संपादकीय लेख


Editorial-32

भारत, रूस बदलते समय के अनुरूप कदम बढ़ाते हुए

अनुराधा एम. चिनॉय

भारत-रूस संबंधों से दोनों देशों को व्यक्तिगत और द्विपक्षीय लाभ पहुंचा है और इसने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में योगदान किया है। भारत-रूस संबंधों में, विशेषकर 1950 के दशक के मध्य से, निरन्तरता बरकरार है और ये अन्य सभी द्विपक्षीय संबंधों से भिन्न हैं। नि:संदेह यह निरन्तरता उत्तरोत्तर भारतीय और सोवियत/रूसी सरकारों, राजनीतिक दलों और वास्तविक प्रणालीगत संस्थाओं से प्रकट होती है जो इन संबंधों में एक सकारात्मक और विशेषाधिकृत साझेदारी को दर्शाते हैं। इसका प्रमाण ‘‘परिभाषित साझेदारी’’ शब्दों में निहित है जिन्हें इस संबंध का वर्णन करने के लिये प्रयोग में लाया गया है।

हाल के समय में रणनीतिक विश्लेषकों का ये मानना था कि भारत-रूस संबंध शिथिल हो रहे थे। यह इसलिये था क्योंकि भारत अमरीका के साथ अपने निकट संबंध कायम कर रहा है। अब जबकि रूस ने चीन के साथ निकट साझेदारी विकसित की है और पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास आयोजित किया है, जो कि पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों द्वारा उड़ी में किये गये हमले, जिसमें 18 सैनिक मारे गये थे, और नियंत्रण रेखा के आरपार भारत की जवाबी कार्रवाई के तुरंत बाद किया गया।

परंतु इनमें से बहुत सी आशंकाओं को हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पूतिन की द्विपक्षीय और वार्षिक बैठक (गोवा, अक्तूबर 15, 2016) के बाद विराम लग गया है जिसने संबंधों की शिथिलता अथवा दूरी संबंधी तमाम प्रश्नों को दरकिनार कर दिया। इस बैठक में करीब 10 अरब अमरीकी डॉलर के रक्षा सौदों पर हस्ताक्षर किये गये और भारत द्वारा एस-400 एबीएम सिस्टम की खरीद, पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के उत्पादन को लेकर प्रतिबद्धत्ता व्यक्त की गई।  यहां तक कि अभी रूस भारत को इसके 60 प्रतिशत से अधिक रक्षा उपकरणों की आपूर्ति करता है, भारत द्वारा अन्य देशों जैसे कि फ्रांस, अमरीका, इस्राइल और अन्यों से अपनी रक्षा खरीद में विविधता लाये जाने से पहले यह लगभग 80 प्रतिशत रक्षा उपकरणों की आपूर्ति करता था। इनसे रूस के साथ एक प्रमुख रक्षा साझेदार के तौर पर पुन: बहाली हुई है। इसके अलावा इन सौदों में भारत में मिलकर विनिर्माण किये जाने का एक प्रमुख घटक शामिल है जो कि मेक इन इंडियानीति के अनुरूप है।

राष्ट्रपति पूतिन ने प्रधानमंत्री को आश्वासन दिया कि संयुक्त अभ्यासों से भारत-रूस संबंध जोखि़म में नहीं पड़ेंगे परंतु ये रूस की बहु-आयामीविदेश नीति को दर्शाते हैं जिसके तहत वे संबंधों के अधिक्रम को बरकरार रख रहे हैं, जिनमें भारत का स्थान सर्वोच्च है। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में क्षेत्र-विनिर्दिष्ट आतंकवाद पर रूस और भारत का संयुक्त दृष्टिकोण और चिंता परिलक्षित होती है।

इस बैठक में हुए अन्य समझौतों में रूस की सरकारी स्वामित्व वाली रोसनेफ्ट कंपनी  द्वारा एस्सार ऑयल की बड़ी हिस्सेदारी को 13 अरब अमरीकी डॉलर में खऱीदे जाने का समझौता शामिल है। इसका अर्थ है कि भारत में अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होगा जिसकी भारत सरकार को तलाश है। इसके अलावा कार्यसूची में परमाणु ऊर्जा और परमाणु संयंत्र क्षेत्र में सहयोग शामिल है जिसकी लागत 30 अरब अमरीकी डॉलर हो सकती है। यह समझौते ऐसे समय पर महत्वपूर्ण हैं जब रूस को पश्चिमी देशों से आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है और इसे अलग-थलग करने का प्रयास हो रहा है। भारत को भी इन प्रस्तावों की आवश्यकता है क्योंकि यह अपनी अर्थव्यवस्था में तेज़ी लाने, अधिक रोजग़ारों के सृजन, अपनी रक्षा तैयारी के आधुनिकीकरण और ऊर्जा आपूर्ति को मज़बूत करने का प्रयास कर रहा है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि ‘‘दो नये मित्रों की अपेक्षा एक पुराना मित्र बेहतर है’’

रूस एक बार फिर दुनिया के साथ भारत के संबंधों में एक अवयव बन गया है। वैश्विक संदर्भ में एकजुटता के साथ कार्य करने और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में सकारात्मकता के साथ योगदान करने की रूसी-भारतीय परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसे ऐतिहासिक रूप में देखा जा सकता है। सोवियत संघ ने भारतीय और अन्य गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) देशों का उपनिवेशवाद और नस्लवाद विरोधी मुद्दों और एक तीसरा मार्ग अख्तियार करने में भारत का समर्थन किया, जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् शीतयुद्ध में डूबी द्विधु्रवीय दुनिया के रूप में देखा जा रहा था, जहां छद्म युद्धों का इतिहास था। इन सोवियत-भारत संबंधों का इतिहास और सहयोग सुविख्यात है। हालांकि इसमें पश्चिमी प्रभाव परिलक्षित नहीं होता है कि किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली का विकास हुआ है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि रूसी/सोवियत-भारतीय साझेदारी ने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिये अधिकारों, समानता और लोकतांत्रिक कानूनों को लेकर शासन के लिये वैश्विक नियमों के निर्माण में योगदान किया है।

1990 के उपरांत वैश्वीकरण के दौर और समकालीन इतिहास में एकधु्रवीय पल की व्याख्या में एक बार फिर बहु धु्रवीय विश्वकी अवधारणा को भिन्न दिशा प्रदान की गई जिसे रूस, भारत और चीन ने विकसित किया था, ये सभी भू-आर्थिक परिदृश्य को बदलने में इच्छुक थे और इन्होंने एकल महाशक्ति अमरीका के प्रभुत्व की अवधारणा से अलग-थलग महसूस किया।

पश्चिम में आर्थिक शिथिलता के समय दक्षिणी ग्लोब में कई देश आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण संचालकों के तौर पर उभरे थे, भारत, चीन और अन्य देशों की वृद्धि प्रभावशाली थी। यह 2000 पश्चात् की रूसी अर्थव्यवस्था के पुन: उत्थान के अनुरूप था।

इस बहुध्रुवीयता की अवधारणा का सूत्रपात ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और शंघाई सहयोग संगठन जैसे नये सुरक्षा समूहों के रूप में नये बहु-आयामी संगठनों के अभ्युदय के साथ हुआ जहां रूस और भारत के पास अंतर्राष्ट्रीय कार्यसूची के निर्धारण का अवसर था।

अत: अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में रूस और भारत के बीच क्या समानता है? इनका निम्नानुसार उल्लेख किया जा सकता है:

(1)रूस और भारत दोनों अन्य ब्रिक्स देशों के साथ वैश्विक आर्थिक शासन-विधि में, विशेषकर विश्व बैंक और आईएमएफ में महत्वपूर्ण बात रखना चाहेंगे जहां उनको अपनी बात रखने का अवसर कम होता है। दोनों ने अंतर्राष्ट्रीय वित्त के पुन: संतुलन के लिये आकस्मिक खर्च आरक्षण व्यवस्था के तौर पर नया विकास बैंक विकसित करने में ब्रिक्स के साथ मिलकर काम किया है।

(2) सुरक्षा: दोनों को आतंकवाद की विनिर्दिष्टता की सामान्य समझ है जहां विभिन्न देश आतंकवाद की अपनी भू-रणनीतिक, क्षेत्रीय, घरेलू और ऊर्जा हितों के अनुरूप व्याख्या करते हैं। यह ताकत बनाये रखने के लिये और इस आतंकवादी खतरे के विस्तार, अपने नियंत्रणाधीन अधिक प्रदेशों को हासिल किये जाने सहित, का एक कारण है। भारत और रूस इससे प्रभावित रहे हैं और ऐसा करना जारी है। लेकिन संयुक्त मंच में आतंकवाद की अलग-अलग समझ विरोधाभासों और गलत अवधारणाओं को जन्म देती है। भारत और रूस को आतंकवाद के खिलाफ एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते के लिये मिलकर काम करने की आवश्यकता है और इस बीच आतंकवाद की किस्मों और संहिताओं के मसौदे के लिये एक आयोग नियुक्त किया जाये।

(3) भारत और रूस की अखंडता की रक्षा पर एक जैसी समझ है और यह शासन में सत्ता के परिवर्तन के विरुद्ध है और दोनों ही मानवाधिकारों के सवालों पर बातचीत का समर्थन करते हैं।

(4) भारत और रूस दोनों ही एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करते हैं जो कि पश्चिमी देशों ने कई देशों पर लगाये हैं और अब रूस पर लगा दिये हैं।

(5) दोनों इस बात में विश्वास करते हैं कि पश्चिम एशिया में आतंकवाद को अलग किया जाना चाहिये और इसे सत्ता परिवर्तन से नहीं जोड़ा जाना चाहिये।

(6) रूस और भारत दोनों की संयुक्त राय है कि अफगान शांति प्रक्रिया का नेतृत्व अफगान लोग बाहरी बलों के बगैर स्वयं संचालित करें। रूस और भारत के कई मुद्दों पर इसी प्रकार एक जैसे सिद्धांत हैं। इन्हें स्पष्टवादिता और प्रचार के तंत्र को सशक्त करते हुए मज़बूत बनाया जाना याहिये।

(7) बहु-धु्रवीय विश्व का निर्माण भारत और रूस की एक सतत कार्यसूची है।

मतभेद कहां पर हैं:

कुछ रणनीतिक हल्कों में ये निराधार आशंकाएं हैं कि भारत-रूस संबंधों में ठहराव निम्नलिखित कारणों से है: रूस ने चीन के साथ हर क्षेत्र में निकट साझेदारी बढ़ाई है। इसके परिणामस्वरूप, यह विश्वास किया जाता है कि चीन रूस पर पाकिस्तान के प्रति नरम रूख अपनाये जाने के लिये दबाव डाल सकता है, जबकि पूर्व में रूस ने पाकिस्तान पर भारतीय स्थितियों का समर्थन किया था। चूंकि चीन के साथ भारत के संबंध मतभेदपूर्ण कई अनसुलझे मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी रहे हैं, इनसे रूस के साथ संबंधों पर खतरनाक असर हो सकता है, विशेषकर जब चीन-रूसी साझेदारी मज़बूती की दिशा में हैं। परंतु राष्ट्रपति पूतिन और रूस के तिरस्कार से रूस के पास बहुत कम अवसर हैं। रूसी अर्थव्यवस्था की बहाली नव उदारवादी सिद्धांतों के विरुद्ध गई है और आर्थिक पत्रिका के अनुसार 70 प्रतिशत रूसी अर्थव्यवस्था अब सरकार के नियंत्रणाधीन है।

पश्चिम द्वारा रूस को इसलिये कोसा जा रहा है क्योंकि उसने क्राइमिया पर पुन: दावा किया है और असद सरकार को बनाये रखने के लिये सैन्य हमले किये हैं। कुछ पश्चिमी देश रूस को एक बार फिर खतरे और अन्य के खिलाफ रणीनति के रूप में देख रहे हैं। एक अन्य मुद्दा रूसियों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाये जाने के बारे में है।

