संपादकीय लेख


volume-44, 2 - 8 February, 2019

 

भारत में महिला सशक्तिकरण

हाल की सरकारी पहलें और इनका प्रभाव

साक्षी बहुगुणा

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाले लोकतंत्र में भी प्रत्येक वयस्क नागरिक के पास एक वोट होता है. परंतु, यह ये सुनिश्चित नहीं करता कि प्रत्येक नागरिक समान रूप से सशक्त है. उदाहरण के लिये महिलाएं, अल्पसंख्यक, समाज के वंचित भी नस्ल अथवा जाति आधारित समूहों में बंटे हैं. उन सभी समूहों में, जिनके सशक्तिकरण की आवश्यकता है, महिला वर्ग एक है. एक विकासशील समाज को विकसित बनाने के लिये महिलाओं का सशक्तिकरण एक पूर्वापेक्षा है. समग्र और संतुलित विकास के लिये पर्याप्त संसाधन हैं. चूंकि मानव जाति में इनकी संख्या 5० प्रतिशत है, यह महत्वपूर्ण है कि समाज का प्रत्येक वर्ग समान रूप से विकास करे और एक दूसरे के साथ सौहार्द से रहे. सामाजिक बदलाव के लिये यह अपेक्षित है कि महिलाओं को निर्णय लेने के लिये सशक्त बनाया जाये. अत: उन्हें सशक्त बनाने के लिये विशेष प्रयास किये गये हैं ताकि लोकतंत्र में मतों की समानता की तर्कसंगतता पूरी हो सके.

महिलाओं का सशक्तिकरण वर्तमान संदर्भ में एक चर्चा का शब्द बन चुका है. सशक्तिकरण एक महत्वपूर्ण मूल्य है और यही कारण है कि दोनों को एक छोर तथा छोर के एक साधन के रूप में देखा जाता है. सशक्तिकरण के विचार पर वस्तुत: किसी भी संदर्भ में बात की जा सकती है: मानव अधिकारों, बुनियादी ज़रूरतों, आर्थिक सुरक्षा, क्षमता निर्माण, कौशल निर्माण अथवा प्रतिष्ठित सामाजिक अस्तित्व की स्थितियां. किसी की भी सामाजिक और आर्थिक स्थिति कोई भी हो, संविधान ने समाज के सभी सदस्यों के लिये अधिकारों की रचना की है. सशक्तिकरण को उन ग़ैर अधिनियमित अधिकारों को पूरा करने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है जिसमें व्यक्तियों, वर्गों और समुदायों के बीच सामाजिक और आर्थिक क्षमताओं के निर्माण पर नये सिरे से ज़ोर दिया जाता है. महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के लिये राज्य की तरफ से प्रभावी नीतिगत कदम एक महत्वपूर्ण निर्धारक होता है. भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये अनेक योजनाएं, नीतियां और कार्यक्रम हैं. सरकारें बुद्धिमत्तापूर्ण नीतिगत पहल के जरिए हस्तक्षेप कर सकती हैं और इन मौजूदा असमानताओं के बारे में कुछ कर सकती हैं. महिलाओं की स्थिति में केवल तभी परिवर्तन आ सकता है जब बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाया जाये. इस तरह, सामाजिक सक्षमताओं के निर्माण पर सरकार का नया ज़ोर रहा है. अत: राज्य के जरिए कार्यान्वयन के लिये क्षमता निर्माण हेतु योजनाएं बनाई गई हैं.

महिलाओं के संदर्भ में, सशक्तिकरण को उनके क्षमता निर्माण या कौशल विकास के माध्यम से साक्षरता और शिक्षा की दिशा में शोषण, उत्पीडऩ, अन्याय के जवाब के रूप में देखा जाता है. अशक्त होने का अर्थ है विकल्पों से वंचित होना और सशक्तिकरण वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति को विकल्प के लिये सक्षम बनाती है, जिन्हें पहले अस्वीकार कर दिया गया है. महिलाओं का सशक्तिकरण और स्वायत्तता तथा उनकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार होना अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, सतत् विकास को हासिल करने के लिये यह अनिवार्य है. महिलाओं और पुरुर्षों दोनों की पूर्ण भागीदारी उत्पादक और प्रजनन जीवन में आवश्यक है, जिसमें बच्चों की देखभाल और पोषण तथा घर के रखरखाव के लिए साझा जिम्मेदारियां शामिल हैं.

