विशेष लेख


Volume-49, 3-9 March, 2018

 

संघर्ष से सशक्त होती नारी

वीणा सबलोक पाठक

किसी भी देश और समाज की प्रगति तरक्की और विकास को वहां की महिलाओं की स्थिति से आंका जा सकता है. कोई भी समाज जितना सुसभ्य और सुसंस्कृत होगा वहां महिलाओं की स्थिति उतनी ही श्रेष्ठ होगी. वास्तव में राष्ट्र की संस्कृति का मुख्य मापदंड नारी की स्थिति भी रहा है. यू भी नारी में नेतृत्व और व्यवस्था संचालन की नैसर्गिक शक्ति होती है क्योंकि वह समुंशी मानवता और सभ्यता की जनक है. सृष्टि के विकास और संचालन का आधार भी वही है. भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की धारणाएं और जबरदस्त विरोधाभास भी देखा गया है. ऐसे ढेरो  उदाहरण है जिससे पता चलता है कि नारी  समय-समय पर उभरी है वहीं दमित भी की गई.

वैदिककालीन समाज में स्त्रियों को सम्मानित सर्वोच्चता का स्थान प्राप्त था. उसे देवी की भांति पूजने की बात कही गई है. वहीं ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है जिसमें वह बलपूर्वक भोग्य बना दी गई. पशुओं की तरह उसका क्रय-विक्रय किया जाने लगा. इन तमाम विरोधाभासों के बाद भी महिलाओंं में आत्ममुक्ति की भावना बराबर पनपती रही और इसके लिए उनकी कोशिश और संघर्ष बराबर जारी रहा. वर्षो के लगातार संघर्ष के साथ महिलाओं ने अपनी पहचान अपना वजूद और अपने आप को साबित करने के लिए एकजुटता भी दिखाई. स्त्रियों ने स्वयं तो आंदोलन किये ही साथ ही उनके सहयोग के लिए समाज सुधारक भी आगे आये और स्थिति यह बनी की इक्कीसवीं सदी आते आते तक महिलाओंं के हालात में बदलाव भी दिखाई देने लगा. उन्नीसवीं सदी जहां पुनर्जागरण के लिए जानी जाएगी वहीं इक्कीसवीं सदी को महिलाओंं के विकास और तरक्की के लिए जाना जायेगा. विश्वपटल पर यदि नजऱ डाली जाये तो हर देश की महिला ने संघर्ष और आंदोलन की राह पकड़ अपने वजूद की जंग लड़ी. इसमें अत्याधुनिक कहे जाने वाले पाश्चात्य देश भी शामिल हंै. सन् 1857 में अमेरिका के शिकागो शहर में कपड़ा उद्योग में काम वाली महिला मजदूरों ने वेतन में बढ़ोतरी और काम के घंटे कम करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन से पहली बार अमेरिकी सरकार का ध्यान इन महिला मजदूरों की ओर गया. केवल अमेरिका में ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी इस आंदोलन की चर्चा रही. अन्य देशों की महिलाओंंं ने भी इसी आंदोलन से प्रेरित हो आंदोलन की राह पकड़ी. सन् 1910 में जर्मनी के कोपनहेगन शहर में नारी मुक्ति आंदोलन की अगुआ क्लारा जेटकिन ने 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा तभी से 8 मार्च का दिन महिलाओंं के लिए संघर्ष के साथ सफलता का जश्न मनाने का दिन बन गया और इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की नींव पड़ी. सन् 1911 में यूरोप के मुख्य देशों में जहां अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत हो गई थी. सन् 1923 में पेरिस में भी महिलायें एकजुट होकर आंदोलन के लिए सडक़ों पर उतरीं, जगह-जगह महिलाओंं के साथ होने वाले भेदभाव, तिरस्कार, अपमान, अन्याय और उपेक्षा के खिलाफ महिलाओं की यह मुहिम तेजी से अन्य देशों में भी पहुंचने लगी. कहीं न कहीं फ्रांस की क्रांति को भी नारी के अन्याय से जोड़ कर देखा जाता है. उस समय महिलायें जनक्रांति के साथ ही राजनैतिक कार्रवाइयों का हिस्सा भी बनी. स्त्री समानता की आवाज़ उठाने वाली पहली पत्रिका फ्रांस में क्रांति के दौरान ही निकली गई थी. वास्तव में यूरोप में नारी की स्थिति तब बदली जब उसने द्वितीय विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया. बात यदि भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की