संपादकीय लेख


volume-38,22-28 December 2018

 

 

 

अटल बिहारी वाजपेयी और उनका

 

सुशासन मॉडल

डॉ. विवेक कुमार मिश्रा

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी, नि: संदेह भारत के सबसे अधिक जाने पहचाने और व्यापक तौर पर स्वीकार्य नेताओं में से एक थे, जिन्होंने 16 अगस्त, 2018 को अपनी अंतिम सांस ली. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे इस प्रखर वक्ता ने अपने जीवन में भारत के विकास को निकट से देखा. वे लाखों लोगों के चहेते थे और उन्होंने राजनीति, गद्य और पद्य के क्षेत्र में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिये ख्याति हासिल की थी.

विश्व ने अनेक महान नेताओं को जन्म दिया है, जिन्हें समाज के शिखरतम पायदान का सम्मान प्राप्त हुआ, परंतु बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके आलोचकों से भी सम्मान मिला हो, और अटल बिहारी वाजपेयी इनमें से एक थे. वाजपेयी जी ने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर देश की सेवा की, एक बार 1996 में केवल 13 दिनों के लिये, और इसके बाद 1999 में 11 महीनों के लिये, इसके बाद उन्होंने 1999-2004 तक एक पूर्ण कार्यकाल के लिये देश की सेवा की. अटल जी ने लोक सभा में दस बार संसद सदस्य के तौर पर सेवा की और अपने राजनीतिक कार्यकाल के दौरान दो बार राज्य सभा के लिये चुने गये. उन्होंने पूरे कार्यकाल के लिये भारत के पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनकर इतिहास की रचना की. उन्हें 2015 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्नसे सम्मानित किया गया.

अटल जी भारत के पुनर्जीवन के लिये समर्पित एक विशिष्ट सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक समर्पित स्वयंसेवकथे.

आरएसएस के साथ उनके जुड़ाव के संबंध में, अटल जी ने एक बार अमेरिका में प्रमुखता से कहा था कि वह कल भारत के प्रधानमंत्री रहें न रहें, परंतु कोई भी उनके एक स्वयंसेवक बने रहने के अधिकार को नहीं छीन सकता.उन्होंने आरएसएस के बारे में लिखा था, ‘आरएसएस केवल व्यक्तियों को परिवर्तित नहीं करता, बल्कि सामूहिक मानसिकता को बदलता है. यह आरएसएस के लोकाचार का सौंदर्य है. हमारी आध्यात्मिकता में कोई व्यक्ति महान ऊंचाइयों को छू सकता है.वे हिंदुत्व की विचारधारा में दृढ़ विश्वास रखते थे. वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक थे.

डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी और पंडित दीन दयाल उपाध्याय के राष्ट्र सेवा मूल्यों और मज़बूत परंपराओं ने उन्हें प्रभावित किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य के तौर पर, अटल बिहारी वाजपेयी पहले ही 16 वर्ष की आयु से राजनीति में सक्रिय हो गये थे. 1951 में, उन्होंने आरएसएस की राजनीतिक शाखा, भारतीय जन संघ के लिये काम करना शुरू कर दिया था.

 

सुशासन दिवस

अटल बिहारी वाजपेयी वह नेता थे जिन्होंने राजनीति को मूल्यों और भारतीय परंपराओं से जोड़ते हुए सुशासन की आधारशिला रखी थी. अटल जी के 90वें जन्म दिन को वर्ष 2014 में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुशासन दिवसके तौर पर घोषित किया था. प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के लोगों को पारदर्शी, प्रभावशाली और जवाबदेह शासन प्रदान करने की प्रतिबद्धता के जरिए वाजपेयी जी के मार्ग का अनुकरण करने का फैसला किया. मैं महसूस करता हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म दिन को हर वर्ष सुशासन दिवस के तौर पर मनाया जाना भारत के लोगों के लिये बड़े सम्मान की बात है.

