नौकरी फोकस


Volume-40, 30 December-5 January, 2017

 
सब्जी विज्ञान में रोज़गार

डॉ. बीना सिंह और कृष्णपाल सिंह

ओलेरीकल्चर यानी शाक-सब्जी की खेती, बागवानी की वह शाखा है जिसका संबंध शाक-सब्जियां उगाने और उनके विपणन से है. भारत शाक-सब्जियों से संबंधित उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी है और तकनीकी विशेषज्ञता तथा प्रबंधन सेवाओं के विस्तार से इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति भी कर रहा है. सब्जियां उगाना आज रोज़गार का अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय विकल्प बन गया है. खाद्य पदार्थों की बढ़ती हुई मांग का मतलब है किसानों में बेहतर जागरूकता तथा विज्ञान और प्रबंधन के माध्यम से सब्जियों का अधिक कारगर एवं कुशल उत्पादन. हालांकि भारत बागवानी की फसलों के प्रमुख उत्पादक के रूप में उभर कर सामने आया है और भारतीय अर्थव्यवस्था में बागवानी का हिस्सा बढ़ रहा है, लेकिन इस क्षेत्र की क्षमताओं का फायदा उठाने की पर्याप्त गुंजाइश है. 2016-17 में देश का बागवानी उत्पादन 28.7 करोड़ टन के आस-पास रहने का अनुमान है जोकि 2015-16 के उत्पादन से मामूली अधिक है. देश में बागवानी क्षेत्र के कुल उत्पादन का 90 प्रतिशत हिस्सा सब्जियों और फलों का है. इस समय भारत दुनिया में सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और कई बागनी फसलों के उत्पादन में अग्रणी है. इस तरह की फसलों में आम, केला, पपीता, काजू, सुपारी, आलू और भिंडी शामिल हैं. भारत में बागवानी वाली फसलों का परिदृश्य बड़ा उत्साहजनक होता जा रहा है. देश में तरह-तरह की जलवायु होने से ऐसी फसलों, खास तौर पर सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने और इनकी खेती के क्षेत्र में बढ़ोतरी की अच्छी संभावना है.   
1980 के दशक के मध्य में भारत ने बागवानी क्षेत्र में विविधता लाने का आह्वाहन करते हुए इस क्षेत्र में निवेश पर ध्यान केन्द्रित किया. इस समय बागवानी ने उत्पादकता में वृद्धि करने और रोज़गार के अवसर बढ़ाकर और निर्यात में वृद्धि करके किसानों और बागवानों की आमदनी बढ़ाने में अपनी विश्वसनीयता कायम कर ली है. इससे बागवानी ग्रामीण क्षेत्रों में मुनाफेवाले कारोबार के रूप में उभर कर सामने आया है. कृषि के क्षेत्र में बागवानी का हिस्सा 30 प्रतिशत से अधिक हो गया है. कृषि और इससे संबंधित गतिविधियों के अंतर्गत नौवीं योजना में बागवानी उत्पादन का योजना-खर्च 3.9 प्रतिशत था जो बारहवीं योजना में 4.6 प्रतिशत हो गया है. पिछले कुछ वर्षों में भारत में बागवानी क्षेत्र के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई है. सब्जियों की खेती का क्षेत्र बढऩे से इनका उत्पादन भी बढ़ा है. पिछले एक दशक में बागवानी के अंतर्गत क्षेत्र में हर साल 2.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई जबकि वार्षिक उत्पादन 7 प्रतिशत बढ़ा है. 2001-02 में बागवानी क्षेत्र का कुल उत्पादन 14.58 करोड़ टन रहा था जबकि खाद्यान्न का उत्पादन 21.28 करोड़ टन रहा था. 2015-16 में कुल बागवानी उत्पादन 28.35 करोड़ टन और खाद्यान्न उत्पादन 25.70 करोड़ टन के स्तर पर पहुंच चुका था.     
