नौकरी फोकस


Volume- 47, 17-23 February, 2018

 

खादी - भारत के आर्थिक रूपांतरण के लिए प्रमुख वस्त्र

डॉ. श्री नाथ सहाय

‘‘मैं चरखा चलाऊंगा, दोस्तों आप भी चलाइए. यह हमें आजादी देगा.’’

-महात्मा गांधी

खादी सिर्फ एक वस्त्र नहीं है, वरन् एक अवधारणा है. यह भारत की आजादी की लड़ाई का एक अभिन्न अंग था, चूंकि गांधी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए खादी को एक हथियारबनाया था. खादी को आजादी की वर्दीका नाम दिया गया. नेल्सन मंडेला ने कहा, ‘‘गांधीजी ने अपने चरखे और घर में कते हुए खादी द्वारा व्यक्ति को मशीन से अलगाव और उत्पादन प्रक्रिया में नैतिकता को बहाल करना चाहा’’.

गांधीजी का लेपटॉप : गांधीजी लोगों की आत्म-निर्भरता प्राप्ति के अपने शिक्षण के साथ चरखे को वृहत् प्रयोग में लाए. एक छोटे ढोने योग्य, हाथ चैनल चक्का (पहले का आकार) को कपास और अन्य रेशे की बुनाई के लिए आदर्श माना गया. इसे भारत के झंडे के पहले रूप में भी शामिल किया गया. अत: यह स्वतंत्रता आंदोलन के अस्त्र और चिह्न दोनों के रूप में स्वतंत्रता संग्राम में एक केंद्रीय स्थान ग्रहण कर लिया.

आजादी के बाद सरकारी स्तर पर खादी की ओर ध्यान दिया गया. 1925 में गठित अखिल भारतीय बुनकर संघ और तत्पश्चात् 1934 में ग्रामोद्योग संघ की स्थापना के बाद 1953 में वाणिज्य मंत्रालय के अधीन अखिल भारतीय ग्रामोद्योग मंडल की स्थापना की गई. बाद में 1957 में खादी और ग्रामोद्योग आयोग अस्तित्व में आया. तब से आयोग ने पूरे देश में विस्तृत नेटवर्क को विकसित किया है और खादी उत्पादों की बिक्री के लिए 5000 से अधिक पंजीकृत संगठनों (गैर-सरकारी) और लगभग 10000 खुदरा बिक्री केंद्रों के जरिए काम कर रहा है.

आयोग के तीन आधारभूत लक्ष्य हैं : (1)  रोज़गार के अवसरों के सृजन हेतु खादी उद्योग को कुटीर उद्योग के रूप में स्थापित करना (2) ऐसे उत्पाद बनाना, जिसका बाजार मिल सके (3) खादी ग्रामोद्योग के जरिए रोज़गार से जोडक़र अधिक से अधिक लोगों को आत्मनिर्भर बनाना. आयोग केंद्र एवं राज्यों से प्राप्त सरकारी सहायता अनुदान से अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन

करता है.

महिला स्व-रोज़गार : खादी उद्योग में छोटे पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है. निम्न आय व्यक्ति के लिए भी यह लाभकर कार्य है. रोज़गार के प्रचुर अवसर के आश्वासन के साथ यह गरीब लोगों, खासकर ग्रामीण महिलाओं, जिनके पास पर्याप्त खाली समय है, परंतु करने के लिए कोई काम नहीं है,

की अर्थव्यवस्था के निर्माण को भी सुनिश्चित करता है.

गैर-कृषि व्यवसाय: ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गैर-कृषि व्यवसाय की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं, क्योंकि कृषि में मशीनों के उपयोग के कारण रोज़गार की संभावना घटती जा रही है. अब अर्थव्यवस्था में गैर-कृषि क्षेत्र का हिस्सा नौ प्रतिशत है. देश के कुल कार्यबल का लगभग 18 प्रतिशत और ग्रामीण कार्यबल का 25 प्रतिशत गैर-कृषि क्षेत्र से संबंधित है. अत: गांव के सभी परिवारों का लगभग एक तिहाई गैर-कृषि कार्य से अपनी आय प्राप्त करते हैं. और इस दिशा में कुटीर उद्योग (कॉटेज इंडस्ट्री) इकाइयां गांवों में रोज़गार प्रदान कर रही हैं. ये इकाइयां लगभग 45 प्रतिशत उत्पाद निर्मित कर रही है. निर्यात के क्षेत्र में भी इनकी बराबर की हिस्सेदारी है. अत: ग्रामोद्योग उत्पादों के साथ खादी की गांवों में रोज़गार सृजन में बड़ी भूमिका है.

