संपादकीय लेख


पर्यावरण असंतुलन के खिलाफ कार्रवाई : समस्या समाधान के उपाय धरती को बचाने में अपना योगदान सुनिश्चित करें-डॉ. प्रियंका शर्मा

‘‘जीवन का तीन अरब वर्षों का इतिहास, 30 लाख वर्षों से मानव जैसी संरचनाएं, 10,000 वर्षों की सभ्यता और फिर मात्र 200 वर्षों की औद्योगिक क्रांति ने हमें विनाश के कगार पर पहुंचा दिया।’’

- प्रोफेसर जॉर्ज वाल्ड

पर्यावरण में सतत और विनाशकारी परिवर्तनों की दृष्टि से पिछले 50 वर्ष ऐतिहासिक रहे हैं, जिनमें धरती का तापमान बढऩे, वनों का ह्रास, ओजोन की परत क्षीण होने, रेगिस्तानों के प्रसार, दीर्घकालिक सूखों, और बार-बार आने वाली बाढ़ और समुद्री तूफानों की परिणति पर्यावरण असंतुलन के रूप में हुई है।

आरेख (आकृति 1) से स्थिति अधिक स्पष्ट होती है। 42 वर्ष पहले 1972 एक ऐतिहासिक वर्ष था जब पहली बार वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय मुद्दों को समझने का गंभीर प्रयास किया गया और इस तथ्य को स्वीकार किया गया कि मानव ने समूची दुनिया के चारों ओर एक आत्मघाती जीवन पद्धति सृजित कर ली है, और यह भी कि पर्यावरणीय असंतुलन के लिए मानव जिम्मेदार है। धरती ग्लोबल वार्मिंग यानी समूचे भूगोल के तापमान बढऩे से भयाक्रांत है और इस भय का कारण मानव-दुष्प्रेरित है।

यहां, महत्वपूर्ण यह है कि लोगों को यह जानकारी देनी है कि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए क्या किया जाना चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण के प्रयोजन के लिए 1972 के बाद से विभिन्न सम्मेलन/बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं, परन्तु इस समस्या की गंभीरता को अभी तक नहीं समझा जा सका है। ग्रीन हाउस गैसों और सीएफसीज में तत्काल कटौती की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि हम आज कार्बनडाइऑक्साइड के उत्सर्जन को पूरी तरह रोक दें तो भी स्थिरीकरण आने में कई सौ वर्ष लगेेंगे। दरअसल हम अपने ग्रह को बचाने के लिए ऐसे साझा तौर-तरीके विकसित करने में विफल रहे हैं, जिन पर उत्तर (विकसित राष्ट्रों) और दक्षिण (विकासशील देशों), दोनों के बीच सहमति होती। हमें जलवायु परिवर्तन और अस्थिरता तथा मौसम में अल्पावधि प्रवृत्तियों के बीच बेहतर समझ के लिए बेहतर मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है। हमें यह शीघ्र निर्णय करना होगा कि हम अपने पर्यावरण को होने वाली क्षति को कैसे रोकें। स्वच्छ विकास व्यवस्था यानी क्लीन डिवेलप्मेंट मेकेनिज्म और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे कुछ उत्तर हैं और हमें उनसे अवश्य सरोकार रखना है। 

धरती का तापमान बढऩे की समस्या के दुष्प्रभाव कम करने और उस पर नियंत्रण करने के लिए विभिन्न स्तरों पर निम्नांकित सुझाव दिए गए हैं।

पर्यावरण असंतुलन दूर करने के उपाय: दुष्प्रभाव कम करना

आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक संतुलन कायम करना अनिवार्य है। यह सुझाव दिया गया है कि राष्ट्रों को धरती का तापमान बढऩे का दुष्प्रभाव कम करने के लिए कार्यनीतियां अपनानी चाहिएं, जैसे ऊर्जा संरक्षण के उपाय करना, कार्बन ईंधनों की बजाय ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना तथा कार्बनडाईऑक्साइड तथा ग्रीन  हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना।

त्याग

तथ्य यह है कि औद्योगिक राष्ट्रों में जीवन शैली में बदलाव लाए बिना पर्यावरण को स्वच्छ बनाना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना, ये दोनों ही कार्य संभव नहीं हैं। चुनौती यह है कि इससे पहले कि विश्वव्यापी आपदा प्रबंधन ताकतें अधिक कठिन समायोजन हम पर लागू करें, हमें अब लोगों को आवश्यक बदलावों के प्रति प्रेरित करना है। 

