संपादकीय लेख


Volume-50, 10-16 March, 2018

 

 

भारतीय जैव प्रौद्योगिकी में रोजग़ार एवं व्यवसाय के बड़े अवसर

डॉ. रणजीत मेहता एवं
सुश्री अंकिता रानी

 आज देशभर में, जैवप्रौद्योगिकी उद्यमी अनेक प्रकार के परिवर्तनकारी नव प्रवर्तनों का विकास कर रहे हैं जो विश्व के कल्याण, समर्थन एवं सहायता के हमारे तरीके को बदल देंगे. ऐसे और अग्रणी नवप्रवर्तनों के बाजार में आने से, ये न केवल बड़े लाभ देंगे, बल्कि ये हमारी अर्थव्यवस्था के आर्थिक अग्रज के रूप में भी कार्य करेंगे.

जैव प्रौद्योगिकी, जिसे विश्वभर में तीव्र गति से उभर रही एवं व्यापक प्रभाव वाली प्रौद्योगिकी के रूप में मान्यता मिली है, समुचित रूप से खाद्य, स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय धारणीयता के इसके आश्वासन के लिए उम्मीदों वाली प्रौद्योगिकी के रूप में वर्णन किया गया है. जीवन विज्ञान में नई तथा अनवरत उन्नति, जैव प्रौद्योगिकी के नए साधनों द्वारा क्रियाशील एवं प्रेरित एक कार्य योजना का विस्तार कर रही है. इस समय उपचारात्मक जैवप्रौद्योगिकी औषधियां और टीके बड़ी संख्या में बेचे जा रहे हैं, जिनका बाजार मूल्य 40 मिलियन अमरीकी डॉलर है और विश्वभर में करोड़ों लोगों को लाभान्वित कर रहे हैं. ऐसी सैकड़ों औषधियां एवं टीके नैदानिक विकास की प्रक्रिया में हैं. इनके अतिरिक्त, बड़ी संख्या में कृषि प्रौद्योगिकी एवं प्रौद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी उत्पादों ने मानव जाति की अत्यधिक सहायता की है.

भारतीय जैवप्रौद्योगिकी क्षेत्र विश्वभर में पहचान बना रहा है और इसमें उभर रहे निवेश अवसरों का पता लगाया जा रहा है. मानव पूंजी को विश्व-प्रतिस्पर्धा का मुख्य संचालक समझा जाता है.

इसके अतिरिक्त, विकसित देशों द्वारा अपनी पूंजी को जोखिम में डालने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है जिसके कारण इन देशों में जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी गिरावट देखी गई है जहां कठिन समय में भारत जैसे विकासशील देश कम लागत वाले अनुसंधान सुविधा दे रहे हैं.

भारत जैसे देश के लिए जैवप्रौद्योगिकी एक अत्यधिक प्रभावशाली समर्थक प्रौद्योगिकी है, जो कृषि, स्वास्थ्य परिचर्या, औद्योगिक प्रोसेसिंग तथा पर्यावरीणीय स्थिरता में क्रांति ला सकती है. पिछले दो दशकों में, भारतीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनेक बिखरे हुए और छिटपुट शैक्षिक एवं औद्योगिक नव प्रवर्तनों के माध्यम से रूप लिया है. अब इन प्रयासों को एक व्यावहारिक राष्ट्रीय जैवप्रौद्योगिकी विकास कार्य-नीति के माध्यम से एकीकृत करने का समय आ गया है. यह आवश्यक है कि इस क्षेत्र के प्रधान वास्तुकार एवं अन्य मुख्य भागीदार (स्टाक होल्डर्स) एक ऐसी कार्य नीति बनाने में ऐसी ठोस भूमिका निभाए, जो यह सुनिश्चित कर सके कि भारत अपनी सभी पूर्ण क्षमताओं को प्रवर्तित करके जैवप्रौद्योगिकी में विश्व नेतृत्व करने के लिए न केवल विद्यमान मंच सुदृढ़ करता है बल्कि इसकी नींव का विस्तार भी करता है.

जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व के 12 अग्रणी देशों में से है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में इसका तीसरा स्थान है. भारत बड़ी संख्या में अमरीकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए)अनुमोदित संयंत्र लगाने वाला अमेरिका के बाद दूसरा बड़ा देश है. भारत ने उत्पाद पेटेंट शासन वर्ष-2005 में अंगीकार की है. यह बढ़ती हुई प्रयोज्य आय के साथ विशाल घरेलू बाजार एवं व्यापक उपभोक्ता आधार वाला देश है. भारत सस्ते टीकों की सप्लाई करने वाला और रिकॉम्बिनेंट हीपाटाइटिस बी. टीके का उत्पादन करने वाला विश्व का सबसे अग्रणी देश है. भारत 7 प्रतिशत से उच्च जीडीपी विकास दर वाली सबसे तीव्र गति से विकासशील बड़ी अर्थव्यवस्था है. भारत में ट्रांसजेनिक धान तथा कई आनुवंशिक रूप से परिशोधित (जीएम) या तैयार सब्जियों का बड़ा उत्पादक बनने की क्षमता है. भारत प्रतिभावान अत्यधिक कुशल एवं प्रशिक्षित पूल से सम्पन्न है. निधियन, मेंटोरिंग, सहायता एवं अवसंरचना समर्थन के माध्यम से उद्योग को समझने के लिए जैवप्रौद्योगिकी विभाग के एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम-जैवप्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) जैसे विशेष उद्देश्य संगठन भारतीय जैवप्रौद्योगिकी उद्योग के, 2025 तक 100 बिलियन अमेरीकी डॉलर तक पहुंचने के लिए 30.46 प्रतिशत सीएजीआर की दर पर विकास करने की प्रत्याशा है. भारत में जैवप्रौद्योगिकी उद्योग 2005 के 1.1 बिलियन  अमेरिकी डॉलर से बढक़र 2015 में 7 बिलियन अमेरीकी डॉलर हो गया और 2018 में इसके 11.6 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंचने की आशा है. यह विकास स्वास्थ्य परिचर्या सेवाओं की बढ़ती हुई मांग, खाद्य एवं पोषण के गहन अनुभव एवं विकास कार्यों और सशक्त सरकारी नव प्रवर्तनों जैसी विविध सकारात्मक प्रवृत्तियों के कारण हुआ है. जैव-भेषजीय क्षेत्र का जैवप्रौद्योगिकी उद्योग में सबसे अधिक हिस्सा है, जिसका हिस्सा 2015 में कुल राजस्व  का 62% था, इसके बाद जैव सेवाओं (18%), जैव- कृषि (15%), जैव-औद्योगिक (4%) और जैव सूचना विज्ञान (1%), का योगदान है. भारत सरकार के एक सार्वजनिक क्षेत्र के एकक-बीआईआरएसी के माध्यम से 104 नए स्टार्ट-अप्स, 346 कंपनियों, 115 सहयोगी परियोजनाओं सहित 509 परियोजनाओं को समर्थन दिया गया.

भारत के वैज्ञानिक एवं इंजीनियरों, व्यापक सांस्थानिक नेटवर्क और लागत प्रभावी विनिर्माण के सुदृढ़ पूल में अनेक परिसम्पत्तियां हैं. एक सौ से भी अधिक राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशालाएं हजारों वैज्ञानिकों को रोजग़ार देती हैं. पूरे देश में 300 से भी अधिक कॉलेज स्तर के शैक्षिक एवं प्रशिक्षण संस्थान जैवप्रौद्योगिकी, जैव सूचना विज्ञान तथा जैविकीय विज्ञान डिग्रियां एवं डिप्लोमा प्रदान करते हैं और वार्षिक आधार पर 50,000 के लगभग छात्र देते हैं. 100 से अधिक चिकित्सा कॉलेज प्रतिवर्ष लगभग 17000 चिकित्सा  पै्रक्टिसनर तैयार करते हैं. जैवविज्ञान एवं इंजीनियरी में प्रति लगभग 300,000 स्नातकोत्तर और 1500 पी.एचडी छात्र उत्तीर्ण होते हैं. इन संसाधनों को एक सफल/उपयोगी उद्यम का सृजन करने के लिए प्रभावी रूप में मार्शल, चैम्पियन एवं क्रियाशील बनाए जाने की आवश्यकता है.