31 मार्च, 2015 तक लगभग 10 लाख लोगों ने खादी उद्योग में रोज़गार प्राप्त किया था, जिसमें 8,78,857 कताई कामगार और 1,46,551 बुनकर थे. खादी और ग्रामोद्योग आयोग (के वी आई सी) की रिपोर्ट में उल्लेख है कि वर्ष 2013-14 (जनवरी 2014 तक) इस क्षेत्र में लगभग 44.29 लाख रोज़गार अवसर सृजित हुए, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 13 प्रतिशत अधिक था. अन्य उद्योगों की तुलना में प्रारंभिक अवसंरचना लागत पर्याप्त कम होने के कारण खादी उद्योग रोज़गार का सुविधाजनक स्रोत है. खादी की कताई के लिए व्यक्ति को एक लकड़ी के चरखे, कुछ कपास और चलाने के लिए स्वयं की थोड़ी सी शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है, जिसे किसी भी शांत स्थान पर बैठकर किया जा सकता है. यह अनुमान लगाया गया है कि एक छोटे से बिजली करघे की स्थापना के लिए लगभग 10 लाख रुपए की आवश्यकता होती है और खादी के लिए यह मात्र 20000 रु. है. कच्ची सामग्री भी गांवों में मिल जाती है.

समस्याएं : तथापि खादी उद्योग अनेक समस्याओं से ग्रस्त है. खादी उद्योग के लिए विपणन सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि गांव, जहां ये इकाइयां स्थापित हैं, में उपयुक्त पहुंच सडक़ों, सुविधाजनक परिवहन प्रणाली आदि की कमी है. अत: वे बाजार में स्वयं पहुंचने में विफल हो जाते हैं और मध्यवर्ती पर निर्भर होते हैं, जो उन्हें ठीक से भुगतान नहीं करते हैं.

संपन्न कंपनियों के अन्य ब्रांडों की तुलना में खादी उत्पादों की आकर्षक पैकेजिंग में अनुपलब्धतता विपणन में दूसरी बड़ी बाधा है, क्योंकि मूल्यों में कमी के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली राजसहायता एवं छूटों के वाबजूद इन वस्तुओं के प्रति युवा एवं संभ्रांत वर्ग आकर्षित नहीं होते हैं.

अन्य संगठनों की तुलना में खादी उद्योग में कामगारों की मजदूरी कम है. खादी बुनकरों की औसत मासिक आय केवल 3000 रु. है, जो मनरेगा मानदंड से भी कम है. बुनकर खादी इकाइयों से बाहर जाने में रुचि लेते हैं और खादी संयंत्रों में लगे हुए बुनकरों की संख्या इन वर्षों में कम हो रही है. यह रिपोर्ट प्राप्त हुई है कि गुजरात राज्य में खादी बुनकरों की संख्या 60,000 से घटकर 10,000 हो गई है (कुरूक्षेत्र (हिंदी) अक्तूबर 2015, पृ. 6 देखें).

नई योजनाएं : खादी को सहायता देने के लिए सरकार ने 850 करोड़ रु. के सरकारी निवेश के साथ 800 एस एफ आर टी आई उद्योग समूहों की स्थापना के लिए परंपरागत उद्योगों के पुनर्जीवन के लिए निधि योजना (एस एफ आर टी आई) की शुरूआत की है. पुरानी मशीनों, उपकरणों को बदला जाएगा, नई तकनीकों को कार्यान्वित किया जाएगा, साझेदारी संयंत्रों की स्थापना की जाएगी और यह सब लगभग चार लाख बुनकरों की सहायता के लिए किया जाएगा. ग्रामीण विकास मंत्रालय के एस जी एस वाई कार्यक्रम को पुन: व्यवस्थित किया गया है और केवीआईसी को नोडल एजेंसी नियुक्त करके पीएमआरवाई एवं आरईजीपी कार्यक्रमों को जोडक़र पीएमईजीपी को निरूपित किया गया है.

