संपादकीय लेख


Volume-42, 13-19 January, 2017

 
भारत में रोज़गार का भविष्य

शशिकला पुष्पा और डॉ. बी. रामास्वामी

रोज़गार सृजन वह महत्वपूर्ण माध्यम है जिससे आर्थिक विकास जनता की खुशहाली में परिवर्तित होता है. विकासमान अर्थव्यवस्था में बढ़ती उत्पादकता के साथ रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी होना गरीबों के लिए विकास प्रक्रिया में भागीदार बनने और अपने जीवन स्तर को सुधारने का सबसे कारगर उपाय होता है. इसलिए उच्च आर्थिक विकास के साथ-साथ अगर रोज़गार के अवसरों में अच्छा विकास न हो तो इससे असमानताएं बढ़ेंगी और इसलिए ऐसा विकास वांछनीय नहीं कहा जा सकता. यानी समता- मूलक विकास का लक्ष्य प्राप्त करने और गरीबी कम करने के लिए लाभप्रद रोज़गार के अवसरों में वृद्धि करना बुनियादी जरूरत है. रोज़गार के अवसरों में तेजी से बढ़ोतरी का तो भारत के लिए और भी अधिक महत्व है क्योंकि 2020 तक आकार की दृष्टि से भारत के दुनिया का सबसे युवा देश बन जाने की संभावना है. जैसा कि 2015-16 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है ‘‘जनसंख्या का लाभ उठाने के लिए भारत को करोड़ों अच्छे, सुरक्षित, उत्पादक और अच्छी आमदनी वाले रोज़गार के अवसर सृजित करने होंगे.’’ इस तरह समता के साथ विकास का लक्ष्य हासिल करने और अपने जनसंख्या बल का लाभ उठाने के लिए रोज़गार का बड़ा महत्व है.   
रोज़गार और गरीबी उन्मूलन
(गरीबी बीमारी है, और रोज़गार इसकी दवा है)
रिज़वानुल ने 2004 में देश भर के आंकड़ों और अनुभव के आधार पर यह साबित कर दिया कि गरीबी उन्मूलन और रोज़गार में बढ़ोतरी के बीच संबंध है. उन्होंने गरीबी कम करने में रोज़गार और श्रम बाजार संबंधी परिवर्तनों के प्रभाव को प्रदर्शित करने में देशव्यापी विश्लेषण का उपयोग किया और पता लगाया कि गरीबी कम करने में विनिर्माण और कृषि से इतर अन्य क्षेत्रों, शिक्षा तथा निर्भरता का बोझ कम करने (यानी श्रम शक्ति की भागीदारी बढ़ाने) जैसे उपायों का सकारात्मक असर पड़ता है. संक्षेप में कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय उत्पादकता और विकास के रोज़गार संबंधी रुझान की गरीबी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. द्वैतीयक क्षेत्र में रोज़गार-प्रधान विकास का सीधा संबंध भी गरीबी कम करने से है.
रोज़गार की स्थिति:
भारत की कामकाजी आबादी (15 से 64 वर्ष) 2050 में 1.1 अरब हो जाएगी जबकि चीन की घट कर 75 करोड़ रह जाएगी. कामकाजी आबादी में इस बढ़ोतरी का फायदा उठाने और इसे अपने लिए बहुत बड़ा दुर्भाग्य बनने से रोकने के लिए भारत को अगले 15 वर्षों तक हर साल रोज़गार के 1.6 करोड़ अवसर जुटाने होंगे. 2017 की आर्थिक समीक्षा के अनुसार साल के दौरान अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र श्रम बाजार पर छाए रहे. इसमें यह भी कहा गया है कि अनौपचारिक क्षेत्र में रोज़गार पूरी अवधि का न होकर मौसमी होता है जिसमें आंशिक रोज़गार और कौशल की कमी पायी जाती है और श्रम संबंधी कानून बड़े कठोर होते हैं. नीति आयोग ने इस बात पर जोर दिया है कि स्वैच्छिक रोज़गार बढ़ रहा है क्योंकि लोग शिक्षा में काफी धन निवेश करने के बाद एक निश्चित आय-स्तर से कम में कार्य करना पसंद नहीं करते.
राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के पांचवें रोज़गार और बेरोज़गारी        सर्वेक्षण 2015-16:
इसके अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर यूपीएस (यूजुअल प्रिंसिपल स्टेटस) आधारित विभिन्न श्रेणियों की श्रम शक्ति भागीदारी दर इस प्रकार है:
क्षेत्र       पुरुष         महिला    उभयलिंगी     कुल
ग्रामीण  ७७.३%       २६.७%   ५१.१      ३५. %
शहरी    ६९.१%        ६.२%    ४१.२%        ४३.५%
ग्रामीण+शहरी ७५.०२३.७%   ४८.०      ५०.३%
कामकाजी आबादी का काफी बड़ा हिस्सा महिलाओं का होने से महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर (एलएफपीआर) का इतने न्यून स्तर पर होना समता और दक्षता दोनों ही दृष्टि से बहुत बड़ी चुनौती है. विभिन्न श्रेणियों के लिए यूपीएस दृष्टिकोण पर आधारित बेरोज़गारी दर नीचे दी गयी है:
क्षेत्र               पुरुष     महिला      उभयलिंगी    कुल
ग्रामीण           ४.२%   ७.८%      २.१%        ५.१%   
शहरी            ३.३%    १२.१    १०.३    ४.९%   
ग्रामीण+शहरी ४.०%     ८.७%      ४.३%       ५.०%   
संयुक्त राष्ट्र के अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) द्वारा जारी विश्व रोज़गार और सामाजिक परिदृश्य रिपोर्ट-2017 में रोज़गार में बढ़ोतरी के रुझान के मांग की तुलना में पिछडऩे की प्रवृत्ति को देखते हुए 2017 के समूचे वर्ष के दौरान बेरोज़गारी बढऩे और सामाजिक असमानता की स्थिति बदतर होने का पूर्वानुमान लगाया गया है.
नीतिगत पहल
सरकार अपने बूते सबको रोज़गार उपलब्ध नहीं करा सकती, इसलिए उसने स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया और मुद्रा योजना जैसे अभियानों पर जोर दिया है ताकि भारत विनिर्माण और उद्यमिता संबंधी गतिविधियों का केन्द्र बन जाए.
मेक इन इंडिया:
इस अभियान का उद्देश्य भारत को दुनिया में डिजाइन और विनिर्माण का केन्द्र बनाना है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका शुभारंभ किया. अनगिनत लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया और बहुत जल्द यह बड़ा लोकप्रिय हो गया है. भारत के नागरिकों और कारोबारियों के लिए यह कुछ करके दिखाने का सशक्त संदेश है. साथ ही यह दुनिया भर के संभावित साझेदारों और निवेशकों के लिए खुला आमंत्रण है. लेकिन मेक इन इंडिया महज एक प्रेरक नारा नहीं है. यह पुरानी पड़ चुकी प्रक्रियाओं और नीतियों को फिर से चमकाने का विस्तृत और अभूतपूर्व प्रयास भी है. इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके माध्यम से सरकार की सोच में आमूल परिवर्तन आया है. प्रधानमंत्री के मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंसके सिद्धांत के अनुसार इसमें कारोबारियों को अधिकार प्रदान किये गये हैं.
स्टार्ट अप इंडिया :
स्टार्ट अप इंडिया भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल है जिसका उद्देश्य देश में नवसृजन और स्टार्ट अप्स के विकास के लिए ऐसा माहौल तैयार करना है जिससे टिकाऊ आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले और बड़ी तादाद में रोज़गार के अवसर उत्पन्न हों. इस पहल के माध्यम से सरकार स्टार्ट अप्स को नवसृजन और अभिकल्पन के जरिए विकास का मौका देना चाहती है. स्टार्ट अप इंडिया की कार्य योजना निम्नलिखित तीन स्तंभों पर आधारित है:
क) सरलीकरण और सहारा देना,
ख) वित्तपोषण में सहयोग और प्रोत्साहन,
ग) उद्योग और शैक्षिक समुदाय की साझेदारी तथा निर्माण अवधि.       
