संपादकीय लेख


वॉल्यूम 23, 8-14 सितंबर, 2018

 

रोज़गार सृजन में बैंकों की भूमिका

अनिल शर्मा

वाणिज्यिक बैंक और विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश में रोज़गार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं. भारत सरकार बैंकों की मदद से, ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों की आबादी के लिए रोज़गार सृजन के वास्ते कुछ बेहतरीन और महत्वपूर्ण नीतियां लागू कर रही है.

उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), ऋण से सम्बद्ध सब्सिडी कार्यक्रम है, जिसका कार्यान्वयन केंद्र के स्तर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय और खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग (के.वी.आई.सी.) तथा राज्य स्तर पर के.वी.आई.सी. निदेशालयों और खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड तथा जिला उद्योग केंद्रों द्वारा किया जा रहा है. इसका उद्देश्य परंपरागत कारीगरों और बेरोज़गार युवाओं को संगठित करते हुए सूक्ष्म उद्यमों की स्थापना के जरिए स्व-रोज़गार के अवसर पैदा करना है. इस कार्यक्रम के अंतर्गत चुने हुए बैंकों के माध्यम से लाभार्थियों/उद्यमियों को सरकारी सब्सिडी वितरित की जा रही है.

इसी प्रकार, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना (एसजीएसवाई), ग्रामीण निर्धनों के लिए एक प्रमुख स्वरोज़गार कार्यक्रम है, जो पंचायती राज संस्थानों और बैंकों की सक्रिय भूमिका के साथ जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों द्वारा लागू किया जा रहा है. इसके अंतर्गत लाभार्थियों को बैंक ऋण और सरकारी सब्सिडी के मिश्रित योगदान के जरिए आमदनी

पैदा करने वाली परिसंपत्तियां प्रदान की जाती हैं.

सूक्ष्म इकाई विकास और पुनर्वित्त एजेंसी लिमिटेड (मुद्रा) द्वारा सूक्ष्म उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है. मुद्रा के जरिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) के अंतर्गत आमदनी पैदा करने वाले सूक्ष्म उद्यमों के लिए 10 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है. इसके लिए समावेशी वित्तीय सहायता के रूप में प्राथमिक ऋणदाता संस्थानों को पुनर्वित्त प्रदान किया जाता है. इसके तहत प्रधानमंत्री जन-धन योजना (पीएमजेडीवाई) के अंतर्गत मंजूर 5000/- रुपये की ओवर ड्राफ्ट सुविधा भी प्रदान की जाती है.  31.03.2017 तक मुद्रा ने सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों, निजी क्षेत्र के 18 बैंकों, 31 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, 13 राज्य/शहरी सहकारी बैंकों, 73 सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों और 31 गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के साथ साझेदारी करते हुए वित्तीय वर्ष 2016-17 में 3525.94 करोड़ रुपये की पुनर्वित्त व्यवस्था की. इस कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2015-16 के दौरान  3783.20 करोड़ रुपये की पुनर्वित्त व्यवस्था की गई थी. देश में कृषि क्षेत्र सर्वाधिक रोज़गार के अवसर प्रदान करता है, जबकि सूक्ष्म, लघु और मध्यम क्षेत्र का रोज़गार सृजन के क्षेत्र में दूसरा स्थान है. इन दोनों क्षेत्रों को धन प्रदान करने में वाणिज्यिक बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस तरह वे रोज़गार सृजन में मदद करते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत में प्रचालित सभी वाणिज्यिक बैंकों के लिए प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण देने के अंतर्गत लक्ष्य और उप-लक्ष्य निर्धारित किए हैं. इन लक्ष्यों के अनुसार समायोजित निवल बैंक ऋण का 40 प्रतिशत अथवा असंतुलित तुलनपत्रक की ऋण समकक्ष राशि, इनमें जो भी अधिक हो, वह निम्नांकित अनुसार प्राथमिकता क्षेत्र को उधार दी जानी चाहिए:

(i) समायोजित निवल बैंक ऋण का 18 प्रतिशत अथवा असंतुलित तुलनपत्रक की समकक्ष राशि, इनमें जो भी अधिक हो, वह कृषि क्षेत्र के लिए निर्धारित की गई है. कृषि क्षेत्र की 18 प्रतिशत लक्षित राशि में से समायोजित निवल बैंक ऋण का 8 प्रतिशत अथवा असंतुलित तुलनपत्रक की ऋण समकक्ष राशि, इनमें जो भी अधिक हो, वह लघु और

सीमांत किसानों के लिए निर्धारित की गई है.

(ii) समायोजित निवल बैंक ऋण का 7.5 प्रतिशत अथवा असंतुलित तुलनपत्रक की समकक्ष राशि, इनमें जो भी अधिक हो, वह सूक्ष्म उद्यमों के लिए निर्धारित

की गई है.

