहीं जलती
वैसे मनुष्य भी आध्यात्मिकता के बिना
नहीं जी सकता
महात्मा बुद्ध
(लेखिका एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं.) (लेखिका  के विचार व्यक्तिगत हैं.)