सुशासन से आशय एक विकासोन्मुख, पारदर्शी और सेवाओं की शीघ्रता से तथा आसानी से सुपुर्दगी पर आधारित सरकार से है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारे प्रिय नेता के जन्म दिवस पर सुशासन दिवस को हम इस देश के लोगों को पारदर्शी, प्रभावशाली और जवाबदेह शासन की हमारी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं.उन्होंने यह भी कहा कि अटल जी के कार्यकाल के दौरान विभिन्न मुद्दों से निपटने में उनकी कार्यकुशलता राष्ट्र के लिये बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई है.यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनके जन्म दिन को सुशासन दिवसके तौर पर मनाने का निर्णय लिया है. अटल जी के जन्म दिन को सुशासन दिवस के तौर मनाये जाने का उद्देश्य निम्नानुसार है:

.      पारदर्शी और जि़म्मेदार प्रशासन का निर्माण करना

.     आम आदमी का कल्याण सुनिश्चित करना

.      सुशासन के लिये अच्छी और प्रभावी नीतियां तैयार करना

.      लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन प्रदान करना

.      लोगों को देश में एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशाासन प्रदान करने के लिये सरकार की प्रतिबद्धता के   बारे में जानकारी देना

.        देश में वृद्धि और विकास को बढ़ाना

.        नागरिकों को शासन प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाने के लिये सरकार के निकट लाना

अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के तौर पर अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान ऊपर वर्णित उद्देश्यों के लिये प्रयासरत रहे. उनके जन्म दिन को सुशासन दिवस के तौर पर मनाया जाना उनके संपूर्ण जीवन की सेवा का साक्ष्य होगा. इसके अलावा, सुशासन दिवस मनाया जाना भारतीय सरकार को लगातार यह याद दिलाता रहेगा कि सत्ताधारी दल निष्पक्ष, विकासोन्मुख होना चाहिये और विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिये जिनके लिये वाजपेयी जीवन पर्यन्त समर्पित रहे थे.

 

आर्थिक शासन से वाजपेयी का संबंध

अपने कार्यकाल के दौरान, वाजपेयी जी ने तुच्छ राजनीतिक हितों को साधने की बजाए देश के विकास के उद्देश्य से जुड़े कार्यक्रमों को प्रमुखता दी. सुशासन का बुनियादी विचार वाजपेयी ने 7 सितंबर, 2000 को न्यूयार्क में एशिया सोसाइटी में अपने भाषण में आगे बढ़ाया था. उन्होंने कहा कि व्यक्ति के सशक्तिकरण का अर्थ है राष्ट्र का सशक्तिकरण, और सशक्तिकरण तीव्र सामाजिक बदलाव के साथ तीव्र आर्थिक वृद्धि से किया जा सकता है’. वास्तव में, इन शब्दों से देश के प्रति उनका योगदान परिलक्षित होता है. उन्होंने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा बल्कि समाज के वंचित वर्ग को ऊपर उठाने के लिये कई सामाजिक सुधारों की भी शुरूआत की. वाजपेयी सरकार के दौरान, भारत ने आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर अपनी सबसे तीव्र वृद्धियों में एक को अनुभव किया. उनके कुशल और दूरदर्शी मार्गदर्शन में संचालित सुधार कार्यक्रमों के कारण भारत का सूचना प्रौद्योगिकी में एक उभरती शक्ति के तौर पर उदभव हुआ. वाजपेयी जी को दृढ़ विश्वास था कि हमारे देश के प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक समुदाय और प्रत्येक नागरिक को भारत की खुशहाली और प्रगति का लाभ मिलना चाहिये. उन्होंने गऱीबों को सस्ते खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिये अंत्योदय अन्न योजना की शुरूआत की और आम आदमी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई.

अटल जी की सबसे यादगार उपलब्धि महत्वाकांक्षी सडक़ परियोजनाएं थीं जो उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुजऔर प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक़ योजनाके नाम से शुरू की थीं. स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्गों के नेटवर्क के जरिए चेन्नै, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोड़ता है जबकि प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक़ योजना संपर्क रहित गांवों के लिये सभी मौसम की सडक़ों के नेटवर्क के तौर पर तैयार की गई थी. स्वर्णिम चतुर्भुज को 5 वर्षों की अवधि के भीतर पूरा किया गया था. रोज़ाना 11 कि.मी. राजमार्गों का निर्माण किया गया.  दिल्ली मेट्रोपरियोजना का शुभारंभ वाजपेयी जी ने 2002 में किया.

