सफलता की कहानी


Success story-14

कामयाबी को पहचान पाने वाले ही आगे कामयाब होंगे

मुंबई स्थित स्टार्टअप कंपनी ऑनस्पॉन प्रोडक्ट (यानी सामान) की विभिन्न ब्रांडों का संबंध कार्यक्रमों के आयोजकों के साथ कायम करती है जिसका आधार जनसंख्या संबंधी आंकड़ों और ब्रांडों के भौगोलिक लक्ष्यों तथा ब्राडों के विपणन बजट के आपसी संबंधों से होता है। कंपनी ने स्वान एंजेल नेटवर्क से 1 करोड़ रुपया जुटाया है। इस पैसे का उपयोग विपणन तथा अन्य गतिविधियां बढ़ाने और उत्पादों ऑनस्पॉन  (Onspon.com) व अन्य उप-उत्पाद) के टेक्नोलॉजी संबंधी आधार को सुदृढ़ करने में किया जाएगा।

ऑनस्पॉन के संस्थापक हितेश गुसाईं जो भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद से पढ़े हैं, बताते हैं ; ‘‘भारत में कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पैसा जुटाने का टिकटों के अलावा और कोई जरिया नहीं है। लेकन बेहतर किस्म के कार्यक्रम तैयार करने में काफी ज्यादा लागत आती है और इसमें दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी भी हो रही है।’’

कई स्टार्टअप्स सामने आने और नये जमाने के ब्रांड जारी होने के साथ ही संबंध बढ़ाकर और तालमेल कायम करके उत्पाद बाजार में पैठ बनाने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। अब ब्रांड अपने लक्षित ग्राहकों का चुनाव खुद कर सकते हैं और इसके लिए समय भी तय कर सकते हैं। इसके लिए वे ऑनस्पॉन स्मार्ट बोर्ड का उपयोग करते हुए बजट के अनुसार कार्यक्रमों के पूर्वनिर्धारित कैलेंडर का चुनाव किया जा सकता है। कंपनी 350 से ज्यादा शीर्ष ब्रांडों को सेवा प्रदान कर रही है जिनमें प्रमुख हैं: टाटा मोटर्स, डाइकिन, अडानी, हाउसिंग डॉटकॉम, महिन्द्रा हॉलिडेज, ज़ेब्रोनिक्स और निसान आदि। ऑनस्पॉन के संस्थापक हितेन गोसाईं ने उद्यमी के रूप में अपनी यात्रा के बारे में रोजगार समाचार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश :      

प्रश्न : आपको इस तरह के कारोबार का खयाल कैसे आया ?

उत्तर : इसकी शुरुआत आईआईएम अहमदाबाद में कार्यक्रमों के प्रायोजन का कामकाज देखते वक्त हुई। मैंने महसूस किया कि भारत के शीर्षस्थ प्रबंधन संस्थान से होने के बावजूद मेरे लिए यह कार्य एक चुनौती है। इसलिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं और जानकारी के आधार पर एक जवाबदेह बाजार बनाने के लिए मेरे पास यह अच्छा मौका था। मैंने तनख्वाह पर जो आखिरी नौकरी की वह थी परसेप्ट कंपनी के सीईओ की। यहीं पर मैंने महसूस किया कि ऊंची लागत वाले आयोजनों और ब्रांडों के स्तर पर यह एक चुनौती है। इस तरह टेबल के दोनों ही तरफ की समस्याओं से मेरा साबका पड़ता रहा था, जिनके बीच सूचनाओं के असंतुलन की पतली सी दीवार की दूरी होती थी और यहीं मेरे मन में ऑनस्पॉन का खयाल आया।  

प्रश्न : शुरू में आपका मिशन क्या था ?

