संपादकीय लेख


Volume-32, Dated 4-10 November, 2017

भारतीय कृषि : जीएसटी फ्रेमवर्क में


नवीन पी सिंह और जयप्रकाश बिसन
कर नीतियां सरकार के लिए दोहरा

राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने के महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक हैं. ये है - आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और राष्ट्र की आर्थिक वृद्धि को स्थायित्व प्रदान करना. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में परोक्ष कर नीति में सरकार द्वारा हाल में किया गया सुधार आदर्श और परिवर्तनकारी लगता है. कर का दायरा बढऩे, कर प्रणाली में प्रचालनगत और ढांचागत खामियां दूर करने और कम उत्पादक से अधिक उत्पादक क्षेत्रों में संसाधनों के पुनर्वितरण जैसी विशेषताओं को देखते हुए यह कर प्रणाली सरकार का राजकोषीय घाटा कम करने में मददगार सिद्ध होगी. वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में जीएसटी एक मंत्र बन गया है और सरकारी अधिकारी, नीति निर्माता तथा आमजन अर्थव्यवस्था और इसके प्रभावों को लेकर आशंकित हैं. परंतु, कृषि क्षेत्र पर जीएसटी के प्रभावों के बारे में दो तरह की विचारधाराएं विकसित हुई हैं, जिन्हें भ्रांतियंों और वास्तविकता के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है. इस आलेख में भ्रांतियंों और वास्तविकताओं पर एक साथ विचार करने का प्रयास किया जाएगा और कृषि क्षेत्र पर इसके प्रभावों को लेकर तथ्यहीन चीजों को दूर करने का प्रयास किया जाएगा. वर्तमान आलेख को दो भागों में बांटा गया है - भ्रांतियां और वास्तविकताएं. इन दोनों धारणाओं पर विचार करने के बाद अंत में निष्कर्ष दिया गया है. इसे केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित रखा गया है और डेरी फार्मिंग, पोल्ट्री फार्मिंग, स्टॉक ब्रीडिंग, लकड़ी या घास कटाई, फल एकत्र करना, कृत्रिम वन उगाना या पौध अथवा पादप तैयार करना, जैसे क्षेत्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया है (क्योंकि कृषि की परिभाषा में मॉडल जीएसटी अधिनियम में इन चीजों को शामिल नहीं किया गया है).
कृषि क्षेत्र पर जीएसटी का प्रभाव: भ्रांतियां और वास्तविकताएं
जीएसटी लागू होने के साथ ही कृषि क्षेत्र पर उसके प्रभावों के बारे में अनेक भ्रांतियां पैदा हुई हैं और उनमें किसी एक या अन्य  पक्ष की अनदेखी किए जाने के कारण विभिन्न हितभागियों की मानसिकता को प्रभावित किया है.
इन भ्रांतियों में निम्नांकित शामिल हैं:
*जीएसटी के कार्यान्वयन के बाद विभिन्न उर्वरकों के दाम बढ़ेंगे.
*जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों के मूल्य में वृद्धि होने के कारण कार्बनिक खेती पर नकारात्मक असर पड़ेगा.
*जीएसटी लागू होने के बाद पादप संरक्षण रसायनों के इस्तेमाल में कमी आएगी. 
*लघु-सिंचाई पद्धतियों पर प्रभाव स्पष्ट नहीं है.
*जीएसटी लागू होने के बाद कृषि मशीनरी के दाम बढऩे से कृषि यंत्रीकरण की लागत बढ़ जाएगी.
*कृषि सेवाओं के मूल्य यथावत बने रहेंगेे चूंकि कृषि सेवाओं को जीएसटी से बाहर रखा गया है.
*जीएसटी लागू होने से कृषि जिंसों के मूल्य में वृद्धि होगी.
*कृषि आपूर्ति शृंखला पर असर पड़ेगा चूंकि लॉजिस्टिक सेवाओं पर जीएसटी के अंतर्गत कर लगेगा.
*जीएसटी से कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में कमी आएगी.
कृषि क्षेत्र में जीएसटी के प्रभावों के बारे में वास्तविकताएं
मूल्य संवर्धित कर (वैट), और उत्पाद शुल्क तथा जीएसटी कराधान व्यवस्था के अंतर्गत कृषि जिंसों पर कर की दरों का व्यापक अध्ययन करने के बाद हमने ऊपर वर्णित भ्रांतियों का उत्तर देने और इन भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है.
उत्पाद और वैट व्यवस्था में उर्वरक उद्योगों को विभिन्न प्रकार की छूट/रियायतें दी गई हैं. इसे देखते हुए उर्वरक उत्पादों पर कुल कर तैयार उर्वरक उत्पादों के मूल्य का करीब 5-10 प्रतिशत होगा. परंतु, जीएसटी के कार्यान्वयन के बाद उर्वरकों को 5 प्रतिशत की कर स्लैब में रखे जाने से उर्वरकों पर समग्र कर में 2 से 3 प्रतिशत तक कमी आएगी. नतीजतन यूरिया, डाई-अमोनिया फास्फेट (डीएपी) और म्यूरेट आफ पोटाश (एमओपी) जैसे उर्वरकों पर कर का बोझ क्रमश: रु 6, 11 और 18 प्रति बैग कम होने की उम्मीद है. उर्वरकों के मूल्य में महत्वपूर्ण कमी के परिणाम स्वरूप उनका इस्तेमाल बढऩे की संभावना है जिसकी परिणति फसल उत्पादन में वृद्धि के रूप में होगी.
दूसरी ओर, जीएसटी के कार्यान्वयन से पहले सूक्ष्म पोषक उर्वरकों पर कर की दरें विभिन्न राज्यों में अलग अलग (उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पंजाब में क्रमश: 4, 6, 5.5, शून्य और शून्य प्रतिशत) थीं परंतु, जीएसटी के कार्यान्वयन के बाद की कर दरों से कम थीं. सूक्ष्म पोषक उर्वरकों को 12 प्रतिशत टैक्स स्लैब में रखे जाने से उनके मूल्य में जो बढ़ोतरी होगी, वह इन पोषक तत्वों की कमी वाले क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषक उर्वरकों के इस्तेमाल में प्रतिरोधक का काम करेगी परंतु इससे अनियंत्रित इस्तेमाल वाले क्षेत्रों में न्यायोचित अनुप्रयोग को बढ़ावा मिलेगा.
यह कहना युक्ति संगत नहीं है कि जीएसटी के कार्यान्वयन से कार्बनिक खेती पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि कार्बनिक खेती में प्रयुक्त सामग्री अर्थात् जैव-उर्वरकों, जैव-कीटनाशकों, जैव-उत्प्रेरकों को जीएसटी प्रणाली में किसी कर स्लैब में परिभाषित नहीं किया गया है. यदि किसी अन्य कारण से इन पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि होती है तो उसका दोष जीएसटी को देना न्यायोचित नहीं है. परन्तु ब्रैंडिड फार्म यार्ड मैन्योर (एमएमवाई) अर्थात् ब्रैंडिड कार्बनिक खाद पर जीएसटी के अंतर्गत 5 प्रतिशत की दर से कर लगाया गया है! परन्तु ब्रैंडिड एफएमवाई का उपयोग शहरी क्षेत्रों में बागवानी तक सीमित है और फसल उत्पादन में कार्बनिक खाद की कुल खपत नगण्य हो सकती है. न तो वाणिज्यिक कार्बनिक फार्मों द्वारा और न ही किसानों द्वारा फसल उगाने के लिए ब्रैंडिड एफएमवाई का उपयोग किया जाता है.
अत: वाणिज्यिक फसल उत्पादन में कार्बनिक खेती पद्धतियों के इस्तेमाल पर जीएसटी का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा.