वाजपेयी जी आर्थिक सुधारों की शुरूआत करके भारत को नई ऊंचाइयों पर ले गये. 1998 से 2004 तक उनके कार्यकाल के दौरान, भारत ने सकल घरेलू उत्पाद की दर आठ प्रतिशत बनाये रखी, मंहगाई दर चार प्रतिशत के भीतर थी और विदेशी मुद्रा भण्डार बढ़ता जा रहा था. व्यवसायों और उद्योग के संचालन में सरकारी भूमिका कम करने की अटल जी की प्रतिबद्धता एक अलग विनिवेश मंत्रालय बनाये जाने के तौर पर परिलक्षित होती थी. सर्वाधिक महत्वपूर्ण विनिवेशों में भारत एल्युमीनियम कंपनी (बाल्को) और हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कार्पोरेशन लिमिटेड और वीएसएनएल शामिल था. वाजपेयी सरकार का एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम लागू करना था जिसका उद्देश्य वित्तीय घाटे को नीचे लाना था.

दूरसंचार क्रांति में वाजपेयी का योगदान

वाजपेयी सरकार की नई दूसंचार नीति ने राजस्व हिस्सेदारी व्यवस्था के साथ दूरदसंचार कंपनियों के लिये नियत लाइसेंस फीस को बदलकर भारत में दूरसंचार क्रांति को जन्म दिया. नीति निर्माण और सेवा के प्रावधान को अलग करने के लिये भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का सृजन किया गया. दूरसंचार विवाद निपटारा अपीलीय अधिकरण के गठन ने भी सरकार को विनियामक और विवाद निपटारे की भूमिकाओं सेे अलग कर दिया. सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय टेलीफोनी पर विदेश संचार निगम लिमिटेड के एकाधिकार का भी अंत कर दिया. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने देश में टेलीफोन और इंटरनेट संपर्क मज़बूत करने पर ज़ोर दिया. ये अटल जी ही थे जिन्होंने एक ऐसे भारत का आधार तैयार किया था जिससे कि वह 21वीं सदी में वैश्विक नेतृत्व का आवरण बन सके. उनकी सरकार की भविष्यगत आर्थिक नीतियों और सुधारों से अनेक भारतीयों की खुशहाल सुनिश्चित हो गई. अगली पीढ़ी की अवसंरचना विशेषकर सडक़ों और दूरसंचार के क्षेत्र में उनके ज़ोर ने हमारे देश के आर्थिक और सामजिक सशक्तिकरण में योगदान किया.

एक समर्पित प्रजातंत्रवादी के रूप में वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी एक समर्पित प्रजातंत्रवादी थे जो कि लोकतंत्र के नियमों से शासित थे और इसके संस्थानों को भी अपनी भूमिका निभाने में सहायता की. 2004 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठन की हार के बाद, उन्होंने कहा, ‘मेरी पार्टी और गठबंधन भले ही हार गये हों, लेकिन भारत और भारत के लोकतंत्र की विजय हुई है.एक सच्चे प्रजातंत्रवादी के स्मारक पर अंकित करने के लिये यह एक प्रतीक है. प्रधानमंत्री के तौर पर, उन्होंने उल्लेख किया था कि यह मज़बूत सरकार नहीं थी जिसकी सरकार को आवश्यकता थी बल्कि एक अच्छा शासन-लोकतंत्र के नियमों से शासित शासन था.

वाजपेयी के शासन के मॉडल का एक ऐसी सरकार के तौर पर उल्लेख किया जा सकता है जिसने भारत के आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया था. उनके नेतृत्व की महानता सदैव राष्ट्र केंद्रित और लोगों के कल्याण के लिये थी. वाजपेयी जी ने सुशासन के लिये एक महत्वपूर्ण आदर्श की स्थापना की थी. यह सदैव सहभागितापूर्ण, सहमति उन्मुख, पारदर्शी, जिम्मेदार, प्रभावी और दक्षता से परिपूर्ण था. यह न्यायसंगत और समावेशी भी था और नियमों का पालन किया जाता था. यह समाज की वर्तमान और भावी ज़रूरतों के लिये भी उत्तरदायी था. वाजपेयी की निविर्विवाद देशभक्ति और उनका मातृभूमि के प्रति प्यार वह बाते हैं जो किंवदंतियों को जन्म देती हैं. वह भारतीयता को गर्व से सीने को लगाते थे और गर्व के साथ घोषणा करते थे कि वह  एक महान प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं. भारतीय विचारधारा वेदों, संतों और ऋषियों की परंपरा पर आधारित है जिनमें भारत की आध्यात्मिक तात्विकता और सांस्कृतिक जड़ें स्थित हैं. वाजपेयी जी ने वास्तव में संपूर्ण पारदर्शी सत्यनिष्ठा के अपने गुणों को दर्शाया

