नौकरी फोकस


Volume-43, 20-26 January, 2017

 
ग्रामीण पर्यटन में रोज़गार की संभावनाएं

जी. आंजनेय स्वामी

हाल के वर्षों में मौजूदा पर्यटन उत्पादों के इर्द-गिर्द ध्यान केंद्रित रहा है, चाहे वे तीर्थयात्रा केंद्र हों, स्मारक हों या फिर समुद्र तट और अन्य धरोहर स्थल हों. इन परंपरागत स्थलों पर अधिक दबाव को देखते हुए पर्यटन के स्थायित्व के मुद्दे उजागर हुए हैं. अत: यह उपयुक्त समय है कि ऐसे संसाधनों की पड़ताल की जाए और उन्हें भारत के पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए, जो अभी तक प्रच्छन्न और  अदोहित रहे हैं. यह एक सामाजिक दायित्व भी है कि पर्यटन को राष्ट्र के समग्र विकास का समावेशी मंच बनाया जाए. अत: आवश्यकता इस बात की है कि पर्यटन का आधार व्यापक बनाया जाए, ताकि वह विशुद्ध रूप से शहरी आभिजात्य वर्ग का, आभिजात्य वर्ग के लिए और आभिजात्य वर्ग द्वारा, की धारणा तक सीमित न रहे.
इस तथ्य पर जोर देने की आवश्यकता है कि पर्यटन उद्योग एक बड़े क्षेत्र के रूप में उभरा है, जो किसी भी प्रदेश/राष्ट्र के तीव्र विकास में योगदान करता है. पर्यटन उद्योग में यह क्षमता है कि वह प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के जरिए न्यूनतम पूंजी परिव्यय के साथ रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है. अत: इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि नीति निर्माताओं ने सभी प्रकार के पर्यटन को प्रोत्साहित करने की तरफ ध्यान दिया है. परंतु दुर्भाग्य से गत वर्षों में मौजूदा पर्यटन उत्पादों के इर्द-गिर्द ध्यान केंद्रित रहा है, चाहे वे तीर्थयात्रा केंद्र हों, स्मारक हों या फिर समुद्र तट और अन्य धरोहर स्थल हों. इन परंपरागत स्थलों पर अधिक दबाव को देखते हुए पर्यटन के स्थायित्व के मुद्दे उजागर हुए हैं. अत: यह उपयुक्त समय है कि ऐसे संसाधनों की पड़ताल की जाए और उन्हें भारत के पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए, जो अभी तक प्रच्छन्न और  अदोहित रहे हैं. यह एक सामाजिक दायित्व भी है कि पर्यटन को राष्ट्र के समग्र विकास का समावेशी मंच बनाया जाए. इसे ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत आलेख में मानव संसाधन विकास के प्रति उद्यमशील दृष्टिकोण अपनाने के जरिए पर्यटन को समावेशी धारणा बनाने से संबंधित कुछ मुद्दों का समाधान करने का प्रयास किया गया है. इसमें पर्यटन उद्योग की संभावनाओं के बारे में ग्रामीण समुदाय में सही जागरूकता पैदा करते हुए ग्रामीण भारत के असंख्य प्राकृतिक संसाधनों को उजागर करने पर विशेष बल दिया गया है, ताकि उन्हें यह समझाया जा सके कि पर्यटन ग्रामीण भारत के उत्थान में किस तरह योगदान कर सकता है. यह ऐसा मुद्दा है, जिसके लिए बहुसूत्री दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जैसे ग्रामीण भारत के क्षेत्र विषयक प्राकृतिक संसाधनों की पहचान, जागरूकता पैदा करना और ग्रामीण युवाओं को पर्यटन संबंधी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार करना.
उद्यमशील दृष्टिकोण की आवश्यकता:
उद्यमशीलता एक धारणा और पद्धति के रूप में सभी मानव प्रयासों को अपने में समेटती है. यह प्रदेश, क्षेत्र और लिंग निर्पेक्ष है. फिर भी, यह गलत धारणा है कि उद्यमशीलता को अधिकतर विनिर्माण क्षेत्र से सम्बद्ध गतिविधि समझा जाता है. इससे मानव प्रयासों के कई क्षेत्र बाहर रह जाते हैं, जिनमें उद्यमशीलता की भावना प्रमुख रूप से विद्यमान होती है. मानवीय जिज्ञासा, कल्पना, उद्यमिता की भावना, उत्कृष्ट करने की ललक और हासिल करने की इच्छा - इन सभी प्रवृत्तियों ने मानव मात्र को घुमंतु अवस्था से वर्तमान स्थिति में ला खड़ा करने में मदद की है, जहां मानव जाति अन्य ग्रहों पर भी विजय प्राप्त करने की तैयारी में है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उद्यमिता ही लोगों को समग्र विकास के लिए कार्य करने हेतु प्रेरित करती है.
