विशेष लेख


Volume-19, 11-17 August, 2018

 
स्वतंत्र भारत
युवाओं की एक आशा

लक्ष्मी दास

एक लंबे और कड़े संघर्ष के बाद भारत को स्वतंत्रता मिली.  यद्यपि गांधी जी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे, किंतु ब्रिटिश सरकार की विभाजन तथा शासन नीति तथा कुछ निहित स्वार्थ के प्रभाव के कारण देश का विभाजन करना पड़ा. भारत स्वतंत्र हो  गया  और भारतीय अपनी नियति के स्वामी बन गए.
  उस समय हमारा एक एजेंडा यह था कि देश को किस शासन प्रणाली से चलाया जाए. हमारे नेताओं ने शासन के लोकतांत्रिक रूप को अंगीकार करने का निर्णय लिया. यह एक कठिन  एवं जोखिमपूर्ण निर्णय था. हमारी जनता सामान्यत: अशिक्षित थी. सभी को चाहे वह बड़ा हो या छोटा, धनी हो या गरीब, किसी भी जाति, लिंग या धर्म का हो, को वोट देने का समान अधिकार देना एक जोखिम भरा प्रयोग था. किंतु भारत ने इसी प्रयोग को चुना और आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हम विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र हैं. शासन के इसी रूप ने हमारे युवा-वर्ग को निर्णय लेने और आगे बढऩे की शक्ति दी. हमारा लोकतंत्र निश्चित रूप से सफल है और समाज के प्रत्येक वर्ग को शक्ति सम्पन्न बनाता है.
 आर्थिक सशक्तिकरण आज की आवश्यकता है. हमारी स्थितियां ऐसी होनी चाहिए कि हम अपने लिए आजीविका प्राप्त कर सकें. गरीबों और अमीरों के बीच का अंतर समाप्त किया जाना चाहिए जिसकी कल्पना हमने अपने लोकतंत्र के प्रारंभिक दिनों में की थी. हमारी नीतियां ऐसे होनी चाहिए कि हर व्यक्ति को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनने के अवसर मिलें.
जब हम रोज़गार की बात करें तो यह अत्यधिक स्पष्ट होना चाहिए कि सभी के पास रोज़गार हो. हमें समय गवाएं बिना इस तथ्य को सुनिश्चित और कार्यान्वित करना चाहिए. हमें अपनी नीतियों की योजना भी तद्नुसार बनानी चाहिए. मुझे लगता है कि कोई छोटा समाधान इसकी पूर्ति नहीं करेगा, बल्कि उससे
स्थितियां और विषम होंगी. हमें इसके मूल में जाना होगा.
 हमें एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की योजना बनानी होगी जो हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप हो. हमारी शिक्षा प्रणाली अंतर्राष्ट्रीय मानकों वाली हानी चाहिए. हम अतंर्राष्टी्रय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में श्रेष्ठ होने चाहिएं, किंतु इसके साथ ही साथ हमें अपनी आवश्यकताओं को भी नहीं भूलना चाहिए, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक बड़ा राष्ट्र हैं जिसका प्रत्येक छठा व्यक्ति भारतीय है. हमारी शिक्षा नीति में युवओं की बड़ी संख्या को ध्यान में रखा जाना चाहिए. हम ‘‘सीख कर कमाना और कमा कर सीखने’’ की नीति अपनाने का प्रयास कर सकते हैं. हम गांधीवादी शिक्षा प्रणाली का प्रयास कर सकते हैं.