उत्तर : किसी भी कार्यक्रम आयोजक के लिए प्रायोजक ढूढऩा सबसे टेढ़ी खीर है। मगर हमने इसके लिए अनुसंधान का सहारा लिया जो हमने कारोबार शुरू करने से पहले ही कर लिया था। इसके पीछे सोच यह है कि प्रायोजकों को काम करने का तरीका बताया जाए  इसे ऐसे तरीके से किया जाए जिसका मापन किया जा सके। इसलिए हमारा विचार यह था कि ज्यादा से ज्यादा आयोजन और ज्यादा से ज्यादा ब्रांडों को हाथ में लिया जाए। इसके लिए हमने दो टीमें बनायीं, पहली आयोजनों का पता लगाने के लिए और दूसरी ब्रांडों की खोज के लिए।

प्रश्न : आपके उपक्रम में कितने कर्मचारी हैं ?

उत्तर : हमारी कंपनी में सिर्फ 13 कर्मचारी हैं।   

प्रश्न : आप अपने कारोबार का प्रचार किस तरह से करते हैं ?

उत्तर : हम ब्रांड या उनके प्रतिनिधियों से कार्यक्रमों को देखने और उनका आकलन करने का कोई पैसा नहीं लेते। इसके पीछे विचार यह है कि वे हमारी सेवाओं के बारे में खुद ही कोई राय कायम करें। इसका अर्थशास्त्र शुल्क पर निर्भर न होकर परिमाण पर ज्यादा आधारित है। अभी तक किसी ने इस तरह से कार्य करने का प्रयास नहीं किया। इसलिए मेलर और पोस्ट्स के जरिए कई संपर्क कायम किये जा रहे हैं। कई ब्रांड फोरमों में भी हमें आमंत्रित किया जाता है जहां हम ब्रांड धारकों से संपर्क साधते हैं और उन्हें अपने मॉडल के बारे में समझाते हैं, वहीं कार्यक्रमों के आयोजन में हम गूगल विज्ञापनों और डिजिटल मार्केटिंग के दूसरे साधनों का भी सहारा लेते हैं। कार्यक्रम खोजने की प्रक्रिया अब 90 प्रतिशत तक ऑटोमैटिक यानी स्वचालित है जिनमें आयोजनों संबंधी नये प्रश्न या तो डिजिटल तरीके से या लोगों द्वारा एक दूसरे से सुनकर प्राप्त होते हैं। ब्रांडों को खोजना अपेक्षाकृत अधिक कठिन है, लेकिन प्रति ब्रांड आमदनी बहुत होने से हम ऑनबोर्ड कार्य करने पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।     

प्रश्न : आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देते हैं ?

उत्तर : हम बेहद पुराने मीडिया सेल्स ढांचे को तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए इसमें हमें मीडिया के उपयोग संबंधी फैसला करने वाली ब्रांड धारक कंपनियों के विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यक्रमों का प्रायोजन भी गैर-परम्परागत मीडिया की श्रेणी में आता है। यहां सबसे बड़़े ईएमसी संगठन में काम करने का मेरा अनुभव मेरे बहुत काम आया और हमने ऐसा ढांचा खड़ा किया जिसमें एजेंसियों को हमारे कामकाज के समीकरणों से बड़ा फायदा होता है। वे इसके जरिए अपने ग्राहकों को इसका उपयोग करने के लिए हमारे साथ साझेदारी की सलाह देती हैं, जबकि पहले ऐसा संभव नहीं था।

प्रश्न : आपने अपने कारोबार के लिए वर्तमान स्थान को ही क्यों चुना?

उत्तर : अच्छे ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए यह बेहतरीन जगह है। यहां आस-पास कई अच्छे कॉलेज हैं और अभियानों की लागत नियंत्रण में है। चूंकि हमारे उत्पाद टेक्नोलॉजी और संसाधन-प्रधान हैं, दोनों तक पहुंच बेहद महत्वपूर्ण है। अब मुंबई, दिल्ली और बंगलुरू में भी हमारे तीन ऑफिस हैं।  

प्रश्न : आपके व्यवसाय की सबसे बड़ी खूबी क्या है ?