राजनीतिक कार्रवाई

स्वयं के लिए और आने वाली पीढिय़ों के लिए प्राकृतिक वातावरण का संरक्षण करने हेतु दो उपाय अवश्य करने होंगे। पहला, यह कि लोगों को पर्यावरण की समस्याओं से अवगत कराने के लिए एक जबरदस्त शैक्षिक अभियान अवश्य चलाना होगा। दूसरा, अधिकाधिक सामान्य नागरिकों को एकजुट होना होगा और इस तरह की राजनीतिक कार्रवाई में शामिल होना होगा कि प्रदूषण निरोधी कानूनों को कड़ा बनाया जाये और उनके प्रवर्तन के प्रयास बढ़ाएं जायें ताकि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कर सकें।

संसाधनों का संरक्षण

इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान संसाधनों का उपयोग अधिक सक्षमता या किफायत के साथ किया जा सकता है। यह संभव है कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों का अनुकरण करते हुए बड़े पैमाने पर, बहु-स्तरीय रीसाइकलिंग कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं। तात्कालिक कार्य अधिक सक्षम प्रौद्योगिकियों का विकास नहीं है, चुनौती लोगों को उन संरक्षण उपायों को अमल में लाने के लिए प्रेरित करने की है, जो पहले से विद्यमान हैं। जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ाते हुए संरक्षण की एक संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा सकता है। जल और ऊर्जा के सक्षम इस्तेमाल के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां हासिल की गई हैं, जो बढ़ती मांग, बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव को समायोजित करने में मददगार हो सकती हैं।

नई प्रौद्योगिकी

बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और जागरूक नागरिक यह स्वीकार करते हैं कि विश्व की ऊर्जा समस्या का समाधान सौर ऊर्जा के रूप में निकाला जा सकता है। सौर विद्युत इकाइयां सूर्य से मिलने वाली और कभी समाप्त न होने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल करती हैं, जो सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त हैं और उनसे विकिरण या विस्फोट का कोई खतरा नहीं है। ऐसी प्रौद्योगिकी प्रकृति का अनुसरण है, चूंकि प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणाली में समस्त ऊर्जा अंतत: सूर्य से ही मिलती है।  

वृद्धि पर अंकुश

पर्यावरणीय संकट का कारगऱ समाधान कुछ हद तक जनसंख्या नियंत्रण पर भी निर्भर करता है, अन्यथा बढ़ती हुई आबादी से अधिक से अधिक प्रदूषण होगा और प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी हमेशा जारी रहेगी। यदि औद्योगिक राष्ट्रों के लोग विकासशील देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए इत्मीनानपूर्ण जीवन शैली और थोड़ा कम खर्चीला जीवन स्तर अपनाने लगें तो यह विश्व अधिक शांति और सुरक्षा के साथ रह सकता है।

हरित वैश्विक अर्थव्यस्था

हरित होना या पर्यावरण अनुकूल होना कोई विकल्प नहीं है, बल्कि एक अनिवार्यता है, जो देशों की अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्भरण और रोजगार सृजन के लिए आवश्यक है। सभी सरकारों का यह दायित्व है कि वे पर्यावरण उत्प्रेरकों का विस्तार करें, जिनमें ऊर्जा सक्षमता, नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल, जन-संचार प्रणाली, नए स्मार्ट विद्युत ग्रिडों का निर्माण और वनों को फिर से हरा-भरा बनाने के उपाय करना तथा शीघ्र और तीव्र परिणाम हासिल करने के लिए परस्पर प्रयासों में समन्वय स्थापित करना शामिल है। हरित अर्थव्यवस्था में निवेश कोई वैकल्पिक व्यय नहीं है।

 

 

