नौकरी फोकस


Volume 25, 2017

आईएएस (मुख्य परीक्षा) की सही तैयारी कैसे करें?

एस. बी. सिंह

आईएएस मुख्य परीक्षा को सच में सिविल सेवाएं परीक्षा की जननी कहा जा सकता है और इसके कारण भी स्पष्ट हैं, क्योंकि इसमें विस्तारित अंक शामिल होते हैं जो किसी के भी रैंक, सेवा और संवर्ग का निर्धारण करते हैं. यदि आप मुख्य परीक्षा में उच्च अंक अर्जित करते हैं, आपको सर्वोच्च रैंक, या यूं कहें प्रथम सौ रैंक के भीतर स्थान प्राप्त होगा, जो आपको तीन सर्वोच्च सेवाओं अर्थात् आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के लिये पात्र बनाता है. इसके अलावा, आपको अपनी पसंद का संवर्ग मिलेगा क्योंकि आपको अपने मुख्य परीक्षा के उच्च अंकों के फलस्वरूप प्राथमिकता मिलेगी. चूंकि प्रारंभिक परीक्षा मात्र एक अर्हक परीक्षा होती है, इसका आपके रैंक, सेवा आदि पर कोई प्रभाव नहीं होता है. इसी तरह, इंटरव्यू मात्र 275 अंकों का है और यह अकेला आपको रैंक अथवा सेवा में अपेक्षित शिखर तक ऊपर नहीं उठा सकता है. अत:, मुख्य परीक्षा के महत्व को इसके उचित संदर्भ में अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये.
यहां पर उन कौशलों का स्मरण करना महत्वपूर्ण होगा जिनका मुख्य परीक्षा में परीक्षण किया जाता है. ये कौशल हैं:
क. संज्ञानात्मक कौशल: यह विचार, अनुभव और चेतना के जरिये ज्ञान और समझ हासिल करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है. आईएएस मुख्य परीक्षा की तैयारी के संदर्भ में, इसका आशय होगा पाठ्य पुस्तकों, संदर्भ सामग्रियों, जर्नल्स, समाचार पत्रों आदि के जरिये ज्ञान अर्जित करने की पर्याप्त चेतना उत्पन्न करना. इस कौशल की पर्याप्तता के बिना उम्मीदवार अर्जित ज्ञान को बगैर किसी अभिप्राय के मात्र इसकी पुन: प्रस्तुति तक सीमित होकर रह जायेगा.
ख. भाषा संबंधी कौशल: चूँकि मुख्य परीक्षा एक लिखित परीक्षा होती है, विषयगत, संरचित उत्तरों, संज्ञानात्मक कौशलों को भाषायी कौशल अर्थात लेखन कला के जरिये अभिव्यक्त करना अपेक्षित होता है. मैं यहां ज़ोर देकर कहूंगा कि पर्याप्त भाषायी कौशलों के बगैर, औसत अंकों से अधिक हासिल करना कठिन होता है भले ही आपके पास कितना ही ज्ञान का समावेश क्यों न हो.
आईएएस मुख्य परीक्षा में सफलता के लिये निश्चित तौर पर ये दो कौशल पूर्णत: अनिवार्य होते हैं. यह तथ्य कि बड़ी संख्या में उम्मीदवार अनेक अवसरों के बावजूद मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाते हैं, इसका कारण इन दो महत्वपूर्ण कौशलों का अभाव माना जा सकता है. इससे अनभिज्ञ, बड़ी संख्या में आईएएस आकांक्षी मात्र पठन, कोचिंग जाने, वेबसाइटों की सर्फिंग और इस झूठी धारणा से ग्रसित रहते हैं कि वे वह सब कुछ कर रहे हैं जो कि मुख्य परीक्षा के लिये अपेक्षित होता है.
संज्ञानात्मक कौशलों का सुधार कैसे करें?
