संपादकीय लेख


Editorial Volume-30

प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में रोज़गार की संभावनाएं

डॉ. एस. पी. शर्मा

प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग ने देश में स्व-रोजगार के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। पीएचडी चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंड्स्ट्री द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के सक्रिय प्रत्यक्ष विक्रेताओं की संख्या 2013-14 में 43,83,487 थी, जो 2014-15 में बढ़़ कर 49,09,505 पर पहुंच गई। इसमें 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। उपभोक्ता मामले मंत्रालय, भारत सरकार ने हाल ही में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों को नीतिपरक रूप देने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो भारत में प्रत्यक्ष बिक्री करने वाली संस्थाओं और प्रत्यक्ष बिक्री उत्पादों के उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

प्रत्यक्ष बिक्री का अर्थ है, ईंट और मसाले से निर्मित नियत स्टोर से अलग हट कर आमने-सामने सामान बेचना। प्रत्यक्ष बिक्री में गृह बिक्री स्थितियां शामिल हैं, जैसे घर-घर जाकर सामान खरीदने का अनुरोध करना, बातचीत के लिए पहले से समय लेना, किसी के हवाले से मिलना और उत्पाद बिक्री दल बना कर सामान बेचना। इनमें सामान सूची तैयार करना और इंटरनेट के जरिए सूचना संप्रेषण भी शामिल है। प्रत्यक्ष बिक्री सबसे पुरानी बिक्री पद्धतियों में से एक है और यह परंपरागत खुदरा मॉडल की उपभोक्ता वस्तुओं से मिलती-जुलती है। डिजाइन की दृष्टि से प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियां विज्ञापन की बजाए अपने बिक्री प्रतिनिधियों के दल के बिक्री कौशल पर अधिक निर्भर करती हैं। प्रत्यक्ष बिक्री करने वाले लोग आमतौर पर स्वतंत्र ठेकेदार होते हैं, वे कंपनी के कर्मचारी नहीं होते। प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियां सभी पृष्ठभूमियों, अनुभव स्तर और व्यक्तिगत विशेषताएं रखने वाले व्यक्तियों को अपने कारोबार में शामिल करती हैं। स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष बिक्री वित्तीय और मानवीय दोनों ही संदर्भों में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक गतिविधि है।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री रामविलास पासवान ने हाल ही में बताया कि प्रत्यक्ष बिक्री के बारे में आदर्श दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं और उन्हें कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को भेजा गया है। इन दिशा-निर्देशों में यह व्यवस्था है कि राज्य सरकारें प्रत्यक्ष बिक्रेता, प्रत्यक्ष बिक्री संस्थाओं की गतिविधियों पर निगरानी/देखरेख के लिए एक व्यवस्था कायम करेंगी, ताकि प्रत्यक्ष बिक्री संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुपालन की स्थिति का पता लगाया जा सके। प्रत्यक्ष बिक्री गतिविधियां संचालित करने वाली कोई भी प्रत्यक्ष बिक्री संस्था 90 दिन के भीतर उपभोक्ता मामले विभाग को एक वचनपत्र प्रस्तुत करेगी, जिसमें दिशा-निर्देशों के अनुपालन का वायदा किया जाएगा और संस्था अपने अधिनिगमन का ब्यौरा भी उपलब्ध कराएगी। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार ‘‘प्रत्यक्ष बिक्री का अर्थ है - वस्तुओं का विपणन, वितरण और बिक्री अथवा एक पिरामिड कार्यक्रम से भिन्न प्रत्यक्ष बिक्री नेटवर्क के हिस्से के रूप में सेवाएं प्रदान करना।’’

इन दिशा-निर्देशों में प्रत्यक्ष बिक्री व्यापार स्थापित करने की शर्तें तय की गई हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि ऐसी संस्था को एक पंजीकृत वैधानिक इकाई होना चाहिए। इन दिशा-निर्देशों में एजेंटों से कोई प्रवेश शुल्क वसूल न करने अथवा बेची गई वस्तुओं को वापस खरीदने के लिए उन्हें बाध्य न करने का भी प्रावधान है।