स्टैंड अप इंडिया:
‘‘करें प्रयास, पायें विकास’’ टैगलाइन के तहत अनुसूचित जातियों और जन जातियों तथा महिलाओं में उद्यमिता को बढ़ावा. स्टैंड अप इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य अनुसूचित बैंकों की हर एक शाखा से अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जन जातियों के कम से कम एक ऋण लेने वाले उद्यमी को या कम से कम एक महिला उद्यमी को नया उपक्रम लगाने के लिए 10 लाख रुपये से 100 लाख रुपये तक के बैंक ऋण उपलब्ध कराने में मदद देना है. स्टार्ट अप इंडिया पोर्टल अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों और महिलाओं में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए तीन स्तंभों पर आधारित सहयोग उपलबध कराने वाला डिजिटल मंच है. यह सहयोग 1. सहारा देने, 2. वित्तपोषण के बारे में जानकारी देने, और 3. ऋण के लिए गारंटी उपलब्ध कराने के रूप में होता है. इस कार्यक्रम का संचालन भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) द्वारा भारतीय दलित वाणिज्य और उद्योग मंडल परिसंघ (डीआईसीसीआई) तथा देश भर की कई विशिष्ट क्षेत्रीय संस्थाओं के सहयोग से किया जाता है. भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक और राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के परिसरों को स्टैंड अप कनेक्ट सेंटर के रूप में कार्य करने की इजाजत दी जाती है. ऋणों के पीछे नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी का समर्थन भी रहता है.     
मुद्रा योजना
माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी लिमिटेड (मुद्रा) भारत सरकार द्वारा गठित एक नयी संस्था है जिसका उद्देश्य आमदनी बढ़ाने वाली कंपनियों से इतर और कृषि क्षेत्र से इतर गतिविधियों के लिए सूक्ष्म और लघु इकाइयों को 10 लाख रुपये से कम की मदद उपलब्ध कराना है. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत मुद्रा ने माइक्रो इकाई के विकास के चरण और वित्तपोषण की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तीन तरह के उत्पाद सृजित किये हैं: शिशु’, ‘किशोरऔर तरुण.इन योजनाओं के अंतर्गत ऋण राशि की सीमा इस प्रकार है-
शिशु: 50,000 रुपये तक;
किशोर: 50,000 रुपये से ज्यादा और 5,00,000 रुपये तक; और
तरुण: 5,00,000 रुपये से अधिक और 10,00,000 रुपये तक.
मुद्रा योजना के अंतर्गत कंपनियों से इतर लघु कारोबार खंड (एनसीएसबीएस) शामिल रहता है जिसमें लघु विनिर्माण इकाइयों के रूप में काम करने वाली प्रोपराइटरशिप या पार्टनरशिप फर्में, सेवा क्षेत्र की इकाइयां, दूकानदार, फल/सब्जी विक्रेता, ट्रक ऑपरेटर, खानपान सेवा इकाइयां, मरम्मत का काम करने वाली दूकानें, मशीन आपरेटर, लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों की इकाइयां सहायता प्राप्त करने की पात्र हैं. बैंकों की शाखाएं मुद्रा योजना के अंतर्गत ग्राहक की आवश्यकताओं के अनुसार ऋण उपलब्ध कराती हैं. इस कार्यक्रम के तहत दिये जाने वाले ऋण बिना किसी जमानती के दिये जाते हैं.     
राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन
इस मिशन को कौशल प्रशिक्षण गतिविधियों में तमाम क्षेत्रों और राज्यों के बीच तालमेल बैठाने के लिए तैयार किया गया है. इसे कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा संचालित सुनियोजित संस्थागत प्रणाली के माध्यम से लागू किया जाता है. मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अहम संस्थागत प्रणाली को तीन स्तरों में बांटा गया है जिसमें शीर्ष स्तर पर नीतिगत दिशानिर्देश के लिए शासी परिषद, संचालन समिति और मिशन की कार्यकारी शाखा के रूप में मिशन निदेशालय (कार्यकारी समिति के साथ)- मिशन निदेशालय की मदद के लिए तीन और संस्थाएं भी हैं: राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी (एनएसडीए), राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) और प्रशिक्षण महानिदेशालय (डीजीटी). ये सब मिशन निदेशालय से क्षैतिज संपर्क में रहते हैं ताकि राष्ट्रीय संस्थागत प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करे.   
प्रारंभ में सात उप-मिशन भी प्रस्तावित हैं ताकि वे मिशन के समग्र लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इमारती खंड की तरह कार्य कर सकें. इनके नाम हैं: (1) संस्थागत प्रशिक्षण, (2) अवसंरचना, (3) कनवर्जेंस, (4) प्रशिक्षक, (5) विदेशों में रोज़गार, (6) टिकाऊ आजीविका, और (7) सार्वजनिक अवसंरचना का लाभ उठाना.
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई)
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की यह प्रमुख योजना है. कौशल को प्रमाणित करने की इस योजना का उद्देश्य भारतीय नौजवानों को बड़ी तादाद में उद्योगों की दृष्टि से प्रासंगिक कौशलों का प्रशिक्षण प्रदान करना है ताकि उन्हें बेहतर आजीविका हासिल करने में मदद मिले. पहले से सीखने के अनुभव या कौशल वाले व्यक्तियों का भी मूल्यांकन किया जाएगा और पहले सीखे गये कौशलों का प्रमाणन किया जाएगा. इस योजना के तहत प्रशिक्षण और मूल्यांकन शुल्क का भुगतान सरकार करती है.
स्टार्ट अप ग्रामीण उद्यमिता कार्यक्रम (एसवीईपी): चुने गये गांवों में रहने वाले युवाओं के लिए टिकाऊ स्वरोज़गार के अवसर उपलब्ध कराना. इसका एक अन्य उद्देश्य यह भी है कि ग्रामीण उद्यमियों और बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के बीच नेटवर्किंग को बढ़ावा दिया जाए.     
डीएवाई-एनयूएलएम:
राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (एनयूएलएम) की शुरुआत आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय ने 2013 में स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना के स्थान पर की थी. राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन का उद्देश्य शहरी गरीबों को उनकी जमीनी स्तर की संस्थाओं में व्यवस्थित करना, कौशल विकास के अवसरों के माध्यम से बाजार मूलक रोज़गार को बढ़ावा देना और उन्हें आसान ऋण की सुविधा प्रदान कर स्वरोज़गार वाले उद्यम स्थापित करने में सहायता देना है. मिशन का एक अन्य उद्देश्य शहरी गरीबों को चरणबद्ध तरीके से आवश्यक सेवाओं से युक्त आवास उपलब्ध कराना भी है. इसके अलावा इसके माध्यम से शहरों के फेरी, पटरी और रेहड़ी लगाकर व्यापार करने वालों के आजीविका संबंधी सरोकारों पर ध्यान देकर उन्हें कारोबार के लिए जगह, संस्थागत ऋण, सामाजिक सुरक्षा और कौशल प्रदान करने का प्रयास भी किया जाता है ताकि वे बाजार में उभर कर सामने आ रहे नये अवसरों का लाभ उठा सकें. 