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि उद्यमिता किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास की कुंजी है. पर्यटन क्षेत्र भी इस बात का अपवाद नहीं है. आर्थिक प्रणाली में जब तक कोई पहल नहीं करता है और संसाधनों  का युक्तिसंगत उपयोग नहीं करता है, तब तक कुछ  भी घटित नहीं हो सकता. पीटर ड्रकर के शब्दों में ‘‘उपयोग की जानकारी न होने की स्थिति में प्रत्येक खनिज एक अन्य चट्टान और प्रत्येक पौधा एक  अन्य खरपतवार समझा जाता है.’’ साधारण शब्दों  में कहें तो उद्यमशीलता का अर्थ है कम उत्पादकताक्षेत्रों से उच्च उत्पादकताक्षेत्रों की तरफ संसाधनों का स्थानांतरण.
वास्तव में यह उचित होगा कि अभी तक दोहित न किए जा सके प्राकृतिक संसाधनों का पता लगाया जाए और उन्हें नए पर्यटन उत्पादों के रूप में विकसित किया जाए.
ग्रामीण भारत के प्राकृतिक संसाधन:
यह कहावत प्रचलित है कि भारत गांवों में बसता है. दर्शनीय सुंदरता, प्रदूषण मुक्त मौसम, प्रकृति के करीब रहने वाले भोले भाले लोग, देसी ज्ञान और पद्धतियां, शिल्प-कृतियां और जीवन शैलियां, ये सब मिल कर एक विशाल खजाने का रूप हैं, जो कंकरीट के जंगल में रहने वाले शहरी अभिजात्य वर्ग द्वारा खोज किए जाने का इंतजार कर रहे हैं. पिछले कुछ दशकों में शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण आबादी के भारी पलायन के बावजूद ग्रामीण भारत का अपना ही आनंद बना हुआ है. गांवों की तरफ जाना और वहां पर्यटन की संभावनाएं खोजना, विशेष रूप से इस बात को देखते हुए महत्वपूर्ण हो जाता है कि अनेक शहरी बच्चे यह समझते हैं कि चावल, सब्जियां आदि उत्पाद भी सॉफ्ट ड्रिंक्स, आइसक्रीम आदि और अन्य व्यक्तिगत इस्तेमाल की चीजों की तरह फैक्ट्रियों में बनते हैं.
बुआई के मौसम से लेकर फसल कटाई तक मौसमवार विभिन्न खेती पद्धतियां, पशुपालन, दूध दोहना, अनाज भंडारण, कृषि उपकरण, प्राकृतिक जीव जंतुओं और वनस्पति सहित हरे-भरे खेत, जल धाराएं और नदियां, गांवों के तालाब और झीलें, भू-परिदृश्य, समृद्ध  लोकगीत, सामाजिक बंधन और संबंध, सामुदायिक रूप से त्योहार मनाना और गांव के सामाजिक/धार्मिक कार्यक्रम - ये सब मिल कर अनेक पर्यटकों को रोमांचक अनुभव प्रदान करते हैं. दिलचस्प बात है कि हाल ही में अनेक परंपरागत पर्यटकों की अभिरुचि में परिवर्तन दिखाई देने लगा है और वे शहरी नीरसता, थकान, व्यावसायिक दबाव, प्रदूषण, वाहनों की भीड़ से ऊब कर ग्रामीण भारत के सौंदर्य को निहारना चाहते हैं. संयोग से ग्रामीण पर्यटन एक उत्कृष्ट विकल्प प्रदान करता है और पर्यटकों तथा सेवा प्रदाताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक लाभ प्रदान करता है.
