विशेष लेख


Volume-51, 17-29 March, 2018

 

भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व और उसकी पौराणिकता

विष्णु चौहान

व संत ऋतु का आरंभ चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है. फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है.

कालगणना, दिन व दिनांक की शुष्क गणना नहीं है. कालगणना विचार का आधार है. विचार के तीन आयाम हैं-भूत, वर्तमान, भविष्य. काल के बिना इन तीनों आयामों का विभाजन संभव नहीं है. भूत हमारा इतिहास है, वर्तमान इसका परिणाम है - खगोल, भूगोल है तथा भविष्य इसकी दिशा है, गंतव्य, प्राप्तव्य की आकांक्षा है. अर्थात तीनों कालों का बोध कराने वाली गणना को पंचांग कहते हैं.

काल गणना में भारत का योगदान:-

पश्चिम को जब तक भारत ने शून्य का ज्ञान नहीं दिया था तब तक वह गणना करने के योग्य ही नहीं था. भारत सरकार की वैज्ञानिक एवं अनुसंधान परिषद द्वारा नवंबर 1952 में कैलेंडर रिफोर्म कमेटी-पंचांग संशोधन समिति डॉ. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में गठित की गई. इस समिति की आवश्यकता के सम्बन्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने एक पत्र लिखा था. इसका समाचार द हिंदू अखबार में 22 फरवरी 1953 को छपा, जिसमें वर्णित था कि - क्योंकि अब हम स्वतंत्र हैं, हमारे देश के नागरिक, सामाजिक व अन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक समान पंचांग चाहिए और इसका विकास वैज्ञानिक तरीके से होना चाहिए. राजकीय एवं सार्वजनिक कार्यों के लिए हम ग्रेगेरियन कैलेंडर का अनुगमन करते हैं, जो कि विश्व के अधिकतर हिस्सों में प्रयुक्त होता है, किंतु इस कैलेंडर में भी पर्याप्त दोष हैं. इसका केवल विस्तृत उपयोग इसे महत्वपूर्ण नहीं बनाता. इसके दोष इसे वैश्विक उपयोग के लिए अयोग्य बनाते हैं.

भारतीय नव वर्ष का प्राकृतिक एवं  वैज्ञानिक आधार

1- भारतीय नव वर्ष के आगमन का सन्देश प्रकृति का कण - कण देता है. यह दर्शाता है कि पुरातन का संपन्न और नवीन का सृजन प्रकृति का हर एक कोना कह रहा है, वृक्ष, पेड़, पौधे अपनी पुरानी पत्तियों, छालों से मुक्ति पाकर नवीन रूप से पल्लवित होते हैं. यूं तो काल गणना का प्रत्येक पल कोई न कोई महत्व रखता है, किंतु कुछ तिथियों का भारतीय काल गणना (कैलेंडर) में विशेष महत्व है. भारतीय नव वर्ष (विक्रमी संवत) का पहला दिन (यानी वर्ष प्रतिपदा) अपने आप में अनूठा है. इसे नव संवत्सर भी कहते हैं. इस दिन पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा करती है तथा दिन-रात बराबर होते हैं. इसके बाद से ही रात की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है. काली अंधेरी रात के अंधकार को चीर कर चांदनी अपनी छटा बिखेरना शुरू कर देती है. ऋतुओं का राजा होने के कारण वसंत में प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम पर होता है. फाल्गुन के रंग और फूलों की सुगंध से तन-मन प्रफुल्लित रहता है. चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर लगाने को एक माह माना जाता है, जबकि यह 29 दिन का होता है. हर मास को दो भागों में बांटा जाता है. कृष्णपक्ष और शुक्ल पक्ष. कृष्ण पक्ष में चांद घटता है और शुक्लपक्ष में चांद बढ़ता है. दोनों पक्ष प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी आदि ऐसे ही चलते हैं. कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन (यानी अमावस्या को) चंद्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता, जबकि शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन (यानी पूर्णिमा को) चांद पूरे यौवन पर होता है.

2- महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है. युगों में प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ है. कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ अति प्राचीनता जुड़ी हुई है. सृष्टि की रचना को लेकर भी इसी दिवस से गणना की गई है, जिसके संदर्भ में लिखा है-

चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेहनि ।

शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।।

भास्कराचार्य ने इसी दिन को आधार रखते हुए गणना कर पंचांग की रचना की, जो की विभिन्न ग्रहों, चंद्रमा एवं सूर्य की गति एवं दिशाओं का उतना ही प्रमाणिकता के साथ निर्धारण करता है जितना आज का आधुनिक सैटेलाइट.

3- हमारे देश में सभी वित्तीय संस्थानों का नव वर्ष अप्रैल से प्रारम्भ होता है, जिसको आर्थिक वर्ष के नाम से भी संबोधित किया जाता है, यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है. इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं, ठंड की समाप्ति और ग्रीष्म का प्रारंभ अत्यंत ही मधुर व आनंददायक आगमन का अनुभव देता है.

4- इसी समय बर्फ पिघलने लगती है. आमों पर बौर आने लगता है. पेड़ों पर नवीन पत्तियों और कोपलों का आगमन होता है.. पतझड़ समाप्त होता है और बसंत ऋतु के आगमन का आगाज होता है. प्रकृति में हर जगह हरियाली छा जाती है, ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे प्रकृति ने नवश्रृंगार किया है.

5- अंतरिक्ष हमारे लिए एक विशाल प्रयोगशाला है. ग्रह-नक्षत्र-तारों आदि के दर्शन से उनकी गति-स्थिति, उदय-अस्त से हमें अपना पंचांग स्पष्ट आकाश में दिखाई देता है. अमावस-पूनम को हम स्पष्ट समझ जाते हैं. पूर्णचंद्र चित्रा नक्षत्र के निकट हो तो चैत्री पूर्णिमा, विशाखा नक्षत्र के निकट वैशाखी पूर्णिमा, ज्येष्ठा नक्षत्र के निकट से ज्येष्ठ की पूर्णिमा इत्यादि-इत्यादि आकाश को पढ़ते हुए जब हम पूर्ण चंद्रमा को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के निकट देखेंगे तो यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा है. यहां से नवीन वर्ष आरंभ होने को 15 दिवस शेष रह जाते हैं. इन 15 दिनों के पश्चात् जिस दिन पूर्ण चंद्र अस्त हो तो अमावस (चैत्र मास की) स्पष्ट होती है और  अमावस अंत (अमांत) के पश्चात प्रथम सूर्योदय ही हमारे नए वर्ष का उदय है. इस प्रकार हम बिना पंचांग और कैलेंडर के प्रकृति और आकाश को पढक़र नवीन वर्ष को सहज ही प्राप्त कर लेते हंै, ऐसा दिव्य नववर्ष दुर्लभ है.

6- ये भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिक प्रमाणिकता ही है जो किसी के नाम का मोहताज नहीं बल्कि वैज्ञानिक गणनाओं से शुरू होता है जबकि सभी नव वर्ष बिना किसी वैज्ञानिकता के किसी धर्मगुरु या प्रवर्तक के जन्म से प्रारंभ कर दिए गए.

7- स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नवम्बर 1952 में वैज्ञानिकों और औद्योगिक परिषद् के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी . समिति के 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की. किन्तु, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार कर लिया गया. आप ही सोचें क्या जनवरी के माह में ये नवीनता होती है, नहीं तो फिर ये नव वर्ष कैसा.. शायद किसी और देश में जनवरी में बसंत आता हो तो वो जनवरी में नव वर्ष हम क्यूं मनायें??

भारतीय पंचांग महीनों के नाम - चैत्र-वैशाख- ज्येष्ठ- आषाढ- श्रावण- भाद्रपद-अश्विन- कार्तिक- मार्गशीर्ष- पौष- माघ- फाल्गुन.

भारतीय नव वर्ष-अनैक दिव्य विशेषताएं संजोए हुए

1. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है. इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की.

2. विक्रमी संवत का पहला दिन उस राजा के नाम पर प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो. साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो. सम्राट विक्रमादित्य ने 2067 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था.

3. प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस - प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना.

4. नवरात्र स्थापना - शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है. प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन.

5. गुरु अंगददेव प्रगटोत्सव - सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस.

6. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना.

7. संत झूलेलाल जन्म दिवस- सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए.

8. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस - विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना.

9. युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन - 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ.

