संपादकीय लेख


Volume 2, 2017

चंपारण आंदोलन
सत्य और अहिंसा की शक्ति का प्रदर्शन

महात्मा गांधी ने किसानों की समस्या को लेकर बिहार के चंपारण में अपने अहिंसा आंदोलन की शुरूआत की थी. किसानों को नील, जो कि नील की डाई का एक स्रोत होता था, की खेती करने और फैक्ट्रियों में इसकी आपूर्ति करने के लिये मज़बूर किया गया था. चंपारण में तीनकठिया सर्वाधिक लोकप्रिय व्यवस्था थी. ‘‘इसके अनुसार फैक्ट्री मालिकों को ऐसे किसान उपलब्ध करवाये गये थे जिन्हें अपनी ज़मीन के एक हिस्से में नील की खेती करने को कहा जाता था जिसके लिये उन्हें एक नियत भुगतान प्राप्त होता था. पूर्व में नील की खेती के लिये आरक्षित हिस्सा 5 कट्ठा प्रति बीघा अथवा किसान की भूमि का एक चौथाई हिस्सा होता था. कुछ समय बाद, कऱीब 1807 के आसपास, इस क्षेत्र को 5_े से घटाकर 3 कट्ठा कर दिया गया. तब से यह व्यवस्था तीनकठिया अथवा तीन कट्ठे की व्यवस्था के तौर पर जानी जाती थी‘‘ (चंपारण में सत्याग्रह, 1928, पृष्ठ 17-18)

फैक्ट्रियों के मालिकों ने, जो कि अधिकतर यूरोपीय होते थे, गांवों में जमीनों के कब्जे प्राप्त कर लिये और अत्याचारों सहित विभिन्न तरीकों से किसानों को बलपूर्वक नील के पौधे उगाने के लिये सहमत कर लिया. फैक्ट्री के लोगों की देख-रेख में, भूमि की जुताई की जाती और खेती के लिये तैयार किया जाता था. ‘‘यदि फसल अच्छी होती थी तो पट्टेदार को प्रति बीघा एक नियत मूल्य का भुगतान किया जाता था. परंतु यदि बम्पर फसल नहीं हुई तो चाहे जो भी कारण रहा हो, किसान को बहुत कम मूल्य दिया जाता था. यदि पट्टेदार नील की खेती करने में असफल रहता, उसे अपना वायदा तोडऩे के कारण हुई क्षति के तौर पर भारी राशि का भुगतान करना होता था.‘‘ (चंपारण में सत्याग्रह, 1928, पृ. 19)

उत्पीडऩ के खिलाफ  धर्मयुद्ध:

गांधीजी ने 10 अप्रैल 1917 को ऐतिहासिक दौरा किया और वे राज कुमार शुक्ल के साथ तृतीय श्रेणी के डिब्बे में आये. शुक्ल जी वे व्यक्ति थे जो कि गांधीजी को भगवान महावीर और भगवान बुद्ध की भूमि पर एक बार फिर दुनिया में अहिंसा की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये लेकर आये थे. यह चंपारण में शताब्दी पुराने नील के पौधे उगाने को लेकर हो रहे अत्याचार को समाप्त कराने के लिये अहिंसा आंदोलन की शुरूआत थी.

गांधीजी का चंपारण मिशन मानवता के इतिहास में अत्यंत महत्व रखता है. यह एक महान धर्मयुद्ध था.

