विशेष लेख


Edition-19

जैवप्रौद्योगिकी में अध्यापन प्रशिक्षण तथा नेतृत्व में उत्कृष्टता बढ़ाने के अवसर

डॉ. सुमन गोविल

२०२० तक भारत के, विश्व  का सबसे युवा देश बनने की आशा है क्योंकि ३५ वर्ष से कम आयु के युवकों का कुल जनसंख्या का ६५त्न होने का अनुमान है. यह हमारे सकारात्मक विकास परिदृश्य का मुख्य वाहक हो सकता है, तथापि, यदि हम वंचितों को उच्च शिक्षा देने और कुशल जनशक्ति की कमी की चुनौती का सामना करने के लिए व्यक्तियों को कौशल से सम्पन्न बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाते हैं तो यह हमारे लिए निष्फल एवं हानिकर हो सकता है.  हम अनेक चुनौतियों का सामना करते हैं क्योंकि केवल १०त्न युवाओं की ही उच्च शिक्षा तक पहुंच है, हमारी प्रशिक्षण अवसंरचना अपर्याप्त, अपूर्ण तथा पुरानी है, पाठ्यवृत्त में संशोधन उस गति से नहीं किया जाता जिस गति से किया जाना चाहिए, अधिकांश शैक्षिक संस्थाओं में ३० से ४०त्न संकाय पद रिक्त हैं, प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण तथा पुन: प्रशिक्षण के अवसर सीमित हैं, अधिकांश छात्रों को उद्योग में पर्याप्त हस्तगत प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिलता और वे उद्योगों की आशाओं तथा अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते. इसलिए शिक्षा स्तर एवं कौशल-विकास में पर्याप्त सुधार लाने पाठ्यवृत्त संशोधनों के लिए उद्योगों तथा उनके एसोशिएशन्स से सकारात्मक सहभागिता, अध्यापन सामग्रियों को तैयार एवं अद्यतन करना, छात्रों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देना आदि की तत्काल आवश्यकता है.
मैं, जैवप्रौद्योगिकी विभाग के एकीकृत मानव संसाधन विकास कार्यक्रम के सफल मामला अध्ययन पर प्रकाश डालना चाहता हूं, जो एक अत्यधिक शानदार कार्यक्रम है तथा वर्तमान एवं विगत छात्रों, संकाय एवं शिक्षा शास्त्रियों एवं अनुसंधान संस्थाओं और उद्योगों जैसे स्टेक होल्डर्स से एकत्र की गई सूचना के आधार पर विकसित किया गया है.
जैवप्रौद्योगिकी विभाग का एकीकृत मानव संसाधन विकास कार्यक्रम जैवप्रौद्योगिकी में अनुसंधान एवं विकास, अध्यापन एवं उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए १९८५ में प्रारंभ किया गया था. १०+२ छात्रों के लिए जीव विज्ञान में डीबीटी छात्रवृत्तियां देने, व्यावहारिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर स्नातक विज्ञान शिक्षा में उत्कृष्टता लाने की स्टार कॉलेज योजना तथा छात्रों को अनुसंधान ज्ञान देने, गुणवत्तापूर्ण व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं एम.एससी./एम.टेक. में स्नातकोत्तर छात्रों में शोध-निबंध, उद्योगों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों को ६ महीने का प्रशिक्षण देकर कौशल की कमी को समाप्त करने वाले अध्यापन कार्यक्रम तथा डॉक्टोरल एवं डॉक्टरोत्तर अनुसंधान के लिए अध्येतावृत्ति देने जैसे छात्र केन्द्रित कार्यक्रम सफलतापूर्वक कार्यान्वित किए जा रहे हैं, सेमिनार/सिम्पोसिया का आयोजन करके सम्पर्क स्थापित करने के लिए मंच उपलब्ध करा कर स्नातक एवं स्नातकोत्तर अध्यापकों और अनुसंधान वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण तथा पुन: प्रशिक्षण तथा वैज्ञानिक परिणामों की प्रस्तुति, उन्नत तकनीकों में अल्पकालीन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम, अग्रणी राष्ट्रीय तथा विदेशी प्रयोगशालाओं में प्रशिक्षण के लिए एसोशिएटशिप भी प्रर्याप्त रूप में उपलब्ध हैं. स्टार कॉलेज योजना के अंतर्गत स्नातक कॉलेजों में विभिन्न विज्ञान विभागों को समर्थन के लिए संयुक्त व्यावहारिक, परियोजनाओं एवं कार्यशालाओं के आयोजन द्वारा अंतर विषयीय संस्कृति शामिल की गई है. रिएजेंट्स तैयार करने, पैथोजेनिक ऑर्गेनिज्म के हस्तन, सैम्पल एकत्र करने, प्रयोगशाला उपस्करों के रखरखाव, सुरक्षा सावधानी आदि के लिए प्रयोगशाला स्टाफ हेेतु कार्यशालाओं का आयोजन एक अतिरिक्त लाभ है. कॉलेज, महत्वपूर्ण और समाज से जुड़े वैज्ञानिक मामलों में, आसपास के स्कूलों एवं कॉलेजों के छात्रों एवं शिक्षकों के लिए अनेक उपयोगी कार्यकलापों का भी आयोजन कर रहे हैं.
