विशेष लेख


Volume-2-8 June, 2018

 
...अन्यथा किसी दिन हम सभी एक साथ मिट जाएंगे


श्रीप्रकाश शर्मा

जिस हरित क्रांति की १९६० के दशक में शुरूआत हुई थी उसके फलस्वरूप उत्पादन बढऩे से भारतीय अर्थव्यवस्था में अत्यधिक सुधार हुआ, जिसकी अत्यधिक आवश्यकता थी. इसके बल पर हमारे अनाज के गोदामों में अनाज का पर्याप्त भंडार उपलब्ध हो गया, जिसे हमारे देश की लगभग १.३५ अरब जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जाता है. इस क्रांति से केंद्र सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा काम के बदले अनाज कार्यक्रम के तहत अन्य कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ देश में अनाज की कमी को पूरा करने हेतु बफर स्टॉक को अभूतपूर्व स्तर पर कायम रखने में भी मदद मिली.
कृषि मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार, हरित क्रांति के फलस्वरूप अनाज का अभूतपूर्व उत्पादन हुआ. वर्ष १९७८-७९ में देश में 131 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था और वर्ष २०१६-१७ के दौरान यह बढक़र २७६ मिलियन टन हो गया तथा वर्तमान समय में यह २७८ मिलियन टन के अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है. इस अवधि के दौरान प्रति एकड़ पैदावार अविश्वसनीय वृद्धि के साथ 75 से 180 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचा. आंकड़े बताते हैं कि समान अवधि के दौरान गेहूं और चावल की उच्च पैदावार नस्लों (एचवाईवी) और रोग प्रतिरोधक नस्लों के तहत फसल के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई. देशवासियों के लिए, विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों के लिए, खाद्य सुरक्षा तथा जीविका की यथासंभव मजबूती की दिशा में एक अभूतपूर्व उपलब्धि की यह शुरूआत थी.
हरित क्रांति से हमें संयुक्त राज्य अमरीका के पीएल ४८० (द पब्लिक लॉ ४८०) की त्रासदी से उबरने में भी मदद मिली, जिसे ‘‘फूड फॉर पीस प्रोग्राम’’ के रूप में जाना जाता था तथा तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वीट डी. इसेनहॉवर द्वारा 10 जुलाई, १९५४ को अमरीकी संविधान के एक अनुच्छेद पर हस्ताक्षर किया गया था. पी एल ४८० के प्रावधान के अनुसार, हरित क्रांति की अवधि से पहले भारत अमरीका से रियायती दर पर गेहूं आयात करता था. किन्तु हरित क्रांति के सभी लाभ और सुखद परिणाम केवल इस बिन्दु पर ठहर जाते हैं. यह एक ऐसा पक्ष है, जो हमारे समक्ष पर्यावरण और जलवायु का एक ऐसा बदसूरत परिदृश्य उपस्थित करता है, जो हमारे जैसे विकासशील राष्ट्र के अनुकूल नहीं है. हरित क्रांत के दौरान अनाज के उत्पादन में जो निरंतर वृद्धि हुई, उसका एक चुनौतीपूर्ण पहलू भी है.
सामाजिक वैज्ञानिकों और प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों के नवीनतम सर्वेक्षणों और विभिन्न आंकड़ों से अब यह स्थापित होता है कि उन राज्यों के किसानों, जहां हरित क्रांति को अत्यधिक सफलता मिली, को अब समान स्तर के उत्पादन हेतु खेती में कई गुणा अधिक पूंजी तथा अन्य कृषिगत निवेश लगाना पड़ता है जो १९६० के दशक की हरित क्रांति से पहले के वर्षों की तुलना में काफी अधिक हैं.
विश्व के अनेक देशों के वैज्ञानिकों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा अन्य रासायनिकों का अत्यधिक इस्तेमाल होना हरित क्रांति के कारण अनिवार्य हो गया और अब वे मिट्टी की उर्वरता की बात करना शुरू कर चुके हैं. कालांतर में, उन रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल बढऩे से भूमि की लवणता और अनुर्वरता बढ़ी है. इसलिए अब तथा कथित उन्नत नस्ल के जादुई बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों का चमत्कार समाप्त हो गया है तथा  यही कारण है कि वैज्ञानिक हरित क्रांति का एक अन्य संस्करण शुरू किए जाने की जरूरत पर बल देने लगे हैं. किंतु हमारी अनेक उपलब्धियों के बीच विश्व भर में उठते इन मूलभूत प्रश्नों को हम आसानी से भूल जाते हैं.
