विशेष लेख


Volume-11, 16-22 June, 2018

 

विश्व पटल पर योग का बढ़ता वर्चस्व

डॉ. यतींद्र कुमार कटारिया विद्यालंकार

भारत ने विश्व को आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा वैज्ञानिक क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है. शून्य की तरह विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन योग को माना जा रहा है. दरअसल योग एक विचार ही नहीं बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति है, जिसमें भारतीय जीवन मूल्य यानी संस्कृति समाहित है. शून्य के आधार पर आधुनिक विज्ञान स्थापित हुआ, उसी तरह आधुनिक जीवन का आधार बनता जा रहा है योग.
योग शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक एवं जीवनीय ऊर्जा का संवाहक है. योग जीवन शैली बदलकर यहां तक कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है. याद रहे कि जलवायु परिवर्तन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों में जो गुस्सा देखा जा रहा है और विश्व भर में तेजी से जो आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, उसका एक कारण बदलती जलवायु व अनियंत्रित जीवन शैली है. दुनिया ने इसे समझा और इसके समाधान के लिए उचित साधन के रूप में योग को स्वीकार किया है. योग में मानवता को एकजुट करने की अद्भुत शक्ति है, क्योंकि योग में ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय एवं समागम निहित है. योग का शब्दिक अर्थ है जोडऩा. चाहे किसी भी देश, जाति, धर्म-संप्रदाय के व्यक्ति हों, योग सभी में सुस्वास्थ्य एवं सकारात्मक सोच विकसित करता है.  योग व्यक्ति निर्माण से विश्व निर्माण का द्योतक है तथा मानव चेतना का विज्ञान है.
नि:संदेह तनाव, अवसाद, अशांति व तृष्णाओं से मुक्ति एवं शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य तथा आत्म परिष्कार के लिए योग हर व्यक्ति के लिए सबल साधन के रूप में आत्मसात किया जा रहा है. कभी केवल संतों एवं ग्रंथों तक सीमित रहने वाला योग अपनी वैश्विक महत्ता से दिन प्रतिदिन अत्यंत लोकप्रिय होता जा रहा है. २१ जून को मनाया जाने वाला विश्व योग दिवस योग प्रेमियों के लिए वैश्विक पर्व का रूप धारण कर चुका है. योग को विज्ञान के रूप में, सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना के रूप में तथा वैश्विक सद्भावना व सुस्वास्थ्य के रूप में निरंतर आत्मसात करने की वृद्धि हो रही है. योग के बढ़ते प्रभाव एवं उसकी उपयोगिता से प्रतिदिन दुनिया भर में करोड़ों लोग लाभांवित हो रहे हैं, लेकिन यहां यह भी विचारणीय है कि योग जो कि शाश्वत मानव कल्याण निधि है, कहीं यह व्यावसायिक विषय ना बन जाए. इसलिए आवश्यक है कि योग की मौलिकता एवं योग के उद्देश्य का ध्यान रखना भी अपेक्षित है. महर्षि पंतजलि के योग दर्शन में वर्णित योग के विशद स्वरूप अष्टांग योग के बारे में जानना भी आवश्यक है. पंतजलि ने योग की संपूर्णता को आठ भागों यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के रूप में परिभाषित किया है. योग में प्रथम सोपान यम के अंतर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य का विधान है जबकि दूसरे सोपान नियम के अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान आते हैं. कदाचित यह भी विडंबनापूर्ण बात है कि योग के नाम पर चल रही तमाम दुकानों व योग गुरुओं के नाम पर गुरुडम कर रहे योग व्यवसायियों ने योग का बाजारीकरण करने को योग को केवल आसन एवं प्राणायाम तक सीमित कर इसे लघुपाश में बद्ध करने का प्रयास किया है. इसमें न सिर्फ योग की मौलिकता खंडित हो रही है बल्कि यम नियम के बगैर तो योग का उद्देश्य भी पूर्ण नहीं हो सकता है. हालांकि आसन, प्राणायाम से शरीर व मन की शुद्धि व स्वास्थ्य की वृद्धि की जा सकती है पर योग की संपूर्णता अष्टांग योग में ही है.
 
