विशेष लेख


Volume-50, 10-16 March, 2018

 

गंगा स्वच्छता कार्यक्रम के उत्साहवर्धक परिणाम

सुधीर कुमार सिंह 

राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता अभियान (एनएमसीजी) से मिले आंकड़े यह बताते हैं कि सरकार द्वारा जारी प्रयासों के सकारात्मक और उत्साहवर्धक परिणाम मिलने शुरू हो गए हैं. स्वच्छता से जुड़े प्रमुख मानकों के आधार पर गंगा नदी के किनारे स्थित १० प्रमुख नगरों में इसके जल की गुणवत्ता की जांच के पश्चात आंकड़े जारी किए गए हैं. इन मानकों में जल में घुली ऑक्सीजन गैस (डीओ) और जैवकीय ऑक्सीजन मांग (बीओडी) शामिल हैं. जल में मल कॉलीफॉर्म स्तर की जांच होना इसकी गुणवत्ता से जुड़ा एक अन्य मानक है. जल पीने अथवा नहाने के लायक है अथवा नहीं, इसे समझने के लिए मल कॉलीफॉर्म का स्तर निर्णायक होता है.

राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता अभियान के कार्य केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के तहत किये जा रहे हैं तथा नदी की सफाई के लिए ‘‘नमामि गंगे’’ कार्यक्रम २०,०००  करोड़ रु. की लागत से संचालित है.

देश में प्रदूषण की निगरानी से जुड़े संगठन-केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उपर्युक्त तीनों मानकों के आधार पर जल की गुणवत्ता का मापन किया तथा आंकड़े जारी किए. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से निर्धारित मापदंड के अनुसार इसमें स्नान करने के लिए, जल की बेहतर गुणवत्ता हेतु इसमें घुली ऑक्सीजन का स्तर ५ एमजी/१ से अधिक और जैवकीय ऑक्सीजन की मांग का  स्तर ३ एमजी/१ से कम होना चाहिए.

किसी नदी के जैवकीय स्वास्थ्य का पता लगाने में मल कॉलीफार्म के स्तर के साथ-साथ जैवकीय ऑक्सीजन की मांग और इसमें घुली ऑक्सीजन के स्तर का मापन अनिवार्य है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े दर्शाते हैं कि पांच राज्यों से होकर बहने वाली गंगा नदी के किनारे स्थित १० महानगरों में इसके जल में घुली ऑक्सीजन गैस का स्तर वर्ष २०१७ में ५ एमजी/१ से अधिक था. ये नगर हैं-ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, पालटा और उलबेरिया. इनमें से अधिकांश नगरों में गंगा जल के नमूने में घुली ऑक्सीजन का स्तर ७.७ एमजी/१ से ८.८ एमजी/१ के बीच पाया गया, जबकि ऋषिकेश में यह १० एमजी/१ के स्तर पर था. काफी समय पहले, वर्ष १९८६ में ऋषिकेश में गंगा जल के नमूने में घुली ऑक्सीजन को ८.१ एमजी/१ के स्तर पर पाया गया था. जल की गुणवत्ता के मूल्यांकन में उसमें घुली ऑक्सीजन का स्तर एक महत्वपूर्ण मानक होता है. इसका स्तर कम होने के साथ ही जल में मछली सहित अन्य जलीय जीवों का जीना कठिन हो जाता है.

जल में जैवकीय ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का स्तर उसमें घुली ऑक्सीजन की वह मात्रा है, जो सूक्ष्म जल जीवों द्वारा जल में मौजूद कार्बनिक पदार्थों को विभक्त करने की प्रक्रिया हेतु आवश्यक है. हालांकि ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर और पटना सहित कई अन्य स्थानों से लिए गए नमूने में इसे मान्य स्तर की तुलना में कम पाया गया है.

गंगा नदी बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने से पहले पांच राज्यों-उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है. गंगा स्वच्छता अभियान का मौजूदा लक्ष्य इस नदी में जल की उस गुणवत्ता को सुनिश्चित करना है, जो इसमें स्नान करने के लिए आवश्यक है. इसमें कोई संशय नहीं कि इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं. केवल कानपुर को छोडक़र, अधिकांश स्थानों से लिए गए जल के नमूने में घुली ऑक्सीजन का स्तर ५ एमजी/१ से अधिक पाया गया.    कानपुर से लिए गए जल के नमूने में  भी इस दिशा में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं. मछलियों की कुछ प्रजातियां अब इसमें फलती-फूलती दिखाई दे रही हैं.

विशेषज्ञों की राय के अनुसार जल की गुणवत्ता में सुधार तो हुए हैं, किंतु उसमें उतार-चढ़ाव जारी है. कचरे की मात्रा में कमी लाना अत्यधिक आवश्यक है. आने वाले समय में और भी अधिक संख्या में मल जल उपचार संयंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, एसटीपी) स्थापित किया जाना चाहिए. इतना ही नहीं, गंगा जल में मल  कॉलीफॉर्म के स्तर में सुधार की भी उतनी ही आवश्यकता है.

गंगा नदी हमारी आजीविका से जुड़ी है. इसके साथ हमारी आस्था भी जुड़ी है. इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग इसमें स्नान करने के लिए आते रहते हैं और शवों का दाह संस्कार करते हैं. इसकी सफाई करना एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा है और पिछले वर्षों में सरकार की ओर से इस दिशा में उठाये गए कदमों के अच्छे परिणाम मिलने  लगे हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने दिसंबर २०१५ से नवंबर २०१७ के दौरान ११०९ प्रदूषणकारी उद्योगों का निरीक्षण किया और कचरा निपटारा हेतु निर्धारित मापदंड का उल्लंघन करने वाले ५०८ उद्योगों को बंद करने के निर्देश दिए. इतना ही नहीं, नवंबर २०१७ तक १४१६७ करोड़ रुपये की लागत से शहरों से निकलने वाले कचरे के प्रबंध के लिए ९३ परियोजनाएं मंजूर की गयी हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि गंगा स्वच्छता के प्रयासों में हमें निश्चित तौर पर सकारात्मक परिणाम मिले हैं. किंतु गंगा जल की गुणवत्ता का मौजूदा स्तर पर्याप्त नहीं है. इन परिणामों से उत्साहित होकर हमें इसकी और भी अधिक स्वच्छता के लिए जोर-शोर से जुट जाना चाहिए, ताकि हम इसकी पवित्रता को स्थापित कर सकें.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)  sudhir20051@gmail.com (लेख में व्यक्त विचार लेखक के  निजी हैं.)