‘‘आर्थिक सुधारों और विकास योजनाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता, यदि गऱीब और वंचित लोग अपना जीवन बेहतर बनाने में सक्षम नहीं होते हैं. इस बारे में अनेक क्षेत्रों में काम करने की ज़रूरत है. कानूनों की भरमार से, विशेषकर नगरीय, पुलिस और वन संबंधी कानून, जिनमें से अनेक में कई दशकों से कोई सुधार नहीं किया गया है, गऱीबों के कई न्यायसंगत व्यवसाय भी अवैध हो जाते हैं. जबकि ऋण प्रदान करने की सूक्ष्मवित्त पद्धति पूर्णत: व्यवहार्य पाई गई है, व्यावसायिक बैंकिंग प्रणाली को अभी गऱीबों को ऋण प्रदान करने के वास्ते सूक्ष्मवित्त की मुख्यधारा में लाया जाना है. लघु उद्योग (एसएसआई) क्षेत्र, जिसमें अप्रतिम रोजग़ार की संभावना है, को ऋण की व्यवहार्यता, तकनीकी और विपणन सहयोग, तथा वैश्वीकरण के संदर्भ में इसके तुलनात्मक लाभ को प्राप्त करने सहित, अनेक चुनौतियों का सामाना करना पड़ता है. ये कुछेक बातें हैं, जिनमें व्यापक सुधार करने की आवश्यकता है.’’

‘‘शहरीकरण एक निरंतर प्रक्रिया है. तद्नुसार, हमारे कस्बों और शहरों में रहन-सहन की स्थितियों में सुधार अवश्य होना चाहिये. इसके लिये वित्तीय संस्थानों से संसाधन जुटाने और नगरीय सेवाओं के लिये उपयोगकर्ता शुल्कों के लिये नगरीय वित्तीय व्यवहारों में सुधार करना अपेक्षित होगा. ऐसे सुधारों का लाभ उठाने के लिये नगरपालिकाओं और राज्यों को योजना संसाधनों का प्रवाह होना चाहिये.’’

‘‘शासकीय सुधार, ई-गवर्नेंस के लिये विशेष संदर्भ के साथ-दसवीं योजना का एक केंद्रीय संदेश, जिसको लेकर अनेक मुख्य मंत्रियों ने आवाज़ उठाई है, भारत के चहुंमुखी विकास को तेज़ करने के लिये शासकीय सुधारों की आवश्यकता है. हमारे अनुभव कहते हैं कि पर्याप्त संसाधन होना काफी नहीं है, और मुफलिस शासन व्यवस्था तथा कार्यान्वयन की बाधाओं पर उत्कृष्ट नीतियां और कार्यक्रम भारी पड़ सकते हैं. हमें एक गतिशील और लचीली बाज़ार अर्थव्यवस्था के विस्तार के वास्ते हमारे प्रशासनिक, न्यायिक और आंतरिक सुरक्षा तंत्रों के कामकाज में महत्वपूर्ण सुधार करने की आवश्यकता है. यह एक मुद्दा है, जिसके लिये हम सभी चिंतित हैं. चूंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न सांस्थानिक ढांचे रखना संभव नहीं होता है, मैं इस मामले पर विस्तार से विचार करने और शासन में सुधारों को लेकर प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु, राष्ट्रीय विकास परिषद को सुझाव देने के लिये इसकी एक उप समिति के गठन का प्रस्ताव करता हूं, जिन्हें एक समान रूप से लागू किया जा सके. ई-गवर्नेंस पर, जो कि बेहतर शासन के लिये महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है, दसवीं योजना में मुख्य ज़ोर दिया गया है. मैं उन राज्यों और केंद्रीय सरकार के विभागों को बधाई देता हूं, जो इस संबंध में पहले ही बड़ी पहलें  कर चुके हैं. मुझे इस तथ्य को जानकर खुशी हुई है कि न्यायिक तंत्र ने भी न्यायिक प्रक्रियाओं में तेज़ी लाने के लिये ई-गवर्नेंस की आवश्यकता और संभावना को स्वीकार किया है. मैं सभी से इसके कार्यान्वयन का आह्वान करता हूं.

