संपादकीय लेख


Editorial Volume-31

सरदार वल्लभ भाई पटेल के व्यक्तित्व के अनजाने पहलू

सुदर्शन अयंगर

इन दिनों सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में जनमानस की रुचि में वृद्धि की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इससे पहले, हर कोई स्कूल पाठ्य पुस्तक में भारत के लौह पुरुषशीर्षक से एक पाठ सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में पढ़ कर संतुष्ट हो जाता था। हम यह जानते थे कि उन्होंने सबसे पहले खेड़ा और फिर दक्षिण गुजरात में सूरत के निकट बारडोली में किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। गांधीजी ने बारडोली सत्याग्रह की सफलता के बाद उन्हें सरदार कह कर संबोधित किया। सार्वजनिक जीवन में सरदार पटेल को फिर से जानने और पढऩे की ललक के पीछे शायद भारत के युवाओं को यह स्मरण कराना है कि वे उनके उन बुनियादी और मूलभूत मूल्यों का अनुकरण करें, जिनमें उनका विश्वास था और जिनके लिए वे संघर्ष करते रहे। परंतु, यह याद रखना चाहिए कि वे शुरू में एक सामान्य युवा व्यक्ति थे, जो अपने संकल्पों और कार्यों की बदौलत एक सुदृढ़ नेता बने। उनका जीवन युवाओं को वह मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता है, जिस पर चल कर सरदार पटेल सार्वजनिक जीवन में सम्मान के शिखर पर पहुंचे।

उपरोक्त संदर्भ में हमारे लिए सरदार पटेल को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि सरदार पटेल ने कठिन परिश्रम और अनुभव के बल पर बचपन से ही अपने व्यक्तित्व का निर्माण शुरू कर दिया था। 31 अक्तूबर, 1875 को नडियाद में एक सामान्य पटेल परिवार में उनका जन्म हुआ, जिनका मुख्य व्यवसाय खेती था। वल्लभ भाई का कुल पांच भाइयों में तीसरा स्थान था। उन्हें एक विचित्र समस्या का भी सामना करना पड़ा। परिवार में प्रथम और अंतिम दो भाई अत्यंत लाडले थे। उनके सबसे बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल, जो भारत के स्वतंत्रता के इतिहास में स्वयं एक महान व्यक्तित्व रहे हैं, की ओर सर्वाधिक ध्यान दिया जाता था। खेती और परिवार संबंधी समस्त श्रम एवं नीरस कार्य परिवार के इस तीसरे पुत्र को करने होते थे। वल्लभ भाई ने बिना किसी प्रतिरोध के उन सभी कार्यों को किया और इस तरह व्यापक अनुभव अर्जित करते हुए भौतिक दृष्टि से बुद्धिमान बने। इससे वे शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ और बौद्धिक दृष्टि से हर कार्य को करने में सक्षम बनते चले गए। इससे उनमें दृढ़ता और स्पष्टवादिता का विकास हुआ। उन्होंने यह महसूस किया कि वे बचपन से ही स्पष्टवादी और सुदृढ़ रहे हैं। वे अपने में कुछ रूखापन लिए हुए थे, परंतु वे तीक्ष्ण बुद्धि थे। 12 वर्ष की आयु में उन्होंने स्कूल जाना शुरू किया। वे एक बेहतरीन सार्वजनिक वक्ता थे, लेकिन साधारण भाषा का इस्तेमाल करते थे। उनमें हास्य की भावना प्रबल थी। वे एक सेल्फमेड मैन (हर काम को स्वयं करने वाले व्यक्ति) थे। उन्होंने बैरिस्टर बनने का निर्णय किया ताकि खूब पैसा कमाएं और अच्छी जिंदगी जीएं। परंतु, अपने लक्ष्य को पाने के लिए उन्हें माता-पिता से कोई प्रेरणा और वित्तीय मदद नहीं मिली। अत: उन्होंने पहले परीक्षा पास करने और एक वकील बनने का निश्चय किया और उसके बाद आगे अध्ययन के लिए पैसा जमा करना शुरू कर दिया। वे निरंतर अपने लक्ष्य का पीछा करते रहे और अंत में उन्हें सफलता मिली।