सरकार की हाल की पहलें

महिलाओं की स्थिति में सुधार जीवन के सभी क्षेत्रों में उनकी निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाता है. इस तरह यह जनसंख्या कार्यक्रमों की दीर्घावधि सफलता के लिये बहुत ज़रूरी है. अनुभव दर्शाते हैं कि जब जनसंख्या और विकास कार्यक्रम सबसे ज्यादा प्रभावी होते हैं तब महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिये भी साथ-साथ कदम उठाये जाते हैं. भारत सरकार ने गऱीबी और बीमारी दूर करने को बहुत अधिक महत्व देते हुए किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना सभी बालिकाओं और महिलाओं के लिये शिक्षा, कौशल विकास और निरक्षरता के उन्मूलन के जरिए बालिकाओं और महिलाओं की क्षमताओं को बढ़ाने के लिये कदम उठाये हैं. सरकार ने महिलाओं के लिये उनके संपूर्ण जीवनचक्र के दौरान उपयुक्त, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के लिये महिलाओं और पुरुषों के मध्य समानता के आधार पर सार्वभौतिक सुगम्यता सुनिश्चित के वास्ते आवश्यक कदम उठाये हैं.

महिलाओं की उन्नति के लिये लगभग प्रत्येक सदस्य राज्य में राष्ट्रीय तंत्रों की स्थापना की गई है जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ महिलाओं के उत्थान को बढ़ावा देने वाली नीतियां तैयार करने, उनके कार्यान्वयन, निष्पादन, निगरानी, मूल्यांकन, समर्थन और सहयोग करना शामिल है.

पिछले चार वर्षों में भारत सरकार द्वारा शुरू किये गये कुछेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम विचारपूर्ण ढंग से तैयार किये गये हैं और इनमें महिलाओं के उत्थान की दिशा में अनेक पहलें शामिल हैं. ऐसी बहुत सी स्कीमें हैं जिनकी शुरुआत एक अच्छी सोच के साथ की गई है.

महिलाओं के लिये हाल की कई सरकारी योजनाओं का एक सार निम्न प्रकार है:

·         बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ: महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में महिला उत्थान के उद्देश्य के लिये

·         सुकन्या समृद्धि खाता: परिवारों की अपनी पुत्रियों के लिये धन बचाने में मदद के लिये

·         वन स्टाप सेंटर स्कीम: घरेलू उत्पीडऩ या हिंसा से पीडि़त महिलाओं, और सहयोग चाहने वाली महिलाओं के लिये आसान सुगम्यता की पेशकश के लिये

·         प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना: गऱीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन प्रदान करने के लिये.

·         महिला ई-हाट: महिला उद्यमियों और महिला स्वयं सहायता समूहों को सहायता प्रदान करने के लिये.

·         कामकाजी माताओं के बच्चों के लिये राजीव गांधी राष्ट्रीय क्रैच योजना: कामकाजी महिलाओं को किफायती डे-केअर सेवाएं उपलब्ध कराने के लिये

·         मातृत्व लाभ योजना: गर्भवर्ती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिये

·         महिला हेल्पलाइन 1091: संकट ग्रस्त महिला, विशेषकर जो किसी प्रकार की हिंसा का सामना कर रही हैं, को आपात सहायता उपलब्ध कराने के लिये

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (2015)

भारत सरकार की सबसे शानदान पहलों में से एक जो कि गिरते बालक-बालिका अनुपात की दृष्टि से बालिकाओं की सुरक्षा और अस्तित्व को सुनिश्चित करते हुए महिलाओं के उत्थान से जुड़ी है. इसे मौजूदा प्रधानमंत्री ने अपने एक चुनावी वायदे को पूरा करते हुए जनवरी 2015 में शुरू किया था. आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी हम अब भी कन्या भ्रूण हत्या के अमानवीय कृत्य की घटिया मानसिकता से ग्रसित हैं. यह योजना कन्या के जन्म पर समारोह करने और अपने लडक़ों की तरह उनके लिये गौरव महसूस करने पर केंद्रित है. इसके के लिये ऐसे 100 चिन्हित जिलों में जागरूकता और प्रोत्साहन के लिये प्रत्येक के लिये 1 करोड़ रु. की राशि के आबंटन के साथ सामाजिक अभियान चलाया जाता है जहां पर बालक-बालिका का अनुपात बहुत ही चिंताजनक है.

सुकन्या समृद्धि खाता (2015)

इसकी शुरूआत जनवरी 2015 में की गई थी. सरकार न केवल अधिक से अधिक बालिकाओं को बचाने की दिशा में प्रयास कर रही है बल्कि उन्हें बेहतर और आर्थिक तौर पर सुरक्षित भविष्य प्रदान के लिये भी समान रूप से दृढ़संकल्प है. भारत हालांकि एक ऐसा देश है जहां हर धर्म में महिला पूजनीय होती है, समाज उन्हें शिक्षित करने की बजाए शादी करने के लिये अधिक उत्सुक रहता है. इसकी अपेक्षा, यह योजना परिवारों की अपनी पुत्रियों की शिक्षा और विवाह के खर्च हेतु वित्तीय मदद करने पर केंद्रित है. इस बचत योजना के अनुरूप माता-पिता या संरक्षक किसी भी बैंक या डाकघर में एक न्यूनतम राशि के साथ अपनी पुत्री के नाम में विशिष्ट खाता खोल सकता है. इसके बाद खाता खोलने की तिथि से 14 वर्ष तक हर साल कितनी भी मात्रा में एकाधिक जमाएं की जा सकती हैं. जमा की राशि 21 वर्ष के बाद परिपक्व होगी. जमा राशि का आयकर की धारा 80सी के तहत कटौती के तौर पर दावा किया जा सकता है. साथ ही अर्जित ब्याज, जो कि वर्तमान में 8.4 प्रतिशत वार्षिक है, भी कर मुक्त है.