 उद्यमशीलता या कौशल विकास अथवा विकेंद्रीकृत उत्पादन एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता होती है. उद्यमशीलता का विकास करने के प्रयास किए गए हैं और किए जा रहे हैं. सभी ने इसकी उपयोगिता को समझा है. हम प्राय: तर्क देते हैं कि प्रतिस्पर्धा के लिए स्तर की सुविधाएं होनी चाहिए.  किंतु ऐसा कहते समय हम भूल जाते हैं कि कोई भी कमजोर व्यक्ति मजबूत से तब तक नहीं लड़ सकता जब तक वह स्वस्थ अथवा समर्थ न हो. मैं यहां किसी प्रकार की छूट, रियायत, अनुदान या आरक्षण की बात नहीं कर रहा हूं. किंतु मेरा मानना यह है कि हमें अपनी आर्थिक नीतियां इस तरह बनानी चाहिए कि उद्यमियों को पनपने और विस्तार के अवसर मिले सकें. हमें उद्यमशीलता को अधिक आकर्षक, अधिक शक्ति सम्पन्न बनाना होगा, ताकि इच्छुक युवा उद्यमशीलता को चुन सकें.
प्रौद्योगिकी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे सावधानी पूर्वक हस्तन किए जाने की आवश्यकता होती है. यह आवश्यक है. किंतु इसके साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रौद्योगिकी की उन्नति ने युवाओं की बड़ी संख्या को बेरोजगार बना दिया है, प्रौद्योगिकी के प्रयोग के साथ ही रोज़गार के अवसरों की संभावना बड़ी तेजी से कम होती जा रही है. बैंकों का ही उदाहरण ले लीजिए. बैंकों को कम जन-शक्ति की आवश्यकता होती है. हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि जब कार्य अधिक हो और व्यक्ति कम हों तो व्यक्तियों का कार्य मशीन द्वारा किया जाना होता है और जब काम कम हो और व्यक्ति अधिक हों तो मशीन का कार्य व्यक्ति द्वारा किया जाना होता है.  इसलिए मशीनों का उपयोग करते समय प्रौद्योगिकी का उपयोग करते समय हमें अत्यधिक सावधान रहना होगा. हमें यह सुनिश्चित  करना होगा कि किसी को रोज़गार देते समय कोई अन्य व्यक्ति बेरोज़गार न हो जाए. निर्धनता को समाप्त करने, बेरोज़गारी की समस्या का समाधान करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को रोज़गार देना होगा. सभी बेरोज़गार युवाओं को अपेक्षित बेरोज़गारी भत्ता देना किसी भी सरकार, किसी भी व्यवस्था के लिए संभव नहीं है. भोजना देना कोई समाधान नहीं है, एक कहावत है ‘‘यदि आप किसी को एक मछली देते हैं तो आप उसे एक दिन का भोजन देते हैं, किंतु यदि आप उसे मछली पकडऩा सिखाते हैं तो आप उसे उसके पूरे जीवन का भोजन देते हैं’’. खैर, हमें अपने युवाओं को आजीविका कमाने में सक्षम बनाने की योजना बनानी है.
 गांधीवादी आर्थिक नीति आजीविका का एक साधन है. यह एक व्यवहार्य उपलब्धि है. मेरी दृढ़ धारणा है कि गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रमों को एक अवसर दिया जाना चाहिए, देश की वर्तमान जटिल समस्याओं से निपटने के लिए उपयुक्त कार्यक्रम रूप में व्यवहार में लाएं जाने चाहिएं. गांधीजी ने केवल विचार ही नहीं दिए, बल्कि इन रचनात्मक कार्यक्रमों को वे व्यवहार में भी लाए यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये विचार कार्यान्वयन योग्य हैं और हम इन कार्यक्रमों से राष्ट्र को अधिक सुदृढ़ बना सकते हैं और ग्रामस्वराज प्राप्त कर सकते हैं.