समत्वं योग उच्यते अर्थात ऊंच-नीच, मेरा-पराया, हानि-लाभ तथा यश-अपयश से ऊपर उठकर समत्व भाव से बड़े ह्दय के साथ जीना ही योग है.
 
आज योग निराश और हताश मानवता को उत्साह, आनंद व ऊर्जा प्रदान कर एक आशा की परिणीति के रूप में अंगीकार किया जा रहा है और यही कारण है कि २१वीं सदी योग सदी का पर्याय बन रही है. योग स्वास्थ्य एवं चिकित्सा का प्रतीक होने के साथ-साथ सामाजिक संबंधों में मजबूती, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना, प्रकृति के प्रति प्रेम तथा विश्वबंधुत्व का संवाहक भी है, इसी के चलते तेजी से न सिर्फ भारत अपितु पाश्चात्य जगत और यहां तक की बड़ी संख्या में इस्लामिक देश योग की महत्ता को स्वीकार कर इसे आत्मसात कर रहे हैं.
योग धर्म एवं संप्रदायों की वर्जनाओं तथा संकीर्ण विद्रूपताओं की सीमाओं से परे की विषय वस्तु है जो इन सीमाओं व अवरोधों को लांघकर विश्व के कोने-कोने में स्वास्थ्य, सद्भाव , शांति व मैत्री का संचार कर भारतीय संस्कृति का उद्घोष कर रहा है. योग के जरिए किस प्रकार भारत की सभ्यता व संस्कृति का प्रसार दुनिया के हर कोने में हो रहा है, यह इस आंकड़े को देखकर पता लगता है. भारत ने जब योग को विश्व दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ में रखा तो योग को स्वीकार करने वाले देशों में उत्तरी अमेरिका के २३, दक्षिण अमेरिका के ११, यूरोप के ४२, एशिया के ४०, अफ्रीका के ४६ एवं अन्य १२ देश शामिल थे. गौर करने वाली बात तो यह है कि ईरान, पाकिस्तान और अरब समेत कुल ४७ इस्लामिक देशों ने भी योग के महत्व को समझा और स्वीकार किया. योग एलाइंस की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २०१६ में अमेरिका में ३ करोड़ ६० लाख लोग योग से स्वस्थ रहने के तरीकों को अपना रहे हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के ९० प्रतिशत लोग योग के बारे में जानते हैं, जबकि वर्ष २०१२ में ७० प्रतिशत अमेरिकी योग के बारे में जानते थे. कमोबेश योग की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता का दायरा ऐसा ही लगभग देश का होता जा रहा है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा सहित अनेकों नामचीन हस्तियां योग को आत्मसात कर लाभ  प्राप्त कर रही हैं.
योग में आश्चर्यजनक लाभ व आत्म परिष्कार का होना उसकी व्यापकता व भव्यता को निरंतर बढ़ा रहा है. गीता में वर्णित योग की परिभाषा योग: कर्मसु कौशलम् के अनुसार योग प्रत्येक क्षेत्र के कार्यों में शुचिता से कुशलता का परिचायक है. वहीं गीता में ही योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को योग के उपदेश देते हुए कहा गया है समत्वं योग उच्यते अर्थात ऊंच-नीच, मेरा-पराया, हानि-लाभ तथा यश-अपयश से ऊपर उठकर समत्व भाव से बड़े ह्दय के साथ जीना ही योग है. यह सूक्तियां योग द्वारा विश्व को शांति व समानता को संदेश देने में समर्थ हैं, जिसकी आज संपूर्ण विश्व को व्यापक जरूरत भी है.
योग विश्व को भारत की वसुधैव कुटुंबकम् की भावना का संदेश पहुंचाने में सक्षम रहा है तभी तो योग को पूरा विश्व पूरी उदारता के साथ अंगीकार कर रहा है. विश्व पटल पर योग का बढ़ता वर्चस्व जहां भारत की बड़ी सांस्कृतिक विजय है वहीं योग मनीषियों को यह भी ध्यान रखना जरूरी हो जाता है कि योग शाश्वत परंपरा के रूप में अपनी मौलिकता एवं उद्देश्य को भी बनाए रखें.
लेखक हिंदी सलाहकार समिति
श्रम मंत्रालय, भारत सरकार के सदस्य हैं मेल आईडी- yatigk@gmail.com , लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं