संपादकीय लेख


Editorial Article

 

इलेक्ट्रॉनिक संसाधन

 

ओ. एस. शेखर सिंह और प्रो. एम. टी. एम. खान

सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों (आईसीटी), इंटरनेट और विशेष रूप से वल्र्ड वाइड वेब (डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू) के आविष्कार ने वास्तविक अर्थ में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र एवं विषय में क्रांति ला दी है. वर्तमान डिजिटल वातावरण में इसने जनसाधारण के जीवन में गतिशील परिवर्तन किए हैं. पुस्तकालय और तत्संबंधी सेवाओं पर भी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों यानी आईसीटी का प्रभाव पड़ा है. यह समझा जाता है कि लाइब्रेरी शब्द का विकास लेटिन शब्द लाइबरसे हुआ है, जिसका अर्थ है, इस्तेमाल के प्रयोजन के लिए सुव्यवस्थित ढंग से रखी गई पुस्तकें. इस शब्द के इस्तेमाल की परंपरा मानव संचार के संरक्षण का लिखित रिकॉर्ड रखने की शुरूआत से जुड़ी हुई है. वर्तमान ई-एन्वायरन्मेंट अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक-परिप्रेक्ष्य में, अधिसंख्य लेखकों द्वारा इसके लिए सामान्य तौर पर ‘‘डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी’’ शब्दों का प्रयोग किया गया है. इसे परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ‘‘किसी एक या अधिक विशिष्ट विषय क्षेत्रों पर केंद्रित ऑनलाइन पूर्ण पाठ (फुल टेक्स्ट) डिजिटल जानकारी का एक सुव्यवस्थित संग्रह’’ डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी कहलाता है.

आज का स्मार्ट डिजिटल वातावरण इस्तेमालकर्ताओं को अधिक अद्यतन जानकारी हासिल करने के अवसर प्रदान करता है, जिससे वे अन्यथा अनभिज्ञ थे. ई-संसाधनों का इस्तेमाल किसी भी समय और किसी भी स्थान पर और अधिक से अधिक लोगों द्वारा स्मार्ट फोन और टेबलेट जैसे उपयोग अनुकूल उपकरणों के जरिए किया जा सकता है. इनसे पुस्तकालयों का आकार भी कम होता जा रहा है. वास्तव में, ये लघु आधुनिक पुस्तकालय सूचना के समृद्ध भंडार हैं. ये पुस्तकालय इसलिए संभव हो पाए हैं कि विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे ई-जर्नल्स, ई-बुक्स, ई-थीसिस, ई-डेटाबेस, ई-रिपोर्ट्स, ई-फाम्र्स और ऐसे ही अन्य ई-संसाधनों के रूप में सूचना का डिजिटीकरण हुआ है.  भारत में सरकार ने ई-सूचना सेवाएं प्रारंभ करने के विभिन्न उपाय किए हैं, जैसे नेशनल नॉलेज नेटवर्क -एनकेएन (एक अत्याधुनिक मल्टी-गीगाबिट पैन-इंडिया नेटवर्क, जो एकीकृत उच्च गति नेटवर्क प्रदान करता है और देश में सभी ज्ञान आधारित संस्थानों का आधार है), नेशनल प्रोग्राम ऑन टेक्नोलोजी इन्हांस्ड लर्निंग-एनपीटीईएल (अर्थात् प्रौद्योगिकी संवर्धित प्रशिक्षण का राष्ट्रीय कार्यक्रम), जिसमें विभिन्न आईआईटी और आईआईएम संस्थानों में दिए गए व्याख्यान एक्सेस किए जा सकते हैं और शोधगंगा, एक कार्यक्रम जिसमें विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत किए गए थीसिस और डेजर्टेशंस ऑनलाइन एक्सेस किए जा सकते हैं, ई-पीजी पाठशाला, जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा स्नातकोत्तर स्तर पर 71 विषयों में ई-कंटेंट (विषय सामग्री) विकसित करने के लिए आईसीटी के जरिए शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय मिशनके अंतर्गत एक परियोजना है, इन्फोपोर्ट (भारतीय इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों के लिए एक सब्जेक्ट गेटवे यानी विषय प्रवेश मार्ग, जो शैक्षिक सामग्री के व्यापक माध्यम के रूप में सेवा प्रदान करने के लिए निर्मित एवं विकसित किया गया है), वर्चुअल लैब्स, ए-व्यू, टॉक्स टू टीचर (देश में निर्मित पुरस्कार विजेता मल्टी-मॉडल, मल्टी-मीडिया ई-लर्निंग प्लेटफार्म, जो ई-शिक्षण का एक गहन अनुभव प्रदान करता है), स्पोकन ट्यूटोरियल, ई-यंत्र, आईएसएलईआरएस (श्रवण बाधित विद्यार्थियों के लिए आईसीटी के जरिए विकसित एक स्वचालित भारतीय संकेत भाषा शिक्षा और पहचान प्लेटफार्म), ऑस्कर++ (वेब आधारित इंटर-एक्टिव एनिमेशन्स और सिम्यूलेशंस का भंडार), ई-कल्प (डिजिटल-शिक्षण वातावरण तैयार करने की एक परियोजना), वीएलई  (वर्चुअल लर्निंग एन्वायरन्मेंट, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाए जाने वाले विभिन्न विषयों की ई-संसाधन जरूरतें पूरी करने के लिए एक ऑनलाइन वातावरण) आदि. इसके अतिरिक्त कई उपाय अभी प्रक्रियाधीन हैं, जैसे नेशनल ई-लाइब्रेरी, डिजिटल इंडिया (भारत सरकार का एक कार्यक्रम, जिसका लक्ष्य सरकारी विभागों को जनता के साथ जोडऩा है ताकि नागरिकों को सरकारी सेवाएं इलेक्ट्रॉनिक तरीके से उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जा सके, जिसके अंतर्गत डिजिटल ढांचे का निर्माण, डिजिटल तरीके से सेवाओं का संवितरण, और डिजिटल साक्षरता शामिल हैं). मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में, एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित सभी पुस्तकों का ई-बुक्स के रूप में डिजिटीकरण किया, जो अब मोबाइल उपकरणों/टैबलेटों आदि पर उपलब्ध हैं. यह उन व्यक्तियों के लिए एक बड़ा परिवर्तन है, जो अभी तक एनसीईआरटी की पुस्तकों का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे. इससे साफतौर पर पता चलता है कि परंपरागत प्रणालियां ई-प्रणालियों और वर्चुअल लर्निंग प्रणालियों में तब्दील हो रही हैं. इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज आवश्यकता अनुसार भंडारित, एक्सेस, और वितरित किए जा सकते हैं; अत: सूचना सेवाएं अब किसी चार दिवारी में सीमित नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, और अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्कों में एकीकृत हैं. शैक्षिक पुस्तकालय भी अब हाइब्रिड या संकर पुस्तकालयों का रूप लेते जा रहे हैं.