भारत एक वृहद जैव-वैविध्य देश के रूप में पुनर्गठित है और हमारे जैविकीय संसाधनों को आर्थिक सम्पदा एवं रोजग़ार अवसरों में परिणत करने के अवसर देता है. नवीकरणीय  संसाधनों पर तैयार नवप्रवर्तित उत्पाद एवं सेवाएं औद्योगिक प्रक्रियाओं में व्यापक दक्षता लाती है, पर्यावरणीय निम्नीकरण पर नियंत्रण रखती हैं और एक अधिक जैव-आधारित अर्थव्यवस्था देती हैं.

भारतीय कृषि, प्रति व्यक्ति कम होते जा रहे कृषि योग्य भूमि एवं जल-संसाधनों से हमारी वर्धमान मानव एवं पशुधन संख्या के लिए अधिक कृषि उत्पादों का उत्पादन करने की कठिन चुनौती का सामना करती है. हमारे देश के 110 मिलियन किसानों की आजीविका की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जैवप्रौद्योगिकी में इस चुनौती का सामना करने की क्षमता है.

हम यह भी अनुभव करते हैं कि एक सफल उद्योग के रूप में जैवप्रौद्योगिकी की उन्नति अनुसंधान एवं विकास, निवेश पूंजी के सृजन, प्रौद्योगिकी अंतरण और प्रौद्योगिकी समावेशन, एकस्वकारिता और बौद्धिक सम्पदा, मूल्यनिर्धारण में वहनीयता, विनियामक मामलों तथा जन विश्वास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करती है. इसके मध्य दो मुख्य तथ्य हैं :

जैवप्रौद्योगिकी के उत्पादों की वहनीयता एवं उन तक पहुंच. नवप्रवर्तन को बनाए रखने और प्रौद्योगिकी विस्तार को कारगर बनाने के लिए बीच एवं संतुलन बनाए रखने वाली नीतियों को लागू किए जाने की आवश्यकता है. इसके लिए एक व्यापक निवेश और नवप्रवर्तन मार्ग के प्रभावी कार्यसंचालन की आवश्यकता होगी.

जैव प्रौद्योगिकी जैसी अग्रणी प्रौद्योगिकियों में निवेश करने का यही समय है. यह ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्र की सामाजिक एवं आर्थिक सुदृढ़ता के लिए इस आकर्षक क्षेत्र की पूर्ण क्षमता प्राप्ति के लिए विभिन्न स्टेक होल्डर्स द्वारा स्पष्ट रूप से सुविचारित नीतियां दिशा एवं योग्य कार्य प्रदान करेंगी. कृषि योग्य भूमि की प्रति व्यक्ति कम होती उपलब्धता, फसलों, पशुधन एवं मात्स्यिकी की कम उत्पादकता, बायोटिक (इन्सैक्ट पेस्ट, वीड्स) और एबियोटिक (लवणता, सूखा, क्षरियता) दबाव, भारी फसलोत्तर क्षति और कृषि साधन के रूप में पानी की कम उपलब्धता जैसी बड़ी चुनौतियां होने के बावजूद अपनी कृषि को प्रतिस्पर्धी और लाभकारी बनाए रखने के लिए जैवप्रौद्योगिकी की आवश्यकता है. वर्षों से कृषि से जुड़ी  जैवप्रौद्योगिकी में निवेश करने के महत्वपूर्ण उन्नत अनुसंधान एवं विकास सक्षमता और सांस्थानिक निर्माण के परिणाम आए हैं. तथापि, अनुसंधान को प्रयोज्य उत्पादों में अंतरित करने में प्रगति कुछ धीमी रही है.