आईएएस मुख्य परीक्षा मौजूद ज्ञान और सूचना को याद करने और पुन: प्रस्तुत करने को लेकर नहीं होती है. यह इसका अभिप्राय बताने के बारे में है. किसी बात का अभिप्राय बताने के लिये किसी को भी संगत तथ्यों के गहन विश्लेषण की प्रक्रिया के जरिये उपलब्ध सूचना को आत्मसात् करना और उन्हें मौलिक तरीके से प्रस्तुत करना होगा. संज्ञानात्मक कौशलों में सुधार के लिये मैं कुछेक बहुत ही नवीनतम और ठोस सुझाव देता हूं. सामान्यत: उम्मीदवार उनके बीच परिचालित और कोचिंग शिक्षकों की सलाह पर मात्र कुछ ही पुस्तकों पर निर्भर रहता है. यह उनके वैश्विक दृष्टिकोण को अत्यधिक सीमित कर देता है. बेहतर ज्ञान के लिये, किसी को भी तैयारी की तंग गलियों से ऊपर उठने और व्यापक मार्ग को तलाशनेे की आवश्यकता है. व्यापक मार्ग में मूल पुस्तकों की पहुंच, कोचिंग की दुनिया से बाहर निकलकर अकादमिक विशेषज्ञों के साथ विचारविमर्श, उदाहरणार्थ कुछ जानेमाने नागरिक अधिकारी जिन्हें सरकारी नीतियों की गहन जानकारी होती है, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर जो कि राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर नियमित टीका टिप्पणियां करते रहते हैं और यहां तक कि कुछ जानेमाने पत्रकारों से संपर्क किया जा सकता है. यहां तक कि यदि आप उन्हें नहीं भी जानते हैं, उन्हें मदद के लिये अनुरोध किया जा सकता है और इनमें से कुछेक आपको महत्वपूर्ण टिप्स देने के लिये समय और रुचि अवश्य रखते होंगे. ऐसा दृष्टिकोण आपकी तैयारी को औसत दजऱ्े से उत्कृष्ट दर्जे तक उठा सकता है और आपके उत्तरों में गुणवत्ता आ सकती है. इसी प्रकार कोचिंग पंडितों के सुझावों से ऊपर उठकर नई स्रोत सामग्री के जरिये नई जानकारी हासिल करने से आपको विषय का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा. उदाहरण के लिये, आधुनिक भारत पर बिपन चन्द्रा की पुस्तक को पढऩा काफी फायदेमंद हो सकता है. परंतु यदि आप नेहरू की ‘‘भारत की खोज’’ से कुछ चयनित अध्यायों को भी पढ़ लें तो आपको स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े मुद्दों के बारे में गहन जानकारियां प्राप्त हो जायेंगी. यही बात नेहरू जी की पुस्तक ‘‘विश्व इतिहास की झलक’’ के बारे में कही जा सकती है जो कि विश्व इतिहास पर लिखी गई अधिकतर पुस्तकों की अपेक्षा अधिक स्पष्टता के साथ लिखी गई है. ज्वलंत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के लिये मशहूर पत्रकार मार्क टली की पुस्तकें बहुत लाभदायक हो सकती हैं. परीक्षार्थियों के मध्य साधारण किताबों को क्रय करने और उन पर मुख्य परीक्षा के लिये निर्भर रहने की एक साधारण मनोवृत्ति होती है. उदाहरण के लिये राजनीति पर एक पुस्तक है जो कि ग़ैर विशेषज्ञ द्वारा किया गया एक संकलन मात्र है, और वह उम्मीदवारों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हो गई है जबकि ग्रांविले ऑस्टिन द्वारा लिखी गई भारतीय संविधान पर एक पुस्तक हमारी राजनीति पर ज्ञान का भण्डार है. लेकिन इसके बारे में मुश्किल से किसी उम्मीदवार को जानकारी होगी अथवा वह इसके बारे में जानकारी की कोशिश करता होगा. पठन की आदतों में बदलाव करना और पाठ्य पुस्तकों के स्तर का उन्नयन आपकी मुख्य तैयारियों के लिये निर्णायक होता है. यदि आप वही पढ़ेंगे जो कि पूरी दुनिया पढ़ रही है, आप अपने को दूसरों से भिन्न किस तरह कर पायेंगे? अत: आपको पाठ्य स्रोतों के बारे में चल रही झूठी अवधारणाओं का त्याग करना चाहिये और नये विचारों को आत्मसात करना चाहिये.
भाषा ज्ञान संबंधी कौशलों में सुधार कैसे करें?