कार्य संभावनाओं वाले क्षेत्र:
ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए, निम्नांकित मुद्दों का सुनियोजित ढंग से समाधान करने की आवश्यकता है, अन्यथा ग्रामीण पर्यटन के महत्व और उसके विकास की आवश्यकता के बावजूद यह विषय एक और सनक तथा शब्दाडम्बर सिद्ध होगा. उद्यमशील दृष्टिकोण अपनाना आज समय की मांग है. पर्यटन व्यवसायियों, तालुक/जिला स्तरीय सरकारी विस्तार अधिकारियों, गांवों में जनमत तैयार करने वाले लोगों और ग्रामीण युवाओं को भागीदार बनाना आवश्यक है, ताकि ग्रामीण पर्यटन की दिशा में एक ठोस पहल की जा सके. निम्नांकित पहलुओं का समाधान वरीयता के आधार पर किया जाना चाहिए:
ग्रामीण पर्यटन संसाधन मानचित्रण: जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे संसाधनों की कमी नहीं है, जो पर्यटन उत्पादों को प्रेरित करते हैं. लोकगीत, नृत्य और नाटक, शिल्पकारी वस्तुएं, हस्तशिल्प उत्पाद और विभिन्न प्रकार के व्यवसाय जैसे कुंभकारी, हथकरघा, ईंट बनाना, मुर्गीपालन और मवेशी पालन, कृषि प्रबंधन पद्धतियां आदि ऐसी बातें हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित कर सकती हैं. इनके अलावा गांवों का प्रदूषण मुक्त भू-परिदृश्य ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा और अन्वेषण के लिए विशेष रूप से आकर्षित करता है. क्षेत्र विशेष से संबंधित सामाजिक रीति रिवाज, उत्सव और विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन में सामुदायिक भागीदारी ऐसे आकर्षण हैं, जो किसी ग्रामीण क्षेत्र की यात्रा को अविस्मरणीय अनुभव बनाने के लिए पर्याप्त हैं. प्रत्येक स्थान की अपनी विशिष्टता/बेजोड़ स्वरूप होता है. ऐसे विशिष्ट उत्पादों/पद्धतियों/प्रक्रियाओं की पहचान करने के लिए एक व्यवस्थित सर्वेक्षण शुरू किया जा सकता है, ताकि आकर्षक स्थलों का पता लगाया जा सके. संसाधनों के मानचित्रण से यह पता लगाया जा सकता है कि ग्रामीण भारत में पर्यटकों को क्या मिल सकता है. कुछ गांव अपने समृद्ध लोकगीतों के लिए जाने जाते हैं, तो कुछ अन्य गांव बेहतर खेती पद्धतियों के लिए और कुछ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाने जाते हैं. कुछ गांव ऐसे भी हैं जो परंपरागत युद्ध कलाओं के लिए और कुछ अन्य फूलों की खेती तथा मछली के तालाबों और झींगापालन के लिए मशहूर हैं. इस तरह ग्रामीण भारत दिलो-दिमाग को छू जाने वाली विविधताओं से युक्त है. आवश्यकता इस बात की है कि कारगर ढंग से उत्पाद डिजाइन किए जाएं और उन्हें प्रचारित किया जाए. व्यवस्थित संसाधन मानचित्रण के अभाव में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने का कोई भी प्रयास अंधेरे में तीर चलाने जैसा समझा जाएगा. अनेक विशिष्ट ग्रामीण संसाधन अत्यंत सादगीपूर्ण और नीरस दिखाई दे सकते हैं, परंतु उनसे जो अनुभव और नवीनता मिलती है, वह खास तरह के पर्यटकों के लिए बहुमूल्य है.