गांधीजी मुजफ़्फरपुर के एक कॉलेज में प्रो. जे.बी. कृपलानी के अतिथि के तौर पर ठहरे थे. कृपलानी  एक हॉस्टल में ठहरे थे और दो छोटे कमरे लिये हुए थे. छात्र गांधी जी और दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष से परिचित नहीं थे. अत: उन्होंने उन्हें इसकी जानकारी दी और वे गांधीजी को पाकर बहुत उत्साही थे. कुछ ने कहा कि हमें आरती करनी चाहिये. छात्रों ने आरती के लिये नारियल को छोडक़र विभिन्न किस्मों के फूल और अन्य सभी आवश्यक वस्तुएं एकत्र कर ली थीं. रात हो गई थी और बाज़ार से नारियल खरीदना संभव नहीं था. परंतु परिसर के भीतर नारियल का एक वृक्ष था. कोई भी पेड़ पर चढऩे को राजी नहीं था और अंत में प्रोफे. कृपलानी स्वयं पेड़ पर चढ़ गये और उन्होंने कुछ नारियल के फल तोड़ लिये.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डी.जी. तेंदुलकर सहित कई लेखकों ने अपनी पुस्तकों में लिखा कि ‘‘कृपलानी की पहले कभी भी गांधीजी से मुलाकात नहीं हुई थी, यद्यपि उनका एक दूसरे के साथ पत्रव्यवहार होता था.’’ परंतु कृपलानी ने ‘‘माई टाइम्स’’ में लिखा है कि वे पहली बार गांधीजी से 1915 में कलकत्ता में मिले थे और उनके साथ ठहरे थे तथा उनके साथ चहलकदमी की थी. जब वे मुंबई में थे, उनकी कई बार उनसे मुलाकात हुई थी और बाद में 1916 में वे उनसे लखनऊ में मिले थे.

गांधीजी उनके कॉलेज में कृपलानी के अतिथि के तौर पर आये थे. परंतु अगले 20 दिनों में कृपलानी को कॉलेज से बाहर भेज दिया गया. कॉलेज के प्रबंधन ने अगले वर्ष के लिये उनके अनुबंध का नवीनीकरण नहीं किया. कृपलानी बेरोजग़ार हो गये. शायद यही भाग्य में था. कृपलानी ने जानेमाने वकीलों के एक दल ब्रजकिशोर प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा के साथ गांधीजी की अहिंसक सेना का एक सैनिक बनने का फै़सला कर लिया.

नील का कोई डिब्बा इंग्लैंड नहीं पहुंचा जिस पर मानव रक्त का धब्बा न लगा हो: बागान मालिकों ने किसानों पर अत्याचार किये. धन बल, जोर जबर्दस्ती और सरकार के समर्थन ने बागान मालिकों को अनैतिक कृत्य जारी रखने के लिये प्रोत्साहित किया. किसी भी तरफ से हिंसा और प्रतिक्रियात्मक हिंसा से मानवता को अधिक क्षति पहुंच सकती थी और हमें जैसे को तैसा की हिंसा का जोखि़म था जो कि इस कठिन दौर से निकलने के लिये मुश्किल काम था. श्री ई डब्ल्यू एल टावर, जो कि उस वक्त फरीदपुर के मजिस्ट्रेट थे, ने जांच आयोग के समक्ष अपनी गवाही में कहा, ‘‘मैंने देखा है कि मजिस्ट्रेट के तौर पर मेरे समक्ष कई किसानों को भेजा गया था जिनके शरीर में बरछी मारी गई थी. मेरे पास वे किसान आये जिनको श्री फार्डे (एक बागान मालिक) ने गोली मार दी थी. मैंने रिकॉर्ड में दजऱ् किया है कि अन्य को किस तरह पहले घायल किया गया और फिर अपहरण कर लिया गया, और किसानों के साथ इस तरह के व्यवहार को मैं खूनखराबे की प्रणाली मानता हूं.‘‘

गांधीजी हिंसा के दुष्प्रभावों से भलीभांति परिचित थे. वे दक्षिण अफ्रीका में बोर युद्ध और जुलु विद्रोहियों के साथ युद्ध से स्वयं भी जुड़े थे. 1915 से 1945 दुनिया के इतिहास का महत्वपूर्ण दौर था. समूचा विश्व विवादों के निपटाने के एकमात्र तरीके के तौर पर हिंसक कार्रवाई में विश्वास करता था. युद्ध को मुद्दों के निपटारे के तौर तरीके के तौर पर स्वीकार किया जाता था. उस समय के विश्व नेता स्टालिन, मुसोलिनि, हिटलर, रूजेवेल्ट और चर्चिल आदि सभी हिंसा के बारे में बात करते थे और युद्ध की तैयारियों का समर्थन करते थे. परंतु समान अवधि में जब समूचा विश्व हिंसा में विश्वास करता था, गांधी जी अकेले व्यक्ति थे जो सोचते थे कि युद्ध और हिंसा का अधिक सकारात्मक विकल्प होना चाहिये. अत: उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई, को शुरू किया. उन्होंने समूची दुनिया के सामने सत्य और हिंसा की शक्ति को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया. गांधीजी ने इसे ध्यानपूर्वक संचालित किया और युद्ध तथा हिंसा के एक विकल्प के तौर पर सभ्य समाज के लिये संघर्ष के समाधान की सर्वाधिक व्यावहारिक और शक्तिशाली तकनीक अहिंसा की अवधारणा को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया. गांधीजी की अहिंसा स्थैतिक नहीं थी, यह बदलती स्थितियों के अनुरूप ढल और अनुकूलता प्राप्त कर लेती है. उन्होंने अपने अहिंसक विरोध का दक्षिण अफ्रीका में जातीय भेदभाव के खिलाफ  इस्तेमाल किया और भारत में उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ अहिंसक पद्धतियों का प्रयोग किया.

