संपादकीय लेख


Editorial Volume-25

भारत में अंतरिक्ष उद्योग
का क्षेत्र और भावी प्रवृत्तियां

मनीषा अग्रवाल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा 8 सितंबर, 2016 को भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है, जिससे भारत भारी उपग्रह छोडऩे में पूरी तरह सक्षम हो गया है। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से यह सातवां सफल प्रक्षेपण था और साथ ही स्वदेश में निर्मित रॉकेट की यह लगातार तीसरी उड़ान थी। स्वदेशी रॉकेट से की गई यह ऐसी प्रथम प्रक्षेपण उड़ान थी, जिसे आधिकारिक रूप में ऑपरेशनलयानी व्यावहारिकसमझा गया। इससे पहले की उड़ानों को विकासात्मकनाम दिया गया था। जीएसएलवी मार्क-2 ने एक अत्याधुनिक मौसम उपग्रह, इन्सेट 3डीआर को प्रक्षेपित किया, जिसका भार करीब 2211 किलोग्राम है।

इसरो ने अब जीएसएलवी मार्क-3 पर काम करना शुरू कर दिया है, जिसकी मदद से 4 टन तक के भारी उपग्रहों को प्रक्षेपित किया जा सकेगा। इसका इस्तेमाल भारत के अगले चन्द्र अभियान-चन्द्रायन-2 के लिए भी किया जाएगा। भारत ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) का इस्तेमाल पहले से कर रहा है, जिसका भार 2 टन से भी कम है। पीएसएलवी लगातार 30 से अधिक सफल उड़ानें भर चुका है।

जीएसएलवी से अभी तक मात्र 10 प्रक्षेपण किए गए हैं, इनमें से 6 रूसी क्रायोजेनिक इंजनों से और 4 देश में विकसित क्रायोजेनिक इंजनों से किए गए। इनमें से केवल 4 उड़ानें सफल रही हैं, जबकि 1 उड़ान आंशिक रूप से सफल थी। रॉकेटों का क्रायोजेनिक प्रोपल्शन (प्रणोदन) तकनीकी दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होता है परंतु कार्यनीतिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। इससे रॉकेटों को भारी पेलोड्स सक्षमतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाने में मदद मिलती है। यह किसी भी मजबूत अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता की कुंजी है और किसी अंतरिक्ष एजेंसी को वाणिज्यिक दृष्टि से सक्षम बनाने का मूल मंत्र है। यह महत्वपूर्ण इंजन प्रौद्योगिकी केवल गिने-चुने देशों के पास उपलब्ध है।

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम विश्व के सर्वाधिक कम लागत वाले कार्यक्रमों में से एक है। इसरो ने अपनी अंतरिक्ष परियोजनाओं के जरिए मदद करने के लिए 33 देशों और 3 बहुराष्ट्रीय निकायों के साथ औपचारिक समझौते किए हैं, और करीब 30 अंतरिक्षयानों को विभिन्न कक्षीय मार्गों पर स्थापित किया है। इसके अलावा अभी तक इसरो 20 राष्ट्रों के लिए 51 उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है और बड़ी तेजी के साथ विश्व के प्रक्षेपण स्थल (लांच पैड) के रूप में उभर रहा है।

इसरो के पास एक तारामंडल है, जिसमें 10 भू-पर्यवेक्षण उपग्रह, 9 संचार उपग्रह, 1 मौसम विज्ञान उपग्रह, और एक वैज्ञानिक उपग्रह शामिल है। कारगर प्रौद्योगिकियों के विकास और अंतर-ग्रहीय अन्वेषण मिशनों के प्रमुख संगठन के रूप में इसरो कई अन्य प्रचालनगत मिशनों की योजना बना रहा है और उपग्रह संचालन जैसे क्षेत्रों में अपना प्रभाव कायम कर रहा है।

