संपादकीय लेख


Volume-39, 23-29 December, 2017

 
उपभोक्ता सशक्तिकरण

डा. शीतल कपूर

भारत में उपभोक्ता आंदोलन के इतिहास में 24 दिसंबर एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि आज ही के दिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 अस्तित्व में आया था. संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 घटिया उत्पादों, बाज़ार में हेराफेरी के जरिए मूल्यों में बढ़ोतरी, असफल वारंटी, बिक्री उपरांत असंतोषजनक सेवाओं और अनुचित व्यापारिक लेनदेन से उपभोक्ताओं के हितों की संरक्षा के लिये अधिनियमित किया था. यह सभी प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करते हुए अपने आप में एक प्रगामी और संपूर्ण कानून है. इस तरह 24 दिसंबर को संपूर्ण भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के तौर पर मनाया जाता है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को विनिर्माताओं के भ्रष्टाचार से उपभोक्ताओं की संरक्षा के लिये एक परोपकारी सामाजिक कानून माना जाता है. उभरते बाज़ार वातावरण में उपभोक्ताओं की बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अधिनियम में अनेक बार संशोधन किये गये हैं और आखिऱी संशोधन कानून को अधिक कड़ा करने और उपभोक्ता मंचों द्वारा मामलों के निपटान में होने वाली देरी में कटौती किये जाने के मकसद से 2002 में किया गया था.
                बाज़ार केवल तभी कार्यकुशलता के साथ संचालित हो सकते हैं जब उपभोक्ता जागरूक होते हैं. प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ारों के लिये सूचनात्मक प्रणालियों का होना आवश्यक होता है. उपभोक्ता प्रत्येक लेनदेन की लागत और लाभों के बारे में सतर्क होने चाहियें और उन्हें इनकी अच्छी तरह से जानकारी होनी चाहिये. जहां कहीं उपभोक्ता सतर्क और सुविज्ञ होते हैं बाज़ार अधिक कुशलता से संचालित होते हैं और प्रतियोगी ताकतें तेज़ हो जाती हैं तथा उनकी व्यापक भूमिका होती है जिससे उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचता है. व्यापार और उद्योग से जुड़े भ्रमित सदस्यों के लिये भी चेतावनी हो जाती है कि कानून में पीडि़त उपभोक्ताओं द्वारा कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है और उपभोक्ताओं का उत्पीडऩ करने की बजाए उनके साथ उचित व्यवहार करना अधिक फायदेमंद साबित होगा. वर्तमान दौर में जहां हरेक विनिर्माता प्रभावी और भ्रामक विज्ञापनों के जरिए अधिकतम लाभ कमाने की कोशिशों में रहता है और व्यापारिक मामलों में अनुचित और प्रतिबंधित व्यवहार का प्रयोग होने लगा है, ऐसे में देश में शक्तिशाली, व्यापक आधार वाले उपभोक्ता आंदोलन के निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है. एक बार जागरूकता का स्तर बढ़ जाने और ग्रामीण तथा शहरी उपभोक्ताओं दोनों के अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हो जाने से स्वत: ही व्यापार और उद्योग तथा सेवा प्रदाताओं पर इस बात के लिये दबाव बढ़ जायेगा कि वे बाज़ार में किफ़ायती मूल्यों पर वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध कराएं. इस तरह वे अनुचित और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहारों में संलिप्त होने से भी परहेज करेंगे.
इस तरह उपभोक्ता अथवा ग्राहक देश की आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उपभोक्ता मांग के बग़ैर विनिर्माताओं के पास उत्पादन और इसे उपभोक्ताओं को बेचने के प्रमुख उद्देश्य का अभाव हो जायेगा. अनेक बार भारत में उपभोक्ताओं को भगवान के समान दर्जा दिया जाता है. हम दुकानों पर कई तरह की पंक्तियां लिखी देखते हैं, जैसे कि ‘‘उपभोक्ता शहनशाह होता है’’, ‘‘उपभोक्ता सदैव सही होता है’’, ‘‘ग्राहक देवो भव:’’ आदि.