हम विकास के बारे में बात करते हैं यह महत्वपूर्ण है. किंतु निरंतर अर्थिक विकास अधिक महत्वपूर्ण है केवल आर्थिक विकास कोई गलत छवि दे सकता है, क्योंकि कुछ व्यक्तियों की उन्नति राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास में योगदान कर सकती है. लेकिन कुछ लोगों की उन्नति हमारी समस्याओं का समाधान नहीं करती है. संतुलित आर्थिक विकास हमारी बेरोजग़ारी की समस्याओं, हमारे ग्रामीण विकास के मुद्दों, हमारी गरीबी से जुड़े मुद्दों का समाधान कर सकता है. संतुलित आर्थिक  विकास केवल तभी संभव है यदि हम गांधीजी की विकेन्द्रीकृत आर्थिक  नीति को अपनाएं.
 उत्पादन के साधन न्यायोचित रूप में रखे जाने चाहिए. उत्पादन के साधन कुछ व्यक्तियों  को देने से केवल कुछ व्यक्ति ही उन्नति कर सकेंगे. इससे बेरोज़गारी बढ़ेगी. हमें अपनी नीतियां इस तरह तैयार करनी चाहिए कि ये नीतियां संतुलित आर्थिक विकास में परिणत हो सकें.
 राष्ट्रीय एकीकरण या अखंडता एक अन्य ऐसा क्षेत्र है जिसे ध्यान में रखा जाना चाहिए. भारत अनेक विविधताओं वाला देश है. विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जातियों, विभिन्न धर्मों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न खाद्य आदतों, विभिन्न जीवन-शैलियों, विभिन्न संस्कृतियों के बावजूद हम एक हैं. हम एक महान राष्ट्र हैं. हममें एक-दूसरे से मिल कर रहने की समझ/भावना होनी चाहिए. हमें एक-दूसरे की आदतों, भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. भावात्मक एकीकरण/ अखंडता हमारी आवश्यकता है. अन्यों से व्यवहार करते समय हमें हमेशा सजग रहना चाहिए. स्वतंत्रता दिवस के इस शुभ अवसर पर हमें शपथ लेनी चाहिए कि हम न तो हम ऐसा कुछ बोलें जो हमारी अखंडता पर प्रश्न-चिह्न लगा दे और न ही ऐसा कोई राष्ट्रीय अखंडता प्रक्रिया को कोई क्षति पंहुचाएं. आइये, हम प्रत्येक नागरिक की पहचान की रक्षा करने की शपथ लें.
 युवा बाहरी स्रोतों पर आश्रित नहीं होने चाहिएं. वे हमारा बल हैं. वे राष्ट्र की ताकत हैं. उनमें क्षमता है. वे अनहोनी कर सकते हैं. वे राष्ट्र की लम्बाई-चौड़ाई माप सकते हैं. आयु/युग आपके पक्ष में है. चुनौती को स्वीकार करें. अन्यों से कोई आशा न रखें. बल्कि ऐसी स्थितियां बनाएं जिनमें अन्यों की सहायता की जा सके. सभी महान हस्तियों ने उन स्थितियों से कठिन स्थितियों का सामना किया, जो आज हम झेल रहे हैं. आपके पास उन महान हस्तियों का अनुभव है. आपके पास उनकी प्ररेणा है. स्वतंत्रता प्राप्त करने में हमारे पूर्वजों  द्वारा किया गया बलिदान आपको आगे बढऩे का स्मरण करा रहा है, आपका मार्गदर्शन कर रहा है. अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक कहीं मत रुको. इस महान राष्ट्र के निर्माण में अपने अन्य युवा सहगामियों के एक दीप स्तंभ/पथ प्रदर्शक बनें. मातृभूमि आपकी प्रतिबद्धता चाहती है अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर रहें और अन्यों की समस्याओं का समाधान करने में उनकी सहायता करें. आप योजना बना सकते हैं. आप आगे बढ़ सकते हैं. बड़ा सोचो. बड़ा प्राप्त करने का प्रयास करो. महान राष्ट्र अर्थात हमारी मातृभूमि आपको पुकार रही है.
(लेखक हरिजन सेवक संघ, नई दिल्ली के सचिव हैं.) ई-मेल : laxmidass47@gmail.com