वल्लभ भाई पटेल की दृढ़ता के बारे में उनके जीवन के एक प्रसंग को अक्सर उद्धृत किया जाता है कि उन्होंने बगल में निकले एक फोड़े का उपचार करने के लिए उसे गर्म-सलाख से स्वयं दाग दिया था। यह घटना उनके स्कूल के दिनों या लडक़पन की नहीं है बल्कि उस समय की है जब वे 25 वर्ष की आयु में अधिवक्ता की परीक्षा देने जा रहे थे। एक प्रतिबद्ध और दृढ़ प्रतिज्ञ वल्लभ भाई अधिवक्ता बन गए और गोधरा में वकालत करने लगे। वे शादीशुदा थे, परंतु उनके वैवाहिक जीवन के बारे में इसके सिवाय किसी को कोई जानकारी नहीं थी कि उनकी पत्नी गुना गांव से थी। उन्होंने गोधरा में अपना परिवार प्रारंभ किया। उन दिनों प्लेग एक महामारी के रूप में फैला, जिसे देखते हुए उन्होंने अपनी पत्नी को दूर भेज दिया और स्वयं एक संक्रमित मित्र की तिमारदारी में लग गए। प्लेग समाप्त होने के बाद वे वापस काम पर लौटे और फिर से वकालत करने लगे। इसके बाद वे बोरसाड़ चले गए, जहां इस दंपति के दो बच्चे मणिबेन और दया भाई पैदा हुए। दया भाई अपना खुद का काम करने लगे और मणिबेन ने अपना जीवन पिता

को समर्पित कर दिया और जीवन-पर्यंत उनका ध्यान रखा। उनकी पत्नी ज़ावेरबेन अधिक जिंदा नहीं रहीं और जवानी में ही कैंसर के कारण चल बसीं। वल्लभ भाई ने बच्चों के लिए मां की भूमिका भी निभाई।

सरदार की मुख्य विशेषता यह थी कि वे गंभीर रहते और कभी अपनी भावनाओं को बाहर नहीं आने देते थे। उनके जीवनी लेखक राज मोहन गांधी ने अनेक अवसरों पर उनकी इस विशेषता को उजागर किया है। उनका व्यक्तित्व अंतत: एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरता है, जो सख्त और दृढ़ थे, तथा लोगों को अपने से दूर रखते थे। लेकिन वे जिन लोगों के करीब आते थे, उनके प्रति सद्भावपूर्ण और खरी-खरी सुनाने वाले भी थे। परंतु, वे अपने अंदर की बात आसानी से किसी को नहीं बताते थे। परिवार के प्रति उनका समर्पण भी उल्लेखनीय था। यह उल्लेखनीय है कि अपनी जवानी में उन्होंने अपने अग्रज विट्ठल भाई के लिए जबर्दस्त त्याग किया था। वल्लभ भाई ने अधिवक्ता के रूप में कठिन परिश्रम किया और कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जा कर काफी धन जमा कर लिया था। उन्होंने इसके लिए आवेदन भेजा और दाखिले संबंधी दस्तावेज उन्हें प्राप्त हो गए। परंतु, दाखिला श्री वी।जैड। पटेल को मिला। विट्ठलभाई उनके अग्रज थे और वे भी इंग्लैंड जा कर कानून की पढ़ाई करना चाहते थे। उन्होंने दाखिला दस्तावेज का आवरण पृष्ठ देखा और अपने अनुज वल्लभ भाई को सुझाव दिया कि पहले अध्ययन के लिए वे जाएंगे, चूंकि उनका नाम भी वीजैड पटेल है। वल्लभ भाई ने गरिमापूर्ण ढंग से अपनी बारी का त्याग कर दिया। उन्होंने न केवल विट्ठल भाई के लिए त्याग किया, बल्कि इस दौरान अपनी भाभी की भी बड़े सम्मानपूर्वक देखभाल की।