प्रत्यक्ष बिक्री के प्रमुख माध्यमों में घर पर जाकर आमने-सामने सामान बेचना, कार्य स्थल पर सामान बेचना, उपभोक्ता के घर पर बिक्री दल के रूप में जाना, और किसी कार्यस्थल, गिरजाघर या अन्य स्थान पर बिक्री दल के रूप में पहुंचना शामिल है। डीएसओ यानी डायरेक्ट सेलिंग आर्गेनाइजेशन्स (अर्थात् प्रत्यक्ष बिक्री संगठन) दो प्रकार का ढांचा इस्तेमाल कर सकते हैं, जो बहु-स्तरीय और एकल स्तरीय हो सकता है। बहु-स्तरीय संगठन (जिन्हें नेटवर्क विपणन संगठन भी कहा जाता है) में प्रत्यक्ष बिक्री विशेषज्ञ अन्य प्रत्यक्ष बिक्री प्रतिनिधियों को भर्ती करते हैं, उन्हें प्रशिक्षित करते हैं और अपनी देखरेख में संगठन का हिस्सा बनाते हैं। बदले में भर्ती करने वाले बिक्री प्रतिनिधियों को संगठन के सदस्यों की बिक्री और स्वयं की बिक्री पर कमीशन मिलता है। एकल स्तरीय संगठन में बिक्री प्रतिनिधि भर्ती और प्रशिक्षण के जरिए स्वयं का संगठन खड़ा नहीं करते हैं, बल्कि स्वयं के बिक्री प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और स्वयं की बिक्री के आधार पर कमीशन हासिल करते हैं।

प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों की शुरुआत 18वीं सदी के उत्तरार्ध में अमरीका में हुई, जब विभिन्न प्रकार के उत्पाद सीधे अंतिम उपभोक्ताओं को बेचने के लिए कंपनियों का गठन किया गया। एवॉन, जो आज सबसे बड़ी प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों में से एक है, की स्थापना 1886 में हुई थी। इसका उद्देश्य शुरू में महिलाओं को धन कमाने और घर से बाहर निकल कर काम करने का अवसर प्रदान करना था। 1920 तक इसका राजस्व दस लाख अमरीकी डॉलर पर पहुंच गया था। 1920 के दशक के मध्य में प्रत्यक्ष वार्षिक बिक्री 300-500 मिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य की होने लगी थी। 1920 के दशक और 1930 के दशक में अमरीका में वैश्विक बाजार के विकास के साथ विपणन और वितरण लागत के नियमन की आवश्यकता और प्रौद्योगिकी के अभाव में कुछ उत्पादों के प्रदर्शन की आवश्यकता महसूस की गई। 1970 और 1990 के बीच की अवधि में, प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में महत्वपूर्ण बदलाव आया। इस उद्योग की शुरुआत प्रत्यक्ष बिक्री चैनल के जरिए प्रसाधन सामग्री और घरेलू उपकरणों की बिक्री के साथ हुई थी, परंतु 1970 के बाद अनेक प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों ने अपने उत्पाद पोर्टफोलियो में विविधता लाने और उत्पादों की संख्या बढ़ाने के प्रयास किए। इनमें घरेलू सामान, भोजन और स्वास्थ्य संबंधी उत्पाद शामिल किए गए। इस अवधि में प्रौद्योगिकी में सुधार भी आया। कई नई विपणन तकनीकों और कार्यनीतियों का विकास किया गया तथा नए वितरण और खुदरा चैनल विकसित हुए। परिणाम स्वरूप प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों ने इन प्रौद्योगिकी विषयक आविष्कारों से लाभ उठाने के लिए अपनी कार्यनीतियों में संशोधन किया। महिलाएं इस उद्योग का प्रमुख हिस्सा बन गईं। ऐसी युवतियां, जिनके लिए पूर्णकालिक रोजगार का विकल्प अपनाना कठिन था, वे और उनके परिवार प्रत्यक्ष बिक्री कार्यदल में शामिल हो गए। इससे उन्हें अपने परिवारों को सहायता करने का अवसर भी मिला।