 देश में सब्जियों के उत्पादन की व्यापक संभावनाओं और इसमें सहायक कई घटकों की वजह से कामकाजी क्षमता से बड़ी चुनौती उत्पन्न करती है. फिलहाल औसत भारतीय की खुराक संतुलित नहीं है और इसमें ज्यादातर अनाज ही शामिल रहते हैं. आम तौर पर सब्जी की फसलों की पैदावार के मुकाबले 5 से 10 गुना ज्यादा है. हम लोग रोजाना औसतन 375 ग्राम अनाज और सिर्फ 30 ग्राम सब्जियां खाते हैं जबकि यह मात्रा 328 ग्राम अनाज और 316 ग्राम सब्जी होनी चाहिए. आहार विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार में रोजाना 200 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां और 150 ग्राम कंद मूल वाली सब्जियां होना जरूरी है. इसलिए आहार में सुधार के लिए फसलों का उत्पादन बढ़ाना भी जरूरी है. इस समय हमारे देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी करीब 32 करोड़ एकड़ जमीन पर खेतीबाड़ी का काम करती है. खेती वाले कुछ क्षेत्र में से केवल 1-2 प्रतिशत में ही सब्जियों की खेती होती है. जाहिर है कि देश में और अधिक इलाके में सब्जियों की खेती होनी चाहिए ताकि संतुलित आहार की आवश्यकता पूरी की जा सके. सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने से जहां लोगों के आहार की गुणवत्ता में सुधार होगा और स्वास्थ्य का स्तर ऊंचा होगा वहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था भी सुधरेगी क्योंकि सब्जियों की खेती रोजगार और आमदनी बढ़ाने का बड़ा अच्छा जरिया है. पिछले पांच वर्षों में बागानी फसलों के कुल उत्पादन में सब्जियों का हिस्सा सबसे अधिक (59-61 प्रतिशत) है. सब्जियों की फसलें तेजी से बढ़ती हैं और कम समय में तैयार हो जाती हैं. इसलिए अब समय आ गया है जब भारत को सब्जियों की सघन खेती करनी चाहिए और साल में इसकी एक से ज्यादा फसलें उगानी चाहिए.         
व्यवसाय के रूप में कृषि/बागवानी
कृषि/बागवानी के तौर-तरीकों की जानकारी इन विषयों को स्नातक स्तर पर अध्ययन के विषय के रूप में चुनकर और पढ़ाई करके हासिल की जा सकती है. इसके लिए जरूरी है कि आवेदक ने 10+2 (सीनियर सेकेंडरी परीक्षा) भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान के साथ या तो कृषि या फिर जीव विज्ञान की पढ़ाई की हो. राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर के कृषि पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए अखिल भारतीय प्री एग्रिकल्चर टेस्ट नाम की परीक्षा आयोजित की जाती है. स्नातक स्तर के कृषि पाठ्यक्रम आम तौर पर चार साल के होते हैं जबकि स्नातकोत्तर यानी मास्टर डिग्री पाठ्यक्रम डिग्री के बाद दो साल के होते हैं. कृषि और बागवानी में पीएच.डी. पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए मास्टर की डिग्री होना तो जरूरी है ही, कुछ विश्वविद्यालय साथ में कुछ अन्य योग्यताएं भी मांगते हैं. मास्टर और पी-एच.डी. पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा पास करनी पड़ती है जिसका आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् या राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा किया जाता है. कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में अंक प्रतिशत के आधार पर भी दाखिला दिया जाता है.