डी.बी.टी. की बड़ी मानव संसाधन पहलों के परिणाम नीचे उल्लिखित हैं:-
प्रारंभ से ही प्रोत्साहन देना : मूल विज्ञान विषयों में लगे श्रेष्ठ छात्रों को आकर्षित करने के लिए डी.बी.टी. ने, सी.बी.एस.ई. द्वारा ली जाने वाली १०+२ परीक्षा में जीव विज्ञान के उच्च २० छात्रों के लिए १९८९ में डी.बी.टी. जीवविज्ञान छात्रवृत्तियां प्रारंभ की. राज्यों को शामिल करने के लिए इस योजना का २००६-०७ में विस्तार किया गया है, छात्रवृत्तियों की सं. बढ़ाकर १०० प्रति वर्ष की गई है और छात्रवृत्तियों की राशि भी बढ़ाकर रु. २००००/- कर दी गई है. यद्यपि यह संख्या कम है, किन्तु डी.बी.टी. छात्रवृत्तियों ने, जीवनविज्ञान में कॅरिअर बनाने के इच्छुक श्रेष्ठ छात्रों को आकर्षित किया है.
२. श्रेष्ठ छात्रों को आकर्षित एवं प्रोत्साहित करना : पिछले कुछ वर्षों से लगातार अनुभव किया गया है कि श्रेष्ठ छात्र विज्ञान पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं ले रहे हैं और इंजीनियरी, प्रबंधन, चिकित्सा आदि व्यावसायिक पाठ्यकमों को चुन रहे हैं. विज्ञान पाठ्यक्रमों में लम्बी प्रतीक्षा अवधि, रोज़गार अवसरों का अभाव, विज्ञान का केवल सैद्धांतिक शिक्षण (प्रयोगशाला उपकरणों की कमी और कीमती रसायनों के कारण) भी इसके कारक हैं. डीबीटी ने, कॉलेज में सहभागी विभागों के साथ सम्पर्क करने के अवसर देकर और नजदीकी अनुसंधान संस्थाओं और उद्योगों का दौरा करने के प्रावधान द्वारा प्रयोगशाला अवसंरचना को मजबूत करके चुने हुए अधिस्नातक कॉलेजों में सभी विज्ञान विभागों का विकास करने के लिए एक स्टार कॉलेज योजना को अभिरूपित किया है. कार्यक्रम का बल व्यावहारिक प्रशिक्षण पर है और अधिस्नातक छात्रों को कुछ अनुसंधान जानकारी दी जाती है ताकि उनमें विज्ञान के प्रति रुचि जागृत की जा सके. प्रारंभ में, कॉलेजों को सुदृढ़ीकरण घटक के अंतर्गत समर्थन दिया जाता है और तीन वर्षों के पूरा होने के बाद उनकी प्रगति की समीक्षा के आधार पर स्टार स्टेट्स प्रदान किया जा सकता है, यह समर्थन अन्य अवधि के लिए भी आगे बढ़ाया जा सकता है अथवा समाप्त किया जा सकता है. अब तक, ४३१ प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, २५० कॉलेजों को समर्थन दिया गया है और ४८ कॉलेजों को समर्थन देने का प्रस्ताव, एक दौर के समर्थन के बाद रोक दिया  गया है. स्टार स्टेट्स बहुत सीमित मामलों में ही दिया जाता है और केवल २० कॉलेजों को ही स्टार स्टेट्स दिया गया है. दैनिक उपस्करों की अधिकता और कीमती उपभोग वस्तुओं की बहुलता के प्रावधान के कारण कॉलेज सभी