संपादकीय लेख


Volume-31, 3-9 November 2018

 

विकास के  जरिए बदलता पूर्वोत्तर

दीपक दीवान

इस वर्ष जुलाई में शिलांग में पूर्वोत्तर परिषद के 67वें पूर्ण सत्र में इस क्षेत्र की जारी विकास गतिविधियों को और बढ़ावा दिया गया. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में पूर्वोत्तर परिषद की यह पहला सत्र था. उल्लेखनीय है कि जून 2018 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रस्ताव पारित कर केंद्रीय गृह मंत्री को पूर्वोत्तर परिषद का पदेन अध्यक्ष मनोनीत करने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया था और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह को फिर से परिषद का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था.

पूर्ण सत्र में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री, इस क्षेत्र के आठ राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया. बैठक को संबोधित करते हुए गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नए भारतके निर्माण का मार्ग विकसित और शांतिपूर्ण नए पूर्वोत्तरसे होकर गुजरेगा. उन्होंने आगे कहा कि नया पूर्वोत्तरबेहतर सडक़ संपर्क और सूचना प्रौद्योगिकी से बनेगा और इन क्षेत्रों में युवाओं को उनके घर के निकट रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे. रोज़गार और आय के अवसर सृजित होने से क्षेत्र में विघटनकारी गतिविधियों से निपटने में मदद मिलेगी. उन्होंने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने की आवश्यकता पर बल दिया.

मिजोरम इस क्षेत्र के शांतिपूर्ण राज्यों में से एक है, जिसे खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में प्रथम विदेशी संयुक्त उद्यम स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है. मार्च 2018 में मिजोरम में इस्राइल के विशेषज्ञतापूर्ण सहयोग के साथ कृषि केंद्र की स्थापना हुई. इस्राइल के सहयोग से स्थापित यह केंद्र समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र में अपनी तरह का पहला केंद्र है. नींबू प्रजाति के फलों के प्रसंस्करण के लिए विशेष रूप से बनाए गए इस केंद्र पर करीब दस करोड़ रुपये की लागत आई है. यह मिजोरम में स्थित है, लेकिन समूचे क्षेत्र की जरूरतें पूरी करेगा. यह केंद्र समूचे पूर्वोत्तर क्षेत्र में बागवानी में लगे किसानों को लाभ पहुंचाएगा और प्रोत्साहित करेगा.

यह कृषि केंद्र पूर्वोत्तर क्षेत्र को शेष भारत के समान विकसित करने के उपाय करेगा. उसके इस प्रयास में मदद करने के लिए भारत सरकार ने भी फरवरी 2018 में पूर्वोत्तर के लिए एक पृथक नीति फोरम का गठन किया था, जिसका लक्ष्य इस क्षेत्र में स्थायी आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है. इस फोरम का सचिवालय पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय में स्थापित किया गया है और सभी पूर्वोत्तर राज्यों, उनके मुख्य सचिवों और सम्बद्ध केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों के अलावा आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों के निदेशकों और विशेषज्ञों को इसके सदस्य के रूप में शामिल किया गया है. नीति फोरम की पहली बैठक 10 अप्रैल 2018 को अगरतला में हुई. इसकी अध्यक्षता पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री जितेंद्र सिंह और नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री राजीव कुमार ने संयुक्त रूप से की. अपने संबोधन में श्री राजीव कुमार ने ‘‘हीरा’’ (यानी हाईवेज़, इनलैंड वाटरवेज़, रेलवेज़ और एयरवेज़ अर्थात् राजमार्ग, अंतरदेशीय जल मार्ग, रेलमार्ग और वायुमार्ग) की धारणा पर आधारित विकास परियोजनाओं पर प्रकाश डाला, जिसकी परिकल्पना प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने की है. उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास, बागवानी, पर्यटन, खाद्य प्रसंस्करण, बांस का उपयोग और पूर्वोत्तर में बनी अन्य वस्तुओं जैसे क्षेत्रों की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिन पर विकास परियोजनाओं में बल दिया जाना है. इन सभी का विकास समयबद्ध तरीके से किया जाएगा. नीति फोरम की कार्य सूची में सडक़, रेल और हवाई संपर्क में सुधार के लिए कार्य नीतियां, क्षेत्र में जल विद्युत की मौजूदा संभावनाओं का उपयोग करने के लिए हाइडल ड्रीम-वे का विकास, कृषि और अनुषंगी क्षेत्रों, जैसे कार्बनिक खेती, सब्जियों, फलों, मसालों, जड़ी बूटियों की खेती, किसानों के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, फसल कटाई परवर्ती नुकसान को न्यूनतम करने के उपाय, फसल बीमा के अंतर्गत अधिक क्षेत्र की कवरेज, दूध उत्पादन में वृद्धि, जारी सिंचाई परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करना, पारिस्थितिकी पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन, साहसिक पर्यटन को प्रोत्साहन, पूर्वोत्तर पर्यटन विकास परिषद (एनईटीडीसी) को सुदृढ़ बनाना शामिल है.

पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किया गया अन्य प्रमुख निर्णय 90 वर्ष पुराने 1927 के भारतीय वन अधिनियम में संशोधन करना है. यह कानून ब्रिटिश सरकार ने अधिनियमित किया था, जिसमें बांस को एक वृक्षके रूप में परिभाषित किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने अधिनियम को संशोधित करने का निर्णय किया और आर्थिक गतिविधियों के लिए गैर-वन भूमि से बांस काटने के लिए वन विभाग की अनुमति की शर्त हटा दी गई. इस कदम का असंख्य पूर्वोत्तरवासियों ने स्वागत किया, जिनका यह मानना था कि इससे गैर-कृषकों के लिए भी रोज़गार और उद्यमिता के नए अवसर पैदा होंगे. मोदी सरकार ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय यह किया कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में परियोजनाओं के लिए शत प्रतिशत धन केंद्र सरकार द्वारा दिया जाएगा, जिनके लिए पहले केंद्र-राज्य सरकार द्वारा

90 : 10 के अनुपात से वित्त पोषण किया जाता था. पूर्वोत्तर क्षेत्र के अधिकतर राज्य केंद्र से अनुदान पर निर्भर रहते हैं और वे अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी भी नहीं जुटा पाते हैं.

एक अन्य प्रमुख पहल के रूप में पिछले वर्ष पूर्वोत्तर परिषद और विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), कपड़ा मंत्रालय के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के बेंत और बांस में प्रछन्न क्षमता का दोहन करने के उपायों का प्रावधान है. समझौता ज्ञापन से समग्र विकास के लिए अपेक्षित प्रशिक्षित कार्मिकों, प्रौद्यागिकी सम्प्रेषण, विपणन सहायता और संस्थागत सहायता के जरिए पूर्वोत्तर क्षेत्र के बेंत और बांस क्षेत्र का समन्वित और समावेशी विकास हो सकेगा. समझौता ज्ञापन से समूचे देश में बांस को एक क्षेत्र के रूप में प्रोत्साहित करने और इसके लिए लोगों को एकजुट करने के अभियान में समन्वय स्थापित किया जा सकता है.

पूर्वोत्तर परिषद और विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) ने मिल कर असम स्थित बेंत और बांस प्रौद्योगिकी केंद्र और त्रिपुरा स्थित बांस एवं बेंत विकास संस्थान को न केवल इस क्षेत्र अथवा देश में बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में प्रोन्नत करने का काम अपने हाथ में लिया है.

पूर्वोत्तर क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व सहित पड़ोसी देशों के साथ जोडऩे वाली प्रमुख बहुराष्ट्रीय परियोजनाओं में कला दान के मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट, भारत-म्यामां-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना, रहि-टिड्डम सडक़ परियोजना और तामू-मांडले सडक़ परियोजना शामिल है. इसी प्रकार ट्रांस-एशियन रेलवे नेटवर्क के हिस्से के रूप में अगरतला-अखोरा (बंगलादेश) के बीच 15.06 किलोमीटर लंबी रेल लाइन परियोजना भी निर्माणाधीन है. इसके पूरा हो जाने के बाद कोलकाता और अगरतला के बीच यात्रा समय में महत्वपूर्ण कमी आएगी और साथ ही त्रिपुरा एवं शेष पूर्वोत्तर के लोगों के लिए आर्थिक अवसर पैदा होंगे.

सडक़ों को उन्नत बनाने के कार्यक्रम के अंतर्गत पूर्वोत्तर के लिए 4,800 किलोमीटर लंबी सडक़ों के निर्माण को मंजूरी दी गई है और पूर्वोत्तर परिषद का करीब 30 प्रतिशत बजट इस क्षेत्र में परिवहन और संचार ढांचे में सुधार के लिए समर्पित है.