ओलेरीकल्चर:
अधिकांश कालेजों में बागवानी या ओलेरीकल्चर के लिए स्नातक स्तर पर विश्वविद्यालयों में अलग से पाठ्यक्रम नहीं हैं और इस विषय को कृषि विज्ञान का ही हिस्सा समझा जाता है. कृषि या बागवानी में स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने वाले छात्रों के पास कई विकल्प होते हैं. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाने के इच्छुक छात्रों के सामने हाल में स्नातक स्तर पर ओलेरीकल्चर यानी शाक-सब्जी विज्ञान का क्षेत्र भी खुल गया है. इसके अलावा पुष्प विज्ञान और लैंडस्केपिंग (फूलों, सजावटी पेड़-पौधों और बागवानी), औषधीय व सुगंधित पदार्थों की फसलों, मसाले और बागानी फसलों, फल विज्ञान तथा फसल कटाई के बाद की टेक्नोलॉजी जैसे विकल्प भी खुले हुए हैं. सब्जियों की खेती के विज्ञान को चुनने वाले विद्यार्थियों को शांत, तर्कशील और प्रेक्षण क्षमता से युक्त होना चाहिए. उसमें अपने विशिष्ट क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता होनी चाहिए.     
उन्हें अपने कार्यक्षेत्र के उस पहलू से पूरी तरह परिचित होना चाहिए जिसमें वह कार्य कर रहे हैं. बागवानी से संबंधित किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए प्रकृति के प्रति प्रेम होना भी जरूरी है. लेकिन इसके साथ-साथ सृजनशीलता और परिकल्पना क्षमता होना भी आवश्यकता है. अगर निजी क्षेत्र में काम करना है तो सप्लायरों और ग्राहकों के साथ बातचीत के लिए सम्प्रेषण कौशल होना भी जरूरी है. सप्लाई आर्डर देने, इनवेंटरी का रिकार्ड रखने तथा उद्यमी बनकर अपने कारोबार का हिसाब-किताब रखने के लिए कम्प्यूटर कौशल भी होना चाहिए.
रोजग़ार की संभावनाएं
विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर चुके उम्मीदवारों के लिए रोजग़ार की कोई कमी नहीं है. स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद विद्यार्थी बैंकों, वित्तीय क्षेत्र, बीज कंपनियों, कीटनाशक कंपनियों, सेल्स और मार्केटिंग आदि के लिए पात्र हो जाते हैं. राष्ट्रीयकृत बैंक, रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, नाबार्ड आदि कृषि और बागवानी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त कर चुके विद्यार्थियों के लिए कृषि अधिकारी, परिवीक्षाधीन अधिकारी, फील्ड ऑफिसर और ग्रामीण विकास अधिकारी के रूप में रोजग़ार के अवसर उपलब्ध कराते हैं. विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय बागवानी के अंतर्गत विशिष्ट क्षेत्रों में स्नातकोत्तर डिग्री वालों को सीनियर रिसर्च फैलो (एसआरएफ), रिसर्च एसोसिएट (आरए), टेक्निकल असिस्टेंट (टीए) आदि के रूप में रोजग़ार देते हैं. लेकिन सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक और अन्य अनुसंधान तथा विकास संबंधी पदों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग/ वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद/ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा संचालित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास करने के साथ ही संबंधित क्षेत्र में काम करने का अनुभव और डाक्टरेट की डिग्री भी मांगा जाता है.    
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी विभाग बागवानी स्नातकों को काम पर रखते रहते हैं. जिन विद्यार्थियों को सब्जी विज्ञान के साथ-साथ उद्यमिता की भी जानकारी है, वे सब्जियों का विपणन करने वाले संगठनों में प्रशासनिक और विपणन संबंधी नौकरियां हासिल कर सकते हैं. उन्हें उद्यान विशेषज्ञ, उद्यान वैज्ञानिक, पर्यवेक्षक, फार्म या एस्टेट मैनेजर के रूप में रोजग़ार मिल सकता है और वे सब्जियों के बीजों का बड़े पैमाने पर कारोबार करने वाली विभिन्न निजी बीज कंपनियों में काम पा सकते हैं. कई उर्वरक और कीटनाशक कंपनियां भी कृषि/बागवानी की शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को अपने यहां जगह देते हैं. इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और कुछ अन्य एजेंसियों में भी बागवानी के विशेषज्ञों की आवश्यकता रहती है. उपर्युक्त के अलावा बायोटेक्नोलॉजी विभाग, भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए), भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो), डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ), राष्ट्रीय बीज निगम, कृषि और सहकारिता मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (दोनों भारत सरकार के) जैसे संगठन भी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विद्यार्थियों को काम पर रखते हैं. सब्जी उद्योग ने कई नये सहायक उद्योगों को भी जन्म दिया है:
अनुसंधान: कई वैज्ञानिक सब्जियों की नयी और सुधरी किस्में तैयार करने में लगे हैं. सब्जी के पौधों की पौष्टिकता और उत्पादन में सुधार करने के साथ-साथ उद्यान विज्ञान के कार्य करने वाले वैज्ञानिक उनकी गुणवत्ता सुधारने और उनके रूप, रंग व आकार को आकर्षक बनाने का काम भी काफी मेहनत से कर रहे हैं.