इलेक्ट्रॉनिक संसाधन : धारणा

ई-संसाधनों की उत्पत्ति ई-पब्लिशिंग की धारणा से हुई है. 1985 के बाद से इलेक्ट्रॉनिक पब्लिशिंग के क्षेत्र में ऐतिहासिक घटनाएं हुई हैं. कागज पर दस्तावेज की धारणा इलेक्ट्रॉनिक डाक्यूमेंट अर्थात् ई-दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों के रूप में परिवर्तित हो रही है. इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि ऐसे दस्तावेज संसाधन, जो किसी इलेक्ट्रॉनिक रूप में विद्यमान और इलेक्ट्रॉनिक रूप में भंडारित हों और जिन्हें कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली और नेटवर्कों द्वारा एक्सेस किया जा सके. इससे भंडारण की समस्याओं का समाधान होता है और सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. ई-संसाधनों की विशेषताओं के कारण अब प्रिंट संसाधनों को डिजिटीकृत किया जा रहा है. ई-दस्तावेज का निर्माण और उपयोग तीव्र गति से हो रहा है और वर्तमान स्मार्ट वेब युग में इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि समझा जा रहा है.

ई-संसाधन : परिभाषाएं

इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों की परिभाषा में कहा गया है ‘‘ऐसी सामग्री जिसके लिए कम्प्यूटर एक्सेस जरूरी हो, चाहे वह पर्सनल कम्प्यूटर, मेनफ्रेम, अथवा हस्तधारित मोबाइल उपकरण के जरिए की गई हो. इन संसाधनों तक पहुंच इंटरनेट के जरिए सुदूर स्थान से या स्थानीय आधार पर की जा सकती है’’. बार-बार गिनाए जाने वाले कुछ ई-संसाधनों में ई-जर्नल्स, ई-बुक्स, फुल-टैक्स्ट (एग्रिगेटिड) डेटाबेसिस, इंडेक्सिंग एंड एब्स्ट्रेक्टिंग डेटाबेसिस, रेफ्रेंस डेटाबेसिस (जीवनियां, शब्दकोश, निर्देशिकाएं, विश्वकोश, आदि), संख्यात्मक और सांख्यिकीय डेटाबेसिस, ई-इमेजिज़, ई-ऑडियो/विजुअल संसाधन शामिल हैं.

इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधनों की आवश्यकता

हम सब जानते हैं कि पिछले 3 दशकों में किस तरह से सूचना का विस्फोट और क्रांति हुई है. आईसीटीज़ के तीव्र विकास के साथ दुनिया सिकुड़ गई है और समय की सीमाएं घट गई हैं. ये प्रौद्योगिकियां हमारे लिए वरदान साबित हुई हैं. अभी तक जो काम घंटों, दिनों और हफ्तों में होता था, उसे अब माउस क्लिक करने भर से किया जा सकता है.

विश्वभर में प्रकाशकों ने इन प्रौद्योगिकियों का निरंतर और महत्वपूर्ण मात्रा में लाभ उठाया है और प्रचुर इलेक्ट्रॉनिक संसाधन सामने आए हैं.

पुस्तकालयों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक संसाधन रखे जाने के पीछे निम्नांकित कारण हैं:-

*आज के युग में आईटी का महत्व.

*तकनीकी, संदर्भ और प्रबंधन कार्यों (जैसे अधिग्रहण, कैटलॉगिंग और संदर्भ) से सम्बद्ध सूचना तक पहुंच.

*ग्राहक की जरूरतों के प्रति उत्तरदायित्व.

*लागत.

*सूचना का स्रोत.

*सूचना परिदृश्य में रूपांतरकारी परिवर्तन.

*डिजिटल संग्रह तैयार करना.

*पुस्तकालय स्थान का बेहतर उपयोग.

*पुस्तकालय स्टाफ की पुन: तैनाती.

प्रभावकारी इस्तेमालकर्ता सेवाएं

इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों के आविष्कार ने शैक्षिक जगत के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं. पुस्तकालय देश में शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के विकास में प्रत्यक्ष प्रोत्साहन हैं. भारत में शैक्षिक पुस्तकालयों को सिकुड़ते स्थिर बजटों और पत्र पत्रिकाओं के मूल्यों में निरंतर बढ़ोतरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. अब समय आ गया है, कि इस समस्या का प्रगतिशील समाधान तलाश किया जाए. शैक्षिक संसाधनों के इस्तेमाल के लिए उन तक पहुंच कायम करने की सुविधा बढ़ाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण उपाय करने होंगे. सरकार ने इस्तेमालकर्ताओं, विशेषकर अनुसंधान विद्यार्थियों के लाभ के लिए शैक्षिक संस्थानों में ई-संसाधन सुविधा शुरू करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं. अनेक स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन भागीदारी ज्ञान नेटवर्क उपायों के जरिए आज विश्वभर में उच्चतर शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों के बीच संसाधनों का अनुकूलतम साझा उपयोग किया जाने लगा है. इन संसाधनों में विभिन्न संगठनों के अंतर्गत उपलब्ध नेटवर्क शामिल हैं, जैसे यूजीसी-इन्फोनेट, आईएनडीईएसटी-एआईसीटीई, एनकेआरसी, एफओआरएसए (फोरम फार रिसोर्स शेयरिंग इन एस्ट्रोनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स), आईआईएम लाइब्रेरीज़, टीआईएफआर और शाखा पुस्तकालय, इसरो पुस्तकालय, हेलिनेट (हेल्थ साइंसेज़ लाइब्रेरी एंड इन्फार्मेशन नेटवर्क), अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र (आईयूसी-डीएईएफ कंसोर्टिया फार एटॉमिक एनर्जी), सीएसआईआर ई-जर्नल कंसोर्टियम, मानव संसाधन विकास मंत्रालय/विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के आईसीएमआर और एन-लिस्ट कार्यक्रम (इनफ्लिबनेट). ये क्रांतिकारी उपाय जोड़ीदार समीक्षा पत्रिकाओं, डेटाबेसिस, एब्स्ट्रैक्ट्स, प्रोसीडिंग आदि सहित विद्वतापूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं.