कीटनाशक, खरपतवारनाशक, रोडेंट यानी कृंतकनाशक जैसे पादप संरक्षण रसायन आधुनिक खेती प्रणाली का अपरिहार्य हिस्सा हैं. परन्तु उनका निरंतर और अत्यधिक इस्तेमाल कई चिंताजनक समस्याओं को जन्म देता है, जैसे मृदा में अवशेष संचित होना, जैव-आवर्धन और कृषि पारिस्थितिकी प्रणाली से लाभदायक जीव-जन्तुओं की हानि. पादप संरक्षण रसायनों पर जीएसटी की दर 18 प्रतिशत होने से उनके अत्यधिक इस्तेमाल पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और उनके विवेक सम्मत इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा. इससे न केवल इन रसायनों के दाम बढऩे पर अंकुश लगेगा बल्कि पर्यावरण और जैवविविधता को भी लाभ पहुंचेगा. दूसरी तरफ, महाराष्ट्र ने पादप संरक्षण रसायनों पर जीएसटी की दर में 0.5 प्रतिशत की कमी करने का निर्णय किया है, जो जीएसटी से पहले 18.5 प्रतिशत थी. पादप संरक्षण रसायनों को लेकर हाल ही में देश के कुछ भागों में जो  असंतोष दिखायी दिया, उसे इन पदार्थों के ऊंचे मूल्यों के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए बल्कि उसका कारण उनकी गुणवत्ता थी. यह भली-भांति स्वीकृत तथ्य है कि किसान पादप संरक्षण रसायनों के लिए उच्चतर मूल्य अदा करने के लिए तैयार हैं बशर्ते उनकी गुणवत्ता तत्संबंधी निर्धारित मानदंड के अनुरूप हो.  
सूक्ष्म-सिंचाई युक्तिसंगत खेती पद्धतियों का महत्वपूर्ण घटक होने के नाते खेती में संसाधनों के किफायती इस्तेमाल को बढ़ावा देती है. संसाधनों की इस्तेमाल सक्षमता में वृद्धि के अलावा, सूक्ष्म-सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली) ऊंचे-नीचे भूभागों में सिंचाई की एक किफायती कार्यनीति है.) 
यह सच है कि हाथ से की गई जुताई/मवेशी संचालित जुताई और विद्युत संचालित जमीन की तैयारी में काम आने वाले उपकरणों पर जीएसटी की दर 12 प्रतिशत निर्धारित की गई है, जो केन्द्रीय उत्पाद और वैट प्रणाली के अंतर्गत कर-मुक्त थे. परन्तु, यह उल्लेखनीय है कि भारत में प्रमुख फसलों, जैसे धान, गेहूं, गन्ना, कपास और मक्का, की खेती के यंत्रीकरण में ट्रैक्टर और हार्वेस्टर की प्रमुख भूमिका है और इनमें से ट्रैक्टर की अगुवाई में हो रहा यंत्रीकरण अधिक महत्वपूर्ण है. जीएसटी व्यवस्था के अंतर्गत ट्रैक्टरों और पावर टिलरों पर संचयी कर की दर में विभिन्न राज्यों में 4.5 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत तक की कमी आयी है. दूसरी तरफ सिंचाई के लिए पानी निकालने के काम आने वाले  सेंट्रिफ्यूगल पंप उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 3.5 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत तक सस्ते हो गए हैं. दूसरी तरफ पादप संरक्षण उपकरण जैसे स्प्रेयर और डस्टर पर जीएसटी व्यवस्था में कर की दर बढ़ गई है यह ध्यान देने की बात है कि जीएसटी लागू होने के बाद छोटे कृषि उपकरणों की लागत में बढ़ोतरी की तुलना में भारी कृषि मशीनों के मूल्यों में कमी अधिक आयी है. 