कुशल भारत मिशन और खादी : भारत सरकार ने यह संकल्पना की है कि भारत के युवाओं को रोज़गार उपलब्ध कराते हुए उन्हें कौशल विकास में भी प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वे अधिक आत्म-निर्भर हो सकें. नई उन्नत मशीनों की शुरूआत और बुनाई, धागा निकालने, डिजाइनिंग और रंगाई आदि की नई तकनीकों के साथ प्रशिक्षण में  खादी का सकारात्मक योगदान है. यह अपना स्वयं का काम शुरू करने के लिए 10वीं एवं 12वीं पास बेरोज़गार छात्रों के लिए युवा-केंद्रित प्रशिक्षण भी है.

सौर चरखा : समय के साथ चरखे का कायाकल्प हुआ है. किसी समय बांस से बना हुआ  यह अब हाईटेक हो गया है. सहायता के लिए सौर चरखा आ गया है. जहां भी बिजली की कमी है, जैसे कि गांव में, यह अधिक महिला अनुकूल है, क्योंकि इसे चलाने में कम शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है. यह सौर चालित चरखा खादी उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा.

झारखंड राज्य ने विभिन्न तरह की मशीनों - झारक्राफ्ट एवं समृद्धि का प्रयोग करके धागे के विकास की दिशा में काम शुरू किया है. समृद्धि  प्रतिदिन 200 ग्राम तस्सर धागा बनाता है. अधिक महिलाएं इस मशीन से काम कर रही हैं. वर्ष 2009 से अब तक महिलाओं ने 28.18 लाख लाभ कमाया है. इसने बड़े पैमाने पर महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है.

डिजाइनर खादी : आधुनिक युग ने सभी उम्र समूह को लोगों को डिजाइन के प्रति पागल बना दिया है. हर कोई आधुनिक चलन के साथ डिजाइन की गई एवं बनाई गई कपड़ों को पहनना पसंद करता है. खादी को चिकना-चुपड़ा’, पसंदीदा एवं आकर्षक रूप देने के लिए फैशन डिजाइनर एन आई एफ टी ने पोशाकों में आधुनिक कट एवं स्टाइल की शुरूआत की है. मांग को देखते हुए कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियों ने युवाओं को आकर्षित करने के लिए खादी जीन्स, पैजामे, जैकेट, कमीजें और कुर्ते बनाये हैं और विपणित किया है. अब खादी फैशन से बाहर नहीं - ‘‘राष्ट्र के लिए, फैशन के लिए खादी.’’

खादी भारत की संस्कृति है : खादी भारत का प्रतीकात्मक वस्त्र है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के अपने दौरे में वहां के राष्ट्रपति जी जिनपिंग को खादी से बना हुआ एक जैकेट भेंट किया. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी उन्होंने खादी में लिपटी हुई गीता भेंट की. अत: खादी गौरव के साथ भारत का प्रतिनिधित्व करती है. प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात संबोधन में अपने जीवन एवं रहन-सहन में इसके प्रयोग के लिए लोगों को कहकर खादी को प्रतिष्ठित और उन्नत किया है. अब खादी को पुनर्जीवित करने और इसे लोगों का संरक्षण देने के लिए अत्यधिक प्रयास किया जा रहा है.

बिक्री में बढ़ोतरी : के वी आई सी डाटा यह प्रदर्शित करता है कि वर्ष 2014-15 के दौरान 36425 करोड़ की राशि के साथ खादी इकाइयों की बिक्री में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. लेकिन इस वृद्धि के बावजूद अन्य कपड़ों की तुलना में खादी का हिस्सा केवल 0.5 प्रतिशत है. बिक्री को और बढ़ाने के लिए स्कूलों (बच्चों में स्वतंत्रता की वर्दी के रूप में रुचि का सृजन करके), कार्यालयों, रेलवे, बंदरगाहों और अस्पतालों में सभी तरह की वर्दिर्यों को अनिवार्य रूप से खादी का बनाये जाने की आवश्यकता है. विशेष प्रदर्शनियां आयोजित की जानी चाहिए जैसा कि 13 अप्रैल 2016 (खादी ग्रामोद्योग की स्थापना दिवस) को किया गया था, जिसने बिक्री को 60

प्रतिशत बढ़ा दिया और इसमें युवा एवं महिलाएं मुख्य क्रेता थे.

पिछले वर्ष (2015 में) खादी से 35000 भारतीय झंडे बनाए गए, जिससे 1.5 करोड़ का मुनाफा हुआ.

आजकल जबकि दुनिया पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक हो रही है, खादी के पर्यावरण अनुकूल गुण को चित्रित और प्रचारित करने और इसके प्रबंधन एवं बिक्री को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है.

(लेखक अकादमीविद् हैं; ईमेल - shrinsahai29in@yahoo.com)