उत्तर : ऐसी कई छोटी-मोटी परामर्शदाता कंपनियां हैं जो परियोजना आधार पर कार्य करती हैं, लेकिन इस काम को बाजार मॉडल पर करने वाला कोई भी नहीं है। फिर भी  sponsormyevent.com, sponsorist.com, sponsorhub.com विश्व स्तर के कुछ खिलाड़ी जरूर हैं। उत्पाद संवर्धन के स्तर पर सबसे बड़ी परामर्शदाता कंपनी आईईजी है जो उत्पादों का प्रायोजन करने वाली विश्व स्तर की कंपनी है। भारत दुनिया में अलग ही तरह का बाजार है जहां कार्यक्रम प्रायोजन की औसत लागत तो कम है मगर संख्या की दृष्टि से कार्यक्रमों की भरमार है। संपर्क स्थापना के लिहाज से ब्रांडों में जबरदस्त उत्सुकता है और एक खास पैमाने पर ही यह संभव है। इसलिए हमारा विचार है कि इस स्थिति में हम उन्हें काफी अपनी ओर आकर्षित करने में हद तक कामयाब रहेंगे।      

प्रश्न : एक फर्म के प्रमुख के नाते आपकी क्या जिम्मेदारियां हैं?

उत्तर : समग्र विकास पर जोर और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी संबद्ध स्तंभों का विकास। यानी सही लोगों का अनुबंधन, उत्पाद बाजार का आकलन, ग्राहक बनाने और उसे काम पर लगाने की प्रक्रिया का निर्माण। 

प्रश्न : क्या आपकी कंपनी स्थानीय समुदायों की मदद करती है ?

उत्तर : हम स्थानीय लोगों को ही लेते हैं और स्थानीय कार्यक्रमों से संपर्क कायम करते हैं। हम उन्हें सही प्रायोजकों का पता लगाने में मदद करते हैं।

प्रश्न : अगर किसी ने हाल ही में कारोबार शुरू किया हो, तो उसको आपकी क्या सलाह होगी?

उत्तर : यह सलाह मीडिया के क्षेत्र के स्टार्टअप्स और प्रयोग के तौर पर विपणन करने वालों के लिए है : पैसे के लिहाज से सोचने से पहले कारोबार के परिमाण के बारे में सोचें। एक एजेंसी की तरह काम करने और तुरंत पैसे कमाने का लोभ आपके मन में होगा। मगर अपने मॉडल पर कायम रहिए-बाद में आपके कारोबार के आकार और परिमाण से आपकी अच्छी तरह भरपाई हो जाएगी। सबकुछ साथ करने से काम नहीं बनेगा। 

प्रश्न : आपको अपने कारोबार में कौन सी दो चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?

उत्तर : ब्रांड की पहुंच और बड़े पैमाने पर संपर्क। 400 शीर्ष ब्रांड हमारे सिस्टम में हैं मगर हमारे सामने चुनौती तेजी से आगे बढऩे की है। सौभाग्य से हमारी सेवाओं का उपयोग कर रहे ब्रांड बहुत संतुष्ट हैं और खुशी-खुशी दूसरी कंपनियों को हमारे नाम की सिफारिश कर रहे हैं। एजेंसियां भी बहुत ही मददगार रही हैं।

प्रश्न : आपके विचार से भारत में स्टार्टअप्स कितने टिकाऊ रहेंगे ?

उत्तर : आने वाले वर्षों में वे ही हमारी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करेंगे। पारम्परिक व्यापारिक मॉडलों पर सवाल उठने लगे हैं। आज दुनिया की सबसे बड़ी कैब ऑपरेटर कंपनी के पास अपनी एक भी कार नहीं है। सबसे बड़ी हॉस्पीटैलिटी (आतिथ्य) कंपनी एआरबीएनबी का अपना एक भी होटल नहीं है। इस तरह के और भी कई उदाहरण हैं। नयी सोच का दायरा व्यापक हो रहा है और स्टार्टअप्स बदलाव की इस लहर में सबसे आगे चल रहे हैं।

यह बात जरूर है कि सफलताओं के साथ असफलताएं भी सामने आयी हैं। मगर अंतत: सफलता की परिभाषा वही लिखेंगे जो इसमें कामयाब होंगे। और स्टार्टअप्स यही करने जा रहे हैं।

 

-अमित त्यागी