डीएवाई-एनआरएलएम:
आजीविका-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की शुरुआत भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जून 2011 में की थी. इसके लिए विश्व बैंक की ओर से आंशिक रूप से निवेश सहायता भी प्राप्त होती है. इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों के लिए कुशल और प्रभावी संस्थागत मंच प्रदान करना है. इसके अलावा इसके माध्यम से आजीविका बढ़ाने के टिकाऊ उपायों तथा वित्तीय सेवाओं तक उनकी आसान पहुंच बनाकर उनकी पारिवारिक आमदनी बढ़ाने के अवसर भी प्रदान किये जाते हैं. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन 8-10 वर्षों में देश में 600 जिलों के 6,000 ब्लॉकों में 2.5 लाख पंचायतों और 6 लाख गांवों के करीब 7 करोड़ गरीब ग्रामीण परिवारों को स्व-सहायता समूहों और इसी तरह की विकेन्द्रित संस्थाओं के माध्यम से सहायता प्रदान करने के लक्ष्य को लेकर चला था. इसके अलावा इसके माध्यम से गरीबों को उनके अधिकार, हक और सार्वजनिक सुविधाएं आदि दिलाकर सशक्तीकरण के सामाजिक संकेतकों तक उनकी पहुंच आसान बनाने का भी लक्ष्य रखा गया था.      
डीएवाई-एनआरएलएम गरीबों की आंतरिक क्षमताओं का उपयोग करने पर आधारित है जिसके लिए इसमें उनकी क्षमताएं (सूचना, जानकारी, कौशल, औजार, वित्त और संगठित समूह) बढ़ाई जाती है ताकि वे देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में सहभागी बन सकें. इसके अंतर्गत (क) वर्तमान आबंटन आधारित रणनीति की बजाय मांग संचालित रणनीति अपनायी जाती है ताकि राज्य गरीबी कम करने के लिए आजीविका आधारित अपनी कार्य योजनाएं बना सकें; (ख) लक्ष्यों, परिणामों और समय पर प्राप्ति पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है; (ग) गरीबों को आवश्यक कौशल संपन्न बनाकर और संगठित क्षेत्र समेत तमाम तरह के आजीविका के अवसरों से उनका संपर्क जोडक़र उनमें क्षमता का सृजन किया जाता है; और (घ) गरीबी दूर करने के लक्ष्यों के तहत परिणामों की निगरानी की जाती है.
अटल नवसृजन मिशन: अटल नवसृजन मिशन (एआईएम-एम) और स्वरोज़गार एवं प्रतिभा उपयोग (एसईटीयू-सेतु) नवसृजन और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देने की भारत सरकार की पहल है. इसका उद्देश्य विश्वस्तरीय नवसृजन केन्द्र, बड़ी चुनौतियों, स्टार्ट-अप कारोबार और अन्य स्वरोज़गार गतिविधियों, खास तौर पर टेक्नोलाजी संचालित क्षेत्रों में इस तरह की गतिविधियों के लिए मंच प्रदान करना है. 
अटल नवसृजन मिशन के दो प्रमुख कार्य होंगे:
द्य स्वरोज़गार के जरिए उद्यमिता को बढ़ावा देकर प्रतिभा का उपयोग, जिसके तहत नवसृजन करने वालों को मदद देने के साथ-साथ उनका संरक्षण भी किया जाएगा ताकि वे आगे चलकर सफल उद्यमी बन सकें.
द्य नवसृजन को प्रोत्साहन: एक ऐसा मंच प्रदान करना जहां अभिनव विचार जन्म ले सकें.
सूचना और संचार टेक्नोलाजी की मदद से एक राष्ट्रीय पोर्टल बनाया गया है जिसका मूल उद्देश्य अवसरों और नौजवानों की आकांक्षाओं के बीच तालमेल कायम करना है. पोर्टल में नौकरियां खोज रहे नौजवानों, रोज़गार देने वालों, कौशल उपलब्ध कराने वालों और व्यावसायिक परामर्शदाता जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं. यह पोर्टल, रोज़गार मिलान सेवा अत्यंत पारदर्शी और उपयोग करने वालों की दृष्टि से सुगम तरीके से उपलब्ध कराता है. इन सुविधाओं और व्यावसायिक परामर्श संबंधी सामग्री को पोर्टल में विभिन्न चैनलों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जाता है. इस पोर्टल में रोज़गार खोजने वालों, नियोक्ताओं, कौशल विकास करने वालों और व्यावसायिक परामर्शदाताओं आदि के पंजीयन की सुविधा भी उपलब्ध है. पोर्टल में बेहद पारदर्शी और उपयोग करने वालों की दृष्टि से आसान तरीके से नौकरियों के मिलान की सुविधा भी उपलब्ध करायी जाती है. इस तरह की सुविधा को व्यावसायिक परामर्श के साथ पोर्टल के जरिए कई चैनलों जैसे रोज़गार परामर्श केन्द्रों और मोबाइल युक्तियों आदि के माध्यम से पहुंचाया जाएगा. यह परियोजना नौजवानों की शिक्षा, रोज़गार और प्रशिक्षण संबंधी विभिन्न आवश्यकताओं और मांगों को पूरा करने में सक्षम होगी. परियोजना में सहयोग के लिए एक बहुभाषी कॉल सेंटर भी बनाया जाएगा.     