सप्ताह के वारों का भी है वैज्ञानिक आधार-

आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारंभ होकर क्रमश: बुध, शुक्र, चंद्र, मंगल, गुरू और शनि की है. पृथ्वी के उपग्रह चंद्रमा सहित इन्हीं अन्य छह ग्रहों पर सप्ताह के सात दिनों का नामकरण किया गया. तिथि घटे या बढ़े किंतु सूर्य ग्रहण सदा अमावस्या को होगा और चंद्र ग्रहण सदा पूर्णिमा को होगा, इसमें अंतर नहीं आ सकता.

स्वामी विवेकानन्द का नव वर्ष के विषय में कथन-

भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत् से गहरा नाता है. भरतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है जिसे विक्रम संवत् का नवीन दिवस भी कहा जाता है . स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा. गुलाम बनाए रखने वाले परकीयों की दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्म गौरव खो बैठता है. यह दिन हमारे मन में यह उद्घोष जगाता है कि हम पृथ्वी माता के पुत्र हैं, सूर्य, चन्द्र व नवग्रह हमारे आधार हैं प्राणी मात्र हमारे पारिवारिक सदस्य हैं. तभी हमारी संस्कृति का बोध वाक्य ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ का सार्थक्य सिद्ध होता है. ध्यान रहे कि सामाजिक विशृंखलता की विकृतियों ने भारतीय जीवन में दोष एवं रोग भर दिया, फलतरू कमजोर राष्ट्र के भू भाग पर परकीय, परधर्मीय ने आक्रमण कर हमें गुलाम बना दिया. सदियों पराधीनता की पीड़ाएं झेलनी पड़ी. पराधीनता के कारण जिस मानसिकता का विकास हुआ, इससे हमारे राष्ट्रीय भाव का क्षय हो गया और समाज में व्यक्तिवाद, भय एवं निराशा का संचार होने लगा. जिस समाज में भगवान श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक व अनेक ऋषि-मुनियों का आविर्भाव हुआ. जिस धराधाम पर परशुराम, विश्वामित्र, वाल्मिकी, वशिष्ठ, भीष्म एवं चाणक्य जैसे दिव्य पुरुषों का जन्म हुआ. जहां परम प्रतापी राजा-महाराजा व सम्राटों की शृंखला का गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ उसी समाज पर शक, हुण, डच, तुर्क, मुगल, फ्रांसीसी व अंग्रेजों जैसी आक्रान्ता जातियों का आक्रमण हो गया. यह पुण्यभूमि भारत इन परकीय लुटेरों की शक्ति परीक्षण का समरांगण बन गया और भारतीय समाज के तेजस्वी, ओजस्वी और पराक्रमी कहे जाने वाले शासक आपसी फूट एवं निज स्वार्थवश पराधीन सेना के सेनापति की भांति सब कुछ सहते तथा देखते रहे. जो जीत गये उन्होनें हम पर शासन किया और अपनी संस्कृति, अपना धर्म एवं अपनी परम्परा का विष पिलाकर हमें कमजोर एवं रुग्ण किया. किन्तु इस राष्ट्र की जिजीविषा ने, शास्त्रों में निहित अमृतरस ने इस राष्ट्र को मरने नहीं दिया. भारतीय नवसम्वत के दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं. लोग इस दिन तामसी पदार्थों से दूर रहते हैं, पर विदेशी नववर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, अश्लील-अश्लील कार्यक्रमों का रसपान तथा बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का रिश्ता नहीं है. विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभिमान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है.

मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं. यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा. क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें.

नव वर्ष को हमें गऊ माता के पूजन व हवन पूजा-पाठ, और खुशहाली से मनाना चाहिए. उस दिन हम एक दूसरे की मूर्खता का उपहास करते हैं. हम चाहे जितने भी तथाकथित गुलाम यूरोपियन माडर्न हो जाएँ मगर बच्चे के जन्म से लेकर, घर खरीदना, सामान खरीदना, शादी विवाह, मृत्यु या जीवन के हर अवसर पर भारतीय पंचांग पर आश्रित हैं. जो भारतीय नव वर्ष पर आधारित है चलिए आप सभी को अभी से ही हिन्दू नव वर्ष की ढेरों शुभकामनायें आशा करूँगा की ये नव वर्ष आप सभी के जीवन में अपार हर्ष और खुशहाली ले कर आये..