कृषि में जैवप्रौद्योगिकी अनुप्रयोग व्यापक रूप में किया जाता है जिसमें उन्नत फसलों, पशुओं, कृषि-वानिकी महत्व के पौधों माइक्रोब्स का सृजन, मार्कर सहायता प्राप्त चयन के माध्यम से प्रजनन में त्वरितता लाना, कज्टीवर्स की फिंगर प्रिंटिंग, लैंड रेजेज, जर्मप्लाज्म स्टॉक्स, फसलों, कृषि-पशुओं और मत्स्य के पेस्ट/पैथोजेन्स हेतु निदानविज्ञान आधारित डीएनए, जैव वैविध्य का निर्धारण एवं निगरानी, विशिष्ट पौधरोपण सामग्रियों का इन विट्रो बहु-गुणन, पशु प्रजनन के लिए एम्ब्रियो अंतरण प्रौद्योगिकी, खाद्य एवं पोषण जैवप्रौद्योगिकी आदि शामिल हैं. थेरापेटिक रूप में या औद्योगिक रूप में उपयोगी उत्पादों के लिए पौधों और पशुओं का प्रयोग किया जा रहा है, उत्पादन की दक्षता में सुधार लाने और लागत में कमी लाने पर बल दिया जा रहा है. पोषण एवं संतुलित आहार महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संवर्धन नीति के रूप में उभर रहे हैं. उन्नत पोषक गुणवत्ता वाले मूल समर्थित उत्पादों के विकास एवं प्रसंस्करण में और खाद्य गुणवत्ता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने एवं निगरानी करने में जैवप्रौद्योगिकी की एक महत्वपूर्ण भूमिका है.

अनुमान है कि यदि केवल 50 प्रतिशत भारतीय फसलों पर केवल 25 प्रतिशत रासायनिक उर्वरकों के बदले जैव उर्वरकों का उपयोग किया जाता तो संभावनाएं 2,35,000 एमटी की होती. आज लगभग 13,000 एमटी जैव उर्वरकों का उपयोग किया जा रहा है जो उपयोग में लाए जाने वाला कुल उरर्वक का केवल 0.36 प्रतिशत है.

जैवप्रौद्योगिकी में सहक्रिया के कुछ क्षेत्र निम्नानुसार हैं :-

मैरीटाइम संसाधन सहयोग : नॉवेल जीन्स एवं जीन उत्पादों-बायोपोलिमर, नॉवल एन्जाइम, नए थेरापेटिक लीड्स एवं अन्य मूल्य समर्थित उत्पादों जैसे ओस्मो-टॉलरेंट फसलों के रूप में समुद्र के आर्थिक जॉन की शायद ही कभी खोज की गई हो. समुद्री जीव भी प्रदूषण निगरानी एवं नॉवल उत्पादों के उत्पादन के लिए बायोरिएक्टर के रूप में अत्यधिक संभावनाएं देते हैं. इसके अतिरिक्त समुद्री माइक्रोब्स सहित गहरे समुद्री जीवों में मानव स्वास्थ्य के लिए व्यापक आशय निहित होते हैं. इन विविध क्षेत्रों में विशेषज्ञता अनेक एजेंसियों/संस्थाओं में छिन्न भिन्न है.