TABLE-1

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यह अधिक समानता पर आधारित समृद्ध भविष्य के लिए एक स्मार्ट निवेश है। भारत को स्वयं के जलवायु उपायों को जारी रखना चाहिए, जैसे सौर ऊर्जा परियोजना संबंधी प्रस्ताव और ऊर्जा सक्षमता एवं संरक्षण के कार्यक्रम। सौर ऊर्जा का अनुमोदन जलवायु के बारे में राष्ट्रीय कार्ययोजना के रूप में किया गया है। साथ ही प्रधान मंत्री ने भारत की यह मंशा घोषित की है कि हम 2015 से 2019 तक हर वर्ष 5 प्रतिशत ऊर्जा बचाएंगे। हमारे पास स्थानीय रूप में और भी बहुत से कारगऱ विकल्प हैं, जैसे जलवायु अनुकूल आहार; ऊर्जा की बचत करने में सक्षम ढांचा, विशेषकर भवन, उपयोगी पौधों के साथ लघु उद्यान वाले टेरस, जहां उगाए जाने वाले पौधे कार्बनडाइऑक्साइड को ऑक्सीजन मे बदलने का करिश्मा कर सकते हैं। भारत जैसे देश में विशाल संभावनाएं हैं, जहां अधिक सक्षम माध्यम विकसित किए जा सकते हैं, पारेषण और वितरण हानियों में कमी लायी जा सकती है, सडक़ों और नगर आयोजना को बेहतर किया जा सकता है और इन सभी उपायों से सामुदायिक जीवन में अपेक्षित बदलाव लाया जा सकता है। 

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

धरती पर पर्यावरण संबंधी प्रलय की आशंका को देखते हुए हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का महत्व बहुत बढ़ जाता है। गैसों का उत्सर्जन रोकने के लिए एक व्यावहारिक वित्तीय ढांचा तैयार करना और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने की रणनीतियों के लिए धन की व्यवस्था करने के उद्देश्य से सभी संबद्ध पक्षों के बीच स्वस्थ संवाद होना आवश्यक है। नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन और जल संरक्षण की अभिनव नीतियों से जलवायु में बदलाव की प्रक्रिया को धीमा करने के प्रयास अधिक किफायती हो सकते हैं जिससे सरकारी खजाने पर बोझ कम हो सकता है और रोजगार तथा समग्र विकास को बढ़ावा मिल सकता है।

जलवायु परिवर्तन और इसके उत्पन्न होने वाले सुरक्षा संबंधी साझा दुष्परिणामों से निपटने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि आपसी सहयोग बढ़ाया जाय ताकि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम हो, लोगों को विस्थापित होने की मजबूरी से बचाने के लिए विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय रणनीति बने, अनुकूलन के ताजातरीन उपायों को आपस में मिल-बांट कर इस्तेमाल किया जाए तथा साझा संसाधनों का प्रबंधन हो सके।

हरित निर्माण या पर्यावरण की दृष्टि से उपयुक्त भवन

आज इमारतों को बनाने में पर्यावरण संबंधी बातों का ध्यान रखने और ऐसी प्रक्रियाओं को अपनाने का चलन बन गया है जिनमें पर्यावरण का पूरा ख्याल रखा गया हो और जो संसाधनों की दृष्टि से अपने पूरे जीवनकाल में किफायती हों। ग्रीन बिल्डिंग यानी हरित भवन को इस तरह से डिजायन किया जाता है कि मानव स्वास्थ्य और प्राकृतिक माहौल पर इनसे निर्मित परिवेश का समग्र प्रभाव का बुरा असर न पड़े। इसके लिए इनमें ऊर्जा, जल और अन्य संसाधनों का किफायत से इस्तेमाल किया जाता है और इनसे उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट, प्रदूषण और पर्यावरण में गिरावट को कम से कम करने का प्रयास किया जाता है। अगर इमारतों में बेहतर वास्तुशिल्प के उपयोग हो और ऊर्जा की किफायत के उपाय भी अपनाए जाएं तो इससे धरती के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी का मुकाबला करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों पर रोक लगाने जैसे उपायों से भी कहीं अधिक मदद मिल सकती है। निर्माण में कंक्रीट, धातुओं और इमारती लकड़ी के ज्यादा इस्तेमाल तथा घरों व कार्यालयों में एयर कंडीशनर से लेकर रोशनी करने तक के तमाम कार्यों में बिजली की खपत घटाकर उन क्षेत्रों में करोड़ों डालर की

 

Table 2

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बचत की जा सकती है जिनमें दुनिया में बिजली की कुल खपत का 30 से 40 प्रतिशत तक उपयोग होता है। बिजली की किफायत करने वाले बल्बों के इस्तेमाल, बेहतर इनसुलेशन और मकानों को हवादार बनाकर उन्हें अनावश्यक रूप से बड़ा बनाने से बचाया जा सकता है।