जागरूकता पैदा करना:
प्रकृति की अनेक पद्धतियां, रीति रिवाज और प्राकृतिक तत्व गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग हो सकते हैं. वे देखने में सामान्य लग सकते हैं. यह भी संभव है कि उन्हें इन सब संसाधनों के मूल्य की जानकारी न हो, फिर भी वे आर्थिक लाभ के लिए उनका दोहन कर सकते हैं. इसलिए विकास से जुड़ी एजेंसियों को चाहिए कि वे ग्रामीण समुदायों को उन चीजों के महत्व और उपयोगिता के बारे में शिक्षित बनाएं, जो उनके पास हैं. ग्रामीण पर्यटन के लाभ और संभावनाओं को उजागर करने में वीडियो क्लिपों, वृत्त चित्रों, लघु फिल्मों और प्रदर्शनियों आदि की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. इस बारे में ग्रामीण पर्यटन को प्रचारित करने के लिए महाराष्ट्र, केरल और मेघालय के ग्रामीण पर्यटन उत्पादों की लघु फिल्में दिखाई जा सकती है, जहां ग्रामीण पर्यटन लाभकारी सिद्ध हुआ है. इस तरह के प्रयासों से ग्रामीणों को जागरूक और सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे वे अपने को पर्यटन के साथ कारगर ढंग से जोड़ सकते हैं. ग्रामीण पर्यटन में संलग्न सफल ग्रामीण उद्यमियों को आमंत्रित किया जा सकता है, जो गांवों पर पर्यटन के सकारात्मक आर्थिक प्रभावों के बारे में ग्रामवासियों को शिक्षित कर सकते हैं.
ग्राम स्तर पर सेवा प्रदाताओं की पहचान:
गांवों की यात्रा करने वाले पर्यटकों के लिए अपेक्षित सेवाएं विविध प्रकार की हैं, जिनमें आवास, भोजन प्रदान करने व दर्शनीय स्थानों की यात्रा कराने से लेकर मेहमानों के मनोरंजन और उनकी सहायता करने जैसी सेवाएं शामिल हैं. ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं को अनुभव कराने में रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं. कुछ उद्यमी पर्यटक विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने को वरीयता दे सकते हैं, दूसरे शब्दों में पर्यटकों को एक ही स्थान पर सभी सुविधाएं प्रदान करने की आवश्यकता है. इसके लिए यह स्वाभाविक है कि स्थानीय समुदाय के चुस्त व्यक्ति/स्वयंसेवी इस काम में अपना हाथ बंटाएं. गांव के स्तर पर हालांकि सभी लोग अनेक वस्तुओं में समान रूप से भागीदारी करते हैं, फिर भी ज्ञान के स्तर, पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक सम्बद्धता, धार्मिक मान्यता, बौद्ध, समझ, अंतर-वैयक्तिक कौशल की दृष्टि से उनमें काफी अंतर होता है. अत: सही मानसिकता के लोगों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है. आज यह देखा जा रहा है कि सरकार के अनेक कार्यक्रम विभिन्न ग्राम स्तरीय निकायों के माध्यम से निष्पादित/संवितरित किए जा रहे हैं. इन्हीं चैनलों/निकायों को पर्यटन के काम में भी लगाया जा सकता है. भारतीय राज्यों में विभिन्न नामों से पुकारे जाने वाले स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, ग्रामीण युवाओं के स्वयंसेवी संगठनों, परोपकारी संस्थाओं, जनमत तैयार करने वाले नेताओं, तालुक स्तरीय विस्तार अधिकारियों आदि पर पर्यटन में योगदान करने का दायित्व डाला जा सकता है. ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहित करने और उसका विकास करने का जिम्मा शुरू में इन स्थानीय समूहों को सौंपा जा सकता है. लेकिन, बाद में इसके लिए स्वयं के साधन तलाश करना अनिवार्य होगा. इन निकायों में सक्रिय कार्मिकों की पहचान की जा सकती है और उन्हें ग्राम स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने के संदर्भ में बुनियादी कौशल प्रशिक्षण दिया जा सकता है, ताकि वे पर्यटकों के साथ ठीक से बर्ताव कर सकें.
अकुशल को प्रशिक्षित करना:
प्रौद्योगिकी, दूरसंचार और परिवहन सुविधाओं के प्रसार के बावजूद आज भी ग्रामीण भारत का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण परिवेश, उल्लास और गौरव बनाए हुए है. कुल मिला कर वे स्वभाविक रूप से जमीन से जुड़े हुए हैं और आडम्बर से दूर हैं. उनमें से ज्यादातर परंपरागत व्यवसायों में पारंगत हैं. यदि उन्हें सामाजिक शिष्टाचार, विनम्रता, अंतर-वैयक्तिक संबंधों, पर्यटकों को आकर्षित करने की तकनीकों की बारीकियों का मामूली प्रशिक्षण दे दिया जाए तो निस्संदेह उन्हें पर्यटकों से व्यवहार करने के लिए तैयार किया जा सकता है.
