विशेष लेख


Volume-10, 9-15 June, 2018

 
हरित क्रांति कृषोन्नति योजना से खुलेंगे किसानों की खुशहाली के दरवाज़े


पार्थिव कुमार

केन्द्रीय सरकार ने हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना को मौजूदा और अगले वित्त वर्ष में भी जारी रखने का फैसला किया है. उसका यह कदम गांवों में खुशहाली लाने की उसकी मुहिम में काफी मददगार साबित होगा. कृषि के विकास से जुड़ी 11 योजनाओं और मिशनों को अपने दायरे में समेटे इस योजना में किसानों की आमदनी बढ़ाने के विभिन्न प्रयासों को एक संगठित स्वरूप दिया गया है. इस योजना के तहत किये जा रहे विभिन्न उपायों से कृषि की लागत घटाने में काफी मदद मिलेगी जिससे किसानों के लाभ में इजाफा होगा. इसमें सिर्फ खेती का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने तथा लागत घटाने की योजनाएं ही शामिल नहीं हैं. कीटों और रोगों की रोकथाम के जरिये फसलों की बरबादी रोकने, खेती पर आधारित अन्य रोजगारों के माध्यम से किसानों की आमदनी बढ़ाने तथा कृषि बाजार और सहकारी समितियों को मजबूत करने से संबंधित विभिन्न योजनाओं को भी इसमें शामिल किया गया है.
किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प को पूरा करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है. इस मुकाम को पुराने और फौरी तौरतरीकों के जरिये हासिल नहीं किया जा सकता. इसके लिये एक समग्र और वैज्ञानिक नजरिया अपनाये जाने की जरूरत है. हरित क्रांति कृषोन्नति योजना अपनी व्यापकता और बहुआयामी विस्तार की बदौलत इस आवश्यकता को बखूबी पूरा करती है.
आजादी मिलने के 70 साल से ज्यादा समय बाद भी भारत गांवों का ही देश है. देश की एक अरब 30 करोड़ से अधिक आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा गांवों में रहता है. भारत के कुल कामगारों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा खेती से जुड़े हुए हैं. इसलिये यह कहना गलत नहीं होगा कि देश की तरक्की का रास्ता गांवों से ही होकर गुजरता है. किसान खुशहाल होंगे तभी देश में खुशहाली आयेगी. मगर वास्तविकता यह है कि कृषि उत्पादन में संतोषजनक इजाफे के बावजूद किसानों की हालत में कोई खास सुधार नहीं आया है. बड़ी संख्या में किसानों की आय अनिश्चित है और वे कर्ज के भार से दबे हुए निराशा की जिंदगी बसर कर रहे हैं. प्रधानमंत्री तक ने उनकी हालत का जिक्र करते हुए कहा है, ‘‘देश को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने वालों की खुद की आमदनी ही असुरक्षित है.’’ 
केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के बजट में कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उनकी उत्पादन लागत से डेढ़ गुना करने का ऐलान किया है. लेकिन यह मानना गलत होगा कि सिर्फ  एमएसपी बढ़ा देने से ही किसानों की परेशानियों का अंत हो जायेगा. प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान किसानों की आमदनी दोगुनी करने के बारे में एक रोडमैप पेश किया. इसमें एमएसपी में इजाफे के अलावा कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना, फसल की बरबादी रोकना और उसकी लागत घटाना तथा किसानों को परिवहन और विपणन की बेहतर सुविधाएं एवं आमदनी के अतिरिक्त साधन मुहैया कराना शामिल है. इनमें से हरेक मकसद को हासिल करने के लिये सरकार के पास अनेक योजनाएं और कार्यक्रम हैं. मगर इन योजनाओं और कार्यक्रमों को आपस में जोडऩे वाली एक व्यापक योजना की जरूरत अरसे से महसूस की जा रही थी ताकि इनमें तालमेल के जरिये अधिकतम नतीजे हासिल किये जा सकें.
केन्द्र सरकार ने 2017-18 में कृषि क्षेत्र से संबंधित 11 योजनाओं और मिशनों को जोड़ते हुए हरित क्रांति कृषोन्नति योजना शुरू करने का फैसला किया. इस व्यापक योजना के शुरुआती सकारात्मक नतीजों को देखते हुए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मई में आयोजित केन्द्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में इसे 33269.976 करोड़ रुपये के खर्च से अगले दो वित्त वर्षों 2018-19 और 2019-20 में भी जारी रखने का फैसला किया गया.
किसानों की आय बढ़ाने के उपायों के बारे में प्रधानमंत्री के नजरिये को प्रतिबिंबित करने वाली हरित क्रांति कृषोन्नति योजना का उद्देश्य समग्र और वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाकर तथा उत्पादों पर बेहतर लाभ सुनिश्चित करके किसानों की आय बढ़ाना है. इस वृहत योजना में शामिल योजनाएं और मिशन हैं-
1. बागवानी के समेकित विकास के लिए मिशन (एमआईडीएच): 7533.04 करोड़ रुपये के केन्द्रीय व्यय से चलाये जा रहे एमआईडीएच का उद्देश्य बागवानी के समग्र विकास को बढ़ावा देना है. इस मिशन से बागवानी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही पोषण सुरक्षा की स्थिति और किसान परिवारों की आमदनी में सुधार किया जा सकेगा.
2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम): इस मिशन का मकसद देश के चिह्नित जिलों में उत्पादन क्षेत्र के विस्तार और उत्पादकता में इजाफे के जरिये चावल, गेहूं, दालों, मोटे अनाजों और वाणिज्यिक फसलों की उपज बढ़ाना है. इस पर होने वाले खर्च में केन्द्र का हिस्सा 6893.38 करोड़ रुपये है. इसमें राष्ट्रीय तिलहन और तेल पाम मिशन (एनएमओओपी) को भी शामिल कर लिया गया है. इसके जरिये खाने के तेलों की उपलब्धता मजबूत करने और इनका आयात घटाने के प्रयास किये जा रहे हैं.
3. संवहनीय कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसए): 3980.82 करोड़ रुपये की कुल केंद्रीय हिस्सेदारी से चलाये जा रहे इस मिशन का लक्ष्य किसी खास कृषि पर्यावरण में सबसे ज्यादा अनुकूल संवहनीय खेती प्रणाली को बढ़ावा देना है. इसमें इस मुकाम को हासिल करने के लिये समेकित कृषि, समुचित मिट्टी स्वास्थ्य प्रबंधन और संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकी के मेलजोल को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
4. कृषि विस्तार पर उप-मिशन (एसएमएई): इसका उद्देश्य राज्य  सरकारों और स्थानीय निकायों की विस्तार व्यवस्था को मजबूत बनाना, खाद्य और पोषण सुरक्षा हासिल करना तथा किसानों का सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण है. इस उप-मिशन पर केन्द्र सरकार कुल 2961.26 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.
5. बीज तथा पौध रोपण सामग्री पर उप-मिशन (एसएमएसपी): इस उप-मिशन में केंद्रीय हिस्सेदारी 920.6 करोड़ रुपये की है. इसके माध्यम से प्रमाणित और अच्छी किस्मों के बीजों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि से बचे बीजों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने तथा बीज प्रजनन शृंखला को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है. इस उप-मिशन में बीज उत्पादन, प्रसंस्करण और परीक्षण में नयी प्रौद्योगिकी और तौरतरीकों को प्रोत्साहित करना शामिल है. इसके तहत बीज उत्पादन, भंडारण, प्रमाणन और गुणवत्ता निर्धारण की ढांचागत व्यवस्था को दुरुस्त और आधुनिक बनाया जा रहा है. 
6. कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन (एसएमएएम): कुल 3250 करोड़ रुपये की केंद्रीय हिस्सेदारी से चलाये जा रहे इस उप-मिशन के तहत छोटे और सीमांत किसानों तक कृषि मशीनीकरण की पहुंच बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. सरकार ऐसे केन्द्रों की स्थापना कर रही है जिनसे कम जमीन और सीमित संसाधनों वाले किसान खेती में काम आने वाली मशीनों को किराये पर हासिल कर सकेंगे. इस उप-मिशन के उद्देश्यों में इन मशीनों के प्रदर्शन के जरिये किसानों में इनके बारे में जागरूकता बढ़ाना भी शामिल है.
7. पौध संरक्षण और पौधों के संगरोधन पर उप-मिशन (एसएमपीपीक्यू): एसएमपीपीक्यू में कुल केंद्रीय हिस्सेदारी 1022.67 करोड़ रुपये की है. इस उप-मिशन का मकसद कीटों, रोगों, खरपतवारों, सूतकृमियों और चूहों से फसलों तथा उनकी गुणवत्ता को होने वाले नुकसान को कम करना है. इसके तहत पौधा संरक्षण रणनीतियों के संबंध में श्रेष्ठ कृषि व्यवहारों को प्रोत्साहन देने जैसे कदम उठाये जा रहे हैं.
8. कृषि गणना, अर्थशास्त्र तथा सांख्यिकी पर एकीकृत योजना (आईएसएसीईएस): इस योजना का उद्देश्य कृषि गणना करना, प्रमुख फसलों की उपज लागत का अध्ययन, खेती से जुड़ी आर्थिक समस्याओं पर शोध, कृषि सांख्यिकी के तौर-तरीकों में सुधार लाना और फसल को बोने से लेकर काटे जाने तक की स्थिति के बारे में अनुक्रमिक सूचना प्रणाली बनाना है.
9. कृषि सहकारिता पर एकीकृत योजना (आईएसएसी): 1902.63 करोड़ रुपये के केंद्रीय व्यय से चलायी जा रही इस योजना का उद्देश्य सहकारी समितियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना, क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना तथा कृषि विपणन, प्रसंस्करण, भंडारण, कंप्यूटरीकरण और कमजोर वर्गों के लिए कार्यक्रमों में सहकारी विकास में तेजी लाना है.