आर्गेनिक खेती

धरती के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी को रोकने का एक कारगर और तरीका है आर्गेनिक उत्पादों/खाद्य पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को बढ़ाया जाए। कार्बनिक खेती में जो मिट्टी उपयोग में लायी जाती है उसकी कार्बन डाइ आक्साइड अवशोषण की क्षमता पारम्परिक खेती में काम आने वाली मिट्टी की अवशोषण क्षमता से बहुत ज्यादा होती है। अनुमानों से पता चलता है कि अगर खाद्य सामग्री के उत्पादन के लिए आर्गेनिक फार्मिंग का तरीका अपना लिया जाए तो 580 अरब पाउंड कार्बन डाइ आक्साइड से निजात पायी जा सकती है। 

 

Table3

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स्वास्थ्य संगठन की प्रतिक्रिया

कई नीतियां और कुछ व्यक्तिगत पसंद भी ऐसी हैं जिनसे न सिर्फ  ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जा सकता है बल्कि जिनसे स्वास्थ्य संबंधी कई लाभ भी उठाये जा सकते हैं। मिसाल के तौर पर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के उपयोग और पैदल चलने व साइकिल चलाने जैसे अभियानों को जोरदार तरीके से चलाकर निजी वाहनों के इस्तेमाल में कमी लायी जा सकती है। इससे कार्बन डाइ आक्साइड के उत्सर्जन को कम करके स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। 2009 में विश्व स्वास्थ्य सभा ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संबंधी नई कार्य योजना का अनुमोदन किया। इसके अंतर्गत ये बातें शामिल हैं:

*समर्थन: जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य के लिए बुनियादी खतरा है-इस बारे में जनता में जागरूकता बढ़ाना।

*साझेदारी: संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंतर्गत सहयोगी एजेंसियों के साथ तालमेल कायम करना और यह सुनिश्चित करना कि जलवायु परिवर्तन की कार्यसूची में स्वास्थ्य को उचित महत्व दिया जाए।

*विज्ञान और प्रमाण: जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के संबंधों के बारे में वैज्ञानिक प्रमाणों की समीक्षाओं में तालमेल रखना तथा वैश्विक अनुसंधान कार्यक्रम तैयार करना।

*स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करना: जलवायु परिवर्तन को लेकर देशों की स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशीलता का आकलन करने में मदद करना। स्वास्थ्य संबंधी खतरे को कम करने के लिए क्षमता सृजन करना ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता में कमी आए।

व्यक्तिगत स्तर पर सुझाव:

*विज्ञान की शब्दावली में पेड़ कार्बन डाइ आक्साइड को अवशोशित कर कार्बन उत्सर्जन की समस्या का समाधान करते हैं। पेड़ एक तरह के प्राकृतिक एयर कंडीशनर यानी वातानुकूलक हैं। वे एक तरह की लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी जीवन रक्षक प्रणाली कहे जा सकते हैं। इसलिए पेड़ लगाइये क्योंकि ये हमारा पोषण करते हैं। आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि विभिन्न क्षेत्रों में एक तिहाई इलाके में पेड़-पौधे लगाए जाएं। जैसे उद्योग, शिक्षा संस्थाओं, सरकारी/निजी संगठनों, रिहायशी इलाकों, धार्मिक स्थानों आदि के पास उपलब्ध जमीन के एक तिहाई हिस्से में उपयोगी बागान अथवा पेड़-पौधे लगाये जाने चाहिएं। मैं उपयोगी बागान/पेड़-पौधे पर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी क्योंकि ये पारिस्थितिकी के अनुकूल होते हैं। हमारे वेदों में इस तरह के पेड़-पौधों के संदर्भ में पंचवटी और नवग्रह वाटिका पीपल, बरगद, नीम, आम, मौलिश्री, गूलर, अशोक, आंवला और बेल आदि को लगाने का उल्लेख किया गया है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यूकेलिप्टस, पेल्टाफार्म, बिलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा), अमलतास, गुलमोहर, कसूद, जकरांदा जैसे पेड़ नहीं लगाए जाने चाहिए। प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा जैसे पेड़ों ने राजस्थान में 28.72 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के 20 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में स्थित घना पक्षी अभयारण्य में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर दिया है।

*पर्यावरण के लिए उत्पन्न संकट से निपटने के लिए ऊंचे होते जा रहे जीवन स्तर में बदलाव लाना और सरल तथा जटिलताओं से मुक्त जीवन-शैली अपनाना भी बहुत जरूरी है। औसत अमरीकी जिस तरह की जीवन-शैली अपनाते हैं उसमें प्रति व्यक्ति 20 टन ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है जो कि  पर्यावरण के लिहाज से सही नहीं है। इसके लिए निर्धारित सुरक्षित सीमा प्रति व्यक्ति 2.3 टन ही है और हमें ऐसी जीवन शैली अपनानी चाहिए जिसमें उत्सर्जन इस सीमा में रहे।

