नौकरी फोकस


Volume 24, 2017

संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी

विष्णुप्रिय पांडे

‘‘अखिल भारतीय स्तर पर विचार-विमर्श के लिए हमें भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है जिसे देश के सबसे ज्यादा लोग पहले से जानते-समझते हों और जिसे दूसरे लोग आसानी से सीख सकें.’’        

-महात्मा गांधी
भारत विभिन्न  भाषाओं का देश है. जैसी कि एक कहावत है--‘‘हर दो मील पर पानी बदले और हर चार मील पर बानी’’. 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 से अधिक बोलियां हैं जो पांच अलग-अलग भाषा परिवारों के अंतर्गत आती हैं. 1991 की जनगणना में लोगों ने मतगणना के कागजात में मोटे तौर पर 10,400 बोलियों को अपनी मातृभाषा बताया था. युक्तिसंगत विश्लेषण के बाद देश में मातृभाषाओं की संख्या 1576 तय की गयी. 2001 की जनगणना में इसका और विश्लेषण करने के बाद  से भाषाओं की कुल संख्या  122 और बोलियों की 234 तय की गयी. संविधान की आठवीं अनुसूची के अनुसार देश में 22 अनुसूचित भाषाएं हैं जो इस प्रकार हैं— (1) असमिया, (2) बंगाली, (3) गुजराती, (4) हिन्दी, (5) कन्नड, (6) कश्मीरी, (7) कोंकणी, (8) मलयालम, (9) मणिपुरी, (10) मराठी, (11) नेपाली, (12) ओडिय़ा, (13) पंजाबी, (14) संस्कृत, (15) सिंधी, (16) तमिल, (17) तेलुगू, (18) उर्दू , (19) बोडो,  (20) संस्कृत, (21) मैथिली, (22) डोगरी.
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हालांकि हर भाषा ने औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई, मगर तभी एक राष्ट्रीय भाषा का सवाल उठा और इसकी आवश्यकता महसूस की गयी. भांति-भांति की भाषाओं और बोलियों वाले भारत जैसे देश में लोगों को समग्र राष्ट्र के रूप में एकजुट रखने के लिए एक साझा भाषा की आवश्यकता होती है. लोगों को एकजुट करने और राष्ट्र निर्माण का यह महत्वपूर्ण कार्य कौन सी भाषा कर सकती है? इस सवाल का जवाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को छोडक़र भला और किस के पास बेहतर हो सकता है जिन्होंने हमेशा एक राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता पर जोर दिया. 1917 में भरुच में गुजरात शिक्षा सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि हिन्दी एकमात्र भाषा है जिसे राष्ट्रीय भाषा के रूप में अंगीकार किया जा सकता है क्योंंकि यही एक ऐसी भाषा है जो देश के अधिसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाती है. इसमें आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक संवाद के लिए संपर्क भाषा बनने की क्षमता है. स्वतंत्रता के बाद हिंदी ने, जो उस वक्त विभिन्न भाषायी समूहों के जबरदस्त दबाव का समाना कर रही थी, राष्ट्र के एकीकरण की भाषा के रूप में अपने को साबित किया. भारत की संविधान सभा ने भी इसे अंग्रेजी के साथ राजभाषा के रूप में स्वीकार किया. राजभाषा के रूप में हिन्दी  को 14 सितंबर, 1949 को अधिसूचित किया गया और इसी की स्मृति में हर साल इसी तारीख को हिन्दी दिवस मनाया जाता है.        
आज 40 करोड़ से अधिक भारतीय हिंदी को अपनी मातृभाषा मानते हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी में हिंदी बोल सकने वालों की संख्या 41 प्रतिशत है. यह बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों  की भाषा है. इसके अलावा अमेरिका, मारीशस, दक्षिण अफ्रीका, यमन, न्यू्जीलैंड और नेपाल जैसे विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतवंशी  भी हिंदी बोलते हैं जिससे यह दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है. 