चूंकि मुख्य परीक्षा में आपकी अंतिम आउटपुट वही होने वाली होती है जो कि आपने अपने उत्तरों के तहत लिखी होती है, इसलिये भाषा संबंधी कौशलों का बहुत महत्व होता है. मुख्य परीक्षा तथ्यों के संग्रह, टिप्पणियां लिखने आदि की अपेक्षा सुंदर उत्तरों के निर्माण के बारे में अधिक होती है. मैं एक उदीयमान उम्मीदवार के साथ अपने अनुभव का स्मरण करना चाहूंगा जिसे जब कोई प्रश्न पूछा जायेगा वह उसके बारे में सब कुछ जान रहा होगा. परंतु उसने मुख्य परीक्षा में कम अंक अर्जित किये और इसे अपने प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण नहीं कर पाया. उसकी असफलता की गहन जांच से पता चलता है कि वह जो कि मौखिक रूप से कह पाने में सक्षम था, लिखित उत्तरों में उसे उतार नहीं पाया. अन्य शब्दों में, जो कुछ वह जानता था, वह अपनी लिखित अभिव्यक्ति में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाया था. मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि भाषायी कौशलों के विकास से लिखित उत्तरों पर पकड़ से मुख्य परीक्षा में सफलता का मार्ग खुलता है. यह एक दीर्घावधि लक्ष्य होता है क्योंकि कोई भी एक रात में लेखन कला को विकसित नहीं कर सकता. लेकिन ज्यादातर उम्मीदवार परीक्षा के इस महत्वपूर्ण पहलू को नजऱअंदाज़ करते हैं और लिखने का अभ्यास बहुत देर बाद शुरू करते हैं. एक अन्य समस्या भ्रामक ‘‘टेस्ट सीरिज’’ से जुड़ी है जो कि उत्तर लेखन प्रैक्टिस का प्रथम और अंतिम जरिया बन चुका है. टेस्ट सीरिज में कुछ भी गलत नहीं है परंतु यदि इसका मूल्यांकन प्रतिष्ठित विशेषज्ञों द्वारा नहीं किया जाता है, तो उम्मीदवार को कोई सही फीडबैक नहीं मिल पाता है. यह भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि उम्मीदवार को मुख्य परीक्षा में अपेक्षित लेखन के बारे में निदेशित करने के लिये बहुत सक्षम मूल्यांकक उपलब्ध नहीं हो पाते हैं. अत: इस संबंध में दो सावधानियों की आवश्यकता है. उम्मीदवार को मुख्य परीक्षा के लिये तैयारियों की शुरूआत से ही लेखन अभ्यास की योजना बनानी चाहिये, दूसरा, गैर अनुभवी, अपरिपक्व व्यक्तियों की अपेक्षा एक अनुभवी व्यक्ति से मूल्यांकन कराएं.
भाषा ज्ञान कौशलों के मुख्य घटक हैं:
1.जोशपूर्ण, स्पष्ट लेखन
2.साधारण, परंतु लेखन का मूल तरीका
3.अच्छी तरह जुड़े पैराग्राफ
4.लघु उत्तरों पर कमान (150-175 शब्द)
मुख्य सामान्य अध्ययन पेपर्स: सही दृष्टिकोण
कुल मिलाकर चार सामान्य अध्ययन पेपर्स होते हैं और प्रत्येक के 250 अंक होते हैं. इन पेपरों में शामिल पाठ्यक्रम सामग्री स्थाई, गतिशील और चिंतनशील होती है. स्थाई हिस्सा ज्यादातर इतिहास, संस्कृति, भूगोल से संबंधित होता है. गतिशील हिस्सा ताज़ा घटनाक्रमों से संबंधित होता है. चिंतनशील हिस्सा नीति शास्त्र से संबंधित होता है. उम्मीदवार को इन सभी चारों पेपर्स के बीच सुंदर संतुलन बनाकर रखना होता है. इससे आशय होता है कि आपको सभी चार पेपरों पर समान ध्यान देना होगा.
सामान्य अध्ययन पेपर I : इस पेपर का अधिकतर हिस्सा इतिहास अर्थात् आधुनिक भारत, आधुनिक उपरांत भारत, विश्व इतिहास, कला और संस्कृति से संबंधित होता है. चूंकि इस पेपर में यह सबसे लंबा हिस्सा होता है, इसकी समझ के लिये बेहतर होगा कि इतिहास पाठ्यक्रम के सभी क्षेत्रों के अच्छी गुणवत्ता के प्रश्न तैयार करें और चिंतनशील उत्तर लिखें. प्रश्नों के जरिये मुख्य पाठ्यक्रम की तरफ बढऩा मुख्य परीक्षा के लिये तैयारी का बहुत ही अनुकूल मार्ग होता है. सामान्य अध्ययन-ढ्ढ में भूगोल और सामाजिक मुद्दे होते हैं. इन दोनों क्षेत्रों में ताज़ा घटनाक्रमों से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं. कोई भी ताज़ा घटनाक्रम की जानकारी रखने के लिये समाचार पत्रों का सहारा लिया जा सकता है.
सामान्य अध्ययन पेपर II: इस पेपर में पाठ्यक्रम का प्रमुख हिस्सा राजनीति और शासन से जुड़े मुद्दे होते हैं. इसके लिये स्थैतिक पहलुओं अर्थात भारत के संविधान तथा गतिशील पहलुओं अर्थात् राजनीति में ताज़ा घटनाक्रमों दोनों का अच्छा ज्ञान होना अपेक्षित होता है. इसके अलावा सामान्य अध्ययन पेपर-ढ्ढढ्ढ का एक भाग अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम भी होते हैं जो कि पूर्णत: ताज़ा घटनाक्रमों पर उन्मुख होता है और इनमें से सर्वाधिक ताज़ा घटनाक्रम हो सकते हैं. सामान्य अध्ययन पेपर-ढ्ढढ्ढ के लिये कोई भी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छपने वाले ताज़ा मुद्दों पर अत्यधिक निर्भर हो सकता है. लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि स्थैतिक हिस्सों को नजऱ अंदाज कर दिया जाये.