भारत में अंतरिक्ष उद्योग

भारत ने 2004 में मंगल के लिए अंतरिक्ष यान भेजा था, तब से भारत अंतरिक्ष की सैर करने वाले दुनिया के उच्च कोटि के देशों (जैसे अमरीका, यूरोप, रूस, चीन और जापान) में शामिल हो गया है। भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र को मोटे-तौर पर अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम उद्योगों की 2  श्रेणियों में रखा जा सकता है। अपस्ट्रीम उद्योगों में उपग्रहों, उनके हिस्से पुर्जों और उप-प्रणालियों एवं प्रक्षेपण यानों का विनिर्माण शामिल है। डाउनस्ट्रीम उद्योगों में उपग्रह आधारित सेवाएं जैसे उपग्रह टेलीविजन, संचार, इमेजनरी आदि शामिल है।

भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र पर अभी तक केवल सरकारी कंपनियों/एजेंसियों का अधिकार है। वाणिज्यिक उद्योग केवल उपग्रहों के लिए हिस्से पुर्जों की आपूर्ति करते हैं अथवा उप-प्रणालियों का विनिर्माण करते हैं। इनमें से कुछ उद्योग सरकार के अंतरिक्ष ढांचे का इस्तेमाल करते हैं ताकि अपने ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कर सकें। अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले अत्याधुनिक देशों में अनेक ऐसे ब्लॉक हैं, जिन्हें नियंत्रणमुक्त और निजीकृत किया जा चुका है, ताकि एक मूल्य शृंखला का निर्माण किया जा सके और अर्थव्यवस्था में प्रमुख योगदान किया जा सके। सरकार अब मेक इन इंडियाके माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है। इसे देखते हुए इस बात की प्रबल संभावना है कि भारत में भी अंतरिक्ष उद्योग की प्रणाली में निजी क्षेत्र को शामिल किया जाएगा।

यह उम्मीद की जा रही है कि भारत में अंतरिक्ष उद्योग निम्नांकित रूपों में मददगार हो सकता है :-

त्र्      भारत की विदेश नीति में मददगार हो सकता है क्योंकि हमारी अंतरिक्ष क्षमताएं नए अंतर्राष्ट्रीय संबंध कायम करने के हमारे प्रयासों का हिस्सा बन सकती हैं।

*कर दाताओं के धन को विदेशी हाथों में जाने से रोका जा सकता है, जिनसे हमें टर्नकी उत्पाद एवं सेवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

*विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए अधिक अवसर जुटाए जा सकते हैं और साथ ही उच्च प्रशिक्षित श्रम बाजार के लिए नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से सुसज्जित करके भारत की रक्षा प्रणाली को मजबूत बनाया जा सकता है और सशस्त्र सेनाओं को रक्षा उत्पाद एवं सेवाएं देश में ही विकसित करने में मदद की जा सकती है, और

*भारत से प्रतिभा पलायन को रोका जा सकता है। 2013 में वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग का कारोबार 31417 अरब अमरीकी डॉलर का अंाका गया था। भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में हालांकि इसरो (जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत कार्य करता है), की प्रधानता है, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में देश अंतरिक्ष गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने जा रहा है। इसका कारण यह है कि भारत लागत की दृष्टि से किफायती, सक्षम एवं नवीन प्रौद्योगिकियां अपना रहा है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए कुछ छोटे स्टार्ट-अप्स की पहल :-

भारत का अंतरिक्ष एसएमई क्षेत्र मात्र 48 करोड़ अमरीकी डॉलर मूल्य का है, परंतु इसका तीव्र गति से विस्तार होने की संभावना है। अंतरिक्ष संबंधी कुछ भारतीय स्टार्ट-अप्स, जिन्होंने बाजार में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है, इस प्रकार हैं :-

*ध्रुव स्पेस नाम का एक छोटा उपग्रह डिवेलेपर है, जिसने पिछले वर्ष बर्लिन स्पेस टेक्नोलोजीज़ नाम की एक जर्मन कंपनी के साथ समझौता किया, ताकि गैर-दूरसंचार  वाणिज्यिक अनुप्रयोगों, जैसे आपदा प्रबंधन, वाहन एवं उड़ान का पता लगाने, भविष्यवाणी विषयक विश्लेषण करने और चित्र लेने (इमेजिंग), के लिए भारत की प्रथम उपग्रह विनिर्माण फैक्टरी लगाई जा सके। इसका लक्ष्य हर वर्ष 10 से 12 उपग्रहों का विनिर्माण करना है।