उस समय के अन्य नौजवानों से भिन्न वल्लभ भाई अंतत: 37 वर्ष की आयु में बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड गए। दुर्भाग्य से अध्ययन के लिए जाने से पहले उनकी पत्नी का देहांत हो गया। उस समय वे बोरसाड में अधिवक्ता के रूप में वकालत कर रहे थे। पत्नी को कैंसर था और उनका आपरेशन किया जाना था। वल्लभ भाई उन्हें बंबई (अब  मुंबई) के हरकिशनदास अस्पताल ले गए और सर्जरी की तैयारी की जा रही थी। परंतु उन्हें एक मामले के सिलसिले में वापस आना पड़ा। उन्होंने सोचा था कि वे जल्द ही वापस लौट आएंगे। परंतु, विधि को कुछ और ही मंजूर था। जब वे अदालत में जिरह के लिए जा रहे थे, तभी उन्हें टेलीग्राम मिला कि ज़ावेरबेन नहीं रहीं। उन्होंने तार को अपनी जेब में रखा और शांत भाव से पैरवी के लिए गए। पैरवी पूरी होने के बाद ही उन्होंने पत्नी की मृत्यु के समाचार का खुलासा किया। इस घटना के 19 वर्ष बाद मौलाना शौकत अली ने उन्हें ए वॉल्कैनो इन आइसयानी बर्फ में ज्वालामुखीकी संज्ञा दी। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को मुम्बई में मिशनरी छात्रावास में रखा। उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल, जो उन दिनों मुम्बई में बैरिस्टर थे, ने दूर से देखभालकर्ता की भूमिका निभाई। इसके बाद सरदार इंग्लैंड चले गए। उन्होंने अच्छे से पढ़ाई की और एक सिमेस्टर के लिए छूट के लिए आवेदन किया, जो उन्हें मिल गई। वे 1913 में भारत लौटे और उन्हें विद्वान व्यक्ति समझा गया। उन्होंने अहमदाबाद में प्रैक्टिस शुरू की और जल्दी ही इसमें सफलता प्राप्त की। इस दौरान ब्रिज खेल में उनकी रुचि विकसित हुई। वे गांधीजी का प्रभाव महसूस कर रहे थे। परंतु, उनके कार्यक्रमों में भाग लेने के इच्छुक नहीं थे। परंतु, धीरे-धीरे वे गांधीजी के गहन प्रशंसक बन गए। यह एक विचित्र मेल था जो दोनों के बीच काम कर रहा था। यहां हमें यह याद रखना चाहिए कि दोनों की मुलाकात एक परिपक्व अवस्था में हुई थी। कोचर्ब आश्रम की स्थापना 1915 में हुई और 1917 में किसी समय दोनों नेताओं की मुलाकात हुई। गांधीजी की उम्र उस समय 47 वर्ष और सरदार की उम्र 40 वर्ष थी।

वल्लभ भाई अहमदाबाद में बस गए थे और उनकी प्रैक्टिस अच्छी चल रही थी। 1917 में उन्हें म्युनिसिपल बोर्ड के लिए भी चुना गया था। उन्हें स्वच्छता समिति का अध्यक्ष भी बनाया गया था। उसी वर्ष शहर में प्लेग फैला और वल्लभ भाई पटेल ने स्थिति को बेहतर ढंग से संभाला। उन्होंने व्यक्तिगत साहस दिखाया और महामारी को रोकने के लिए बेहतर प्रबंध किए। यह महसूस किया गया कि तत्कालीन म्युनिसिपल कमिशनर ठीक से रुचि नहीं ले रहे थे और उनके खिलाफ भारी रोष पैदा हो रहा था। वल्लभ भाई पटेल ने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और कमिशनर को हटवाने में कामयाब हुए। इस संदर्भ में यह बात उल्लेखनीय थी कि वल्लभ भाई पटेल स्वयं सार्वजनिक जीवन में थे और इसलिए उन्होंने गांधीजी का आकलन करने के बाद उनसे जुडऩे का निश्चय किया था। वल्लभ भाई पटेल को गांधीजी की सबसे अच्छी बात यह लगी कि वे बड़ी साफगोई के साथ बात करते थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह देखा कि गांधीजी वही करते थे, जो वे कहते थे। इसलिए जब गांधीजी ने बैठक में पूर्णकालिक सुदृढ़ स्वयंसेवकों की बात की, तो वल्लभ भाई पटेल उनमें शामिल हो गए। उन्होंने कोई कर अदा न करनेके लिए किसानों के आंदोलन का सक्षम नेतृत्व किया। खेड़ा सत्याग्रह के बाद वे कांग्रेस में एक प्रतिष्ठित नेता बन गए। उन्हें गुजरात प्रांतीय कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनाया गया और वे 1946 तक इसके अध्यक्ष रहे।