भारत में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग की शुरुआत कम निवेश वाले उद्यम अवसर के रूप में हुई। इसमें ऐसे व्यक्तियों के लिए उद्यमशीलता के अवसर उपलब्ध हुए, जो स्वयं के स्थान से और स्वयं की शर्तों पर अपना व्यापार स्थापित करना चाहते थे। पिछले वर्षों में यह देखा गया है कि प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में मुक्त उद्यम प्रणाली, शुरुआत करने में कम लागत, न्यूनतम जोखिम, पूरक आय अर्जित करने के अवसर, प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम, आदि फायदों को देखते हुए बड़ी संख्या में लोग इस उद्योग के साथ जुड़ते गए हैं।

पिछले वर्षों में प्रत्यक्ष बिक्री की धारणा लोकप्रिय होती गई है, क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष विक्रेता द्वारा उपभोक्ताओं को उनके घरों, कार्यस्थल पर या खुदरा बिक्री के स्थान से भिन्न स्थान पर उत्पादों के प्रदर्शन के जरिए सीधे उत्पाद का प्रथम अनुभव कराने की क्षमता है। प्रत्यक्ष बिक्री पद्धति नए या विशिष्ट उत्पाद रखने वाली ऐसी संस्थाओं को एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करती है, जिनके उत्पाद परंपरागत रिटेल स्टोरों में आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, अथवा जो खुदरा स्टोरों की शेल्फों पर अपना सामान पहुंचाने से संबंधित विज्ञापन और प्रोमोशन की भारी लागत वहन करने की प्रतिस्पर्धा में शामिल नहीं हो सकती हैं। प्रत्यक्ष बिक्री प्रणाली अर्थव्यवस्था में खुदरा वितरण ढांचे को बढ़ावा देती है और गुणवत्ता उत्पादों के सुविधाजनक स्रोत के साथ उपभोक्ताओं को सेवाएं प्रदान करती हैं।

लिंग समानता के संदर्भ में, प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग महिलाओं को आय अर्जित करने के शानदार अवसर प्रदान करते हुए महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह उद्योग ऐसे व्यक्तियों के लिए भी परंपरागत रोजगार का एक लचीला विकल्प प्रदान करता है, जो अपने परिवार की आय में पूरक वृद्धि करने के इच्छुक हों या जिनकी जिम्मेदारियां अथवा परिस्थितियां उन्हें नियमित अंशकालिक या पूर्णकालिक रोजगार में शामिल होने की अनुमति प्रदान न करती हों।

यह उद्योग समाज में समानता और कौशल विकास को प्रोत्साहित करने में उन महिलाओं का कौशल बढ़ाने और विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो प्रत्यक्ष विक्रेता के रूप में इसमें जुड़ती हैं। उनके लिए समय-समय पर विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त हाल के वर्षों में रहन-सहन की लागत में बेतहाशा वृद्धि को देखते हुए युवाओं के लिए अपने व्यक्तिगत खर्च वहन कर पाना कठिन हो गया है। लागत में इस वृद्धि का युवाओं के समग्र उपभोग व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जो देश की अर्थव्यवस्था को उच्चतर विकास के मार्ग पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष बिक्री पद्धति युवाओं को अतिरिक्त धन कमाने का मंच उपलब्ध कराती है ताकि वे अपने अल्पावधि या मध्यम अवधि के लक्ष्य प्राप्त कर सकें।

प्रत्यक्ष बिक्री को गैर-स्टोर खुदरा फार्मेट के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है और इसे ऐसी उपभोक्ता उत्पाद पद्धति एवं सेवाओं के वितरण के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के माध्यम से बिक्री की जाती है और यह बिक्री नियत खुदरा स्थान से दूर स्वतंत्र बिक्री प्रतिनिधि और वितरकों के माध्यम से होती है, जो स्वयं अपनी बिक्री पर मुनाफा कमाते हैं तथा अपनी विपणन और प्रोत्साहन सेवाओं का लाभ उठाते हैं। उनका व्यापार उत्पाद या सेवाओं के वास्तविक इस्तेमाल या खपत पर आधारित होता है।