*क्या आप जानते हैं गूूगल पर एक छोटी सी सर्च करने पर 7 ग्राम कार्बन डाइ आक्साइड का उत्सर्जन होता है? इसलिए सर्च कीजिए मगर तभी जब ऐसा करना जरूरी हो। अगर बहुत जरूरी न हो तो अनावश्क सर्च मत कीजिए।

*पॉलीथीन की थैलियों का इस्तेमाल बंद कीजिए। चाहे खरीदारी के लिए जाना हो या पिकनिक पर, हमेशा सूती/जूट के कैरी बैग का उपयोग कीजिए।

*जीवन के हर क्षेत्र में ऊर्जा का इस्तेमाल दक्षता से किया जाना चाहिए। हमेशा ऊर्जा की किफायत करने वाले बल्बों, जैसे सीएफएल का इस्तेमाल कीजिए।

*बिजली के साथ-साथ पानी की भी किफायत जरूरी है।

*इस बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए पर्यावरणको स्कूल और कालेज की पाठ्यचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। प्रकृति के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक बनाया जाना चाहिए।

*हर एक व्यक्ति को बताया जाना चाहिए कि मानवीय गतिविधियों का पारिस्थितिकीय संतुलन पर कितना बुरा असर पड़ रहा है और इससे कैसे निपटा जाए।

*रेशम की एक साड़ी को बनाने में 50 हजार रेशम कीट मारे जाते हैं। हम जो कुछ भी पहनें वह ऐसा होचा चाहिए जो दोषमुक्त और शुद्ध हो।

*निजी वाहनों की संख्या में कमी की जानी चाहिए और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

*जहां तक पर्यावरण के संरक्षण के लिए कायदे-कानून का सवाल है, हमारे कानून बड़े सख्त हैं। लेकिन इनपर अमल करने में खामियां हैं। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि हम एकजुट होकर राजनीतिक कार्रवाई के लिए तैयार हो जाएं ताकि प्रदूषण विरोधी कानून को सुदृढ़ किया जा सके, कानून पर अमल सुनिश्चित हो सके तथा हमारी जैव-विविधता का  संरक्षण हो सके। इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि हमें इस बात का अहसास होना चाहिए कि विकास तभी संभव है जब हम पर्यावरण के कायदे-कानूनों का अनुसरण करें। केवल कानून बनाने से बात बनने वाली नहीं है। उन पर अमल भी होना चाहिए।      

निष्कर्ष : आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो कुछ उत्सर्जन किया जा चुका है, वह तो हो ही चुका है। हालांकि यह सही नहीं है, यह एक तथ्य है कि जिस से जो बन पड़े उसे करने के लिए सबको सहयोग करना है अन्यथा हम कभी नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगे। विकसित देश इस समस्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। उन्हें अन्य देशों की ओर से भुगतान करना होगा ताकि उन्हें भी ऊर्जा और टेक्नालॉजी आदि फायदे मिल सकें। विकासशील देशों को स्वच्छ टेक्नोलाजी के साथ आगे बढऩा होगा ताकि वे विकृत विकास के रास्ते में भटकने न पाएं। हमारे पास सबकुछ है, लेकिन हमें उपलब्ध चीजों को सही स्थान पर रखकर कार्य करना होगा। हम तब तक प्रगति नहीं कर पाएंगे जब तक जलवायु परिवर्तन और उसके दुष्परिणामों को उतना ही महत्व नहीं देंगे जितना आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन आदि को नहीं देंगे। पर्यावरण के साथ-साथ विकास हमारा नया एजेंडा होना चाहिए। आज दुनिया के प्रत्येक देश के लिए विकास या उन्नति के नाम पर जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियों को संशोधित करने का सही वक्त आ गया है। पर्यावरण के संरक्षण और अर्थव्यवस्था के विकास का कार्य साथ-साथ होना चाहिए। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था: ‘‘हम जो कुछ करते हैं और हम जो कुछ करने में सक्षम हैं इनके बीच अंतर ही दुनिया की ज्यादातर समस्याओं का समाधान करने को काफी है’’

 

लेखक से drpriyankasharma2010@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। लेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं।