संपादकीय लेख


volume-1 , 2017

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की महत्वपूर्ण विशेषताएं


स्वास्थ्य ही धन है’, यह पुरानी कहावत मानव की बुद्धिमता को व्यक्त करती है और प्रत्येक राष्ट्र का यह लक्ष्य है कि उसकी आबादी स्वस्थ रहे। कोई भी देश स्वास्थ्य के मुद्दे की अनदेखी नहीं कर सकता, क्योंकि व्यक्ति के स्वास्थ्य का स्तर मानव पूंजी सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जन-स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार का हस्तक्षेप इस स्पष्ट तर्क पर आधारित है कि स्वस्थ कार्मिकों का अर्थ है उत्पादक कार्मिक; और बीमारी की घटनाओं की परिणति मानव पूंजी एवं आर्थिक उत्पादकता में कमी और सामथ्र्य से अधिक खर्च के रूप में होती है। ये आर्थिक कारण सरकार को स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश और उपाय करने के लिए बाध्य करते हैं। भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकारको एक मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान करता है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक फैसलों में कहा है कि स्वास्थ्य का अधिकारवास्तव में जीवन के अधिकारका अभिन्न अंग है। स्वास्थ्य का अधिकार स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक पहुंच पर निर्भर करता है। भारतीय संदर्भ में जनस्वास्थ्य राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अधिशासित है और स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। संविधान अनुच्छेद 47 के अंतर्गत राज्य पर एक रचनात्मक दायित्व डालता है कि वह पोषण और जीवन स्तर को ऊंचा उठाए और जन-स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार लाए। इस रचनात्मक दायित्व के अंतर्गत सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करे। अपने इस रचनात्मक दायित्व के निर्वहन के लिए सरकार को दिशा-निर्देशों और निर्देशों की आवश्यकता पड़ती है। नीतियां ये विशिष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करने का उद्देश्य पूरा करती हैं, जो प्राथमिकता क्षेत्रों में उपाय करने के लिए सरकार का मार्गदर्शन करती हैं। नीतियां परिस्थितियों और समय के अनुसार तय की जाती हैं और उनकी भूमिका परामर्शक किस्म की होती है। परिस्थितियों और समय में परिवर्तन के साथ नीतियों में संशोधन या उन्हें फिर से निर्धारित करने की आवश्यकता पड़ती है। इस कॉलम के अंतर्गत हम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) 2017 की प्रमुख विशेषताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे 15 मार्च, 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी प्रदान की गई है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे इस विषय को व्यापक रूप में समझने के लिए एनएचपी, 2017 संबंधी मूल दस्तावेज को भी पढ़ें, जो नीति दस्तावेज के साथ जारी किया गया है।
स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के लिए अतीत में किए गए प्रयास
भारत में स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं प्रदान करने के शुरुआती व्यवस्थित प्रयास पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से किए गए। इसके अलावा उच्चस्तरीय समितियों जैसे भोरे समिति, सोखे समिति और मुदलियार समिति आदि की अनुशंसाओं का भी इन प्रयासों में योगदान रहा।