 

 

प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित, अटल बिहारी वाजपेयी- टूअर्डस डेवलपड इकोनॉमी: डिफाइनिंग मूमैंट्सपुस्तक से उद्धरण. खऱीदने के लिये कृपया संपर्क करें: फोन: 011-24367260, 234365609

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 समानता और न्याय पर आधारित उनके सिद्धांतों को वैश्विक तौर पर मान्यता दी जाती थी. उनके निर्णय की अनुभूति की पुष्टि सिद्धांतों की रक्षा के लिये सत्ता के बलिदान के लिये तैयार रहने की उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति से स्वत: परिलक्षित हो जाती है. वाजपेयी जी अपनी राजनीतिक मान्यताओं को लेकर दृढ़ संकल्पिक थे, परंतु सदैव दूसरों की बातों को स्थान और सम्मान देते थे. उन्होंने संसद में बहस के उच्च मानदंड स्थापित किये. उनकी सरलता और सत्यनिष्ठा में, उनकी गरिमा और सहानुभूति में, और पद से निजी तौर पर न जुड़े होने की अनुभूति ने उन्हें युवाओं के लिये प्रेरणा बना दिया.

अटल जी की राजनीतिक यात्रा की अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियां

.    अटल बिहारी वाजपेयी 1977 में उस वक्त केंद्र में मंत्री बने जब पहली बार जनता पार्टी के नेतृत्व में गठबंधन सत्ता में आया. वे उस वक्त विदेश मंत्री बनाये गये. विदेश मंत्री के तौर पर, वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देने वाले पहले व्यक्ति बन गये.

.    अटल जी के प्रयासों से ही भारत परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बना और 11 मई 1998 को पोखरण में उन्होंने परीक्षण कराये. अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत की प्रतिष्ठा को स्थापित किया और दुनिया में भारत का स्थान बदला.

.   अटल जी ने भारत के 56वें स्वतंत्रता दिवस पर चंद्रयान-1 परियोजना की घोषणा की. इसने भारतीय अंतरिक्ष मिशन में प्रमुखता दिलाई. वाजपेयी जी ने कहा, ‘हमारा देश अब विज्ञान के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरने के लिये तैयार है. मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत 2008 में चंद्रमा पर अपना स्वयं का अंतरिक्ष यान भेजेगा. इसका नाम चंद्रयान रखा गया है.

सुशासन और प्रधानमंत्री मोदी

अटल बिहारी वाजपेयी जी की तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कॅरिअर की शुरूआत आरएसएस के कार्यकर्ता के तौर पर की थी. यह भारतीय लोकतंत्र की महानता है कि दोनों ही देश के प्रधानमंत्री बने. दोनों ही समान विचारधारा और पृष्ठभूमि से आये थे. प्रधानमंत्री मोदी ने वाजपेयी जी की विरासत को आगे बढ़ाया. वाजपेयी जी की तरह, मोदी लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, जो शासन करते हैं वे शासक नहीं हैं, वे सेवक होते हैं. वे अपने आप को प्रधानमंत्रीनहीं, लोगों का प्रधान सेवकपुकारते हैं. वाजपेयी की तरह मोदी कहते हैं सुशासन लोगों को विकास के केंद्रबिंदु में लाना होता है,’ परंतु भ्रष्टाचार और कालाधन सुशासन में बाधाएं बनी हुई हैं.इन्होंने नागरिकों के अधिकारों का हनन किया है. अत:, मोदी ने विमुद्रीकरण जैसे विभिन्न उपायों के जरिए इन मुद्दों के खि़लाफ  लड़ाई छेडऩे की घोषणा कर डाली है. सुशासन में लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने का दायित्व सरकार पर है. यहां तक कि समाज के सर्वाधिक कमज़ोर वर्गों की भी देश के विकास में समान रूप से भागीदारी होनी चाहिये. यह पारदर्शी, दक्ष और जिम्मेदारीपूर्ण होने के बारे में है, यह एक स्वच्छ सरकार, भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार के बारे में है. सुशासन के लिये एक महत्वपूर्ण कदम सरकार में प्रक्रियाओं और क्रियाकलापों का सरलीकरण है ताकि समूची व्यवस्था को पारदर्शी और तीव्र बनाया जा सके. इस संबंध में प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया, माईगोव डॉट इन, जीवन प्रमाण, ई-भाषा, ई-संपर्क, ई-ग्रीटिंग्स, जीएसटी जैसी विभिन्न पहलों की शुरुआत की है और दूसरी नीतिगत पहलों का कार्यान्वयन किया है जो कि हाल में मोदी सरकार ने देश में सुशासन के वास्ते शुरू की हैं. ऐसी किसी भी पहल की शुरुआत के पीछे का मुख्य उद्देश्य यह है कि सरकार और नागरिकों के बीच अंतर को पाटने के लिये प्रौद्योगिकी को एक औज़ार के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाना चाहिये. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य देश को डिजिटली तौर पर सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था के तौर पर परिवर्तित करना है. डिजिटल इंडिया बदलाव की प्रकृति में है और यह सुनिश्चित करेगा कि सरकारी सेवाएं नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध हों.