डिजिटीकरण (पुस्तकालयों का) की वर्तमान प्रवृत्ति (पुस्तकालयों के बीच) इस बात का द्योतक है कि इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों द्वारा पेश की गई संभावनाओं के बारे में एक नई अभिरुचि पैदा हुई है. पुस्तकालयों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को अपनी अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के लिए सर्वाधिक सम-सामयिक और अद्यतन जानकारी की आवश्यकता पड़ती है. अत: वे विभिन्न प्रकार के ई-संसाधनों पर निर्भर करते हैं, क्योंकि वे ज्ञान के सृजन और संप्रेषण का तीव्रतम माध्यम होते हैं.

परंतु, पुस्तकों और सावधिक पत्र पत्रिकाओं जैसे परंपरागत दस्तावेज भी ज्ञान का सृजन करते हैं और उसे संप्रेषित करते हैं, परंतु स्मार्ट ई-इन्वायरन्मेंट में अनुसंधानकर्ताओं को अपनी उंगलियों के पोरों पर ताजा सूचना की आवश्यकता पड़ती है. ई-इन्फार्मेशन की विशिष्टताओं को देखते हुए इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका  ने वर्ष 2012 में घोषणा की थी कि वे अपने प्रमुख विश्वकोश का मुद्रित संस्करण बंद करेंगे और पूरी तरह डिजिटल प्रकाशन को अपनाएंगे. उनके विचार में, अन्य शैक्षिक प्रकाशनों को भी डिजिटल रूप में प्रकाशित करने की आवश्यकता है और तदनुरूप हम प्रयास कर रहे हैं. हम काफी मात्रा में ऐसे प्रकाशन अमरीका और विश्वभर के पुस्तकालयों में वितरित कर रहे हैं और ये प्रकाशन मोबाइल उपकरणों तथा क्लाउड पर उपलब्ध हैं और उन्हें किसी भी आईपैड या माई फोन या माई कम्प्यूटर से एक्सेस किया जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधन किसी भी प्रकाशन में निहित जानकारी को साधारण, सशक्त अनुसंधान और पुन: प्राप्ति क्षमताओं के साथ तेजी से और आसानी से अनुसंधानकर्ताओं को उपलब्ध कराते हैं, जो डॉ. एस. आर. रंगनाथन द्वारा दिए गए पुस्तकालय विज्ञान के चौथे सिद्धांत अर्थात् ‘‘इस्तेमालकर्ताओं का समय बचाएं’’ को पूरा करते हैं.

लाभ, उपयोग और प्रभाव

इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधन विद्वतापूर्ण संचार के नए माध्यमों के विकास पर निरंतर प्रभाव डाल रहे हैं, और वस्तुओं के संवितरण की उनकी क्षमता अत्यंत व्यापक है, क्योंकि वे प्रिंट मीडिया से सम्बद्ध भौगोलिक सीमाओं पर सफलतापूर्वक नियंत्रण कर लेते हैं. ई-संसाधन दूरस्थ विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से मददगार हैं, जिनके पास बाहर से डायल करते हुए सामान्य रूप में उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों से पुस्तकालयों तक पहुंच कायम करने की सुविधाएं बहुत सीमित हैं. ई-संकलन उन सभी संस्थानों और व्यक्तियों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, जो अपनी दहलीज पर तुरंत, प्रासंगिक, व्यापक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं. इन सभी घटकों को ध्यान में रखते हुए अनेक संगठन अपने इस्तेमाल के लिए ई-संकलनों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. किसी संकाय या सहायता संघ की सदस्यता भी इस्तेमालकर्ता समुदाय की मांगें पूरी करने में मददगार हो सकती है. बड़ी संख्या में जाने-माने प्रकाशकों ने ई-पब्लिशिंग का काम प्रारंभ किया है और इनमें से अनेक ऐसे प्रकाशक हैं, जिन्होंने अपने प्रकाशनों के ई-संस्करण निकालने शुरू कर दिए हैं. ई-संसाधनों के कुछ फायदे इस प्रकार हैं:-

*समय की पर्याप्त बचत.

*सम-सामयिक/अद्यतन जानकारी तक आसान पहुंच.

*किसी भी समय (24&7) और कहीं भी, इस्तेमाल करने की सुविधा.

*इस्तेमाल करने और स्टोर करने में भौतिक स्थान की बचत.

*एक क्लिक पर पढऩे, फारवर्ड करने, सेव करने और डाउनलोड करने की सुविधा.