इन बदलते गठबंधनों में भारत ने अमरीका के साथ निकट संबंध बनाये हैं और अपनी शस्त्र आयात नीति में विविधता लेकर आया है। हालांकि यह अब भी इसके पास सोवियत हथियारों का जमावड़ा है क्योंकि यह उसके साठ प्रतिशत रक्षा हथियारों का बेस है। जैसे ही भारत की निर्भरता रूस से कम होगी रूस नये बाजारों की तलाश करेगा और अपने संबंधों में विविधता लेकर आयेगा।

एक अन्य प्रमुख चुनौती यह है कि रूस-भारत व्यापार अभी 10 अरब अमरीकी डॉलर के लक्ष्य से कम है। परंतु 2016 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मदद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पूतिन के बीच हुई 2016 की बातचीत इन आर्थिक संबंधों को सकारात्मक रूप में देखा जा रहा है।

तेज़ी से बदल रही दुनिया में रूस और भारत दोनों के लिये कई प्रमुख चुनौतियां हैं। दोनों ही देशों ने बहु भू-रणनीतिक हितों का विकास किया है और अपनी बातचीत के दायरे का विस्तार किया है। रूस चीन के साथ निकट संबंध रखता है जैसे कि अमरीका के भारत के साथ हैं। परंतु दोनों का मानना है कि वैश्वीकृत दुनिया में पुरानी निर्भरता समाप्त हो गई है और नई-अंतर-निर्भरता संभव है जहां प्रत्येक देश दूसरे के प्रमुख हितों को नुकसान पहुंचाये बगैर अलग-अलग क्षेत्रों में संबंध कायम कर सकता है। इस प्रकार रूस के चीन के साथ और भारत के अमरीका के साथ संबंधों से भारत रूस संबंधों को क्षति नहीं होगी परंतु संबंधों की मध्यस्थता करने की योग्यता में वृद्धि होगी। ब्रिक्स के निर्माण में भारत-रूस संबंधों की प्रमुख भूमिका रही है। दोनों देश इस बात को समझते हैं और द्विपक्षीय तथा अन्य मुद्दों को यथासंभव सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करते हैं। नि:संदेह चुनौतियां बनी रहेंगी।

इन स्थितियों में भारत को रूस के साथ अपनी शक्ति के पुननिर्माण और सामूहिक चिंताओं को दूर करने के लिये काम करना होगा। उन्हें आतंकवाद पर संयुक्त रणनीति के लिये गुप्त सूचनाओं के आदान प्रदान करने पर अपने पूर्व के समझौतों में जान फूंकनी होगी। यदि भारत को पाकिस्तान से सरकार प्रायोजित आतंकवाद की चिंता है, रूस उन देशों का समर्थन कर रहा है जो कि पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में आतंकी समूहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन कर रहे हैं। भारत को उन देशों की अधिक कड़ाई से भत्र्सना करनी होगी जो कि सत्ता परिवर्तन या स्थानीय राजनीति को मुद्दा बनाकर पश्चिम एशिया में आतंकी समूहों को आगे बढऩे में सहयोग कर रहे हैं।

भारत-रूस संबंधों को दोनों देशों में लोकप्रियता और आर्थिक समर्थन प्राप्त है। भारत-रूस संबंध व्यापक और ऐतिहासिक हैं और वे आर्थिक, सामाजिक, भू-रणनीतिक हितों सभी क्षेत्रों को लेकर हैं। जहां तक रूस का संबंध है, ऐसा देखा जा सकता है कि इसमें कुछ रणनीतिक बदलाव है। परंतु रूस को उस स्थिति में धकेला गया है। वास्तव में रूस जानता है कि भारत अब भी उसका सबसे विश्वसनीय साझेदार है। उनका भारत को लेकर हितों का कोई टकराव या व्याकुलता नहीं है जैसा कि वे अन्यों के बारे में करते हैं। भारत ने बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। इस व्यवस्था ने भारत और रूस दोनों को, चीन जैसे अन्य देशों की यदि बात न भी करें, बहुत फायदा पहुंचाया है। इसे बरकरार रखने के लिये भारत और रूस को सक्रिय रणनीतिक और आर्थिक सहयोग करने की आवश्यकता है, परंतु दोनों को इसके लिये प्रयास करने होंगे।

(अनुराधा एम चिनॉय सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा व्यक्त किये गये विचार अपने हैं)