(iiii)  समायोजित निवल बैंक ऋण का 10 प्रतिशत अथवा असंतुलित तुलनपत्रक की समकक्ष राशि, इनमें जो भी अधिक हो, वह

समाज के कमजोर वर्गों को अग्रिम देने के लिए निर्धारित की गई है.

व्यक्तियों और स्वयं सहायता समूहों/संयुक्त देयता समूहों के सदस्यों को सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों द्वारा दिए जाने वाले बैंक ऋणों को भी निम्नांकित शर्तों के अधीन सम्बद्ध श्रेणियों अर्थात् कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम तथा अन्यके अंतर्गत परोक्ष वित्त के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

 

 

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की वर्तमान स्थिति*

           

गतिविधि

अनुमानित संख्याओं की संख्या

हिस्सा

श्रेणी

(लाखों में)

प्रतिशत

 

ग्रामीण

शहरी

कुल

 

विनिर्माण

114.14

8250

196.65

31

व्यापार

108.71

121.64

230.35

36

अन्य सेवाएं

102.00

104.85

206.85

33

बिजली *

0.03

0.01

0.03

0

सभी

324.88

309

633.88

100

सूक्षम,लघु और  मध्य उद्योगों में रोज़गार

बोर्ड गतिविधि श्रेणी

 

रोजगार (लाखों में)

 

हिस्सा

 

 

प्रतिशत

 

ग्रामीण

शहरी

कुल

   

विनिर्माण

186.56

173.86

360.41

32

व्यापार

160.64

226.54

387.18

35

अन्य सेवाएं

150.53

211.69

362.22

33

बिजली *

0.06

0.02

0.07

0

सभी

497.78

612.1

1109.89

100

एमएसएमई सेगमेंट में क्रेडिट एक्सपोजर (लाख करोड़ रुपये) *

अवधि

अती लघू 10 लाख

सूक्ष्म1 10-50 लाख

सूक्ष्म2 50 लाख -1 करोड़

लघु और मध्य-1 ऊधम -1-5 करोड़

लघु और मध्य-2 ऊधम 5-10 करोड़

सूक्ष्म लघु और मध्य ऊधम 10 करोड़ तक

 दिसंबर 15

0.58

1.29

0.8

2.66

1.57

6 94

मार्च 16

0.55

1.32

0.87

2.79

1.67

7.19

जून 16

0.56

1.39

0.93

2.98

1.76

7.63

सितंबर 16

0.58

1.46

0.97

3.06

1.79

7.85

दिसंबर 16

0.56

1.42

0.95

3.06

1.81

780

मार्च 17

0.58

1.49

1.01

3.22

1.87

8.16

जून 17

0.64

1.57

1.06

3.36

1..93

8.56

सितंबर 17

0.67

1.60

1.07

3.38

1.92

8.63

दिसंबर 17

0.74

1.66

1.10

3.44

1.92

886

वर्ष-दर-वर्ष क्रेडिट विकास दिसंबर 16-दिसंबर 17

31.90%

17.10%

15.60%

12.50%

6%

13.70%

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                       

 

 

* वर्ष 2015-16 की अवधि में आयोजित किया गया राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) का 73वां दौर

उपरोक्त तालिकाओं से यह देखा जा सकता है कि मध्यम उद्यम क्षेत्र के लिए बैंकों द्वारा की गई वित्तीय व्यवस्था ने इन उद्यमों के पालन पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और उनसे रोज़गार के बेहतर अवसर पैदा हुए हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एक अन्य प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर बढ़ाने का रहा है, जिसके लिए उन्होंने ग्रामीण स्वरोज़गार प्रशिक्षण संस्थानों में भागीदारी अदा की है. यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक पहल है. इसका उद्देश्य देश के प्रत्येक जिले में एक समर्पित ढांचा कायम करना है, जिसके माध्यम से ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण एवं कौशल का उन्नयन किया जा सके और उनमें उद्यमशीलता विकसित की जा सके. ग्रामीण स्वरोज़गार प्रशिक्षण संस्थानों का प्रबंधन बैंकों द्वारा किया जाता है, जिसमें भारत सरकार और राज्य सरकारों का सक्रिय सहयोग मिलता है. इस कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:-

1.ग्रामीण बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) युवाओं की पहचान करना और उन्हें स्वरोज़गार के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना.

2.उनकी अभिरुचि का मूल्यांकन करने के बाद उन्हें खास व्यवसायों में प्रशिक्षण प्रदान करना.

3.बैंकों के साथ ऋण सुविधा सुनिश्चित करते हुए उनकी मदद करना. तथा

4.स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए कम से कम दो वर्ष तक अभिरक्षा सेवाएं प्रदान करना.