भारत में डायरेक्ट सेलिंग असोसिएशन  (आईडीएसएस) ने प्रत्यक्ष बिक्री को परिभाषित करते हुए कहा है कि ‘‘उपभोक्ता उत्पादों/सेवाओं का उपभोक्ताओं को प्रत्यक्ष विपणन डायरेक्ट सेलिंग कहलाता है, जो उनके घरों या अन्य व्यक्तियों के घरों, उपभोक्ताओं के कार्य स्थल और स्थाई खुदरा दुकानों से दूर अन्य स्थानों पर किया जाता है और आमतौर पर प्रत्यक्ष विक्रेता द्वारा उत्पादों के बारे में स्पष्टीकरण या प्रदर्शन के जरिए यह संभव हो पाता है।’’

औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी), भारत सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह के प्रयोजन के लिए प्रत्यक्ष बिक्री को थोक व्यापार के अंतर्गत वर्गीकृत किया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हाल ही में समेकित की गई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के अनुसार थोक बिक्री व्यापार/थोक बिक्री व्यापार (सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों से सोर्सिंग सहित) में स्वचालित मार्ग के अंतर्गत शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति है। यह निवेश नकद और सामान दोनों रूपों में किया जा सकता है।

2014 में विश्वभर में खुदरा बिक्री के अंतर्गत प्रत्यक्ष बिक्री का योगदान 182 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य से अधिक का था, जो इस उद्योग के लिए एक रिकार्ड था और जिसमें 2.5 प्रतिशत की बिक्री वृद्धि दर्ज की गई थी। विश्वभर में सर्वाधिक बिक्री करने वाले शीर्ष बाजारों में अमरीका (19 प्रतिशत), चीन (17 प्रतिशत) और जापान (9 प्रतिशत) शामिल हैं। भारत की रैंकिंग इस क्षेत्र के आकार के संदर्भ में 2009-10 में 18वें स्थान पर थी जो  2014-15 में गिर कर 22वें स्थान पर पहुंच गया। विश्वभर में 9.9 करोड़ से अधिक उद्यमी 2014 में प्रत्यक्ष बिक्री से स्व-रोजगार प्राप्त कर रहे थे, जबकि 2000 में यह संख्या 3.9 करोड़ थी। इस प्रकार इसमें औसत बढ़ोतरी 7.1 प्रतिशत की हुई। एक प्रफुल्लित उद्योग होने के बावजूद शिक्षा, अनुभव, वित्तीय संसाधनों अथवा भौतिक स्थिति के किसी विशेष स्तर की इस उद्योग के लिए आवश्यकता नहीं है। इस उद्योग की ये विशेषताएं बाजार प्रभुत्व में आगामी भौगोलिक परिवर्तनों के लिए एक मंच उजागर करती हैं।

प्रत्यक्ष बिक्री के क्षेत्र में भारत में भी निरंतर बढ़ोतरी का वातावरण रहा है। भारत में प्रत्यक्ष बिक्री संस्थाओं ने पिछले कई वर्षों में प्रभावशाली बढ़ोतरी दर्ज की है। प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग द्वारा सकल बिक्री 2014-15 में 7,958.3 करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो 2013-14 में 74722 करोड़ रुपये की थी। 2014-15 में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग की वृद्धि दर करीब 6.5 प्रतिशत थी जो 2013-14 में 4.3 प्रतिशत दर्ज हुई थी।

सर्वेक्षण के अनुसार संगठित प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग की सकल बिक्री में वेलनेस/हेल्थकेयर उत्पादों का सर्वाधिक योगदान रहा है, जो करीब 42 प्रतिशत है। इसकी वजह देश में स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के प्रति बढ़ती चिंता है। इसलिए स्वास्थ्य उत्पादों के प्रति बढ़ती रुचि का हाल के समय में उनकी प्रत्यक्ष बिक्री में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके बाद सौंदर्य/प्रसाधन सामग्री और व्यक्तिगत देखभाल वस्तुओं (34 प्रतिशत), घरेलू सामान और गृह सुधार उत्पादों (11 प्रतिशत), उपभोक्ता और घरेलू टिकाऊ सामान (7 प्रतिशत) और अन्य उत्पादों जिनमें भोजन और पेय पदार्थ, कृषि उत्पाद, आयुर्वेद उत्पाद, शैक्षिक उत्पाद, सेवाएं, प्रोत्साहक वस्तुएं, वस्त्र और अनुषंगी वस्तुएं आदि शामिल हैं (6 प्रतिशत), का स्थान है।