सरदार पटेल, गांधीजी से गहरे प्रभावित थे। वे इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का गांधीजी का रास्ता सही है। वे इस बात को भी अच्छी तरह स्वीकार करते थे कि स्वयं को बदले बिना और हर संभव सादगीपूर्ण भौतिक जीवन अपनाए बिना सार्वजनिक जीवन में उतरना और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना संभव नहीं है। उन्होंने पश्चिमी वस्त्र छोड़ दिए और नियमित रूप से कताई शुरू की और खादी के वस्त्र पहने। वल्लभ भाई पटेल ने गांधीजी को अपना सर्वोच्च नेता माना और उनके रास्ते पर चलने वाले नेता बने। उन्होंने संगठनकर्ता की अपनी भीतरी शक्ति के साथ गुजरात प्रांतीय कांग्रेस की सेवा की। उन्होंने अहमदाबाद म्युनिसिपल कांग्रेस की लंबे समय तक सेवा की और 1924 और 1928 के बीच वे अहमदाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष रहे। उन्होंने सुदृढ़ निर्णय किए और सभी प्रकार के विपरीत दबाव को निष्प्रभावी किया। अहमदाबाद के वर्तमान तिलकमार्ग को चौड़ा करने में वे मकान और दुकान मालिकों के साथ सख्ती से पेश आए, जिनकी संपत्तियां हटानी पड़ी थीं। कुछ लोगों ने समस्या को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की, परंतु वल्लभ भाई ने पूरे मनोवेग से समस्या को एक म्युनिसिपल क्षेत्र के भौतिक आयोजना संबंधी मुद्दे के रूप में हल किया।

सूरत जिले में बारदोली में किसानों के सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व करने के बाद उन्हें सरदार की उपाधि दी थी। किसानों से कहा जा रहा था कि वे देय से अधिक राजस्व अदा करें। गांधीजी ने वल्लभ भाई से कहा था कि वे इस मुद्दे का समाधान करने के लिए काम करें। एक सफल आयोजक के रूप में वल्लभ भाई ने किसानों में असाधारण साहस पैदा किया। ब्रिटिश प्रशासन राजस्व के बदले अचल और चल संपत्ति की कुर्की कर रहा था। वल्लभ भाई ने क्षेत्र की महिलाओं को भी प्रेरित किया कि इस उद्देश्य के लिए वे अपने पतियों को संघर्ष करने और जेल जाने के लिए तैयार करें। यह एक लंबी लड़ाई थी, लेकिन अंतत: ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। वल्लभ भाई के नेतृत्व को इसका श्रेय मिला और गांधीजी ने उन्हें सरदार कह कर पुकारा। बारदोली में स्वराज आश्रम की स्थापना की गई, जो आज भी एक जीवंत संगठन है, जो गांधीवादी सिद्धांतों पर काम करने का प्रयास कर रहा है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधीजी और अन्य सहयोगियों के साथ सरदार पटेल भी गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद के सह-संस्थापकों में से एक थे। वे 1930 से कई वर्ष तक इसके कुलपति रहे और गांधीजी की हत्या के बाद 1948 में इसके कुलाधिपति भी बने। उनकी निर्भीकता और दृढ़ता का पता एक घटना से चलता है। 1933-34 में जब सरकार ने गुजरात विद्यापीठ को बंद करने का निर्णय ले लिया, तो गांधीजी और काका साहेब कालेलकर ने विश्वविद्यालय पुस्तकालय को अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी में स्थानांतरित करने का फैसला कर लिया। सरदार पटेल उस समय जेल में थे। जब वे जेल से बाहर आए, तो उन्हें इस निर्णय की जानकारी मिली। उन्होंने गांधीजी का विरोध किया और उनसे कहा कि उनका फैसला निरंकुश है। ऐसा निर्णय केवल संचालक मंडल की पूर्ण बैठक में ही किया जा सकता था। गांधीजी ने उनकी बात स्वीकार की और सरदार विश्वविद्यालय पुस्तकालय को वापस लाने में सफल हुए। आज गुजरात विद्यापीठ पुस्तकालय गुजरात के सबसे बड़े पुस्तकालयों में से एक है, जहां आठ लाख से अधिक पुस्तकें हैं।