हिन्दी भाषा का संक्षिप्त परिचय
हिंदी को संस्कृत की पुत्री माना जाता है जो देवभाषा मानी गयी है. संस्कृत अविभाजित भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमांत में आकर बसने वाले आर्यों द्वारा बोली जाती थी. यह इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार के अंतर्गत आधुनिक इंडो-आर्य समूह की सदस्य है. क्लासिकल संस्कृत से पालि-प्राकृत और अपभ्रंश का रूप धारण करते हुए यह बीते युगों में विकास के विभिन्न चरणों से होकर गुजरी है. हिन्दी के प्रारंभिक स्वरूप को ईसा के बाद की 10वीं सदी में हिंदुवी, हिन्दुस्तानी और खड़ी बोली के रूप में खोजा जा सकता है.  
लेकिन हिंदी का साहित्यिक इतिहास 12वीं सदी से प्रारंभ होता है और इसका आधुनिक अवतार यानी आज की हिंदी करीब तीन सौ साल पुरानी है.
पृष्ठभूमि : प्राकृत और क्लासिकल संस्कृत का काल (तारीखें अनुमानित हैं)
750 ई.पू. :वेदोत्तिर संस्कृति का क्रमिक उद्भव
500 ई.पू. :बौद्धों और जैनों के प्राकृत ग्रंथों का अभ्युदय (पूर्वी भारत)
400 ई.पू. :पाणिनि द्वारा वैदिक संस्कृति से पाणिनि कालीन संस्कृत में बदलाव का संकेत देने वाले संस्कृत व्याकरण का प्रणयन
322 ई.पू. :मौर्यों के ब्राह्मी लिपि के शिलालेख प्राकृत (पाली में)
250 ई.पू. : क्लासिकल संस्कृत का जन्म (विद्यानाथ राव) 100-100 ई. तक ई. सन् : शिलालेखों में प्राकृत का स्थान धीरे-धीरे संस्कृत ने लिया
320 ई.:गुप्त या सिद्ध-मातृका लिपि का जन्म
अपभ्रंश और पुरानी हिंदी का उद्भव
400 ई. :कालिदास के विक्रमोर्वशीयम् में अपभ्रंश
550 ई : वल्लभी के धारा सेना शिलालेख में अपभ्रंश साहित्य
779 ई. :उद्योतन सूरी ने कुवलयमालाक्षेत्रीय भाषाओं का उल्लेख किया.
769 ई. :सिद्ध सरहपाद द्वारा दोहाकोश का प्रणयन; उन्हें हिंदी का पहला कवि माना जाता है।
800 ई. :इसके बाद का ज्यादातर संस्कृत साहित्य टीकाओं के रूप में है। (विद्यानाथ राव)
933 ई. :देवसेना की शृवकाचार, पहली हिंदी पुस्तक
1100 ई.:आधुनिक देवनागरी लिपि का उद्भव
1145-1229 : हेमचंद्र ने अपभ्रंश व्याकरण लिखा
अपभ्रंश का पराभव और आधुनिक हिंदी का उद्भव
1283 ई. :खुसरो की पहेलियां और मुकरियां. हिंदुवीशब्द का इस्तेमाल
1398-१५१८ ई. :कबीर की रचनाओं से निर्गुण भक्तिका जन्म
1370 ई. :असाहत के हंसावलीद्वारा प्रेमगाथाओं का काल
1400-1479 ई. : रायघु - अंतिम महान अपभ्रंश कवि
1450 ई. :सगुण भक्तिरामानंद से युग की शुरूआत
1580 ई. :बुरहानुद्दीन जानम की प्रारंभिक दक्खिनी कृति कलमितुल-हकायत
1585 ई. :नाभादास की भक्तामाल’ - हिन्दी भक्त कवियों का वर्णन
1601 ई. :बनारसीदास की पहली हिंदी आत्मकथा अर्ध कथानक
1604 ई. :गुरू अर्जन देव द्वारा आदि गं्रथमें कई कवियों की रचनाओं का संकलन
1532-1623 ई. :तुलसीदास की रामचरित मानस
1623 ई. :जटमल की ‘‘गोरा-बादल की काथा’’ -खड़ी बोली की पहली पुस्तक (अब तक मानक बोली बन चुकी थी।)
1643 ई. :रीतिकालकी काव्य परम्पराओं की शुरूआत--रामचंद्र शुक्लु
1645 ई. :शाहजहां द्वारा दिल्ली के किले का निर्माण -आस-पास की भाषा उर्दू कहलाई
1667-1707 ई. :वली की रचनाएं लोकप्रिय हुईं. दिल्ली के कुलीन घरानों में फारसी को उर्दू ने हटाया. सौदा और मीर आदि ने अक्सर इसे उर्दू कहा है.