महात्मा गांधी ने भी बाज़ार में उपभोक्ताओं के महत्व के बारे में उल्लेख किया था.
‘‘उपभोक्ता हमारे परिसरों पर आने वाला सबसे महत्वपूर्ण आगंतुक होता है. वह हम पर निर्भर नहीं होता है. हम उस पर निर्भर होते हैं. वह हमारे काम में बाधक नहीं है-वह इसका उद्देश्य होता है. हम उसे सेवाएं देकर उस पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं. वह हम पर उसे सेवाएं प्रदान करने का अवसर देकर मेहरबानी कर रहा है.’’
भारत में उपभोक्ता आंदोलन की क्रांति
भारत में उपभोक्ता संरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है. उपभोक्ता संरक्षण इसकी प्राचीन संस्कृति का हिस्सा रहा है और इसकी राजनीतिक व्यवस्था का प्रमुख अंग था. कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन भारत का बुनियादी कानून था और इसे ही उपभोक्ताओं की संरक्षा के प्रावधान के साथ सुदृढ़ किया गया. वस्तुओं की बिक्री का संचालन कुछ इस तरह से किया गया था कि आम जनता को कोई कष्ट न हो. यदि अत्यधिक लाभ (शासक के लिये) से आम जनता को कष्ट होता था तो उस व्यापार गतिविधि को तत्काल बंद कर दिया जाता था. व्यापारियों के लिये लाभ की सीमा निर्धारित की जाती थी. यहां तक कि सेवाओं के लिये समयबद्धता निर्धारित की गई थी, उदाहरण के लिये वास्तुकारों, बढ़ई, दर्जी, धोबी के लिये भी, उपभोक्ता के हित के संरक्षण के लिये नियम बनाये गये थे. प्राचीन साहित्य में यह भी उल्लेख है कि भारत में ऐसे विनियम थे जिनके तहत वजऩ और माप-तौल का पर्यवेक्षण होता था. मापतौल में कमी पाये जाने पर विक्रेताओं पर भारी जुर्माना किया जाता था. व्यापार में इस्तेमाल होने वाले माप तौल के औज़ारों का आधिकारिक एजेंसी निर्माण करती थी जो कि मानकीकरण के लिये जिम्मेदार होती थी और हर चार महीने में इनकी जांच की जाती थी. घटिया उत्पादों को बढिय़ा उत्पादों के तौर पर उपलब्ध करवाने वाले विक्रेताओं पर बेचे गये उत्पाद के मूल्य का आठ गुणा जुर्माना लगाया जाता था. वस्तुओं में मिलावट के लिये न केवल विक्रेताओं पर जुर्माना लगाया जाता था बल्कि वस्तु की हानि की भरपाई के लिये मज़बूर होना पड़ता था.
औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के बाद 1947 में भारतीय आर्थिक नीति घरेलू उद्योगों को संरक्षा प्रदान करने और विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिये घरेलू बाज़ारों को नहीं खोलने पर आधारित थी. भारत में उपभोक्ता आंदोलन ‘‘सामाजिक बल’’ के तौर पर उपभोक्ताओं के हितों की अनुचित व्यापार व्यवहारों के विरूद्ध संरक्षा और प्रोत्साहन की आवश्यकता के साथ आरंभ हुआ जो कि पश्चिमी देशों में शुरू हुए उपभोक्ता आंदोलन से बहुत भिन्न था. पश्चिमी देशों में उपभोक्ता आंदोलन औद्योगिकीकरण उपरांत तथा वस्तुओं और सेवाओं की प्रचुरता का परिणाम था.
भारत में उपभोक्ता आंदोलन के जन्म के बुनियादी कारण हैं:
क)अनियंत्रित खाद्य की कमी, जमाखोरी, काला बाज़ारी, खाद्य और खाद्य तेलों में मिलावट ने 1960 में उपभोक्ता आंदोलन को एक संगठित स्वरूप में जन्म दिया. यह समस्या विशेष तौर पर 1962 में भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय ज्यादा गंभीर हो गई थी.