भारत सरकार ने आजादी के 36 वर्ष बाद 1983 में प्रथम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति घोषित की। एनएचपी-1983 का लक्ष्य सन् 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाएंप्रदान करना था। एनएचपी 1983 में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सरकार सेवा प्रदाताकी भूमिका अदा करेगी और सेवा वितरण के मॉडल के रूप में सार्वजनिक प्रावधानकरेगी। भारत सन् 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाएंप्रदान करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया और देश के महामारी विषयक स्वरूप में परिवर्तन के संदर्भ में 2002 में एक अन्य नीति दस्तावेज जारी किया गया, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में असमानताएं दूर करने पर मुख्य रूप से ध्यान दिया गया। एनएचपी-2002 में न केवल क्षेत्रीय स्वास्थ्य असमानताएं दूर करने का वायदा किया गया, बल्कि इसमें स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने और देश में ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में सुधार लाने का भी वायदा किया गया। एनएचपी-2002 के नीति निर्देशों की परिणति राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) जैसे कार्यक्रमों के रूप में हुई। ये दोनों कार्यक्रम 2013 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत मिला दिए गए। इस अवधि में भारत में विभिन्न मोर्चों पर मिश्रित परिणाम दिखाई दिए, जैसे अस्पतालों में प्रसवों में बढ़ोतरी की बदौलत मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी आई। भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में भी मामूली सुधार हुआ। एनएचपी-2002 में निर्धारित लक्ष्य और सहस्राब्दि विकास लक्ष्य भी हासिल नहीं किए जा सके।
सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाएंसे सर्वत्र स्वास्थ्य सुविधाओंतक स्थाई विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अंतर्गत स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्रवाई के तहत नए सिरे से वैश्विक प्रयासों की पृष्ठभूमि और उच्च मृत्यु दर और रुग्णता के चलते भारत सरकार ने अपने प्रयासों को नया रूप देते हुए 2015 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति दस्तावेज का प्रारूप जारी किया। आम जनता, सम्बद्ध पक्षों और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों से टिप्पणियां आमंत्रित की गईं। मसौदा स्वास्थ्य नीति पर कई दौर के विचार विमर्श और समीक्षाओं के बाद मौजूदा एनएचपी-2017 को आकार प्रदान किया गया। एनएचपी-2017 में सबके लिए सहनीय लागत पर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं सुनिश्चित करनेऔर सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाएंकी धारणा के स्थान पर सर्वत्र स्वास्थ्य सुविधाएंप्रदान करने का वायदा किया गया है। सबके लिए सहनीय लागत पर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के प्रावधान पर नीति विशेषज्ञों और जन-स्वास्थ्य प्रबंधकों द्वारा और विचार विमर्श एवं समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। एनएचपी-2017 में स्वीकार किया गया है कि देश का महामारी विषयक स्वरूप बदला है और बीमारियों के दोहरे बोझ के कारण एक अलग तरह की स्थिति पैदा हुई है।
एनएचपी-2017 में स्वास्थ्य के निम्नांकित लक्ष्य तय किए गए हैं:
‘‘नीति में सभी आयु समूहों के लोगों के लिए स्वास्थ्य और खुशहाली का सर्वोच्च संभव स्तर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे सभी विकास नीतियों में निवारक और प्रोत्साहक स्वास्थ्य देखभाल उपायों के जरिए हासिल किया जाएगा और किसी को भी वित्तीय  कठिनाई का सामना किए बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक सभी की पहुंच सुनिश्चित की जाएगी। यह लक्ष्य पहुंच में बढ़ोतरी, गुणवत्ता में सुधार और स्वास्थ्य देखभाल की लागत में कमी लाने के प्रयासों के जरिए हासिल किया जाएगा।’’ (एनएचपी-2017 पृष्ठ 1)