1600-1825 ई.:बिहारी से लेकर पद्माकर तक कई कवियों को ओरछा और अन्य शासकों का आश्रय
आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास
1796 ई. :सबसे पुराने किस्म के टाइपों से देवनागरी में छपाई (जॉन गिलक्रिस्टो की ग्रामर ऑफ द हिन्दुस्तानी लैंगुएज, कलकत्ता) (डिक प्लकर)
1805 ई. :फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के लिए लल्लू लाल के प्रेमसागरका प्रकाशन
1813-46 ई :महाराजा स्वाति तिरुमल रामा वर्मा (ट्रावणकोर) हिन्दी के साथ-साथ दक्षिण भारतीय भाषाओं में काव्य सृजन
1826 ई. :उदं मार्तंडहिन्दी साप्ताहिक का कोलकाता से प्रकाशन शुरू
1837 ई. :ओम जय जगदीश हरेआरती के कवि फिल्लौरी का जन्म
1839-1847 ई. :गार्सिया द ताशी ने हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचरलिखी (डेजी रॉकवैल)
1833-86 ई. :गुजराती कवि नर्मद का हिंदी को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाने का प्रस्ताव
1850 ई. :हिंदीशब्द का इस्तेमाल आज उर्दू कही जाने वाली भाषा के लिए कभी नहीं हुआ
1854 ई.:समाचार सुधावर्षणहिंदी दैनिक का कोलकाता से प्रकाशन
1873 ई. :महेन्द्र भट्टाचार्य की पदार्थ विज्ञानहिन्दी में छपी.
1877 ई.:श्रद्धाराम फिल्लौरी का उपन्यांस भाग्यवती छपा
1886 ई. :आधुनिक हिंदी साहित्य का भारतेंदु युग प्रारंभ
1893 ई. :बनारस में नागरी प्रचारिणी सभा का गठन (डेजी रॉकवैल)
1900 ई. :राष्ट्रवादी लेखन की द्विवेदी युगसे शुरूआत
1900 ई. :सरस्वती पत्रिका में किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी इंदुमतीछपी
1913 ई. :राजा हरिश्चंद्रदादासाहेब फालके की पहली हिन्दी फिल्म
1918-1938 ई :छायावाद काल
1918 ई. :गांधी जी ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की.
1929 ई. :हिन्दी साहित्य का इतिहास’- रामचंद्र शुक्ल
1931 ई. :पहली सवाक हिंदी फिल्म आलम आरा
1930 का दशक :हिंदी टाइपराइटर (नागरी लेखन यात्रा) (शैलेंद्र मेहता) हमारा युग
1949 ई. :राजभाषा अधिनियम ने केन्द्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी का उपयोग अनिवार्य बनाया
1950 ई. :संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी को संविधान में स्थान मिला.
स्रोत : www.cs.colostate.edu
 
संवैधानिक प्रावधान
संविधान सभा में राजभाषा के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई थी और यह फैसला किया गया कि देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अपनाया जाना चाहिए. यही निर्णय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत संघ की राजभाषा घोषित करने का आधार बना. भारतीय संविधान का भाग-17 राजभाषा के मुद्दे से संबंधित है.
अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा से संबंधित है और इसमें कहा गया है : ‘‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी.’’
संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा.   
(2) खंड 1 में किसी बात के होते हुए भी इस संविधान के लागू होने के 15 साल के भीतर संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था.