पर्यावरण :  पर्यावरणीय मामले सभी से जुड़े हैं. दुर्लभ एवं संकटापन्न टाक्सा के संरक्षण एवं निर्धारण, वनरोपण तथा रिफोरेस्टेशन सहित व्यापक विविध पर्यावरणीय मामलों पर लागू किए जाने के लिए जैवप्रौद्योगिकी में व्यापक संभावनाएं हैं. यह पर्यावरणीय प्रदूषण की त्वरित निगरानी करने, माइन स्पोइल डम्प्स जैवे विकृत स्थलों के पारिस्थितिक जीर्णोद्वार, उद्योगों (तेल रिफाइनरियों, डाइंग एवं वस्त्र एककों, कागज एवं लुगदी मिलों, टेनरी, पेस्टिसाइड एककों) द्वारा छोड़े गए एफ्लुएंट के शोधन, ठोस कूड़े के शोधन आदि में भी सहायता करता है. देश में अनेक प्रौद्योगिकियां सृजित एवं प्रदर्शित की गई हैं. असली चुनौती उन्हें उद्योग द्वारा अंगीकार करना है, जो किंचित असमान रही हैं. सामान्य रूप में कार्पोरेट समूह जैवप्रौद्योगिकियों को अंगीकार करने के लिए अतिउत्साही नहीं है, यहां तक कि उन क्षेत्रों में भी नहीं जिनमें ये प्रभावोत्पादक रही हैं.

औद्योगिक जैवप्रौद्योगिकी : इस समय, जैवप्रौद्योगिकी की एक तीसरी लहर-औद्योगिक जैवप्रौद्योगिकी का तीव्रता से विकास हो रहा है. औद्योगिक जैवप्रौद्योगिकी (श्वेत जैवप्रौद्योगिकी नाम से भी प्रसिद्ध) उपयोगी रासायनिक तत्वों के उत्पादन के लिए जैविकाय प्रणालियों का प्रयोग करती है. यह प्रौद्योगिकी मोलेक्यूलर आनुवंशिकी एवं मेटाबॉलिक इंजीनियरी के अग्रणी क्षेत्रों में नई महत्वपूर्ण खोजों के साथ संयुक्त रूप में बॉयोकेटालिसिस तथा फर्मंटेशन पर मुख्य रूप से आधारित है. यह नई प्रौद्योगिकी तथा कथित हरित रासायन विज्ञान जिसमें शर्करा (चीनी) एवं वनस्पति तेल जैसे नवीकरणीय संसाधन विविध रासायनिक पदार्थों जैसे फाइन एवं बल्क, रसायनों, भेषजविज्ञान, बॉयो-कलरेंट्स, सोल्वेनेंट्स, बॉयो-प्लास्टिक्स, विटामिनों, खाद्य योजकों, बायो-पेस्टिसाइड्स और जैव ईंधन जैसे बायो एथनॉल तथा बायो-डीजल में परिवर्तित हो जाते हैं आदि के एक मुख्य सहयोगी के रूप में विकसित हुई हैं.

चिकित्सा जैवप्रौद्योगिकी : आर्थिक विकास के लिए जनता का स्वस्थ होना अनिवार्य है. सम्पूर्ण रोगभार के लिए एचआईवी एड्स , क्षयरोग, मलेरिया, संक्रमण श्वसन रोग संक्रमण और हृदय एवं रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करने वाले पुराने रोग, तंत्रिका मनश्चििकित्सा रोग, मधुमेह और कैंसर आदि मुख्य सहयोगी हैंं. स्वास्थ्य प्रणाली की स्थानीय आवश्यकताओं के साथ प्रौद्योगिकी एवं उत्पादों का तालमेल होना और प्रौद्योगिकी को स्वास्थ्य प्रक्रियाओं में कारगर बनाना महत्वपूर्ण है.

पैथोजेल जीनोक्स तथा सबटाइप्स, संक्रामक चुनौतियों की वाहक प्रतिक्रियाओं, कनिष्ठकर्ताओं एवं रक्षात्मक रोग प्रतिरक्षा  के मोलेक्यूलर निर्धारकों के बारे में ज्ञानवर्धन और मूल बचाव प्रतिरक्षा की नव समझ प्रक्रिया तथा नए इम्यूनोजेन्स  का विकास के तरीके संक्रामक रोगों के टीकों के विकास का मार्गदर्शन करेंगे् नैदानिक परीक्षणों में अंतरणीय अनुसंधान एवं विविध उम्मीदवारों का तीव्रता से मूल्यांकन करने की क्षमता टीकों के विकास की गति बढ़ाने में सहायता कर सकती है.