ख)इसके अलावा प्रौद्योगिकी विकास में कमी के कारण उत्पाद विकल्पों का अभाव और 1970 के दशक में बढ़ती मंहगाई के कारण उपभोक्ताओं में बेचैनी बढ़ गई. 1970 तक उपभोक्ता संगठन बड़े पैमाने पर आलेख लिखने और बढ़ते मूल्यों के विरूद्ध अपनी आवाज उठाने में जुटे थे.
ग)तब से उपभोक्ता आंदोलन ने व्यापारिक फर्मों के साथ-साथ सरकार पर व्यापार संचालन को सही करने के लिये दबाव बनाया जिसने उपभोक्ताओं को परेशान कर दिया था.
घ)1986 में भारतीय सरकार द्वारा उठाया गया प्रमुख कदम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 का अधिनियमन था.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं
भारत में उपभोक्ता आंदोलन के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का अधिनियमन रहा है. अधिनियम में उपभोक्ताओं को अपने शिकायत के निपटारे के लिये कार्रवाई किये जाने के अधिकार प्रदान किये गये हैं. जब तक कि कोई उपभोक्ता अपने अधिकारों के बारे में अच्छी तरह से परिचित नहीं होता है वह अपने अधिकारों की सुरक्षा करने की स्थिति में नहीं हो सकता. कानून उपभोक्ता की जागरूकता के स्तर के अनुरूप ही प्रभावी हो सकता है. उपभोक्ता जागरूकता के उच्चतर और व्यापक स्तर से अधिक से अधिक उपभोक्ता व्यापार और उद्योग के साथ अपने लेनदेन के दौरान अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होंगे. उपभोक्ताओं की व्यापक चिंता से बाज़ार में उनके उत्पीडऩ का स्तर घटेगा. व्यापार और उद्योग भी उपभोक्ताओं की जवाबी कार्रवाई के डर से अपने व्यापार व्यवहारों को तैयार करने में अधिक सावधान हो जायेंगे. जैसे ही उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ेगी, व्यापार प्रबंधक ऐसी जागरूकता को अपने निर्णय करने और उत्पादों और सेवाओं के लिये परस्पर लाभकारी पेशकशों के निर्माण की दिशा में कार्रवाई करेंगे ताकि उपभोक्ताओं को संतुष्ट किया जा सके. ब्रैंडों और कंपनियों के प्रति विश्वास बनाये रखने के लिये उपभोक्ता की संतुष्टि पूर्वापेक्षा होती है.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनिमय, 1986 के अनुच्छेद 6 के अधीन उपभोक्ताओं के छह अधिकारों की संरक्षा सुनिश्चित की जाती है. ये हैं सुरक्षा, सूचना, पसंद, प्रतिनिधित्व, निपटारा और उपभोक्ता शिक्षा, तथा विनिर्दिष्ट प्रकृति में उपभोक्ताओं को सरल, तीव्र और किफायती निपटारा प्रदान करते हैं तथा जहां कहीं उचित होता है, प्रतिपूर्ति भी प्रदान की जाती है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत देश में दीवानी और अन्य विधिक समाधानों की तजऱ् पर एक तीन स्तरीय विशेष शिकायत निपटारा तंत्र की स्थापना की गई है जहां पर खरीदी गई किसी दोषपूर्ण वस्तु अथवा ली गई सेवाओं में कमियों के विरूद्ध असंतुष्ट उपभोक्ता शिकायत दजऱ् करा सकता है, जिसमें ऐसे वस्तु/सेवा प्रदाता के विनिर्माता और व्यापारी द्वारा अपनाये गये प्रतिबंधात्मक/अनुचित व्यापार व्यवहार सम्मिलित होते हैं. पिछले तीस वर्षों में 4.3 मिलियन से अधिक उपभोक्ता मामलों पर उपभोक्ता मंचों में कार्रवाई की गई और निर्णय सुनाए गए.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपभोक्ता शब्द को वस्तुऔर सेवाएंके तौर पर परिभाषित किया गया है. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुच्छेद 2(1)(घ) के अनुसार उपभोक्तासे आशय ऐसे किसी व्यक्ति से है, जो:
1.किसी वस्तु को इस्तेमाल के लिये क्रय करता है जिसके लिये भुगतान किया गया है या वायदा किया गया है या आंशिक भुगतान किया गया है और आंशिक वायदा किया गया है, अथवा आस्थगित भुगतान की किसी अन्य व्यवस्था के अधीन क्रय किया गया है और इसमें ऐसी वस्तुओं का कोई भी उपयोगकर्ता उस व्यक्ति के अलावा जो कि ऐसी वस्तुओं के लिये भुगतान या वायदा करता है अथवा आंशिक भुगतान किया है अथवा आंशिक वायदा किया गया है अथवा आस्थगित भुगतान की किसी अन्य व्यवस्था को अपनाया गया है, जब ऐसा इस्तेमाल उस व्यक्ति की इजाजत से किया जाता है, परंतु इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं होता है जो ऐसी वस्तुओं को पुन: बिक्री के लिये अथवा किसी वाणिज्यिक उद्देश्य के लिये क्रय करता है, अथवा
2.उपयोग के लिये कोई सेवा को हायर या प्राप्त करता है जिसके लिये भुगतान किया गया है या वायदा किया गया है या आंशिक भुगतान किया गया है और आंशिक वायदा किया गया है, अथवा आस्थगित भुगतान की किसी अन्य व्यवस्था के अधीन क्रय किया गया है और इसमें ऐसी सेवाओं का कोई भी उपयोगकर्ता उस व्यक्ति के अलावा जो कि ऐसी सेवाओं के लिये भुगतान या वायदा करता है अथवा आंशिक भुगतान किया है अथवा आंशिक वायदा किया गया है अथवा आस्थगित भुगतान की किसी अन्य व्यवस्था को अपनाया गया है, जब ऐसी सेवाएं उस व्यक्ति की इजाजत से ली जाती हैं. (परंतु इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं होता है जो ऐसी सेवाओं को किसी वाणिज्यिक उद्देश्य के लिये प्राप्त करता है)
उपभोक्ता संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र के दिशानिर्देश (यूएनजीसीपी)
1985 में जारी की गई यूएनजीसीपी को सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच व्यापक विचारविमर्श के बाद दिसंबर 2015 में संशोधित किया गया. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसंबर, 2015 को संशोधित यूएनजीसीपी 2015 को संशोधित किया. भारत ने 2015 में यूएनजीसीपी के संशोधन की प्रक्रिया में सक्रियता के साथ भाग लिया और एक पर्यवेक्षण तंत्र की व्यवस्था के लिये ज़ोर दिया जिसे संशोधित यूएनजीसीपी 2015 के दिशानिर्देश 95 के अधीन अंतर सरकारी विशेष समूह के तौर पर स्थापित किया गया है. सभी सदस्य राष्ट्र इस समूह के वस्तुत: सदस्य हैं. उपभोक्ता संरक्षण कानून और नीति पर अंतर सरकारी विशेषज्ञ समूह का पहला सत्र जेनेवा में 17 और 18 अक्तूबर 2016 को अंकटाड के तत्वावधान में आयोजित किया गया था. 66 देशों और 5 अंतर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरणों के प्रमुखों सहित, इस उच्चस्तरीय चर्चा में उपस्थित हुए. बैठक में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री, भारत सरकार ने कहा कि विशेषज्ञों के अंतर सरकारी समूह से एक ऐसा मंच उपलब्ध हुआ है जिससे परस्पर जुड़ाव और समझ के साथ-साथ उपभोक्ता सुरक्षण में सुधार की उपयुक्त रणनीतियां तैयार करने में सहायता मिली है. दूसरी बैठक जुलाई 2017 में हुई जिसमें विशेष तौर पर सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिये समावेशी उपभोक्ता संरक्षण नीतियों के संबंध में संगत पणधारियों की महत्वपूर्ण भूमिका की पहचान की गई, इसमें कमज़ोर और सुविधाओं से वंचित उपभोक्ताओं की संरक्षा पर विनिर्दिष्ट उपायों के निर्माण और कार्यान्वयन पर ज़ोर दिया गया और यह महसूस किया गया कि सदस्य राष्ट्र विनिर्दिष्ट घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये भिन्न-भिन्न उपाय कर सकती हैं और विकासशील देशों में इस श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिये विशेष तौर पर आगे शोध का सुझाव दे सकती हैं. इसने विश्वव्यापी उपभोक्ताओं के कल्याण में वृद्धि के लिये ई-कामर्स में जोखि़मों की संभावनाओं को सीमित करते हुए इसके विस्तार के महत्व पर ज़ोर दिया गया और ई-कॉमर्स में उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने के लिये एजेंसियों के बीच अनौपचारिक सहयोग सहित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मज़बूत करने तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था में विश्वास का निर्माण करने के उपाय किये जाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया.