परंतु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान आदेश द्वारा संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी एक के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेंगे.
(3) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात् विधि द्वारा-(क) अंग्रेजी भाषा का, या (ख) अंकों के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किये जाएं.
संविधान बनाते और इसे अंगीकार करते समय यह व्यवस्था की गयी थी कि अंग्रेजी भाषा कार्यपालिका, न्यायपालिका और वैधानिक कार्यों में 15 साल यानी 1965 तक उपयोग में लायी जाती रहेगी. संविधान में यह व्यवस्था की गयी थी कि राष्ट्रपति कुछ खास कार्यों के लिए हिन्दी के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद 344(1) में व्यवस्था की गयी है कि संविधान के लागू होने के पांच साल पूरे हो जाने के बाद और उसके बाद दस साल पूरे होने पर राष्ट्रपति एक आयोग का गठन कर सकते हैं जो संघ के सरकारी कामकाज में हिंदी के उत्तरोत्तर उपयोग के बारे में राष्ट्रपति को अपनी सिफारिशें देगा. आयोग अध्यक्ष और कुछ सदस्यों से मिलकर बना होगा.    
संविधान के अनुच्छेद 351 में कहा गया है कि संघ का यह कत्र्तव्य  होगा कि वह हिंदी भाषा के प्रसार बढ़ाएं, उसका विकास करें ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुतस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात् करते हुए और जहां आवश्यक और वांछनीय हो वहां उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे.
भारत सरकार की पहल
संविधान के उपर्युक्त अनुच्छेदों के प्रावधानों के अनुसार राजभाषा अधिनियम, 1963 (1967 में संशोधित) बनाया गया जिसमें 25 जनवरी 1965 के बाद सरकारी काम-काज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने की व्युवस्था की गयी. अधिनियम में यह भी व्यवस्था की गयी कि कुछ विशिष्ट  उद्देश्यों  जैसे संकल्पों, सामान्य आदेशों, नियमों, अधिसूचनाओं, प्रशासनिक व अन्य रिपोर्टों, प्रेस विज्ञप्तियों, संसद के समक्ष रखे जाने वाले सरकारी दस्तावेजों, संविदाओं, करारों, लाइसेंसों, परमिटों, टेंडरों और टेंडर के फार्मों आदि में हिंदी और अंग्रेजी दोनों का उपयोग अनिवार्य होगा.    
1976 में राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 8(1) के प्रावधानों के अनुसार राजभाषा नियम बनाए गये. इनकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1) ये केन्द्र सरकार के तमाम कार्यालयों पर, जिनमें आयोग, समितियां या केन्द्र  सरकार द्वारा नियुक्त न्यायाधिकरण और निगम या उनके स्वामित्व वाली या नियंत्रण वाली कंपनी शामिल हैं, लागू होंगे;
2) केन्द्र सरकार के कार्यालयों से राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों या क्षेत्र में रहने वाले किसी व्यक्ति के साथ पत्राचार हिन्दी में होगा. क्षेत्र के अंतर्गत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा और केन्द्र शासित प्रदेश अंडमान-निकोबार द्वीप समूह व दिल्ली आदि शामिल हैं;
3) केन्द्र सरकार के कार्यालय से क्षेत्र के राज्यों/ केन्द्र शासित प्रदेशों के साथ होने वाला पत्राचार आम तौर पर हिंदी में होगा. लेकिन क्षेत्र में रहने वाले किसी व्यक्ति से पत्राचार अंग्रेजी या हिंदी में किया जा सकता है. क्षेत्र में पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ शामिल हैं. 