यह अर्धसत्य है कि कृषि सेवाओं को जीएसटी से बाहर रखे जाने के कारण कृषि सेवाओं की लागत यथावत् रहेगी. कृषि सेवाओं में निम्नांकित शामिल हैं - क) खेती से संबंधित सेवाएं (किसी भी फसल की पैदावार से प्रत्यक्ष रूप में जुड़े कृषि कार्य, जो कृषि फसल के बुनियादी स्वरूप को नहीं बदलते हैं परन्तु, उन्हें प्राथमिक बाजार के लिए क्रय-विक्रय योग्य बना देते हैं; खेती के काम से संबद्ध मशीनों या प्रचालन के लिए अपेक्षित भवन सहित या भवन रहित कृषि भूमि को किराए पर देना; द्वितीयक विपणन कार्य; कृषि विस्तार सेवाएं; किसी कृषि उपज विपणन समिति या बोर्ड या कमीशन एजेंट द्वारा खेती की पैदावार की खरीद-फरोख्त के लिए प्रदान की गई सेवाएं, आदि), ख) कृषि सहायता सेवाएं (बैंकिंग, बीमा और गोदाम और परिवहन) और ग) अनुसंधान एवं विकास सेवाएं. 
परोक्ष कर की वर्तमान नीति कृषि सेवाओं को आंशिक रूप में छूट प्रदान करती है और ऊपर वर्णित अनुसंधान एवं विकास सेवाओं जैसी कुछ सेवाओं का कर के दायरे में रखती है.
ताजा या कच्चे रूप में उपभोग की जाने वाली कृषि वस्तुएं जैसे फल और सब्जियां, दूध और रोजाना इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुएं जैसे चीनी, मिल्ड राइस, गेहूं का आटा और दालें आदि, जो किसी ब्रैैंड के तहत नहीं बेची जा रही हों, जीएसटी के अंतर्गत कर से मुक्त जिंसों की श्रेणी में रखा गया है. परन्तु, कोई भी ऐसी कृषि वस्तु, जो गहन प्रसंस्करण से गुजरने के बाद अनिवार्यत: अपना स्वरूप बदल लेती है, जैसे चाय, कॉफी, बेकरी उत्पाद और ऐसे उद्योगों की अन्य वस्तुओं, जो कृषि क्षेत्र से कच्चा माल लेते हैं, पर विभिन्न श्रेणियों के तहत जीएसटी लगाया गया है. इस प्रकार यह ध्यान देने की बात है कि जीएसटी लागू होने से कृषि जिंसों के मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होने जा रही है. दूसरी ओर 2016 में समग्र एफएमसीजी उद्योग में खाद्य उत्पादों की हिस्सेदारी मात्र 19 प्रतिशत है. इसका यह अर्थ है कि भारत में खाद्य व्यापार का अधिसंख्य हिस्सा ब्रैंड रहित असंगठित क्षेत्र में संचालित किया जा रहा है. अत: ब्रैंडिड खाद्य वस्तुओं को छोड़ कर जीएसटी की वजह से कृषि जिंसों के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी.    
यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि अनेक सेवाओं के कर के दायरे में आ जाने से छोटे कस्बों में छोटे व्यापारियों के मामले में खेती की वस्तुएं महंगी हों जाएंगी. परन्तु, वास्तव में जीएसटी लागू होने के बाद लॉजिस्टिक और सप्लाई चेन की लागत में कमी आयी है. यह उम्मीद की जा रही है कि जीएसटी व्यवस्था में अंतर-राज्यीय जांच चौकियों पर खर्च होने वाला करीब 20 प्रतिशत समय बचेगा और सडक़ परिवहन में सतत वाहन चालन हर रोज 80 से 100 किलोमीटर तक अधिक होगा. इससे न केवल लॉजिस्टिक की कार्यसक्षमता में सुधार आयेगा बल्कि मार्ग के दौरान खराब हो जाने वाली वस्तुओं की बर्बादी रोकने में भी मदद मिलेगी. इसके अतिरिक्त इस ई-वे बिल से न केवल माल की आवा-जाही सुगम होगी बल्कि तत्संबंधी रसीद सामान की ढुलाई के दौरान सामान के टिकट के रूप में काम करेगी और सामान वाहक की स्थिति का पता लगाने में भी मदद मिलेगी. इस तरह सामान को समय पर लक्ष्य पर पहुंचाया जा सकेगा.    