सामान्य अध्ययन पेपर-III: इस पेपर में उल्लिखित विषयवस्तु आर्थिक विकास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंध और आंतरिक सुरक्षा से संबंधित होती है. अत:, यह पेपर इसकी कवरेज की दृष्टि से अधिक विविधता वाला होता है और इस तरह इन सभी क्षेत्रों की ध्यानपूर्वक, संतुलित तैयारी करने की आवश्यकता होती है. सामान्य अध्ययन पेपर-ढ्ढढ्ढ की तरह यह पेपर भी ताज़ा घटनाक्रमों पर आधारित होता है और समाचार पत्रों के सघन अध्ययन से इससे काफी हद तक कवर किया जा सकता है.
सामान्य अध्ययन पेपर-IV : यह पेपर नीति शास्त्र पर आधारित होता है जो कि मुख्य पाठ्यक्रम में एक नया समावेश है (2013 से). यह पाठ की तुलना में अधिक चिंतनशील होता है. नीतिशास्त्र अध्ययन स्वयं जीवन के बारे में सीखना है. अत: इस पेपर के लिये हमारे रोज़मर्रा के अनुभव सत्य कथाएं हो सकती हैं. इस पेपर के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम पूरी तरह सांकेतिक है और इसे शाब्दिक अर्थ में लेना अविवेकपूर्ण होगा. साथ ही पाठ्यक्रम कम शाब्दिक और अधिक प्रासंगिक होता है. नीति शास्त्र के पेपर की समस्या पुस्तकों, नोट्स आदि के रूप में उपयोगी अध्ययन सामग्री का अभाव है. आईएएस की तैयारी के लिये नीतिशास्त्र पर उपलब्ध वर्तमान पुस्तकें बहुत ही अप्रासंगिक हैं क्योंकि वे दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान और लोक प्रशासन से जुड़े नासमझी के अभ्यावेदन हैं.
संबद्ध पुस्तक सूची आधुनिक भारत:
1.बिपन चंद्रा: भारत का स्वाधीनता संघर्ष
2.आर. सी. प्रधान: राज से स्वराज तक
3.ए. आर. देसाई: भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि
4.नेहरू: भारत की खोज
5.दुर्गा दत्त: कजऱ्न से नेहरू तक और इसके बाद का भारत
6.गेज़ेटियर ऑफ इंडिया: वाल्यूम ढ्ढढ्ढ
स्वतंत्रता उपरांत भारत
1.एनसीईआरटी: आज़ादी से लेकर राजनीति
2.एनसीईआरटी: भारत में सामाजिक बदलाव और विकास
3.बिपन चंद्रा: आज़ादी से लेकर भारत
4.पॉल आर ब्रास: भारत में आज़ादी के बाद से राजनीति
विश्व इतिहास
1.अर्जुन देव और इंदिरा अर्जुन देव: विश्व का इतिहास
2.एल मुखर्जी: यूरोप का इतिहास
3.एल मुखर्जी: विश्व का इतिहास
कल और संस्कृति
1.ए एल बाशम: दि वंडर दैट वाज इंडिया
2.गेज़ेटियर ऑफ इंडिया: वाल्यू ढ्ढढ्ढ
3.एनसीईआरटी: भारतीय कलाएं
4.बासिल ग्रे: भारत की कलाएं
भूगोल
1.एनसीईआरटी: केवल 11वीं और 12वीं श्रेणी की पुस्तकें
सामाजिक मुद्दे
1.एनसीईआरटी: भारत में सामाजिक बदलाव और विकास
2.एनसीईआरटी: वैश्वीकरण और सामाजिक परिवर्तन
राजनीति
1.पी एम बख्शी: भारत का संविधान
2.ग्रांविले ऑस्टिन: भारत का संविधान
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
1.राजीव सिकरी: चुनौतियां और रणनीतियां
2.मुचकुंद दुबे: भारत की विदेश नीति
3.शिवशंकर मेनन: च्वाइसिस
अर्थशास्त्र
1.मिस्र एंड पुरी: इंडियन इकोनोमी
2.आर्थिक सर्वेक्षण
3.अर्थ पेडिया (वेबसाइट)
नीति शास्त्र
1.एआरसी रिपोर्ट: चौथी रिपोर्ट
2.नाडकरणी: गांधियन एथिक्स
(एस. बी. सिंह शिक्षाविद् और आईएएस गुरु हैं. उनसे ई-मेल: sb_singh2003@ yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है)
चित्र: गूगल के सौजन्य से