एक सुदृढ़  फार्मेसी क्षेत्र, बढ़ती हुई अनेक लघु एवं मझली जैवप्रौद्योगिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और चिकित्सा स्कूलों के एक बड़े नेटवर्क की स्थापना तथा कम लागत के उत्पाद मूल्यांकन के लिए चिकित्सा जैवप्रौद्योगिकी भारतीय उद्योग को महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं. चिकित्सा जैवप्रौद्योगिकी क्षेत्र का, जैवप्रौद्योगिकी उद्योग टर्नओवर दो तिहाई भाग से अधिक वार्षिक योगदान है. भारतीय टीका उद्योग ने, सम्पूर्ण विकासशील विश्व के लिए कम लागत के टीकों के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभरकर भारतीय क्षमता को उजागर किया है.

जैव सूचना विज्ञान एवं आईटी सक्षम जैव प्रौद्योगिकी : जैव सूचना विज्ञान, जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उच्च अनुसंधान एवं विकास के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रमाणित सिद्ध हुआ है. जैव-सूचना विज्ञान नई औषधियों एवं टीकों जैसे नए उत्पादों संयंत्रों एवं विशिष्ट सम्पत्तियों, पेस्ट एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता, नए प्रोटीन मोलेक्यूल्स तथा जैविकीय सामग्रियों एवं सम्पत्तियों के विकास में लागत तथा समय में कमी लाने की प्रबल प्रत्याशाओं का धारक है. एक पूर्ण जीनोम अनुक्रम, माइक्रोस ऐरे से डाटा प्रोट्योमिक्स और टैक्सोनोमिक स्तर पर प्रजाति डाटा उपलब्ध होता है, इन डाटा बेस के एकीकरण के लिए परिष्कृत जैवसूचना विज्ञान साधन, अपेक्षित होता है. इन डाटा को उपयुक्त डाटा बेस में सुव्यवस्थित करना और इनका विश्लेषण करने के लिए उपयुक्त सॉफ्टवेयर साधनों का विकास करना बड़ी चुनौतियां होंगी. भारत कम लागत पर ऐसे संसाधनों को तैयार करने की क्षमता रखता है.

भारत में जैवसूचना विज्ञान का उपयोग, जीव विज्ञान में अनुसंधान को बढ़ावा देने, जैवसंसाधनों के संरक्षण तथा प्रबंधन की संभावनाओं को बढ़ाने, उत्पादों, प्रक्रियाओं तथा कच्चेमाल के मूल्यांकन बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों की योजना एवं निगरानी के लिए अपेक्षित कॉम्प्लेक्स डाटा के प्रबंधन तथा फार्मा और जैवप्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनुबंध सेवाओं एवं व्यवसाय आउटसोर्सिंग की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रभावी रूप से किया जा सकता है. जीवन विज्ञान मामलों को सुलझाने के लिए जैवसूचना विज्ञान का अधिकतम  उपयोग करने में ऐसी उपयुक्त कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञान समस्याओं का बनाना है जिन्हें आईटी साधनों के माध्यम से दूर किया जा सकता है.

भारत में जीवन विज्ञान के लिए जैवसूचना विज्ञान एक उभरता हुआ क्षेत्र है- बाजार का आकार अभी भी अत्यधिक सीमित है (प्रत्येक 20 मिलियन अमरीकी डॉलर से 100 बिलियन अमरीकी डॉलर के कई वर्टिकल्स) भारत रसायन विज्ञान एवं कम्प्यूटर विज्ञान, सॉफ्टवेयर, स्वास्थ्य परिचर्या और जीव विज्ञान में सशक्त है.