ट्रायल में न्याय: आइए चंपारण आंदोलन पर नजऱ डालें. गांधीजी को मोतिहारी में गिरफ्तार नहीं किया गया था परंतु उन्हें एक नोटिस जारी किया गया था और 18 अप्रैल 1917 को मोतिहारी के उप दंडाधिकारी की अदालत में आपराधिक दंड संहिता की धारा 144 के तहत बुलाया गया था. नोटिस में कहा गया कि ‘‘अत: अब मैं एतद्द्वारा आपको जिले से दूर होने का आदेश देता हूं जिसके तहत आपके लिये अगली उपलब्ध ट्रेन से इसे छोडऩा अपेक्षित है.‘‘ गांधीजी ने इस नोटिस का पहुंचते ही जवाब दिया कि ‘‘सार्वजनिक दायित्व की भावना को लेकर मैं ये कहने का अपना कत्र्तव्य महसूस करता हूं कि मैं जिले को छोडऩे में असमर्थ हूं परंतु यदि अधिकारियों को इससे खुशी मिलती है तो मैं आदेश की अवज्ञा के दंड से पीडि़त होना पसंद करूंगा. अदालत में भी उन्होंने ऐतिहासिक बयान दिया. उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह बयान किसी भी प्रकार से मुझ पर लगाये जाने वाले दंड को कम के वास्ते नहीं दे रहा हूं, बल्कि यह दर्शाने के लिये कि मैंने मेरे लिये जारी आदेश का असम्मान विधिपूर्ण प्राधिकारी के लिये सम्मान के वास्ते नहीं है बल्कि हमारे उच्चतर कानून, आत्मा की आवाज की आज्ञा में दिया... यह दृढ़ विश्वास है कि संविधान के दायरे में जिसके अधीन हम रह रहे हैं, आत्म-सम्मान वाले व्यक्ति के लिये एकमात्र सुरक्षित और सम्मानजनक यही है कि ऐसी स्थितियों में जिनका मुझे सामना करना पड़ रहा है, वही करना है जो मैंने करने का निर्णय कर लिया है, और वह है कि अवज्ञा की पेनाल्टी का विरोध किये बगैर प्रस्तुति.‘‘

दंडाधिकारी ने कहा कि इस बयान में दोष की स्पष्ट व्याख्या नहीं होती है. इस पर गांधीजी ने कहा कि, ‘‘मैं अदालत का समय बर्बाद करना नहीं चाहता और मैं दोषी मानता हूं.‘‘ इसे दंडाधिकारी को और आगे पूछताछ करने के लिये मज़बूर कर दिया. उन्होंने कहा, ‘‘यदि आप जिले को अभी छोड़ देते हैं नहीं लौटने का वायदा करते हैं, आपके खिलाफ  मामले को वापस ले लिया जायेगा.‘‘ गांधीजी ने उत्तर दिया ‘‘ऐसा नहीं हो सकता. इस समय कहना चाहूंगा, मैं चंपारण को यहां तक कि जेल से लौटने के बाद भी अपना घर बनाऊंगा.’’