क्या हमारी धरती जनसंख्या के तेजी से बढ़ते बोझ को सहन कर पाएगी, जो प्रतिवर्ष १.११ प्रतिशत से भी अधिक है तथा इससे हमेशा बढ़ती जरूरतों के बोझ को सहन कर पाएगी? हमारे लिए एक अन्य प्रश्न का शीघ्रतापूर्वक उत्तर देना भी आवश्यक है कि हम मिट्टी की उर्वरता में कमी, मृदा क्षरण, पृथ्वी पर वनाच्छादित क्षेत्रों में तीव्र ह्रास, भूजल के स्तर में निरंतर गिरावट, वायु प्रदूषण, ओजोन की परत हटना, वैश्विक चुनौतियों तथा अन्य विभिन्न समस्याओं जैसी अनेक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने हेतु किस हद तक तैयार हैं?
यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं कि पर्यावरणीय गिरावट से कई प्रतिकूल तथा अवांछित बदलाव हुए हैं तथा इनके कुप्रभावों से धरती के प्राकृतिक संसाधनों तथा जीवन अत्यधिक प्रभावित हुए हैं. अनियमित मानसूनी बारिश और वनों की कटाई के कारण अब विश्व भर में सूखे की स्थिति एक अत्यधिक सामान्य प्राकृतिक लक्षण बन गई है. विश्व भर में अधिकांश भिन्न माने जाने वाले नगरों और शहरों में विशेषकर अनुमान से परे समय में बाढ़ का खतरा मंडराता रहता है. जलवायु परिवर्तन की अनियमितता से स्थिति में तेजी से बदलाव हुआ है तथा इसके परिणामस्वरूप वैश्विक जनसंख्या एक ऐसे सामाजिक-आर्थिक संकट का सामना कर रही है, जो पहले कभी नहीं था.
पूरे विश्व के सामने जल संकट उपस्थित है, जो विश्व में पर्यावरण संबंधी संतुलन की दिशा में अवरोध साबित हो रहा है. इस तथ्य से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि जल एक ऐसा महत्वपूर्ण घटक है जो पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों के अस्तित्व के लिए एकदम अनिवार्य है. किंतु, दुर्भाग्यवश, विश्व की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण जल की उपलब्धता आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा संकट बन गया है, जो वायु के बाद मानव की दूसरी सबसे मूलभूत जरूरत है. विश्व की जनसंख्या में पिछले सात दशकों में दोगुणे से भी अधिक वृद्धि हुई है. कुएं, तालाबों तथा नलकूपों में जल का स्तर प्रत्येक वर्ष नीचे जा रहा है तथा इसके कारण अनेक देशों में लोगों के सामने असहय परेशानी उत्पन्न हो रही है.
पृथ्वी का 71 प्रतिशत सतह जल से ढक़ा है, जो पृथ्वी के क्षेत्रफल की तुलना में दो-तिहाई से अधिक है, किन्तु पूरे विश्व में उपलब्ध जल का केवल 3 प्रतिशत हिस्सा ही स्वच्छ पेयजल है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न दैनिक प्रयोगों के लिए विश्व भर में लोग कर सकते हैं. यह इस कारण है कि विश्व के ९६.५ प्रतिशत जल में महासागरीय जल शामिल है. चिंताजनक तथ्य यह खुलासा करता है कि स्वच्छ जल के कुल 3 प्रतिशत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हिमनदों में फंस कर रह गया है. इस कारण विश्व भर में सभी नियमित मानवीय क्रियाकलापों के लिए 1 प्रतिशत से भी कम जल की उपलब्धता रह गई है तथा इस बात को ध्यान में रखते हुए हम विश्व भर में जल संकट की गंभीरता का आसानी से आकलन कर सकते हैं.
इसके अलावा, पर्यावरण के प्रदूषण से पारिस्थितिकीय संतुलन तथा मानव जाति के प्राकृतिक आवास स्थलों के सामने खतरा उत्पन्न हुआ है. वायु प्रदूषण मानवता के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट में बताया गया है कि नौ मौतों में से कम-से-कम एक मौत का कारण वायुमंडल में कार्सिनोजेन तथा अन्य विषैले पदार्थों की मौजूदगी है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वायु प्रदूषण के कारण प्रत्येक वर्ष विश्व भर में ३.५ मिलियन से भी अधिक लोगों की मौत हो जाती है. इसमें से आधे लोगों की मौत गहरे धुंध के कारण केवल चीन में होती है.
वायु प्रदूषण कई अन्य नगरों और शहरों को बड़े पैमाने पर और तेजी से जकड़ता जा रहा है. विशेषकर औद्योगीकरण तथा आधुनिकीकरण के सुधार से पूर्व के समय वाले नगर इनमें शामिल हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वायु प्रदूषण पर नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार एक अत्यंत खतरनाक खुलासा सामने आया है. रिपोर्ट का कहना है कि विश्व भर में 20 सबसे प्रदूषित नगर हैं, जो पीएम २.५ के खतरनाक स्तर वाले नगरों में शामिल होने के कारण मौत के फंडें की तरह है. यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विश्व भर में सबसे प्रदूषित इन 20 नगरों में से केवल भारत में 14 सबसे प्रदूषित नगर हैं. रिपोर्ट में हमारे लिए एक और खतरा बताया गया है- चीन की तुलना में भारत में प्रदूषित नगरों की संख्या अधिक है.
जल की उपलब्धता वाले क्षेत्रों को सामान्य रूप से पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता तथा प्राकृतिक संसाधनों व जीव-जंतुओं की विविधता का आधार माना जाता है, जो काफी तेजी से घटते जा रहे हैं. संभावित तौर पर विश्व के इन समृद्ध क्षेत्रों का विनाश होना, चिंता का एक विषय है, क्योंकि इन स्थानों पर विश्व भर के लिए चावल का उत्पादन किया जाता है. जल की उपलब्धता वाले क्षेत्रों का आकलन इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आसानी से किया जा सकता है कि यह तूफानों, सूखे की स्थिति, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों के लिए बचाव के रूप में काम        करता है.
क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर वनाच्छादित क्षेत्रों का ह्रास प्रतिवर्ष लगभग 13 मिलियन हेक्टेयर की तीव्र दर पर हो रहा है, जो प्रतिदिन 200 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्रों के नुकसान के बराबर है? वन के 40 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के साथ, जो पृथ्वी के क्षेत्रफल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत है, हमारे पास केवल ०.६२ हेक्टेयर वन क्षेत्र पर कैपिटा उपलब्ध है, जो देशों के अस्तित्व के लिए अपर्याप्त है.
जोखिम में पड़े जैविक संसाधनों और वनस्पतियों में अपने स्तर से निरंतर गिरावट जारी है, जो चिंता का विषय  है. अमरीकी काला भालू की प्रजाति के साथ-साथ 22000 अन्य प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं. औसतन प्रत्येक दिन विश्व भर में 70 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं. वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा क्षरण, वन क्षेत्रों का ह्रास, खाद्य पदार्थों में विषैलापन तथा अनेक पारिस्थितिकीय समस्याएं अत्यधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं. जो पृथ्वी पर मानव जाति और अन्य जीव-जंतुओं को निगलने के लिए तैयार हैं. गंभीर मृदा क्षरण के कारण प्रत्येक वर्ष विश्व भर में कृषि उत्पादन का स्तर गिरता जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, प्रत्येक वर्ष लगभग 12 मिलियन हेक्टेयर कृषियोग्य भूमि की गुणवत्ता नष्ट हो रही है, जो पृथ्वी पर मानव जीवन के अस्तित्व के लिए एक चुनौती है.