हो तो इसकी शुरूआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्थ से हो गयी थी लेकिन नारी के साथ होने वाले शोषण भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती और महात्मा गाँधी ईश्वरचंद्र विद्यासागर  जैसे समाज सुधारक और महापुरुष थे. इन समाज-सुधारकों के सहयोग समर्थन और मदद से महिलाओंं ने अपने अस्तित्व की लड़ाई की शुरुआत की. देश की राजनितिक आर्थिक और सामाजिक स्थिति ने महिला संघर्ष को पीछे धकेलने की हर संभव कोशिश करी. महिला को महिला होने के कारण तमाम तरह के भेदभाव और अन्याय का सामना करना पड़ा. आजादी के बरसों पहले ही महिलाओंं के विरोधी स्वर मुखर होने लगे थे. देश में सन् 1917 में महिला मताधिकार जैसे, क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग उठी. ब्रिटिश हुकूमत इसके लिए कतई तैयार नहीं थी, परन्तु महिलाओं के दबाव के चलते एक प्रतिनिधि मंडल बनाया गया. जिसने न सिर्फ मताधिकार की मांग रखी गई साथ ही स्त्रियों के लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था स्वास्थ्य और प्रसूति सुविधाओं की मांग भी रखी गई. परिणाम स्वरूप भारत में मद्रास ऐसा पहला प्रान्त बना जहां महिलाओंं को वोट देने का अधिकार मिला. सन्् 1917 में ही देश में इंडियन वीमेन एसोसिएशन की स्थापना की गई. 1920 आते-आते तक समाज में पहली बार नारी की स्थिति पर चिंता दिखाई दी, इसके पूर्व 1910 में सरला देवी ने स्त्री महामण्डल की स्थापना की, जिसने समय-समय पर नारी अधिकारों की आवाज़ उठाई, सन् 1910  के बाद तो उग्र राष्ट्रवादी स्त्रियां महिला अधिकारों के लिए अधिक सक्रिय होने लगी थी. सन् 1913 में क्रान्तिकारी आतंकवाद की समर्थक कुमुदनी मित्र इंटरनेशनल वेमेंसफ़ेज़ अललाइंज़ में भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने बुडापेस्ट गई थी. सन्  1926 में नेशनल कौंसिल ऑफ़ इंडियन वीमेन और सन् 1927  में अखिल भारतीय महिला परिषद् बनाई गई. देश में महिला सुधार आंदोलन की गति 20 वी शताब्दी में निरंतर तेज होती गई. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महिलाओं को प्रेरित और उत्साहित करने के लिए ढेर सारे महिला संघटन बनाए गए. इनका उद्देश्य मात्र स्वतंत्रता ही नहीं था बल्कि छोटे-मोटे अन्याय के खिलाफ भी ये जम कर आंदोलन करती थीं. देश की आजादी के पहले आजादी के दौरान और आजादी के बाद भी महिला आंदोलन और संघर्ष कभी भी थमा नहीं. बल्कि लगातार जारी है. नारी के संघर्ष का ही परिणाम है कि अब वह हर उस क्षेत्र में भी आगे आ रही है जो कभी पुरुषों के प्रभुत्व वाला जाना माना और समझा जाता था. स्त्री शिक्षा के व्यापक प्रसार के कारण ही उन्हें अपने व्यक्तित्व विकास के अवसर मिले हैं. उद्योगीकरण, शहरीकरण और आधुनिकीकरण के कारण महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं. सामाजिक बदलाव के साथ-साथ पारिवारिक रूप से भी महिलाएं सशक्त हुई है. कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओंं को जो सामाजिक मान्यता मिली है उसके पीछे बरसों का लम्बा संघर्ष है. यह महिलाओं के अस्तित्व और अस्मिता के संघर्ष का परिणाम है. इसके पीछे उन तमाम स्त्रियों का संघर्ष भी शामिल है, जिन्होंने तमाम विरोधों के बाद भी इससे शुरू करने की हिम्मत दिखाई थी. लेकिन इतना होने के बाद भी यह तो बस एक शुरूआत है. वास्तव में महिला सशक्तिकरण का लक्ष्य पाने के लिए महिलाओं को स्वयं में आत्मबल और आत्मसम्मान पैदा करना होगा तभी नारी संघर्ष की उपयोगिता और महिला दिवस की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी.     

(लेखिका एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. इसमें व्यक्त उनके विचार निजी हैं)