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/ जनजाति केन्द्र:
अनुसूचित जातियों/जनजातियों के उद्यमियों को पेशेवर सहायता उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति केन्द्र बनाया गया है ताकि केन्द्र सरकार की सार्वजनिक खरीद नीति के अंतर्गत सूक्ष्म और लघु उद्यम आदेश 2012 के तहत खरीद संबंधी बाध्यताओं को पूरा किया जा सके, व्यवहार्य कारोबारी तौर-तरीकों को अपनाया जा सके और स्टैंड अप इंडिया पहल का लाभ उठाया जा सके. इस कार्यक्रम को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एनएसआईसी) के माध्यम से लागू किया जाएगा जो मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत सार्वजनिक क्षेत्र का एक उपक्रम है.  
सिफारिशें:
द्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों में नयी जान फूंकना क्योंकि कुल रोज़गारों में से एक चौथाई उनमें ही मिलते हैं.
द्य सरकार को बाजार में कौशल संबंधी विसंगतियों को कम करना चाहिए और विभिन्न क्षेत्रों में लिंग संबंधी अंतर भी दूर किया जाना चाहिए.
द्य कारोबार करना आसान बनाने के लिए सरकार को और सुधार करने चाहिए और कर तथा व्यावसायिक प्रोत्साहन प्रदान करने चाहिए, खास तौर पर युवा उद्यमियों और सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों को.
द्य सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, आतिथ्य और पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना चाहिए. विकास को बढ़ावा देने और इनकी जबरदस्त रोज़गार क्षमता का फायदा उठाने के लिए नीति संबंधी बदलाव जरूरी हैं.
द्य सरकार को रोज़गार पैदा करने वाले प्रत्येक क्षेत्र पर अलग से ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है.
द्य रेलवे, मैट्रो, बंदरगाहों और राष्ट्रीय राजमार्गों आदि पर बड़े पैमाने पर निवेश के जरिए बुनियादी ढांचे का विकास किया जाना चाहिए.
द्य रोज़गार के अवसर पैदा करने वाली योजनाओं का स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत और सबके लिए आवास जैसी योजनाओं के साथ तालमेल कायम करके रोज़गार के अवसरों में भारी बढ़ोतरी की जा सकती है.
द्य तटवर्ती रोज़गार क्षेत्र बनाए जाने चाहिए.
द्य हाल की एक रिपोर्ट में किये गये प्रस्ताव के अनुसार रोज़गार के अवसर पैदा करने के तीन तरीकों को आजमाया जाना चाहिए.
द्य रोज़गार के अवसरों का अधिक सटीक सांख्यिकीय मापन, निवेश और नवसृजन के मार्ग की बाधाओं को दूर करना, औद्योगिक नगरियों की स्थापना, विनिर्माण पर विशेष जोर देना और टूरिस्ट सर्किटों का विकास.           
डॉ. शशिकला पुष्पा सांसद (राज्य सभा) हैं और उन्होंने डॉ. बी. रामास्वामी के साथ संयुक्त रूप से चार पुस्तकें लिखी हैं. ई-मेल:ranjeetmehta@gmail.com  डॉ. बी. रामास्वामी एपीजी शिमला विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश के पूर्व प्रो-वाइसचांसलर हैं.