बढ़ती आमदनी, शहरीकरण और युवाओं की बड़ी आबादी जैसे कारणों से उपभोक्ता उत्पादों की मांग में बेतहाशा वृद्धि हुई है और उसे पूरा करने के लिए प्रभावकारी और सक्षम वितरण चैनल की आवश्यकता बढ़ी है। प्रत्यक्ष बिक्री एक ऐसा ही भिन्न व्यापार मॉडल है, जो आज के उपभोक्ताओं की तेजी से बदलती मांगें पूरी कर रहा है।

प्रत्यक्ष बिक्री संस्थाओं के विकास की धारणाओं के आधार पर, सुदृढ़ कानून, अर्थव्यवस्था में निवेश बहाली और अर्थव्यवस्था के सभी अनुभागों में उपभोक्ता आधार के विस्तार की बदौलत यह उम्मीद की जा रही है कि इस उद्योग में 2 अंकों में वृद्धि दर्ज करने की क्षमता है। सर्वेक्षण के अनुसार प्रत्यक्ष बिक्री संस्थाएं यह महसूस करती हैं कि उद्योग का आकार 2019-20 तक 15,302.6 करोड़ रुपये मूल्य पर पहुंच जाएगा।

आगे आने वाले समय में उभरते हुए जन-सांख्यकीय लाभ की बदौलत अन्य देशों की तुलना में भारत में इस उद्योग की बेहतर स्थिति रहने की संभावना है। जनसंख्या के अनुमानों से संकेत मिलता है कि 2020 में भारत की आबादी की औसत आयु सबसे कम होगी जो करीब 29 वर्ष होने का अनुमान है। इसकी तुलना में चीन और अमरीका की औसत आयु 37 वर्ष, यूरोप में 45 वर्ष और जापान की औसत आयु 48 वर्ष रहने का अनुमान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2020 तक जहां एक ओर कम आयु की आबादी का 5.6 करोड़ अभाव रहने की आशंका है, वहीं भारत में 2020 तक युवाओं की करीब 4.7 करोड़ अधिशेष आबादी होगी।

इसे देखते हुए, प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग युवाओं को स्व-रोजगार और आमदनी के उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हुए  इस बेजोड़ जनसांख्यकीय लाभ को और बढ़ाएगा। चूंकि युवा ऊर्जावान, आत्मविश्वासी, प्रेरित और नए विचारों वाले होते हैं, इसलिए प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग हमारे देश के अनेक युवाओं के लिए रोजगार का बेहतरीन स्रोत बनेगा। न्यूनतम पूंजी निवेश, वैकल्पिक आय अर्जित करने के अवसर, पढ़ाई का त्याग किए बिना संचालित किए जाने की संभावना, चूंकि इसे अंशकालिक आधार पर कार्यरूप दिया जा सकता है और जीवन निर्वाह की लागत में पूरक वित्तीय सहायता देने की क्षमता, आदि ऐसी विशेषताएं हैं, जो भारत में इस उद्योग के फलने फूलने के अनुकूल हैं।

रोजगार सक्षमता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के जरिए ज्ञान और कौशल विकास पर निर्भर करती है। प्रत्यक्ष बिक्री पद्धति प्रत्यक्ष विक्रेता के रूप में शामिल होने वाले व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इससे उन्हें न केवल काम करने का मौका मिलता है, बल्कि सीखने और अंतर-वैयक्तिक कौशल में सुधार लाने तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान या संचालित करने का अवसर मिलता है। हमारे देश के युवाओं को अधिकार प्रदान करना आवश्यक है। अर्थव्यवस्था में उनके लाभकारी और निरंतर योगदान के लिए उन्हें सही शिक्षा और कौशल उपकरणों एवं अवसरों तक उनकी पहुंच कायम करना आवश्यक है। इस तरह प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग युवाओं को कमाने और बचाने के लिए स्व-रोजगार के अवसर प्रदान करते हुए उनके सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे उच्चतर बचत और उच्चतर निवेश में भी योगदान होता है, जिसकी परिणति अर्थव्यवस्था को विकास के उच्चतर पथ पर पहुंचाने के रूप में होती है।