राजनीतिक मामलों में सरदार पटेल गांधीजी की भावनाओं का सम्मान करते थे। उन्होंने हमेशा उनके फैसलों का सम्मान किया। वे गांधीजी के निर्णयों के अनुयायी मात्र अथवा अंधानुकरण करने वाले मात्र नहीं थे, बल्कि अधिकतर अवसरों पर गांधीजी के निर्णय उन्हें सोचे समझे लगते थे। सरदार पटेल समझते थे कि गांधीजी के निर्णय अधिकतर अवसरों पर सुविचारित और परिगणित होते हैं। यह अक्सर कहा जाता है कि बारदोली सत्याग्रह के सफल नेतृत्व के बाद 1929 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की बारी सरदार पटेल की थी, परंतु गांधीजी ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू का समर्थन करने की सलाह दी और सरदार पटेल खुशी-खुशी इसके लिए सहमत हो गए। स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल ने देश को जोडऩे में इस्पात की दुर्लभ शक्ति का परिचय दिया। उनके प्रयासों का यशोगान ऊंचे स्वर में किया जाता है और वे इसके पात्र भी थे, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए उन्हें जबर्दस्त दबाव भी झेलने पड़े, जिनका उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ा। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए। 15 दिसंबर, 1950 को उनकी मृत्यु हो गई।

सौराष्ट्र में जूनागढ़ नवाब और अन्य रजवाड़ों को राष्ट्र की मुख्यधारा में जोडऩा आसान काम नहीं था। इसके लिए उन्हें शक्ति और प्राधिकार के साथ समझाने बुझाने और मोल भाव करने की कला का भी सहारा लेना पड़ा। देशी रजवाड़ों को जोडऩे की प्रक्रिया में उनके व्यक्तित्व की इस विशिष्टता ने विशेष योगदान किया। हैदराबाद के नवाब को आत्मसमर्पण करने के लिए राजी करना लोहे के चने चबाने जैसा था। इस कार्य में उन्होंने सुविचारित शक्ति का प्रदर्शन किया। इसी तरह भोपाल का मामला भी टेढ़ी खीर था। युवा पीढ़ी को समझना चाहिए कि एक उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को पूरी तरह अपना नेता स्वीकार किया। इस संदर्भ में कश्मीर मुद्दे पर एक गलत धारणा प्रचारित की जाती रही है और उसे काफी विश्वसनीयता भी मिलती रही है। परंतु, सरदार पटेल कश्मीर समस्या की जटिलता को समझते थे और इस बारे में नेहरू जी से उनकी कोई अलग राय नहीं थी।

कठिन श्रम, ईमानदारी, निर्भीकता, दृढ़ता, शांत और सुदृढ़ विचारों ने वल्लभ भाई को वास्तव में एक सरदार-एक नेता बनाया। उन्होंने हमारा मार्ग प्रश्स्त किया कि कड़ी मेहनत और पूरी इच्छाशक्ति से काम किए बिना सफलता की सीढिय़ां नहीं चढ़ी जा सकतीं। कहा जाता है कि एक प्रतिशत प्रेरणा और 99 प्रतिशत मेहनत रंग लाती है। आज के युवाओं को महान नेता सरदार पटेल से यह सीख लेनी चाहिए।

(लेखक गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद के पूर्व कुलपति हैं।  ईमेल- sudarshan54@gmailcom)