*टीम इंडिया, एक एरोस्पेस स्टार्टअप है, जिसने लैंंिडंग माइलस्टोनश्रेणी में गूगल, लूनर, एक्सप्राइज प्रतियोगिता में 10 लाख डॉलर का पुरस्कार जीता। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली यह एकमात्र भारतीय टीम थी, जिसमें विभिन्न टीमों को दिसंबर, 2016 तक एक रोबोट चांद पर उतारना था।

*एनियारा स्पेस ने जुलाई 2014 में ब्रिटेन की दोरिया एरोस्पेस के साथ उपग्रह खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए ताकि प्रसारणों के लिए दो छोटे भू-स्थिर वाणिज्यिक उपग्रह विकसित किए जा सकें।

*अर्थ-2 ऑर्बिट भारत का प्रथम अंतरिक्ष स्टार्टअप है, जो भू-पर्यवेक्षण उत्पाद उपलब्ध कराता है और विभिन्न कंपनियों को प्रक्षेपण सुविधा सेवाएं प्रदान करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास डिजाइन-उन्मुखी विनिर्माण, एरोस्पेस, और एम्बेडिड साफ्टवेयर का अनुभव है, जो उसे निजी अंतरिक्ष उद्योगों के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने में मदद पहुंचा सकता है।

जून 22, 2016 को भारत ने 20 उपग्रह (जिनमें 17 विदेशी उपग्रह शामिल थे) एक साथ धरती की कक्षा में छोड़े। इसरो के लिए यह एक कीर्तिमान था, जिसने भारत को विश्व में रूस (जिसने 2014 में एक दिन में 33 उपग्रह छोड़े थे) और अमरीका (जिसने 2013 में एक दिन में 29 उपग्रह छोड़े थे), के बाद तीसरा स्थान दिलाया। वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों को निजी कंपनियों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जो उपग्रहों के निर्माण को बढ़ावा दे रहे हैं और ऐसे मानव रहित रॉकेट इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें फिर से काम में लाया जा सके।  इससे उपग्रहों के प्रक्षेपण और उनके विनिर्माण में लागत कम आएगी और समय की भी बचत होगी।

उदाहरण के लिए ध्रुव स्पेस का अनुमान है कि वह 10 से 100 किलोग्राम तक भार वाला उपग्रह मात्र 3 करोड़ रुपये की लागत में बना सकता है। ऐसा उपग्रह विकसित करने में इसरो को करीब 200 से 300 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यह कंपनी टैक्सी संचालकों, बड़ी आईटी कंपनियों और बड़ी डेटा कंपनियों के साथ विदेशी साझेदारी करने की भी प्रक्रिया में है, जिन्हें अपने सिविलियन और वाणिज्यिक उद्यमों में मदद के लिए उपग्रहों की आवश्यकता पड़ती है।

प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनियां निम्नांकित क्षेत्रों में योगदान कर सकती हैं:-

*जहाजों की स्वचालित पहचान (एआईएस)

*महिला सुरक्षा

*प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन

*टेलीमेडिसिन

*टेली एजुकेशन

*बाढ़ प्रबंधन के लिए दूरसंवेदन।

घरेलू बाजार में उत्पादन लागत कम होना उन भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स के लिए एक लाभप्रद स्थिति है, जो अधिक आकर्षक विदेशी बाजारों में प्रवेश की योजना बना रहे हैं।

भारत के प्राइवेट अंतरिक्ष उद्योग, जो अभी सुप्तावस्था में हंै, को बढ़ावा देने में सक्रिय योगदान करने के लिए सरकार एक राष्ट्रीय विधायी फ्रेमवर्क और केंद्रीय अंतरिक्ष नीति विकसित करने की प्रक्रिया में है, ताकि सरकारी-निजी साझेदारियां सक्षम बनाई जा सकें,, निजी गतिविधियों  की अनुमति दी जा सके, जोखिम कम किया जा सके और बाहरी अंतरिक्ष संधि के, जिसका भारत एक सदस्य है, के अनुसार बीमा का प्रावधान किया जा सके।

भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के समक्ष चुनौतियां

भारत के अंतरिक्ष प्रयास समस्याओं से मुक्त नहीं हैं। एक तरफ अमरीका भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के साथ सहयोग बढ़ाने का इच्छुक है, वहीं दूसरी तरफ अमरीका की प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनियां अमरीकी उपग्रहों को कक्षा में छोड़े जाने के लिए इसरो के कम लागत वाले प्रक्षेपण वाहनों का इस्तेमाल किए जाने का विरोध कर रही हैं। उनके अनुसार उनके लिए इसरो के साथ प्रतिस्पर्धा करना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि इसे भारत सरकार सहायता प्रदान करती है।

अतीत में पृथ्वी की कक्षा से नीचे आए एक भारतीय उपग्रह का मलबा जापान में एक मत्स्य गांव में गिर जाने से बड़ा विवाद खड़ा हो गया था, जिसने अंतर्राष्ट्रीय विवाद का रूप ले लिया था। भारत को, अंतरिक्ष उपकरणों से क्षति पहुंचने की स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय देयता संबंधी 1972 के समझौते के तहत निर्धारित क्षतिपूर्ति करनी होगी। राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून और नीति के अभाव में भारत के लिए यह निर्धारित करना बड़ा मुश्किल है कि कितनी मात्रा में हर्जाना दिया जाए।

वर्तमान में भारत की अंतरिक्ष गतिविधियां मुख्य रूप से 2000 की उपग्रह संचार नीति और 2011 की दूरसंवेदन डेटा नीति द्वारा संचालित हैं। प्रणालीगत त्रुटियों को महसूस करते हुए भारत ने अंतत: स्वयं का अंतरिक्ष अधिनियम बनाने का निर्णय किया, जिससे सरकार को उन वस्तुओं से उत्पन्न कानूनी मुद्दों से निपटने में मदद मिलेगी, जो हम अंतरिक्ष में भेजते हैं अथवा उन चीजों से या उनके कारण जो घटनाएं घटती हैं।

भारत में अंतरिक्ष उद्योग में बदलाव

पिछले 2 वर्षों में भारत के अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह पर पहुंचे, एक मिनी अंतरिक्ष शटल को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया और इसरो ने नेवीगेशन सिस्टम पर आधारित क्लासिक स्वदेशी उपग्रह का शुभारंभ किया। इस वर्ष के अंत तक इसरो एक बेजोड़ दक्षिण एशिया उपग्रह (जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं परिकल्पना की है), प्रक्षेपित करने जा रहा है, जो दक्षिण एशिया के पड़ोसियों के लिए एक मैत्रीपूर्ण संचार उपग्रह होगा। भारत ने अपनी प्रथम राष्ट्रीय वेधशाला एस्ट्रोसेट का भी सफल प्रक्षेपण किया है। भारत देश के रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों में अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर रहा है।

नाविक (नेवीगेशन विद इंडियन कंस्टेलेशन) के अंतर्गत इसरो के 7 उपग्रह कक्षा में हैं, जो समूचे भारतीय क्षेत्र में रात के समय नौवहन संकेत प्रदान करते हैं। इसरो के मिशनों और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कई अन्य अनुप्रयोगों जैसे संचार, प्रसारण, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के सर्वेक्षण, पर्यावरण निगरानी और आपदाओं की भविष्यवाणी के लिए भी किया जा रहा है। भारत की रक्षानीति में भी बड़ा बदलाव आया है और हवाई, भूमि और समुद्री सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अंतरिक्ष पर नियंत्रण का महत्व भी उजागर हुआ है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब परिपक्व होता जा रहा है। इसे देखते हुए उच्च कोटि के कॉलेज (आईआईटीज़) डीआरडीओ, एचएएल और इसरो के साथ मिल कर प्रभावकारी अनुसंधान में लगे हैं। अनेक कंपनियों ने भारत में अपने इंजीनियरी केंद्र स्थापित किए हैं और वर्तमान केंद्रों का विस्तार किया है, जिससे अंतरिक्ष उद्योग में निश्चित रूप से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे

 

(लेखिका एक स्तंभकार हैं और इसरो में अनुसंधान फेलो हैं। (ईमेल: manisagraawal2106@gmail.com)