वन स्टाप सेंटर स्कीम (2015)

समाज में महिलाएं शोषण, यातना और हिंसा से जूझ रही हैं, जिन पर अंकुश लगाये जाने की आवश्यकता है. यह हिंसा शारीरिक, यौन, मानसिक, आर्थिक या मनोवैज्ञानिक प्रताडऩा के रूप में हो सकती है. किसी भी देश की सरकार की प्राथमिक जि़म्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को खुशहाली के लिये उचित और सुरक्षित वातावरण प्रदान करे. महिलाओं के उत्थान के इस लक्ष्य के अनुरूप, वन स्टाप सेंटर स्कीम की शुरूआत अप्रैल, 2015 में की गई थी. ये वन स्टाप सेंटर (ओएससी) प्रभावित महिलाओं और यहां तक कि 18 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं को तत्काल सहायता, आपातकालीन सहायता, चिकित्सा सहायता और कानूनी तथा मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान के वास्ते स्थापित किये गये हैं.

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (2016)

मार्च, 2016 में शुरू की गई भारत सरकार की इस पहल का उद्देश्य है कि प्रत्येक को पका खाना मिले और इसके तहत गऱीबी रेखा से नीचे की महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराया जाता है. सामाजिक अभियान के कारण और संपन्न वर्ग से अपनी सबसिडी कमज़ोर वर्गों के लिये छोडऩे की अपील के साथ यह बहुत अधिक प्रकाश में आई. प्रत्येक परिवार के पास एलपीजी कनेक्शन सुनिश्चित बनाने से दो तरह के फायदे होंगे. यह न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार, उन्हें धूएं और धूल से मुक्ति दिलाकर उनके उत्थान के लिये काम करेगा, बल्कि इन लोगों द्वारा आग जलाने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले ग़ैर नवीकरणीय संसाधनों की भी बचत होगी. उन्हें इस योजना का लाभ लेने के लिये केवल एक आवेदन-पत्र और अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है.

महिला ई-हाट (2016)

इस योजना में महिला उद्यमियों, ग़ैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों और छोटे उत्पादों के सशक्तिकरण पर ज़ोर दिया जाता है. इसकी शुरुआत मार्च, 2016 में हुई थी, यह द्विभाषी पोर्टल देश भर में महिलाओं को उनके विनिर्मित उत्पादों तथा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिये प्रदान की गई सेवाओं को दर्शाने के लिये ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है. यह पोर्टल उनके व्यवसाय के लिये उत्प्रेरक के तौर पर काम करेगा और इसके लिये कहीं से भी किसी भी समय जुडऩे के लिये केवल एक मोबाइल नंबर की आवश्यकता होती है. यह भारतीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के सामाजिक अभियानों डिजिटल इंडियाऔर स्टैंड अप इंडियाके अनुरूप बहुत बड़ा प्रयास है.

मातृत्व लाभ कार्यक्रम (2017)

यह योजना भारत में गर्भवती और स्तनपान कराने वाले महिलाओं के लाभ के लिये है और इसमें सरकार द्वारा प्रायोजित सुविधाओं के तहत उचित देखभाल, व्यवहार और दक्षता उपयोग प्रदान की अपेक्षा की गई है. बढ़ी मातृत्व मृत्यु दर पर अंकुश के लिये पूर्व में इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना के नाम से जानी जाने वाली इस योजना का पुन: नामकरण करके 2017 में प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना कर दिया गया. इसमें 19 वर्ष या अधिक आयु की ऐसी महिलाओं को दो प्रथम जीवित बच्चों के लिये सशर्त नकद अंतरण किया जाता है, जो मां बनने वाली हैं या जो स्तनपान कराने वाली हैं. इसमें इस अवधि के दौरान होने वाली रोजग़ार संबंधी हानि को अतिरिक्त रूप से शामिल किया जाता है.