अंत में, जैवप्रौद्योगिकी प्रौद्योगिकीय परिवर्तन की ऐसी अगली लहर दे सकती है जो विलक्षण एवं आईटी द्वारा उत्पन्न लहर से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है. रोजग़ार सृजन, बौद्धिक सम्पदा सृजन, नवोद्यम अवसरों का विस्तार, औद्योगिक विकास में वृद्धि करना कुछ ऐसे अकाट्य तथ्य हैं, जो इस क्षेत्र के लिए एक संकेन्द्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता का समर्थन करते हैं.

एक विषय के रूप में जैवप्रौद्योगिकी का विकास तीव्रता से हुआ है और जहां तक इसमें रोजग़ार का संबंध है, यह एक तीव्र गति से विकासशील क्षेत्र बन गया है. रोजग़ार रिकार्ड दर्शाते हैं कि भविष्य में जैवप्रौद्योगिकी की व्यापक संभावनाएं हैं. जैवप्रौद्योगिकीविद्  भेषज कंपनियों, रासायनिक, कृषि एवं समवर्गी कंपनियों में कॅरिअर तलाश सकते हैं. वे जैव- प्रसंस्करण उद्योगों के नियोजन, उत्पादन तथा प्रबंधन-क्षेत्रों में सेवा में रखे जा सकते हैं. सरकारी तथा कॉर्पोरेट क्षेत्र द्वारा चालित अनुसंधान प्रयोगशालाओं में व्यापक रोज़गार हैं.

भारत में जैव प्रौद्योगिकी छात्र सरकारी संस्थाओं जैसे विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों में या निजी क्षेत्रों में अनुसंधान वैज्ञानिक/सहायकों के रूप में रोज़गार प्राप्त कर सकते हैं. इसके विकल्प के रूप में वे विशेषज्ञताप्राप्त जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों या जैव प्रौद्योगिकी से संबद्ध कंपनियों जैसे भेषज फर्मों, खाद्य विनिर्माताओं, एक्वा-कल्चर एवं कृषि कंपनियों में रोज़गार प्राप्त कर सकते हैं, जो जीवन विज्ञान से संबंधित उपस्करों से लेकर रसायनों, भेषज एवं नैदानिकी व्यवसाय से जुड़ी होती हैं. कार्य की संभावनाएं अनुसंधान विक्रय, विपणन, प्रशासन, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रजनन, तकनीकी समर्थन आदि क्षेत्र में हो सकती है.

एक अंतिम बिंदु के रूप में, जैवे प्रौद्योगिकी क्षेत्र भारत में एक ऐसा नवोदित एवं विकासशील क्षेत्र है, जिसमें असीम रोज़गार सृजन करने की संभावनाएं हैं. सरकार भारत का एक विश्व श्रेणी के जैव-विनिर्माणी हब के रूप में विकास करने के लिए अनुसंधान एवं विकास पर विशेष बल देते हुए मानव पंूजी एवं अवसंरचना के सृजन के लिए पर्याप्त रूप में निवेश कर रही है. लक्ष्य भारतीय जैव प्रौद्योगिकी जगत को वर्ष २०२५ तक १०० बिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य तक पहुंचाना है. वर्तमान में भारत का जैव प्रौद्योगिकी उद्योग विश्व बजार का २% भाग धारण करता है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है. इस क्षेत्र में विकास की प्रबल संभावनाएं निहित हैं और निवेशकों को यह क्षेत्र व्यापक अवसर देता है. भारत सरकार द्वारा मई २०१६ में घोषित राष्ट्रीय आईपीआर नीतिनव प्रवर्तन, अनुसंधान एवं विकास तथा उद्यमिता को बढ़ावा देने में सहायक होने के साथ-साथ आईपीआर शीघ्र भरने की प्रक्रियाएं भी निर्धारित करती है, जो इस क्षेत्र की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है.

डॉ. रणजीत मेहता पीएच.डी. चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रधान निदेशक है.
ई-मेल ranjeetmehta@gmail.com तथा सुश्री अंकिता रानी जैव प्रौद्योगिकी में अनुसंधानकर्ता हैं.) (लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)