भारतमाला परियोजना के अंतर्गत 5,301 किलोमीटर लंबी सडक़ों के सुधार की मंजूरी दी गई है, जिसमें से 3,246 किलोमीटर लंबी सडक़ें पूर्वोत्तर आर्थिक गलियारा परियोजना के अंतर्गत आती हैं. ग्यारह अंतर-राज्य बस टर्मिनलों में से नौ का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है. तीन अंतर-राज्य ट्रक टर्मिनल बनाए गए हैं, जिनमें से दो असम और एक नगालैंड में है, जिनका निर्माण कार्य पूरा हो गया है. त्रिपुरा में एक अंतर-राज्य ट्रक टर्मिनल का कार्य निर्माणाधीन है.

इस क्षेत्र में एक अन्य प्रमुख पहल जहाजरानी और अंतरदेशीय जल मार्गों के विकास के लिए की गई है. जहाजरानी और नौवहन प्रयोजनों के लिए बराक नदी का विकास दो चरणों में किया जा रहा है. प्रथम चरण के अंतर्गत करीमगंज और बदरपुर टर्मिनलों के उन्नयन सहित भांगा और सिल्चर के बीच 71 किलोमीटर लंबे मार्ग का विकास शामिल है, जिसके लिए निर्माण कार्य शुरू हो गया है. बराक नदी में गाद निकालने का काम नवंबर 2017 में शुरू हुआ और अभी तक जारी है. चरण 2 के अंतर्गत सिल्चर और लखीपुर के बीच 50 किलोमीटर लंबे हिस्से का विकास शुरू किया जाएगा.

गुवाहाटी हवाई अड्डे पर तीन हैंगरों एप्रन का निर्माण और जोरहाट हवाई अड्डे पर एप्रन के विस्तार का कार्य पूरा कर लिया गया है. तीन अन्य हवाई अड्डों पर निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है. अरुणाचल प्रदेश में तेजू हवाई अड्डे का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो गया है. गुवाहाटी में नए इंटिग्रेटिड  टर्मिनल भवन की आधारशिला भी रखी गई और निर्माण कार्य शुरू किया गया. नागर विमानन मंत्रालय ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में 92 नए विमान मार्गों की मंजूरी दी है, जिन पर उड़ान कार्यक्रम के अंतर्गत दूसरे दौर में विमान सेवाएं शुरू की जाएंगी. सिक्किम में नए पाक्योंग ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का निर्माण कार्य पूरा हो गया है.

सदियों पुराने मीटर गेज रेल मार्गों को आधुनिक ब्रॉडगेज में बदला जा रहा है. पिछले 4 वर्षों में 970 किलोमीटर रेल मार्ग बदला जा चुका है. रेलवे ने अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम को अपने नेटवर्क में शामिल किया है और रेलवे का प्रयास है कि कुछ और राज्यों की राजधानियों तक रेल मार्ग का विस्तार किया जाए. वास्तव में प्रतिष्ठित राजधानी एक्सप्रेस दिल्ली से अरुणाचल प्रदेश में नाहरलगुन तक सप्ताह में दो बार सेवाएं प्रदान कर रही है.

पूर्वोत्तर परिषद की विभिन्न परियोजनाओं की सफलता की एक अन्य कहानी पूर्वोत्तर समुदाय संसाधन प्रबंधन परियोजना (एनईआरसीओ-आरएमपी) है, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली एक लाख 19 हजार महिलाओं का कायाकल्प कर दिया है. यह परियोजना अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष की सहायता से चलाई जा रही है, जो एक स्थायी आजीविका परियोजना है. इस परियोजना के अंतर्गत असम, मेघालय और मणिपुर के छह सर्वाधिक दुर्गम और दूर दराज के पर्वतीय जिलों के 1326 गांवों को कवर किया गया. बाद में अरुणाचल प्रदेश में 5 अन्य पिछड़े जिलों तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग तथा मणिपुर में चंदेल और चूड़ाचांदपुर के 1177 गांवों तक पहुंच कायम की गई.

मिजोरम में 913.63 करोड़ रुपये की लागत से तुईराइल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर संयंत्र का निर्माण कार्य पूरा किया गया और इससे अब विद्युत उत्पादन शुरू हो गया है. पूर्वोत्तर परिषद ने क्षेत्र में 694.5 मेगावाट क्षमता के विद्युत संयंत्रों की संस्थापना और 2540.41 किलोमीटर ट्रांसमिशन एवं वितरण लाइनों की स्थापना में भी मदद की है.

धौला-सादिया पुल, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष 26 मई को किया था, इस बात का प्रतीक बन गया है कि केंद्र सरकार नए भारत के निर्माण में पूर्वोत्तर को अग्रिम पंक्ति में लाने और विकास का अंतराल दूर करने के प्रति वचनबद्ध है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. ई-मेल: deepakdewan56yahoo. co.in व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)