महिला हेल्पलाइन (2015)

यह अप्रैल, 2015 में लागू की गई थी, यह महिला हेल्पलाइन 1091 स्कीम उन महिलाओं के उत्थान की दिशा में एक पहल है जो हिंसा का सामना कर रही होती हैं तथा तत्काल सहायता की ज़रूरत होती है. इसमें सार्वजनिक या निजी जीवन में हिंसा का सामना कर रही कोई भी महिला या बालिका को चौबीसों घण्टे टोल फ्री टेलीफोनिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है. यह उनकी सहायता के लिये सरकार और सरकारी एजेंसियों द्वारा शुरू की गई विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में भी जागरूकता का प्रसार कर सकती है. ये हेल्पलाइनें कठिन परिस्थितियों में नजदीकी अस्पताल पहुंचाने, एम्बूलेंस सुविधा, पुलिस थाने, अग्निशमन विभाग और अन्य से संबंधित सहायता भी प्रदान करती हैं.

ऊपर वर्णित नीतियों का प्रभाव

सरकारी नीतियों का समाज में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण योगदान है. आने वाले समय में इस तरह की नीतियों से महिलाओं की स्थिति में जबर्दस्त परिवर्तन आयेंगे. भिन्न-भिन्न नीतियों से भिन्न-भिन्न जरूरतें पूरी होती हैं जो कि इन पहलों की सफलता है. महिलाओं की चिंता में पहलुओं का स्तर शामिल है, यदि सरकार और अधिक नीतियां लेकर आती है तो यह और ज्यादा उचित होगा. इन प्रयासों की कमज़ोरियों में से एक निष्पादन या कार्यान्वयन तंत्र है. इन तंत्रों को अक्सर अस्पष्ट शासनादेशों, पर्याप्त कर्मचारियों की कमी, प्रशिक्षण, डेटा और पर्याप्त संसाधनों की कमी तथा राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व के अपर्याप्त समर्थन से बाधा उत्पन्न होती है.

निष्कर्ष

संपूर्ण सामाजिक विकास के लिये यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि हर किसी व्यक्ति का आर्थिक, सामजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण किया जाये. महिलाओं का सशक्तिकरण विकास के एक हिस्से के साथ-साथ उसके कारक के तौर पर देखा जाता है. किसी भी देश को विकसित नहीं माना जा सकता यदि उसकी आधी आबादी बुनियादी जरूरतों, आजीविका विकल्पों, ज्ञान और राजनीतिक आवाज तक पहुंचाने के मामले में बुरी तरह वंचित है. इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्त्री-पुरुष समानता सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक मानव और वित्तीय संसाधनों के आवंटन द्वारा समर्थित होने की आवश्यकता है. महिलाओं के अवसरों, संभावनाओं और गतिविधियों से संबंधित कार्यक्रमों पर दोहरा ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये. इस तरह, इन कार्यक्रमों का उद्देश्य बुनियादी जरूरतों  के साथ-साथ क्षमता निर्माण, संगठनात्मक विकास और सशक्तिकरण के लिये महिलाओं की विशिष्ट ज़रूरतों को पूरा करना है. विकास प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिये छोटे उद्यम सबसे अच्छे वाहन हैं. संपूर्ण सामाजिक और स्त्री-पुरुष के बीच असमानताओं का मुकाबला करने के लिये सशक्तिकरण को बहुत ही महत्वपूर्ण और निर्णायक माना जाता है.

1950 से लेकर महिलाओं और सामाजिक नीतियों से संबंधित भिन्न-2 दृष्टिकोण अपनाये गये. ये दृष्टिकोण उनकी आवश्यकताओं के आधार पर एक से दूसरे में परिवर्तित होते चले गये. व्यापक दृष्टिकोण, जिनके आधार पर नीतियों को लागू किया गया है, वे कल्याणकारी दृष्टिकोण, महिलाओं के विकास का दृष्टिकोण, जेंडर और विकास दृष्टिकोण तथा अंत में सशक्तिकरण का दृष्टिकोण हैं. कल्याण बुनियादी तौर पर महिलाओं या अन्य गऱीब और समाज के वंचित वर्गों के प्रति उन्मुख सेवाओं को संदर्भित करता है. उनका लक्ष्य मुख्यत: राहत पहुंचाना होता है. जबकि, सशक्तिकरण कल्याण के दीर्घकालिक लक्ष्य की दिशा में काम करता है. सशक्तिकरण उन्हें अवसरों, जब भी प्राप्त होते हैं, की प्राप्ति और उपयोग करने में सक्षम बनाता है. सशक्त होने पर वे प्रदान की गई कल्याणकारी सेवाओं का पूरा उपयोग कर सकते हैं. इसलिये कल्याणकारी दृष्टिकोण के लिये सशक्तिकरण पूर्वोपेक्षा है. सशक्तिकरण के बिना विकास का कोई रास्ता नहीं अपनाया जा सकता.

(लेखक के. आर. मंगलम विश्वविद्यालय में विधि अध्ययन विद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं. ई-मेल: sakshibahugunajnu@gmail.com)

ये उनके निजी विचार हैं.