देश में कृषि क्षेत्र की बढ़ोतरी पर जीएसटी का बहु-आयामी प्रभाव पड़ा है. इसने जहां एक ओर निवेश बाज़ार (जैसे उर्वरक, भूमि तैयार करने के विद्युत चालित उपकरण, मुख्य रूप से ट्रैक्टर्स और पावर टिलर्स, सिंचाई उपकरण आदि) पर रचनात्मक प्रभाव डालते हुए कृषि उपज और उत्पादकता बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण पैदा किया है, वहीं दूसरी तरफ संस्थागत चुनौतियों; आपूर्ति विषयक दबावों (जैसे टोल बूथ में अधिक प्रतीक्षा समय, कराधान की बहुलता, प्रांतीय सीमाओं पर व्यापार अड़चनें आदि) का समाधान करने में भी मदद की है, जिससे देशभर में कृषि आपूर्ति शृंखलाओं की कार्यक्षमता में वृद्धि होगी और कृषि उत्पाद जन-जन तक उपलब्ध हो सकेंगे. कर-बहुलता और कराधान के प्रपाती प्रभाव की समाप्ति, करों के अनुपालन में वृद्धि और संसाधनों के बेहतर आवंटन से न केवल कृषि प्रणाली की अक्षमताएं दूर होंगी, बल्कि इस क्षेत्र को तीव्र विकास के मार्ग पर लाने में भी मदद मिलेगी. अत: जीएसटी परवर्ती युग में कृषि क्षेत्र का स्थिर और संतुलित विकास होने की संभावना है.
निष्कर्ष
कराधान व्यवस्था में परिवर्तन से कृषि क्षेत्र में उच्चतर कार्यक्षमता, पारदर्शिता और अधिक कर-अनुपालन जैसे संचालकों का समावेश हुआ है, जो इस क्षेत्र को प्रारंभिक गड़बडिय़ों से बचाने में पर्याप्त सशक्त हैं. उत्पाद शुल्क और वैट व्यवस्था तथा जीएसटी व्यवस्था में कृषि क्षेत्र के तुलनात्मक अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो गयी है कि बीज, उर्वरक, सेंट्रिफ्यूगल पंपों, टै्रक्टरों और पावर टिलर जैसे निवेश नई कर प्रणाली में सस्ते होंगे जबकि पादप संरक्षण रसायन, माइक्रोन्यूट्रिन्ट यानी सूक्ष्म पोषक उर्वरकों और हार्वेस्टरों के मूल्यों में किंचित वृद्धि संभव है, जिनकी वृद्धि संबंधी लागत अन्य निवेशों के मूल्य में कमी से होने वाले फायदों की तुलना में नगण्य है. उत्पादों की दृष्टि से विचार करें तो केवल संसाधित और ब्रैंडिड कृषि उत्पादों के दामों में मामूली बढ़ोतरी होगी. परन्तु, भारत में खाद्य वस्तुओं की खपत ताजा उत्पादों के रूप में अधिक होती है और दैनिक खपत वाली ऐसी वस्तुएं (चावल, दाल, तिलहन, चीनी आदि) जिनके प्रसंस्करण की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें कर की शून्य दर के अंतर्गत रखा गया है, इसलिए उपभोग के संदर्भ में भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा. अत: जीएसटी व्यवस्था से कृषि क्षेत्र पर कोई नकारात्मक प्रभाव पडऩे की आशंका नहीं है. 
(नवीन पी सिंह आईसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनोमिक्स एंड पालिसी रिसर्च (एनआईएपी), नई दिल्ली में प्रधान वैज्ञानिक हैं और जयप्रकाश बिसन कृषि अर्थशास्त्र डिविजन, आईएआरआई, नई दिल्ली, में पीएच.डी स्कॉलर हैं)
ई-मेल v2j25@yahoo.in आलेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी विचार हैं).
चित्र:गूगल से साभार.