वैश्विक तपन पर्यावरण संबंधी एक अन्य मुद्दा है, जो एक अन्य सबसे बड़े खतरे के रूप में विश्व के सामने है. एक अनुमान के अनुसार, उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध  से लेकर वैश्विक तापमान में ०.८०0 ष्. से अधिक वृद्धि हुई है तथा इसके परिणामस्वरूप विश्व भर में बारिश, सूखे की स्थिति तथा बर्फबारी की प्रणाली के प्रतिकूल लक्षण दिखाई पड़ते हैं. यदि हम शीघ्र ही पर्यावरण की स्थिति में तीव्र गिरावट की दर को रोकने में विफल रहेंगे,  तो अनुमान है कि वर्ष २१०० ईस्वी सन् तक औसत वैश्विक तापमान में 30 से ६0 तक वृद्धि होने की संभावना है. ओजोन परत का तेजी से क्षरण होना, वैश्विक तपन का मुख्य कारण है. यह एक ऐसा लक्षण है, जिसके प्रति हमें सतर्क रहना होगा.
देश में वायु प्रदूषण संबंधी मौतों की संख्या में भी वृद्धि होती रही है. ‘‘द ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजिजेज’’ का कहना है कि प्रत्येक वर्ष लगभग ६,५०,००० समय-पूर्व प्रसव से मौतों का पांचवा अग्रणी कारण वायु प्रदूषण है. विश्व के अधिकांश देशों में प्रदूषित वायु सांस लेने के कारण समय-पूर्व प्रसव से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण श्वसन और हृदय रोग हैं. जैव इंधन की कमी होना एक अन्य खतरनाक संकेत है तथा इसकी ओर शीघ्र ध्यान देना आवश्यक है.
पर्यावरण संबंधी संकट वास्तव में चेतना संबंधी संकट है. यह एक जागरूकता संबंधी संकट भी है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संकट उन समस्याओं तथा चुनौतियों को देख पाने में हमारी असमर्थता से जुड़ा है, जो हमारे दरवाजे पर लगातार दस्तक दे रही हैं. वर्ष २०५० तक, विश्व की जनसंख्या बढक़र लगभग 9 बिलियन हो जाएगी और उस समय तक मानव जाति समय-पूर्व प्रसव से होने वाली मौतों के सबसे बड़े कारण का सामना कर रही होगी तथा एक सर्वेक्षण के अनुसार विभिन्न अनिवार्य सुविधाओं की कमी तथा पर्यावरण संकट के कारण प्रत्येक वर्ष लगभग ३.६ लाख लोगों की मौत होगी. उस समय तक जल की मांग बढक़र ५० प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है तथा विश्व की जनसंख्या में अतिरिक्त ४० प्रतिशत वृद्धि होने के कारण उसे जीवन के लिए अनिवार्य- जल की सुविधा के बिना जीवनयापन करने को मजबूर होना पड़ेगा.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार कहा था, ‘‘पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत के लिए पर्याप्त सामग्री है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति के लालच के लिए पर्याप्त नहीं है.’’ गांधीजी के कथन की अंतदृष्टि गंभीर आत्म-निरीक्षण हेतु हमारा आह्वान करती है. इसे कायम रखते हुए हम पर्यावरण को टिकाऊ बनाने की बड़ी चुनौती का सामना कर सकते हैं, जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है.
पहली बात यह है कि हमें प्राकृतिक संसाधनों के गैर अक्षय स्रातों की बर्बादी के प्रति लोगों को जागरूक करना होगा. वायु से हम सांस लेते हैं और जो पृथ्वी पर सभी जीवों के अस्तित्व के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटक है, इसके प्रति सबसे गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की जरूरत है. वायु प्रदूषण सबसे बड़ी चिंता का विषय है, जिसकी ओर शीघ्र ही ध्यान देना आवश्यक है. धुंध एक नवीनतम चुनौती है तथा इस स्थिति में सुधार के लिए शीघ्र कदम उठाना जरूरी है. तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण  और कारखाने की चिमनियों से उत्सर्जित कार्बन गैसों पर समयबद्ध नियंत्रण की आवश्यकता है, ताकि वायु अपेक्षाकृत शुद्ध हो, जिसे सांस में ग्रहण किया जा सके. इससे वैश्विक तपन में कमी लाने में भी मदद मिलेगी. यह एक ऐसा खतरा है, जो विश्व में जलवायु की स्थिति को बुरी तरह प्रभावित करता है.
ऊर्जा को राष्ट्र के विकास का इंजन माना जाता है. जैव-ईंधन ही ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण रूप ही नहीं, बल्कि विरासत का एक संसाधन भी है. हम उनका इस्तेमाल कम करें और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उनकी बर्बादी न करें.
कृषि-योग्य भूमि में कमी हो रही है तथा इसमें कोई संदेह नहीं कि इसकी गुणवत्ता में भी अत्यधिक गिरावट हो रही है. जैविक खेती अपनाने तथा १९६० के दशक के दौरान शुरू किए गए विभिन्न रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल द्वारा खेती के विकल्प के रूप में प्रचारित करने से मिट्टी की उर्वरता में तेजी से गिरावट पर रोक लगेगी तथा उसकी गुणवत्ता बढ़ेगी. विश्व की बढ़ती जनसंख्या तथा खाद्यानों की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए इसकी ओर ध्यान रखना सबसे आवश्यक है.
इसमें संदेह नहीं कि समस्या के वैश्विक होने के बावजूद हमारी सोच में, हमारी दृष्टि में और सबसे महत्वपूर्ण हमारी आत्म-खोज में इसका समाधान निहित है. अपनी जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के प्रति जागरूक होने की जरूरत है. सामान्य रूप से हम अपने ग्रह की रक्षा करने के लिए और पर्यावरण की रक्षा करने के लिए नैतिक तौर पर बाध्य हैं, यदि विश्व को फूलते-फलते तथा जीवित और सुरक्षित देखना चाहते हैं.
दक्षिण कोरिया के प्रसिद्ध राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र संगठन के पूर्व महसचिव बान की-मून ने अपने निम्नलिखित शब्दों में विश्व को एक परिदृश्य तथा पर्यावरण स्वास्थ्य का महत्व दर्शाया, ‘‘अपने ग्रह की रक्षा करना, जनता को गरीबी से निजात दिलाना, आर्थिक विकास की ओर बढऩा... ये सब एक तथा समान लड़ाई हैं. हमें निश्चित तौर पर जलवायु परिवर्तन, जल की कमी, ऊर्जा की कमी, वैश्विक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण को आपस में जोडक़र देखना चाहिए. एक समस्या का समाधान, सभी के लिए समाधान होना चाहिए.’’
प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र क्षरण से पृथ्वी पर जैव तथा वनस्पति के जीवन पर अत्यधिक खतरा उत्पन्न होता है. विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का जिस तेजी से दोहन किया जा रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए हम यह पाते हैं कि पूरा विश्व इस बात से भयभीत है कि वह दिन दूर नहीं जब अगली पीढिय़ों को  उन प्राकृतिक संसाधनों को देखने के लिए अपने निकटतम चिडिय़ाखाना जाना पड़ेगा, जिन प्राकृतिक संसाधनों को उनके पूर्वजों ने गंवा दिया, जो उनके आसपास थे.
प्रसिद्ध अमरीकी पर्यावरण विश्लेषक लेस्टर आर. ब्राऊन ने एक बार कहा था, ‘‘हमने इस पृथ्वी को अपने  पूर्वजों से नहीं पाया है; हमने इसे अपने बच्चों से कर्ज लिया है.’’ इस पक्ति में यह बात छिपी हुई है, जो हमें गंभीरतापूर्वक यह सोचने पर मजबूर करती है कि मानवजाति का जीवनकाल बढ़ाने तथा पृथ्वी पर जैव विविधता कायम रखने के लिए हम पर्यावरण की रक्षा पर जोर दें.
यह काम करने का समय है, गंभीरतापूर्वक योजना तैयार करें, वह भी शीघ्रतापूर्वक, अन्यथा हम यह सोचने के लिए तथा जो हम खो चुके तथा क्यों इस बात के लिए हम कल जीवित नहीं रहेंगे. इसलिए, अब समय आ गया है कि हम पर्यावरण की क्षति को नियंत्रित करने और हमारी पारिस्थितिकी के नुकसान पर नियंत्रण पाने के काम को प्राथमिकता दें, ताकि हम भविष्य की पीढिय़ों के लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित कर पाएं, अन्यथा आगामी वर्षों में हमारे पास ऐसा कोई विकल्प नहीं बचेगा और हम सभी किसी दिन एक साथ मिट जाएंगे.
लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय, दिनथार वेंग मामिट,
पीओ-मामिट जिला-मामिट (मिजोरम) ७९६४४१ के प्रधानाचार्य हैं. ई-मेल: spsharma.rishu@gmail.com