प्रमुख नीतिगत सिद्धांत
नीति के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए एनएचपी-2017 में 10 प्रमुख नीतिगत सिद्धांत तय किए गए हैं। ये नीतिगत सिद्धांत इस प्रकार हैं: 1) व्यावसायिकता, निष्ठा और नैतिकता, 2) समानता, 3) सहनीयता, 4) सार्वभौमिकता, 5) रोगी केंद्रित एवं गुणवत्तापूर्ण देखभाल, 6) जवाबदेही, 7) समावेशी हिस्सेदारी, 8) अनेकत्व, 9) विकेंद्रीकरण, और 10) गतिशीलता और अनुकूलनशीलता।
एनएचपी-2017 में कहा गया है कि ये महत्वपूर्ण नीतिगत सिद्धांत मृत्यु दर और रुग्णता की स्थिति कम करने में सहायक होंगे और इनसे लोगों के स्वास्थ्य में समग्र सुधार होगा।
विशिष्ट मात्रात्मक लक्ष्य
एनएचपी-2017 में 3 प्रमुख क्षेत्रों में विशेष मात्रात्मक लक्ष्य भी तय किए गए हैं, ताकि नीति के लक्ष्यों की प्राप्ति का पता लगाया जा सके: क) स्वास्थ्य के स्तर और कार्यक्रम का प्रभाव, ख) स्वास्थ्य प्रणालियों का कार्य निष्पादन, ग) स्वास्थ्य प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण। कुछ प्रमुख मात्रात्मक संकेतक नीचे दिए गए हैं:
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य
एनएचपी-2017 में प्रसूति, नवजात और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के अतिरिक्त प्रयासों पर बल दिया गया है। ये प्रयास मां और शिशु की मृत्यु रोकने के लिए अतीत में किए गए प्रयासों और स्थायी विकास लक्ष्यों के अंतर्गत वैश्विक प्रतिबद्धता पूरी करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के अलावा होंगे।
1.2025 तक जन्म के समय जीवन संभाव्यता 67.5 से बढ़ा कर 70 पर पहुंचाना।
2.राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर 2025 तक टीएफआर में कमी लाते हुए उसे 2.  तक लाना।
3. 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 2025 तक कम करके 23 पर लाना और 2020 तक एमएमआर को मौजूदा स्तर से घटा कर 100 पर लाना।
4.2019 तक शिशु मृत्यु दर कम करके 28 तक लाना।
5.नवजात मृत्यु दर में कमी लाते हुए 2025 तक उसे 16 पर लाना और जन्म दर को ‘‘एकल अंक’’ पर लाना।
6.एचआईवी/एड्स के लिए 2020 के वैश्विक लक्ष्य हासिल करना, जिन्हें 90: 90: 90 भी कहा जाता है अर्थात् एचआईवी के साथ रह रहे 90 प्रतिशत लोगों को उनके एचआईवी स्तर की जानकारी हो, एचआईवी संक्रमण निदान किए गए 90 प्रतिशत लोग निरंतर एंटी रिट्रोवायरल उपचार प्राप्त करें और एंटी रिट्रोवायरल उपचार प्राप्त करने वाले 90 प्रतिशत व्यक्ति वायरल मुक्त रहें।
7.क्षय रोग के लिए नए बलगम पॉजिटिव रोगियों में उपचार की दर 85 प्रतिशत से अधिक बनाए रखने और नए मामलों की दर में कमी लाने तथा 2025 तक क्षय रोग को समाप्त करने का लक्ष्य हासिल करना।
8.2025 तक हृदय रोगों, कैंसर, मधुमेह या सांस की पुरानी बीमारियों के कारण असामयिक मौतों में 25 प्रतिशत की कमी लाना।
9.2025 तक 90 प्रतिशत से अधिक नवजात शिशुओं को एक वर्ष की आयु तक पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करना।
10.2025 तक 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में बौनेपन की स्थिति में 40 प्रतिशत कमी लाना।
11.स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद के मौजूदा 1.15 प्रतिशत से बढ़ा कर 2.5 प्रतिशत करना।
12.2020 तक उच्च प्राथमिकता जिलों में भारतीय जन-स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) के अनुसार अद्र्ध चिकित्सीय स्टाफ और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
13.2025 तक उच्च प्राथमिकता जिलों में आईपीएचएस मानदंडों के अनुसार आबादी के अनुपात में सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों में बढ़ोतरी करना।