ग्रामीण स्वरोज़गार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई) कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण हेतु कवर किए जाने वाले कुछ क्षेत्रों में बागवानी, रेशम कीटपालन, डेरी उद्योग, मुर्गीपालन, सूअर पालन, मशरूम की खेती, भेड़पालन, औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती, मधुमक्खी पालन, इलेक्ट्रिक मोटर रीवाइंडिंग और पंप सेट रख-रखाव, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स की सर्विसिंग, ट्रेक्टर मरम्मत, दुपहिया वाहन मरम्मत, ब्यूटी पार्लर प्रबंधन, डिजिटल डिजाइनिंग और पब्लिकेशन (डीटीपी), सिलाई मशीन मरम्मत और रख-रखाव, हाथ की कढ़ाई, खाद्य प्रसंस्करण और बेकरी उत्पाद, ड्रेस डिजाइनिंग, अगरबत्ती निर्माण, पटसन उत्पाद विनिर्माण, पेपर बैग, लिफाफे और फाइलें बनाना, कम्प्यूटरीकृत वित्तीय लेखा, डाटा एंट्री ऑपरेशन आदि शामिल हैं.

आज दिनांक तक 587 आरईएसटीआई प्रचालन में हैं और 35 बैंक इस कार्यक्रम में योगदान कर रहे हैं. इन संस्थानों ने 24,58,298 ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया है तथा उनमें से 16,12,310 को लाभप्रद रोज़गार दिया गया है. इन युवाओं को 342.75 करोड़ रुपये संवितरित किए गए हैं.

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, अधिनियम 1976 के अंतर्गत क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबीज़) की स्थापना राज्य प्रायोजित संगठनों, स्थानीय रूप में आधारित और ग्रामीण उन्मुखी संस्थानों के रूप में की गई. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के स्वामित्व में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और प्रायोजितकर्ता बैंक (कोई भी वाणिज्यिक बैंक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को प्रायोजित कर सकता है) की हिस्सेदारी क्रमश: 50 प्रतिशत, 15 प्रतिशत और 35 प्रतिशत है.

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का उद्देश्य लघु और सीमांत किसानों, कृषि श्रमिकों, आबादी के सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की ऋण संबंधी जरूरतें पूरी करना है, ताकि कृषि, व्यापार, वाणिज्य, उद्योग तथा अन्य उत्पादक गतिविधियों का विकास किया जा सके. 31 मार्च, 2014 को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या 57 थी और उस तारीख तक ये बैंक 642 जिलों में 19082 शाखाओं (पिछले वर्ष के दौरान

17861 शाखाएं) के नेटवर्क के साथ प्रचालित थे. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की 75 प्रतिशत शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में थीं.

31 मार्च, 2014 को 20 राज्यों में 38 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को 2173.43 करोड़ रुपये जारी किए गए. जारी की गई राशि में भारत सरकार के योगदान के रूप में 1086.70 करोड़ रुपये, राज्य सरकार के योगदान के रूप में 326.04 करोड़ रुपये और प्रायोजितकर्ता बैंक के योगदान के रूप में 760.69 करोड़ रुपये शामिल थे.

31 मार्च, 2014 को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की बकाया ऋण राशि 1,59,302 करोड़ रुपये थी तथा 31 मार्च, 2014 को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के बकाया ऋणों में प्राथमिकता क्षेत्र के ऋणों की हिस्सेदारी 81.74 करोड़ रुपये थी और 31 मार्च, 2014 तक कृषि क्षेत्र के ऋणों की हिस्सेदारी 56.68 प्रतिशत थी.

इन प्रयासों के अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, अलग अलग बैंकों द्वारा भी विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए सामाजिक बैंकिंग के क्षेत्र में साझा प्रयास किए जा रहे हैं. यूको बैंक के  सामाजिक एवं वित्तीय उत्थान के दो बेजोड़ कार्यक्रम हैं अर्थात् यूको उत्थान स्कीम और यूको समग्र ग्रामीण विकास योजना. पहले कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे गांवों को बैंक द्वारा अपनी निकटतम शाखा के माध्यम से गोद लिया जाता है, जहां गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारों की संख्या बहुत अधिक हो, ताकि गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को गरीबी से निजात दिलाई जा सके. बैंक ने 10 राज्यों में 31 गांवों को गोद लिया है और इन प्रयासों के जरिए 6568 बीपीएल परिवारों को बैंक द्वारा ऋण सहायता प्रदान की गई ताकि वे अगले 4 वर्षों के दौरान अपनी आजीविका को बेहतर बना सकें. यूको समग्र ग्रामीण विकास योजना के अंतर्गत बैंक ने 6 राज्यों में 10 गांवों को गोद लिया है ताकि उनका चहुंमुखी विकास किया जा सके. वित्तीय सहायता के अंतर्गत बैंक ने छोटे व्यापारियों को सामान्य के्रडिट कार्ड, कारीगरों को कारीगर क्रेडिट कार्ड और महिलाओं सहित ग्रामीण लोगों को पशुपालन के लिए ऋण प्रदान किए हैं.