4) केन्द्र सरकार के कार्यालय से क्षेत्र के राज्यों/ केन्द्र शासित प्रदेशों और उनमें रहने वाले लोगों (यानी वे सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश जो क्षेत्र और क्षेत्र में शामिल नहीं हैं) के साथ होने वाला पत्राचार आम तौर पर अंग्रेजी में किया जाएगा;
5) केन्द्र सरकार के कार्यालयों के बीच और केन्द्र सरकार के कार्यालयों से राज्य  सरकारों/केन्द्र शासित प्रदेशों तथा व्यक्तियों आदि के साथ पत्राचार उस सीमा तक हिंदी में होगा जितना समय-समय पर तय किया जाएगा
6) सभी मैनुअलों, संहिताओं और केन्द्र सरकार के कार्यालयों में प्रक्रिया संबंधी साहित्य को हिंदी और अंग्रेजी दोनों में तैयार किया जाना चाहिए. सभी फॉर्म, रजिस्टरों के शीर्षक, नाम पट्टियां, नोटिस बोर्ड और विभिन्न प्रकार की लेखन सामग्री आदि हिंदी और अंग्रेजी में होना जरूरी है;
7) अधिनियम की धारा 3(3) में निर्दिष्ट  किसी दस्तावेज पर दस्तखत करने वाले अधिकारी की यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी कि ये हिन्दी और अंग्रेजी में दोनों में जारी किये जाएं.
8) केन्द्र सरकार के प्रत्येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रमुख की यह सुनिश्चित करने की जिम्मेेदारी होगी कि उप-नियम के अंतर्गत अधिनियम के प्रावधानों, नियमों और निर्देशों पर उचित तरीके से अमल हो और इसके लिए उपयुक्त और प्रभावी जांच बिन्दु तैयार किये जाएं.  
राजभाषा विभाग 1968 के राजभाषा संकल्प के अनुपालन में एक वार्षिक कार्यक्रम तैयार करता है. इस कार्यक्रम में केन्द्र  सरकार के कार्यालयों के लिए हिन्दी में किये जाने वाले विभिन्न कार्यों जैसे पत्राचार शुरू करने, टेलीग्राम, टेलेक्स आदि भेजने के लक्ष्य निर्धारित कर दिये जाते हैं. विभाग इन लक्ष्यों  को प्राप्त करने की दिशा में हुई प्रगति के बारे में संबंधित कार्यालयों से त्रैमासिक रिपोर्ट भी मंगाता है. इन रिपोर्टों के आधार पर वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट बनायी जाती है जिसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है. देश भर में आठ क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय स्थापित किये गये हैं जो बंगलुरु, कोच्चि, मुंबई, कोलकाता, गुवाहाटी, भोपाल, दिल्ली और गाजि़याबाद में हैं और संघ की राजभाषा नीति को लागू करने की निगरानी करते हैं.    
राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4 के अनुसार संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के उपयोग में हुई प्रगति की समय-समय पर समीक्षा करने और इस बारे में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 1976 में पहली बार एक संसदीय समिति गठित की गयी. सलाहकार समिति में लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सांसद होते हैं.
1976 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में पहली केन्द्रीय हिंदी समिति गठित की गयी. यह समिति हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए नीतियां और दिशानिर्देश तैयार करने वाली शीर्ष संस्था है. केन्द्रीय हिन्दी सलाहकार समिति के निर्देश पर सभी मंत्रालयों/ विभागों में हिन्दी सलाहकार समितियां बनाई गयी हैं. इनके प्रमुख संबंधित मंत्रालयों के मंत्री होते हैं.    
केन्द्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति का भी गठन किया गया है जो संघ की राजभाषा के तौर पर हिंदी में काम करने के लिए कर्मचारियों के प्रशिक्षण और राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों पर अमल की स्थिति की समीक्षा करने के लिए कार्य करती है.  
जिन शहरों में केन्द्र सरकार के कम-से-कम दस कार्यालय हैं वहां शहर राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की गयी हैं जो सदस्य कार्यालयों में हिन्दी के प्रयोग में प्रगति  की समीक्षा करने के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ अपने अनुभवों को भी साझा करते हैं. अब तक इस तरह की 255 शहर राजभाषा कार्यान्वयन समितियां देश भर में गठित की जा चुकी हैं. 