14.2025 तक उच्च वरीयता जिलों में मानदंड (आबादी और समय पर पहुंच के संदर्भ में) के अनुसार प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की देखभाल सुविधाएं कायम करना।
15.2020 तक स्वास्थ्य प्रणाली घटकों के बारे में जिला स्तर पर जानकारी के लिए इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस सुनिश्चित करना।
16. 2020 तक स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ बनाना और जन-स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण बीमारियों के लिए पंजीयन कार्यालय स्थापित करना।
स्रोत: (एनएचपी-2017 पृष्ठ 4 और 5)
 
संक्रामक-एवं गैर संक्रामक रोग
एनएचपी-2017 में क्षय रोग और एचआईवी की रोकथाम के लक्ष्य भी निर्धारित किए गए हैं। क्षय रोग और एचआईवी से निपटना दो विशेष कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला यह कि भारत में क्षय रोग के मामलों का बोझ बहुत ऊंचा है, यानी देश में क्षय रोग के 22 लाख रोगी हैं (विश्व स्वास्थ्य संगठन, 2015)। क्षय रोग के मामले में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि क्षय रोग के मामले दवा प्रतिरोधक (मल्टी ड्रग रजिस्टेंट (एमडीआर) और एक्स्ट्रीम ड्रग रजिस्टेंट (एक्सडीआर)) होते जा रहे हैं। दूसरे, एचआईवी रोगियों में अवसरवादी संक्रमणों का प्रमुख स्रोत क्षय रोग है, जो उनके जीवन की संभाव्यता को कम करने का कारण है और उनके जीवन की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव डालता है। एनएचपी-2017 में गैर-संचारी रोगों जैसे हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और पुरानी सांस की बीमारियों के कारण असामयिक मौतों की समस्या के समाधान के प्रयासों को भी शामिल किया गया है।
स्वास्थ्य ढांचा
एनएचपी-2017 में यह प्रस्ताव है कि 2025 तक उच्च प्राथमिकता जिलों में ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में सुधार लाया जाएगा और 2020 तक उच्च प्राथमिकता जिलों में मानव संसाधन की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी। एनएचपी-2017 में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं का नया नामकरण ‘‘हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर’’ यानी ‘‘स्वास्थ्य और तंदरुस्ती केंद्र’’ के रूप में किया गया है। ये स्वास्थ्य और तंदरुस्ती केंद्र व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल पैकेज प्रदान करेंगे, जिनके अंतर्गत वृद्धावस्था स्वास्थ्य देखभाल, पीड़ानाशक उपचार और पुनर्वास देखभाल सेवाएं भी शामिल होंगी। एनएचपी-2017 के अनुसार प्राथमिक देखभाल अवश्य सुनिश्चित की जानी चाहिए और इसमें यह प्रस्ताव किया गया है कि प्रत्येक परिवार को एक स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जाएगा, जो उन्हें प्राथमिक देखभाल सुविधा से जोड़ेगा और देश में कहीं भी सेवाओं के निर्धारित पैकेज का पात्र बनाएगा।
मानव संसाधन
एनएचपी-2017 में मध्यम स्तरीय सेवा प्रदाताओं और जन-स्वास्थ्य प्रबंधन संवर्ग की भी व्यवस्था की गई है। मध्यम स्तरीय सेवा प्रदाता ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में मानव संसाधनों की कमी दूर करने और सेवा वितरण में अंतराल दूर करने में मदद करेंगे। मध्यम स्तर के सेवा प्रदाताओं के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार की ग्रामीण चिकित्सा सहायक योजना में मार्गदर्शन किया है। एनएचपी-2017 में इसी उपाय को अपनाया गया है। मध्यम स्तरीय सेवा प्रदाताओं का सृजन समुदाय स्वास्थ्य में बी.