10. कृषि विपणन पर एकीकृत योजना (आईएसएएम): इस योजना में कुल केंद्रीय हिस्सेदारी 3863.93 करोड़ रुपये की है. इसका मकसद कृषि विपणन संरचना का विकास तथा इसमें नवाचार, आधुनिक प्रौद्योगिकी और प्रतिस्पर्धी विकल्पों को प्रोत्साहित करना है. आईएसएएम में कृषि उत्पादों के वर्गीकरण, मानकीकरण और गुणवत्ता प्रमाणीकरण के लिए ढांचागत सुविधा विकसित करना, राष्ट्रव्यापी विपणन सूचना नेटवर्क की स्थापना तथा कृषि सामग्रियों के अखिल भारतीय व्यापार के लिए साझा ऑनलाइन बाजार प्लेटफॉर्म के जरिए बाजारों का एकीकरण भी शामिल है.
सरकार ने 22 हजार ग्रामीण हाटों में ढांचागत सुविधाओं को बेहतर बना कर किसानों को बाजारों से जोडऩे के लिये सामूहिक कृषि विपणन परियोजना शुरू की है. इसके तहत कृषि उत्पाद विपणन समितियों की मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से जोड़ कर खेती के उत्पादों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय क्रय-विक्रय केन्द्र बनाया जा रहा है.
11. राष्ट्रीय ई-शासन योजना (एनईजीपी-ए):  केंद्र की 211.06 करोड़ रुपये की कुल हिस्सेदारी से चलायी जा रही है एनईजीपी-ए का उद्देश्य विभिन्न कार्यक्रमों को किसान केन्द्रित और सेवा उन्मुख बनाना है. इसके तहत विस्तार सेवाओं का प्रसार और प्रभाव बढ़ाने, समूचे फसल चक्र में सूचनाओं और सेवाओं तक किसानों की पहुंच में सुधार करने, केंद्र और राज्यों की वर्तमान सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) पहलकदमियों को बढ़ावा देने तथा किसानों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्हें समय पर जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराके कार्यक्रमों की क्षमता और प्रभाव में वृद्धि के प्रयास किये जा रहे हैं.
हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना के तहत किये जा रहे विभिन्न उपायों से कृषि की लागत घटाने में काफी मदद मिलेगी जिससे किसानों के लाभ में इजाफा होगा. इसके अलावा सरकार कृषकों को सस्ती दर पर और पर्याप्त मात्रा में पानी, बिजली, बीज, कीटनाशक, कृषि ऋण और खेती में काम आने वाले औजार मुहैया कराने पर ध्यान दे रही है. उसने 99 सिंचाई परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिये 80000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान किया है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू किये जाने और यूरिया की क्वालिटी में सुधार से रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में 10 प्रतिशत तक कमी आने के अलावा उत्पादन में पांच से छह फीसदी का इजाफा हुआ है. इस योजना में किसानों को बताया जाता है कि उन्हें अपने खेत की मिट्टी की प्रकृति के हिसाब से किस फसल के लिये कौन सा और कितना उर्वरक इस्तेमाल करना है. किसानों की आर्थिक मदद के लिये सरकार ने कृषि ऋण की कुल रकम को तीन साल में आठ लाख करोड़ रुपये से बढ़ाते हुए 11 लाख करोड़ रुपये कर दिया है.
किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित तथा अन्य कुटीर, सूक्ष्म और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना वक्त की जरूरत है. हरित क्रांति कृषोन्नति योजना के तहत एमआईडीएच, आईएसएसी और आईएसएएम इस काम में बेहद सहायक साबित हो रहे हैं. सरकार  बागवानी, पशु पालन, मुर्गी पालन, रेशम पालन, खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा और हस्तशिल्प जैसे ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये इनके अलावा भी कई योजनाएं चला रही है जिनमें से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), पारंपरिक उद्योग पुनर्जीवन कोष योजना (स्फूर्ति) तथा नवाचार, ग्रामीण उद्योग और उद्यमिता प्रोत्साहन योजना (एस्पायर) खास तौर से जिक्र के लायक हैं.
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की लगातार अनदेखी की वजह से गांवों में रोजगार के मौकों में इजाफे की रफ्तार कम रही है. इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण युवाओं के शहरों की ओर पलायन में इजाफा हुआ है. इसके कारण शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है. शहरों में लगातार बढ़ती जनसंख्या के लिये बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम एक बेहद पेचीदा मसला बन गया है. हमें समझना होगा कि गांव सिर्फ शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिये नहीं हैं.
उनकी अपनी चिंताएं और आवश्यकताएं हैं. देश को स्मार्ट शहरों के अलावा आदर्श
ग्रामों की भी जरूरत है. किसानों को उपज
की लाभकारी कीमत दिलाने के अलावा उनकी आमदनी बढ़ाने के पर्याप्त वैकल्पिक अवसर मुहैया कराये जायें तो ग्रामीण
क्षेत्रों में निस्संदेह संपन्नता आयेगी. बिजली, पानी, सडक़, स्कूल, अस्पताल और
बाजार जैसी सुविधाओं के विस्तार से
गांवों की आत्मनिर्भरता में इजाफा होगा.
इन मंजिलों तक पहुंचने में हरित क्रांति कृषोन्नति योजना जैसी योजनाएं बड़ा किरदार अदा कर सकती हैं. 
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.
ईमेल: kr.parthiv@gmail.com