*आवश्यकता अनुसार फोंट का आकार बढ़ाने की सुविधा.

*पाश्र्ववर्ती संगीत/एनिमेशन की सुविधा.

*श्रवणबाधितों के लिए सुनने में सुविधाजनक ई-संसाधन.

*असीमित समवर्ती उपयोग.

*अधिक आकर्षक.

*परिवर्तनीय सेवा के साथ आसानी से विलय होने वाले.

*अन्वेषण क्षमताओं में सहायक.

*जिल्दबंदी की लागत में बचत.

*सम्प्रेषित करने और प्रतिलिपि तैयार करने की दृष्टि से आसान.

*इस्तेमालकर्ताओं को संसाधनों के खो जाने या विलुप्त हो जाने के भय से मुक्ति.

*परस्पर संवादकारी और इस्तेमालकर्ताओं एवं लेखक/प्रकाशक के बीच संवाद की अनुमति देने वाले.

*चोरी, साहित्यिक चोरी, ऑनलाइन मोड में परिवर्तन की समस्या रहित.

*ई-संसाधन अनुसंधान एवं गतिविधियों में कारगर एवं सक्षम तरीके से वृद्धि करते हैं.

त्र्      तीव्रगामी और अधिक माध्यमों से एक्सेस किए जाने वाले.

त्र्      पुन: उपयोग योग्य.

*प्रबंधन में आसानी.

*कार्मिक लगाने की दृष्टि से किफायती.

*एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने/भेजने और भंडारित करने में सुगम.

*विश्वभर में उपलब्ध.

*समयोचित.

सामान्य शब्दों में कहा जा सकता है कि आज के स्मार्ट वेब युग में इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधन निम्नांकित कार्य कर सकते हैं:-

*औपचारिक शिक्षण व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं;

*दूरवर्ती स्थानों से दुर्लभ और बेजोड़ सामग्री तक पहुंच कायम करने में सक्षम;

*परंपरागत संसाधनों की तुलना में अधिक जानकारी (जिससे हम अनभिज्ञ हो हैं) प्रदान करते हैं;

*क्लास रूम हो या घर या यात्रा के दौरान अथवा जरूरत के अनुसार किसी भी स्थान पर आसानी से पहुंच योग्य;

*ऑनलाइन और मोबाइल उपकरणों, टेबलेटों आदि पर उपलब्ध;

*फुल टैक्स्ट सहित संवर्धित अनुसंधान क्षमता;

*इस्तेमालकर्ताओं को जानकारी संगृहीत करने और उपयोग करने के अधिक अवसर प्रदान करते हैं;

*समुदायों को अपनी रुचि और अधिक विशेषज्ञतापूर्ण संसाधनों को प्राप्त करने में सहायता करते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक सूचना संसाधनों के प्रकार

वर्तमान ई-सूचना प्रबंधन के उपकरणों और तकनीकों के समुचित उपयोग के जरिए सूचना विस्फोट की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए, पुस्तकालयों और सूचना केंद्रों के सूचना व्यवसायियों को सूचना संचालन संबंधी अपनी शैली, अभिरुचि और कौशल में बदलाव लाना होगा. सूचना उपलब्ध कराने वाले विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों में निम्नांकित शामिल हैं:-

*इलेक्ट्रॉनिक बुक्स (ई-बुक्स)

*ई-मैनुअल्स

*इलेक्ट्रॉनिक जर्नल्स (ई-जर्नल्स)

*इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस

*ई-न्यूजपेपर आर्टिकल्स

*ई-मार्केट अनुसंधान सूचना

*ई-वित्तीय आंकड़े

*ई-सांख्यिकीय जानकारी

*ई-अनुसंधान सामग्री और आंकड़े

*ई-ऑडियो सामग्री

*ई-विजुअल सामग्री

*ई-एग्जिबीशन्स

*ई-मैग्जीन्स

*ई-शेयर वेयर्स

*ई-प्रीप्रिंट्स

*ई-व्हाइट पेपर्स

*ई-मैन्युस्क्रिप्ट्स

*ई-मैप्स

*ई-थीसिस

*ई-टेक्निकल रिपोर्ट

*ई-कम्प्यूटर प्रोग्राम

*ई-डिजिटल इमेज

*ई-डायरेक्टरीज़

*ई-डिक्शनरीज़

*ई-एन्साइक्लोपीडियाज़

*ई-ग्लोसरी

*ई-बायोग्राफी

*ई-कांफ्रेंस प्रोसीडिंग्स

*ई-न्यूमेरिकल डेटा

*ई-ग्रैफिक्स

*ई-डिजिटाइज्ड साउंड

*ओपीएसी (ऑनलाइन पब्लिक एक्सेस कैटलॉग)