एशियाई देशों के बीच परस्पर उत्कृष्ट व्यवहारों के आदान-प्रदान के लिये उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत ने अंकटाड की साझेदारी में 26 और 27 अक्तूबर, 2017 को उपभोक्ता संरक्षण पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया. माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन किया और उल्लेख किया कि ‘‘उपभोक्ता हितों की संरक्षा सरकार की प्राथमिकता है. यह न्यू इंडिया के हमारे संकल्प से भी परिलक्षित होता है. उपभोक्ता संरक्षण से आगे बढ़ते हुए न्यू इंडिया में उत्कृष्ट उपभोक्ता व्यवहारों और उपभोक्ताओं की खुशहाली को शामिल किया जायेगा.’’
आगे की दिशा
भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय उद्योगों के कई प्रकार से विस्तार और बदलते बाज़ार माहौल के बीच भारतीय मानक ब्यूरो बीआईएस अधिनियम, 2016 को लागू किया गया. बीआईएस ने भी उपभोक्ता अनुकूल एप्प केअरका विकास किया है जिसे सूचना प्राप्त करने और आईएसआई चिन्हित उत्पाद/हालमार्क वस्तु के विरूद्ध शिकायत दजऱ् कराने के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है. रियल एस्टेट सेक्टर में उपभोक्ताओं के अधिकारों और हितों की संरक्षा करने और व्यापारिक व्यवहारों और लेनदेनों के बीच समानता और मानकीकरण को बढ़ावा देने के लिये रियल एस्टेट (विनियम एवं विकास) अधिनियम, 2016 पारित किया गया है. इसके अलावा सरकार ने सभी हितधारकों को एकल मंच के अधीन लाने के लिये इन्ग्राम-एकीकृत शिकायत निपटान तंत्र पोर्टल शुरू की है. एक तरफ राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन अपने टोलफ्री नंबर 1800-11-4000 अथवा 14404 के जरिए सलाह और दिशानिर्देशन प्रदान कर रही है और उपभोक्ताओं का सशक्तिकरण कर रही है. उपभोक्ताओं को बार कोड स्कैन करने और उत्पाद के बारे में सभी विवरण प्राप्त करने में सहायता के लिये एक स्मार्ट उपभोक्ता एप्लीकेशन शुरू की गई है. भारत में उभरते डिजिटल बाज़ार और भारत में विभिन्न उपभोक्ता खण्डों के बीच ज्ञान की विषमता को ध्यान में रखते हुए संसद द्वारा शीघ्र ही एक नया उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2016 पारित किये जाने की संभावना है. यह आशा की जाती है कि नये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम से मौजूदा कानून की खामियों दूर हो जायेंगी और यह उपभोक्ता आंदोलन को व्यापक मज़बूती प्रदान करेगा.
(लेखक वाणिज्य विभाग, कमला नेहरू कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. ई-मेल : sheetal_kpr@hotmail.com, व्यक्त विचार निजी हैं)
चित्र: गूगल के सौजन्य से