इस संदर्भ में यह ध्यान देने की बात है कि भारतीय समाज परंपरागत रूप में आतिथ्य सत्कार के लिए जाना जाता है. भारतीय संदर्भ में अतिथि देवो भव:की कहावत सही चरितार्थ होती है. सांस्कृतिक और भाषायी बाधाओं से परे ग्रामीण भारत के प्रत्येक पहलू में यही दर्शन व्यक्त होता है. इस दृष्टि से ग्रामीण जीवन सबके लिए एक और एक के लिए सभीके सिद्धांत पर आधारित है. यह भावना भारत के समूचे ग्रामीण परिदृश्य में व्याप्त है.
इस बात को देखते हुए कि आवभगत और अतिथि सत्कार की भावना ग्रामीण भारत के बुनियादी मूल्यों में निहित रही है, पर्यटन के प्रचालनगत पहलुओं के संदर्भ में मामूली शिक्षण/प्रशिक्षण पर्याप्त होगा, जिससे ग्रामीणों को पर्यटन/पर्यटकों को अपनाने के लिए तैयार किया जा सकेगा. गांवों में शिक्षित युवाओं को कम्प्यूटर कौशल की बुनियादी जानकारी दी जा सकती है, जिससे वे यात्रा प्रारंभ होने से पहले और बाद में पर्यटकों के साथ तथा आपूर्ति शृंखला में विभिन्न सेवा प्रदाताओं के साथ जुड़ सकें. स्मार्ट फोन और इंटरनेट एक्सेस के वर्तमान प्रसार को देखते हुए प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में बुनियादी कौशल प्रशिक्षण अद्भुत परिणाम सामने ला सकता है. आज अनेक इस्तेमालकर्ता अनुकूल ऐप्स प्रचलित हैं, जिनकी जानकारी गांवों में लक्षित समूहों तक पहुंचाई जा सकती है ताकि वे उनका इस्तेमाल करके बिचौलियों पर निर्भर न रहें. ग्राम स्तर पर विभिन्न पर्यटन कार्यों मे भागीदार पर्यटकों की वरीयताओं का पता लगा सकते हैं. वे यह जान सकते हैं कि पर्यटक गांवों में कैसे समय व्यतीत करना चाहेंगे, क्या देखना और अनुभव करना चाहेंगे, कैसा भोजन पसंद करेंगे और किस तरह की स्मरणीय वस्तुएं अपने साथ ले जाना पसंद करेंगे.
मानव संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग
अधिकतर कृषि कार्य मौसमी होते हैं, वास्तव में ग्रामीणों के पास खाली समय का लंबा अंतराल होता है, जिसका वे अपनी तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं. कुछ ग्रामीण युवा अपने को पर्यटन और अनुषंगी गतिविधियों में संलग्न करके आय के वैकल्पिक स्रोत तलाश कर सकते हैं. एक बार लोगों को यह पता चलने के बाद कि पर्यटन कैसे उनके जीवन में बदलाव ला सकता है और आय के अतिरिक्त अवसर पैदा कर सकता है, ग्रामवासियों के दृष्टिकोण में बदलाव लाया जा सकता है और इस प्रक्रिया में उन्हें पर्यटकों का स्वागत करने के लिए अधिक अनुकूल बनाया जा सकता है. इच्छुक व्यक्तियों और परिवारों की पर्यटन गतिविधियों में भागीदारी से ग्रामीण भारत की अनेक समस्याएं हल की जा सकती हैं. इससे परिवारों की आय बढ़ेगी, खपत पद्धतियों में बेहतरी के लिए बदलाव आएगा, ग्रामीण समुदाय का आत्मविश्वास बढ़ेगा, उन्हें अपने चारों ओर की दुनिया की बेहतर जानकारी मिलेगी और लोगों को वास्तविकता का ज्ञान होगा. विभिन्न स्थानों और संस्कृतियों से आने वाले पर्यटकों के साथ बातचीत से
विश्व के प्रति ग्रामीण लोगों का नजरिया व्यापक होगा. इससे एक ऐसे मंच का निर्माण होगा, जो विचारों के आदान-प्रदान और सार्वभौम भाईचारे की भावना का विकास सुनिश्चित करेगा.