*ई-डेटा आर्काइव्स

*ई-न्यूज़वायर

*ई-एनिमेशन

*ई-मेल

*ई-टैक्स्ट

*ई-रिसर्च रिपोट्र्स

*इंटरनेट रिसोर्सिज

*ई-मल्टीमीडिया कंपोनेंट्स

*ई-मेटा रिसोर्सिज़

*ई-एब्स्ट्रैक्ट्स

*ई-आर्काइवल फाइंडिंग एड

*ई-बिब्लोग्रैफिकल टूल्स

*ई-लाइब्रेरी कैटलॉग

*ई-इंडेक्स, आदि.

ई-संसाधनों के उत्कृष्ट उपयोग के बारे में सुझाव

*इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों और सेवाओं, विशेष रूप से शैक्षिक संस्थानों (प्राथमिक से उच्चतर) के लिए समुचित वित्तीय और अन्य सुविधाएं.

*शैक्षिक पुस्तकालयों/संस्थानों (विशेषकर राष्ट्रीय महत्व के) को चाहिए कि वे इस्तेमालकर्ता अनुकूल स्मार्ट उपकरणों, जैसे टेबलेटों/स्मार्ट फोनों के लिए एसएलए (स्मार्ट लाइब्रेरी एप्स) जैसे अधिक अद्यतन साधन और अनुप्रयोग विकसित करें, ताकि वे अपने ई-संकलन, वेब और ओपन वेब संसाधनों को एक्सेस कर सकें. ये उपाय/एसएलए इस्तेमालकर्ताओं (पंजीकृत और गैर-पंजीकृत) को सम्बद्ध पुस्तकालयों के सामान्य संसाधसनों, जिनकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं है, की बजाय उनमें उपलब्ध ओपन वेब संसाधनों, ई-संसाधनों और ई-सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करेंगे.

*सम्बद्ध पुस्तकालयों/प्राधिकारियों द्वारा ओपन वेब संसाधनों और इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं, और साथ ही ओसीबी (ऑनलाइन चैट बाक्स) तथा वीएचडी (वर्चुअल हेल्प डेस्क) के इस्तेमालकर्ताओं को इन सेवाओं का उत्कृष्ट उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिए 24&7 आधार पर ऑनलाइन सहायता सुविधा के साथ एक आईएल (इन्फॉर्मेशन लिटरेसी अर्थात् सूचना साक्षरता) प्रणाली सृजित/विकसित की जानी चाहिए, ताकि वे उत्कृष्ट ओपन ई-संसाधनों और सेवाओं का उपयोग करने के लिए सूचना व्यवसायियों से संपर्क कर सकें.

*देश में विभिन्न पुस्तकालयों/संस्थानों में उपलब्ध ई-संसाधनों, ओपन वेब संसाधनों और सेवाओं के लिए एनईसी (नेशनल ई-कार्नर) विकसित करने की पहल की जानी चाहिए, ताकि इन संसाधनों का उत्कृष्ट उपयोग किया जा सके, जो नाममात्र के शुल्क पर क्लिक करने मात्र की दूरी पर उपलब्ध हैं. इससे ओपन एक्सेस संसाधनों का उपयोग करने में मदद मिलेगी. यह तथ्य है कि इन संसाधनों का इस्तेमाल होने के साथ ही उनके मूल्य में वृद्धि होती है.

*एसएसएसएसडेटा सेवाएं/वेब सुविधाएं देशभर में नाममात्र के शुल्क पर उपलब्ध कराई जानी चाहिएं, ताकि इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों और ई-सेवाओं तक पहुंच को बढ़ावा दिया जा सके और इंडियाविजन-2020 के लक्ष्य हासिल किए जा सकें.

 

(ओ.एस. शेखर सिंह पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के अनुसंधान स्कॉलर हैं, ई-मेल shekharlib22@gmail. प्रोफेसर एम.टी.एम. खान स्कूल ऑफ लाइब्रेरी एंड इन्फार्मेशन साइंस, गलगोटिया विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, (उत्तर प्रदेश) में प्रोफेसर और डीन हैं. ई-मेल mtmkhan55@gmail.com)