भारत सरकार राजभाषा नीति को कारगर तरीके से लागू करने के लिए मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और विभिन्न कार्यालयों को हर साल पुरस्कार प्रदान करती है. वह अपने सेवारत/ सेवानिवृत्त कर्मचारियों, बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण संस्थाओं और स्वायत्त संगठनों को हिन्दी में मौलिक पुस्तक लिखने के लिए नकद पुरस्कार देती है. आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी की तमाम शाखाओं तथा समसामयिक विषयों पर लेखन को बढ़ावा देने के लिए विशेष पुरस्कार योजना शुरू की गयी है जिसमें भारत का कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है.
सरकार ने हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत देश भर में 119 पूर्णकालिक और 49 अंशकालिक केन्द्र  स्थापित किये हैं. ये कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, चेन्नै और गुवाहाटी में स्थित हैंं. ये कार्यालय देश के विभिन्न भागों में चलाई जा रही हिंदी शिक्षण योजनाओं को शैक्षणिक और प्रशासनिक सहयोग प्रदान करते हैं. गुवाहाटी में एक नया क्षेत्रीय मुख्यालय स्थापित किया गया है और इंफाल, आईजोल और अगरतला में हिंदी प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये हैं ताकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में हिंदी प्रशिक्षण की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके. केन्द्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना 31 अगस्त, 1985 को की गयी थी. इसका उद्देश्य  सघन पाठ्यक्रमों के जरिए हिंदी का प्रशिक्षण प्रदान करना और पत्राचार के जरिए हिंदी टंकण और हिंदी आशुलिपि की सैद्धांतिक जारी देना है. केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो का गठन मार्च 1971 में मंत्रालयों/विभागों, केन्द्र  सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों, बैंकों आदि के गैर-वैधानिक साहित्य, मैनुअलों/संहिताओं, फार्मों आदि का अनुवाद करवाने के लिए किया गया था. इसके अलावा केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो सरकारी कर्मचारियों के लिए अल्पावधि अनुवाद पाठ्यक्रमों का भी संचालन करता है. 
नयी टेक्नोलॉजी के आने से उनसे संबंधित एप्लिकेशन टूल्स और साफ्टवेयर का विकास करने के प्रयास भी जारी हैं जिससे राजभाषा के रूप में हिन्दी को डिजिटल तरीके से भी प्रयोग में लाया जा सके. 
राजभाषा विभाग हिंदी में अपना पोर्टल शुरू कर चुका है जबकि लगभग सभी सरकारी मंत्रालयों/विभागों और कार्यालयों के वेबसाइट अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी हैं.  फेसबुक, ट्विटर, ह्वाट्स अप और इसी तरह के अन्य सोशल मीडिया साइट्स अपने उपयोक्ताओं को हिंदी इस्तेमाल करने का विकल्प उपलब्ध कराते हैं. रीजनल मार्केटिंग इन द डिजिटल एज़नाम की हाल की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि शहरी भारत में करीब 60 प्रतिशत उपभोक्ता ऑनलाइन सामग्री को हिंदी में देखते हैं. इसके बाद तमिल और मराठी का नंबर आता है. भारत सरकार ने भी हिंदी भाषी राज्यों को निर्देश दिया है कि वे हिंदी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अंग्रेजी के बराबर महत्व दें. उसने सभी मंत्रालयों और विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा बैंकों से भी कहा है कि वे ट्विटर, फेसबुक, गूगल, यू-ट्यूब और ब्लॉग आदि में आधिकारिक खाता खोलते वक्त, हिंदी को प्राथमिकता दें. 
अपना ज्यादातर कार्य हिंदी में करने वाले तीन लोगों को नकद पुरस्कार देने की भी घोषणा की गयी है. जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में संकेत दिया है हिन्दी बहुत जल्द डिजिटल दुनिया की शीर्षस्थ भाषाओं में से एक हो जाएगी. ऐसे में इस साल का हिन्दी दिवस मनाते हुए हिंदी का भविष्य उज्ज्वल लगता है.
(लेखिका जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सामाजिक कार्य विभाग में शोध छात्रा हैं.)
उनका ई-मेल पता है : vishnupriyapandey@gmail.com)