ग्रामीण पर्यटन के लिए पारिस्थितिकी:
पर्यटन की शब्दावली में सुगम्यता, आवास, आकर्षण और सुविधाएं-यानी फोर ज (एक्सेसिबिलिटी, एकमोडेशन, एट्रक्शंस और एमिनिटीज)-पर्यटन के चार स्तम्भ हैं. पर्यटन के विभिन्न प्रकार के आकर्षण होने मात्र से इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि पर्यटन का विकास स्वत: होगा. ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए समुचित बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य हैं, जिनमें ग्रामीण पर्यटक स्थलों तक पहुंचने के लिए निर्बाधित परिवहन सुविधाएं, ठहरने की सुविधाएं, मिलनसार स्थानीय समुदाय, बुनियादी सुविचधाओं के साथ स्वास्थ्य देखभाल केन्द्र, एटीम्स और दूरसंचार सुविधाएं, इंटरनेट कनेक्टिविटी, आदि शामिल हैं. इस तरह की पारिस्थितिकी प्रणाली का सृजन और उसे बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है. विशिष्ट ग्रामीण पर्यटन केन्द्रों के बारे में जानकारी, सुविधाओं की उपलब्धता और संपर्क के लिए महत्वपूर्ण व्यक्तियों का ब्यौरा ग्रामीण पर्यटन पोर्टलों की वेबसाइटों पर दिया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, भारत की सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए, किसी स्थान विशेष से संबद्ध सांस्कृतिक लोकाचार, मूल्यों, गांव संबंधी विधि-निषेधों की जानकारी भी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए.
ग्रामीण पर्यटन के विशेषज्ञों को, भले ही वे किसी भी विचारधारा/सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से संबद्ध हों, गांव के स्वरूप, सांस्कृतिक बारीकियों और पद्धतियों की जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए. इससे आधुनिक प्रौद्योगिकी प्रवीण पर्यटकों को उस गांव के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिसकी वे यात्रा करना चाहते हैं और साथ ही वांछित गांव में प्रवास के दौरान किसी प्रकार के धोखे/संघर्ष की आशंका नहीं रहेगी. विभिन्न सेवाओं के मूल्य का उल्लेख भी वेबसाइटों पर किया जा सकता है. पूर्ववर्ती पर्यटकों/समूहों का वर्णन और उनकी अनुशंसाओं का उल्लेख भी किसी पर्यटक स्थल का महत्व बढ़ाने में कारगर भूमिका निभा सकता है. इस तरह की समस्त जानकारी वेबसाइट पर प्रदर्शित करने से पर्यटकों को अपनी यात्रा की रूपरेखा तैयार करने और मेजबान समुदाय के साथ बिना किसी असुविधा के अपने प्रवास का आनंद लेने में मदद मिलेगी. अंतत: यह स्थिति पर्यटकों और मेज़बान समुदाय दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी.  
निष्कर्ष:
राष्ट्रीय संदर्भ में पर्यटन को बढ़ावा देने के महत्व और पर्यटन के आधार का विस्तार करने की आवश्यकता को देखते हुए, यह उपयुक्त समय है कि ग्रामीण पर्यटन पर समुचित ध्यान दिया जाये. ग्रामीण भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भौतिक एवं मानव संसाधनों को देखते हुए ग्रामीण पर्यटन के विकास की व्यापक संभावनाएं हैं. ग्रामीण लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने और बुनियादी कौशल प्रदान करने के संदर्भ में न्यूनतम उपायों से निश्चय ही ग्रामीण पर्यटन को ऊंचे पायदान पर पहुंचाया जा सकेगा और इससे शहरी और ग्रामीण भारत के बीच अंतराल कम होगा. संतुलित क्षेत्रीय विकास का लक्ष्य न्यूनतम निवेश के साथ हासिल किया जा सकता है, जो एक स्वीकृत राष्ट्रीय लक्ष्य है. इस तरह ग्रामीण पर्यटन भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास का एक वैकल्पिक मॉडल प्रदान करता है. इस तरह हम राष्ट्र की समृद्धि के लिए ग्राम स्वराजका गांधी जी का सपना पूरा कर सकते हैं.
(लेखक पुदुच्चेरी में पांडिचेरी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर एवं डीन हैं. ई-मेल: anjaneyag@yahoo.com). इस आलेख का अंग्रेजी संस्करण कुरुक्षेत्र पत्रिका के दिसम्बर, 2017 के अंक में प्रकाशित हो चुका है.