एससी जैसे समुचित पाठ्यक्रमों और/या सक्षमता आधारित ब्रिज पाठ्यक्रमों और अल्पावधि पाठ्यक्रमों के जरिए करने का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त एनएचपी-2017 में सभी राज्यों में जन-स्वास्थ्य प्रबंधन संवर्ग बनाने का प्रस्ताव है, जो प्रवेश मानदंड के रूप में जन-स्वास्थ्य या संबंधित विषयों पर आधारित होगा। ़चिकित्सा और स्वास्थ्य व्यवसायी इस संवर्ग का प्रमुख हिस्सा होंगे, परंतु समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र, मानव विज्ञान, नर्सिंग, अस्पताल प्रबंधन, संचार आदि विविध पृष्ठभूमि वाले व्यवसायी, जिन्होंने जन-स्वास्थ्य प्रबंधन प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, को भी इस संवर्ग में शामिल करने पर विचार किया जाएगा। जन-स्वास्थ्य प्रबंधन संवर्ग के निर्माण से प्रबंधन क्षमता में सुधार होगा और कार्यक्रम कार्यान्वयन में अपेक्षित समाज वैज्ञानिक संदर्श शामिल किया जा सकेगा।
आशा
एनएचपी-2017 में आशा (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) के कॅरिअर विकास की बात कही गई है। इसमें आशा कार्यकर्ताओं के लिए प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम निर्धारित करने का प्रावधान है। इसके तहत आशा कार्यकर्ताओं के चयन में एएनएम, नर्सिंग और अद्र्ध चिकित्सीय पाठ्यक्रमों को वरीयता दी जाएगी। छत्तीसगढ़ में मानव संसाधन में गंभीर अंतराल दूर करने के लिए एएनएम प्रशिक्षण में मितानिन के चयन को वरीयता देना इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
निगरानी और मूल्यांकन
स्वास्थ्य कार्यक्रम की साक्ष्य आधारित आयोजना और बेहतर निगरानी के लिए एनएचपी-2017 में स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ बनाने तथा 2020 तक जन-स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण बीमारियों के पंजीकरण कार्यालय स्थापित करने का वायदा किया गया है। स्वास्थ्य प्रणाली घटकों के उपायों के मापन के लिए भी ऐसे ही मानदंड प्रस्तावित किए गए हैं।
आयुष
प्रोत्साहक और उपचारात्मक सेवाओं के लिए एनएचपी-2017 में आयुष और योग की भूमिका बढ़ाने की व्यवस्था है। इस नीति का लक्ष्य जन-स्वास्थ्य केंद्रों में एक साथ आयुष उपचार सुविधाएं प्रदान करना है। इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि स्कूलों और कार्य स्थलों में बेहतर स्वास्थ्य को प्रोत्साहन देने के हिस्से के रूप में योग को शामिल किया जाएगा। आयुष औषधियों की प्रभाव क्षमता को प्रमाणित करने के लिए अनुसंधान पर भी बल दिया जाएगा।
स्वास्थ्य के लिए सामाजिक आंदोलन
एनएचपी-2017 में स्वस्थ नागरिक अभियानचलाने का प्रस्ताव है, ताकि स्वास्थ्य के लिए वातावरण में सुधार लाया जा सके। एनएचपी-2017 के अनुसार स्वस्थ नागरिक अभियानसात बुनियादी क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई पर आधारित होगा। ये सात क्षेत्र इस प्रकार हैं:-
1.स्वच्छ भारत अभियान
2.संतुलित, स्वस्थ भोजन और नियमित व्यायाम
3.तंबाकू, शराब और मादक द्रव्यों के सेवन की समस्या का समाधान
4.यात्री सुरक्षा - रेल और सडक़ यातायात दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों की रोकथाम
5.निर्भय नारी - महिलाओं के प्रति हिंसा रोकने के उपाय
6.कार्य स्थल पर तनाव कम करना और अधिक सुरक्षा प्रदान करना
7.भीतरी और बाहरी वायु प्रदूषण में कमी लाना।
स्रोत: एनएचपी (2017, पृष्ठ 6)
स्वास्थ्य नीति दस्तावेज प्रस्तुत करके सरकार ने नीतिगत अंतराल दूर करने का प्रयास किया है और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जाने वाले उपायों को उजागर किया है। यह नीति मृत्यु और रुग्णता में कमी लाने और स्थायी विकास लक्ष्य हासिल करने के प्रति राजनीतिक इच्छाशक्ति को भी दर्शाती है।
(लेखक टीआईएसएस, गुवाहाटी कैम्पस में सहायक प्रोफेसर हैं)
चित्र: साभार - गूगल।