सुशासन से आशय लोक उद्यमों को व्यावसायिक सिद्धांतों पर निर्णय लेने के लिये उन्हें प्रबंधकीय स्वायत्तता प्रदान करके कार्यनिष्पादन में सुधार लाना है. इस संदर्भ में वाजपेयी जी की तरह प्रधानमंत्री मोदी ने सरकारी एयरलाइन्स, एअर इंडिया और सरकारी दूरसंचार कंपनी भारत संचार निगम तथा भारतीय नौवहन निगम के कार्यनिष्पादन में आये बदलाव का उल्लेख किया. इसी तरह की बात भारतीय डाकघरों को लेकर है, जो कि सूचना प्रौद्योगिकी, विशेषकर सोशल मीडिया के विस्तार के कारण असंगत हो चुके हैं. सरकार डाक घरों को भुगतान बैंकों में परिवर्तित करने के लिये कदम उठा रही है.

सुशासन के भाग के तौर पर, प्रधानमंत्री मोदी ने जन धन योजना बैंक खातों को आधार कार्डों से जोडऩे पर ज़ोर दिया. सीधे लाभ अंतरण, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक भुगतान, ये सभी कम नकदी प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जो सभी सुशासन का हिस्सा हैं. इसके पीछे की अवधारणा बिचौलियों के जरिए होने वाले भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना और सुविधाजनक भुगतान और प्राप्तियों की सुविधा प्रदान करना है. प्रधानमंत्री मोदी ने वाजपेयी जी द्वारा दर्शाए गये सुशासन के मार्ग को विस्तारित किया है.

निष्कर्ष

अटल बिहारी वाजपेयी जी हिंदुत्व के समर्थक थे और मूल्यों तथा लोकाचार के व्यक्तित्व के धनी थे जिन्होंने राजनीतिज्ञों के वर्गों की बांटने वाली विचारधारा को अस्वीकार कर दिया. उनका देश के लिये एक दृष्टिकोण था और विभिन्न देशों में इसे सही स्थान दिलाना चाहते थे. वाजपेयी जी एक ऐसे महान देशभक्त, महान नेता थे, जिनके जैसा कोई हाल के वर्षों में भारत में दिखाई नहीं दिया है. और, वे एक महान प्रधानमंत्री तथा भारत की सच्ची आवाज़ थे, एक ऐसी आवाज़, जो तर्कसंगत, उचित और हास्य से परिपूर्ण थी और एक ऐसी आवाज़ जिसने कभी किसी के दिल को ठेस नहीं पहुंचाई. अंत में, यही कहा जा सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत को एक वास्तविक शक्ति प्रदान की, एक ऐसा मस्तिष्क प्रदान किया जिसने निर्भीक होकर फैसले किये, वे एक ऐसा चरित्र थे, जिसने देशभक्ति के अर्थ को परिलक्षित किया.

(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश में राजनीति विज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के सहायक प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं. उनसेmishrajnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)