द्यरसायन उद्योग: बागवानी उद्योग कई तरह के रसायनों पर निर्भर है जिनमें उर्वरक, कीटनाशक और ग्रोथ हारमोन शामिल हैं. कई कंपनियां ऐसे रसायनों के उत्पादन में लगी हैं जो बागवानी के पौधों के उत्पादन और गुणवत्ता में वृद्धि करते हैं.
द्यमशीनरी: बागवानी के पौधे तैयार करने में काम आने वाली मशीनरी व उपकरणों का डिजाइन तैयार करने व उनके उत्पादन का काम इंजीनियर करते हैं. इन उपकरणों से बागवानी में काम आने वाले पौधों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है.  
द्यवितरण: बागवानी उत्पादों को उत्पादन स्थल से विपणन केन्द्रों तक बिक्री के लिए ले जाया जाता है. सब्जियों के जल्द सड़ कर नष्ट हो जाने के कारण इस तरह के उत्पादों के परिवहन और लादने व उतारने में उनका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता पड़ती है ताकि उनकी गुणवत्ता पर लंबे समय तक बुरा असर न पड़े.
द्यबागवानी के कम्प्यूटरों का उपयोग: आज उद्यान विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटरों का व्यापक इस्तेमाल होने लगा है. उद्यान विज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटरों के इस्तेमाल के विशेष क्षेत्रों में ये क्षेत्र शामिल हैं: सब्जियों के पौधों का अभिकल्पन, फसल व मृदा के मॉडल तैयार करना, उपकरणों का स्वचालन, सार्वजनिक सूचना, रिकार्ड कीपिंग और डेटाबेस, ग्रीनहाउस का ऑटोमेशन, उपकरणों के चिन्हांकन से रसायनों के उपयोग का ऑटोमेशन.    
इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान और राज्य कृषि विश्वविद्यालय भी उद्यानविज्ञान/ ओलेरीकल्चर में स्नातक, स्नातकोत्तर और डॉक्टर की डिग्री स्तर के पाठ्यक्रम संचालित करते हैं. इनके नामों का संकेतिक सूची नीचे दी गयी है:
1. आचार्य एन.जी.रंगा कृषि विश्वविद्यालय, प्रशासनिक कार्यालय, राजेन्द्र नगर, हैदराबाद-500030 (आंध्र प्रदेश).
2. कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर, मंदौर, जोधपुर-342304 (राजस्थान).
3. कृषि विश्वविद्यालय, कोटा बोरखेड़ा, कोटा-324001(राजस्थान).
4. आणंद कृषि विश्वविद्यालय, आणंद-388100 (गुजरात).
5. असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहाट-785013 (असम).
6. बिधानचंद्र कृषि विश्वविद्यालय, मोहरपुर, नाडिया-741252 (पश्चिम बंगाल).
7. बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210 (बिहार).
8. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके, रांची-834006 (झारखंड).
9. केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पी.ओ. बॉक्स 23, इम्फाल-795004 (मणिपुर).