उन्होंने दंडाधिकारी को परेशानी में डाल दिया. उन्होंने कहा कि मामले पर विचार करना अपेक्षित है और वे बाद में 3 बजे आदेश पारित करेंगे. अदालत की कार्यवाही पुन: 3 बजे शुरू हुई और दंडाधिकारी ने कहा कि वे तीन दिन बाद आदेश पारित करेंगे. दंडाधिकारी उन्हें जमानत पर रिहा करना चाहते थे परंतु गांधीजी ने इंकार कर दिया. अत: दंडाधिकारी को अपनी व्यक्तिगत हैसियत पर उन्हें रिहा करने के लिये मज़बूर होना पड़ा. तीन दिनों के बाद जिला प्रशासन ने गांधीजी के विरुद्ध मामले को वापस लेने का फैसला किया और जांच के लिये सभी संभव सहायता देने की बात कही.

नियुक्ति के खि़लाफ  बागान मालिक:

सरकार ने पट्टेदारों की शिकायतों के बारे में जांच के लिये समिति का गठन किया. गांधीजी भी समिति के एक सदस्य थे. परंतु श्री जे वी जेमसन के प्रतिनिधित्व में पट्टेदार एसोसिएशन ने गांधी का समिति का सदस्य बनने पर इस आधार पर विरोध किया कि वे प्रांत के लिये पूर्णत: अजनबी हैं और इसके भूमि कार्य की गंभीर प्रणाली से अनभिज्ञ हैं. दरअसल उसने पूरी बारीकी से सभी सूचना एकत्र की थी, अन्य स्रोतों से इसकी पुष्टि की और संबंधित लोगों के साथ जांच की तथा अंतत: निष्कर्ष पर पहुंचे. ‘‘उनकी प्रारंभिक रिपोर्ट में दर्शाया गया था कि किस तरह उन्होंने स्थिति का आकलन किया और जांच समिति की रिपोर्ट में दर्शाया गया कि उनके निष्कर्ष एकदम सही थे.‘‘

पदक लौटाये और पुन: प्राप्त किये: इस बीच गांधी जी ने चंपारण के घटनाक्रम पर वायसराय के निजी सचिव को एक पत्र लिख दिया और अंतत: कहा, ‘‘मेरा उद्देश्य राष्ट्रीय सेवा है और वह भी इतने लंबे समय तक जितना कि मानवीयता के लिये ऐसा करना जरूरी है. मैं समझता हूं कि क्यों मेरे दक्षिण अफ्रीका के काम को मानवीय माना गया था और मुझे 1915 में केसरी हिंद स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था. जब तक मेरे मानवीय उद्देश्य पर प्रश्नचिन्ह लगता रहेगा, तब तक मैं पदक धारण करने का अनिच्छुक बना रहूंगा. अत: मैं अपने लोगों से कह रहा हूं कि वे आपको पदक लौटा दें और मैं इसे पुन: प्राप्त करने में सम्मानित महसूस करूंगा यदि मुझे यह तब लौटाया जाये जब मेरे उद्देश्य पर प्रश्नचिन्ह न लगे.‘‘ गांधी जी ने पदक वायसराय को लौटा दिया था.

लेकिन वायसराय ने गांधीजी के तर्क को स्वीकार नहीं किया और पुन: गांधीजी को पदक भेज दिया. ये इतिहास था. सरकार ने मामलों को वापस लिया, सरकार ने पदक लौटाने के गांधी जी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. पुलिस अधिकारी और जिला प्रशासन गांधीजी के प्रति बहुत ही विनम्र हो गये थे. क्या ये अद्भुत था? गांधीजी ने कहा कि ये सत्य और अहिंसा की ताकत है. चंपारण मिशन के जरिये उन्होंने सत्य को उजागर करने के सिवाय कुछ नहीं किया.

गांधीजी चंपारण के जरिये सत्य और अहिंसा की शक्ति का संदेश देना चाहते थे. उन्होंने सीमांत और दबे कुचले लोगों को शक्तिशाली बना दिया. वे निर्भय हो गये. चंपारण में भारत की आज़ादी के आंदोलन का बीज बोया गया और इस तरह चंपारण के किसानों के उत्पीडऩ से क्रांति का सूत्रपात हुआ और यह समूचे भारत में फैल गई.

लेखक, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, राजघाट, नई दिल्ली के  निदेशक हैं, ई-मेल: nationalgandhimuseum@gmail.com   

चित्र: गूगल के सौजन्य से