देश के आर्थिक सशक्तिकरण में महिलाओं ने रोजगार और आय सृजन के जरिए महत्वपूर्ण योगदान किया है। विश्वभर में हाल के वर्षों में महिलाओं की स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। देश की वृद्धि और विकास में पिछले वर्षों में महिलाओं ने समान भागीदारी अदा की है। भारतीय महिलाओं की इस उपलब्धि का श्रेय उनके द्वारा अनेक सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में समानता का अंतराल दूर करने को दिया जा सकता है। 1991 में महिलाओं की साक्षरता दर 39 प्रतिशत थी जो 2001 में बढ़ कर 54 प्रतिशत हो गई और 2011 में 65 प्रतिशत पर पहुंच गई। इससे पता चलता है कि शिक्षा में लिंग संबंधी अंतराल में महत्वपूर्ण कमी आई है।

परंतु, अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी की दर जो 2004-05 में मात्र 37 प्रतिशत थी, वह 2009-10 में गिर कर 29 प्रतिशत रह गई। महिलाओं के रोजगार में कमी चिंता की बात है, चूंकि लिंग असमानताएं दूर करने और महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण में उनका आर्थिक सशक्तिकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिसंख्य श्रमिक बल की आय का स्तर कम रहने में शिक्षा और कौशल की कमी को जिम्मेदार समझा जाता है, जिससे असमानता बढ़ती है। इस दिशा में प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग प्रत्यक्ष विक्रेता के रूप में भर्ती होने वाली महिलाओं के कौशल में वृद्धि एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, जो उनके लिए समय-समय पर विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित और प्रदान करता है।

भारत में आबादी में करीब 48 प्रतिशत योगदान महिलाओं का है। इसे देखते हुए समाज के विकास में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, जिसके लिए यह जरूरी है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में आर्थिक क्रियाकलाप में भागीदारी के लिए महिलाओं का सशक्तिकरण किया जाए। इस तरह महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में प्रत्यक्ष बिक्री पद्धति महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है क्योंकि यह महिलाओं को वित्तीय आत्मनिर्भरता का एक मंच प्रदान करती है। इससे वे एक लचीले और कम निवेश वाले वातावरण में उच्चतर बचत और उच्चतर निवेश में योगदान कर सकती हैं। यह पद्धति कौशल बढ़ाने वाली है और घर तथा काम के बीच संतुलन को प्रोत्साहित करती है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष पद्धति के जरिए उद्यमशीलता में महिलाओं की वृद्धि का प्रत्येक प्रतिशत हमारी अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में महत्वपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारत में प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों को नियमित करने के लिए उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नए दिशा-निर्देश उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के साथ ही प्रत्यक्ष बिक्री करने वाली कंपनियों के उत्पादों को एक नीतिपरक आधार प्रदान करते हैं। यह पद्धति भारत के औद्योगिक विकास को सुदृढ़ बनाने और उसे उच्चतर स्तर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। उम्मीद की जा रही है कि ये दिशा-निर्देश उपभोक्ताओं के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था, प्रत्यक्ष बिक्री कंपनियों द्वारा भर्ती किए जाने वाले व्यक्तियों के लिए पारिश्रमिक प्रणाली और प्रत्यक्ष विक्रेताओं द्वारा अनिवार्य रूप से अनुपालन हेतु कुछ नियम निर्धारित करते हुए कंपनियों और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेंगे। ये दिशा-निर्देश प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग को बढ़ावा देने में मददगार सिद्ध होंगे, जो बड़ी संख्या में युवाओं और महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं, कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण में योगदान कर रहा है, सूक्ष्म एवं लघु उद्यम क्षेत्र को बढ़ावा देता है और भारत में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम मेक इन इंडियामें योगदान कर रहा है। इतना ही नहीं, प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में सतत नियामक सुधारों से इस उद्योग को अधिक व्यापार सृजन, विदेशी निवेश आकर्षित करने और अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर पैदा करने के मामले में वैश्विक मानदंड के अनुरूप पहुंचाया जा सकेगा।

 

(लेखक पीएचडी चेम्बर ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली में मुख्य अर्थशास्त्री हैं। ईमेल: spsharma@phdcci.in)