10. चंद्रशेखर आजाद कृषि और प्रौद्यिोगकी विश्वविद्यालय, कानपुर-208002 (उत्तर प्रदेश).
11. चौधरी चरण सिंह, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार-125004 (हरियाणा).
12. सीएसके हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर-176062 (हिमाचल प्रदेश).
13. डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विश्वविद्यापीठ, दपोली, जिला रत्नागिरि-415712 (महाराष्ट्र).
14. डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, कृषिनगर, अकोला-444104 (महाराष्ट्र).
15. डॉ. यशवंत सिंह परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय, सोलन, नौनी-173230 (हिमाचल प्रदेश).
16.डॉ. वाईएसआर बागवानी विश्वविद्यालय, वेंकटरामन्नागुडम, पीबी नं. 7, पश्चिम गोदावरी जिला, टेडेपाल्लिगुडम-534101 (आंध्र प्रदेश).
17. गोविन्द बल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर-263145 (उत्तराखंड).
18. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषक नगर, रायपुर-492006 (छत्तीसगढ़).
19. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर-482004 (मध्य प्रदेश).
20. जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, जूनागढ़-362001 (गुजरात).
21. केरल कृषि विश्वविद्यालय, वेल्लानिकारा, त्रिश्शूर-680656 (केरल).
22. महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर-313001 (राजस्थान).
23. महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी-413722 (महाराष्ट्र).
24. मान्यवर श्री कांशीरामजी कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बांदा-210001 (उत्तर प्रदेश).
25. आचार्य नरेन्द्र देव कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद-224229 (उत्तर प्रदेश).
26. नवसारी कृषि विश्वविद्यालय, नवसारी-396450 (गुजरात).
27. ओडिशा कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर-751003 (ओडिशा).
28. प्रो. जयशंकर तेलंगाना राज्य कृषि विश्वविद्यालय, राजेन्द्र नगर, हैदराबाद-500030 (आंध्र प्रदेश).
29. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना-141004. (पंजाब).
30. राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर-848125 (बिहार).
31. राजमाता विजयराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर-474002 (मध्य प्रदेश).
32. रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी-(उत्तर प्रदेश).
33. सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश).
34. सरदार कृषिनगर-दंतिवाडा कृषि विश्वविद्यालय, सरदार कृषिनगर, जिला बनासकांठा-385506 (गुजरात).
35. शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्यागिकी विश्वविद्यालय, रेलवे रोड, जम्मू-180009 (जम्मू-कश्मीर).
36. शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्यागिकी विश्वविद्यालय, शालीमार कैंपस, श्रीनगर-181121 (जम्मू-कश्मीर).
37. श्री करण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर-303329 (राजस्थान).
38. सवाई केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर-334006 (राजस्थान).
39. तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर-641003 (केरल).
40. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु, जीकेवीके, बेंगलुरु-560065 (कर्नाटक).
41. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़-580005 (कर्नाटक).
42. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, शिमोगा-(कर्नाटक).
43. उद्यानविज्ञान विश्वविद्यालय, नवनगर, बागलकोट-587102 (कर्नाटक).
44. कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, पीबी 329, रायचूर-584101 (कर्नाटक).
45. उत्तराखंड उद्यानविज्ञान और वानिकी विश्वविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड).
46. उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय, कूच बिहार-736165 (पश्चिम बंगाल).
47. वसंतराव नाइक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, परभनी-431402 (महाराष्ट्र).
48. श्री कोंडा लक्ष्मण राज्य उद्यान विज्ञान विश्वविद्यालय, राजेन्द्र नगर कैंपस, हैदराबाद (आंध्र प्रदेश).
डॉ. बीना सिंह, सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक, ई-मेल: beena.nair1985 @gmail.com
डॉ. कृष्णपाल सिंह , सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, जगदलपुर, बस्तर (छत्तीसगढ़), ई-मेल:
drkpsingh2010 @gmail.com


             चित्र सौजन्य: गूगल.