छात्रों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने में सक्षम हैं और अधिस्नातक छात्रों द्वारा छोटी अनुसंधान परियोजना कार्य जैसे परिसरों को हरा-भरा बनाना, पानी, दूध के उत्पादों की गुणवत्ता की जांच, ब्लड ग्रुप की जांच आदि किए जाते हैं. पिछले ८-९ वर्षों में इस योजना से महत्वपूर्ण क्रांति आई है, जो संस्वीकृत सीटों की तुलना में आवेदकों का अधिक संख्या में होना, प्रवेश के समय कट ऑफ प्रतिशतता में वृद्धि, सीट छोडऩे की दर में कमी आना, अधिस्नातक परीक्षा में बेहतर परिणाम और पीजी विज्ञान पाठ्यक्रमों में अधिक प्रवेश आदि से प्रमाणित होती है. सभी कॉलेजों ने उन्नत एनएएसी रैंकिंग प्रदर्शित की है और डीएसटी, यूजीसी आदि से भारी समर्थन प्राप्त किया है. ब्रिटिश काउंसिल और आईआईएसटीआर पुणे के सहयोग में तीन पक्षीय अध्यापन शिक्षण कार्यक्रम किये जा रहे हैं और बुनियादी तथा उन्नत अनुसंधान आधारित अध्ययन में दो पक्षीय प्रशिक्षण के बाद हमारे शिक्षक अन्य कॉलेजों के शिक्षकों के लिए क्षेत्रीय कार्यशालाएं आयोजित करेंगे. प्रयोगशाला मैनुअल के रूप में पठन सामग्री, एसओपी, सहभागी कॉलेजों द्वारा नवप्रवर्तित सैद्धांतिक कार्य किए गए हैं जिनका दो विशेषज्ञ समितियों द्वारा मूल्यांकन किया गया है और सभी के द्वारा उपयोग करने के लिए इन्हें एक समान प्रारूप में संकलित किया जा रहा है. डीबीटी द्वारा किया गया यह एक छोटा कार्य है जिसने व्यापक लाभ दिया है और इसे छात्रों को विज्ञान पाठ्यक्रमों में बनाये रखने और आकर्षित करने में सहायता मिली है.
३. जैवप्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर अध्यापन कार्यक्रम : १९८५-८६ में जैवप्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर अध्यापन कार्यक्रम प्रारंभ करने के संबंध में भारत विश्व के कुछ प्रथम देशों में से है. विशेषज्ञतापूर्ण जनशक्ति, क्षेत्रीय अपेक्षाओं  की आवश्यकताओं के आधार पर अध्यापन कार्यक्रम ७० से भी अधिक विश्वविद्यालयों में विस्तरित किए गये हैं जिसमें सामान्य, कृषि, चिकित्सा, फार्मा, पर्यावरण, समुद्र, औद्योगिक, जैवसंसाधन, पशुचिकित्सा, खाद्य, जैव प्रोसेस इंजीनियरी जैसी विभिन्न विशेषज्ञताएं शामिल की गई हैं. यह विभाग दैनिक कक्षा प्रैक्टिकल के लिए आवश्यक उपकरणों की खरीद के लिए उदार अनुदान, उपयोग योग्य सामग्रियों के लिए वार्षिक अनुदान, अध्येतावृत्ति, दौरों, पुस्तकों और पत्रिकाओं, उपस्कर रख-रखाव, आकस्मिक व्यय तथा प्रशिक्षण के लिए अनुदान देता है. विभागीय शोध निबंध अनिवार्य कर दिये गये हैं और प्रति छात्र ५० हजार रुपये का थैसिस अनुदान दिया जाता है ताकि अच्छे स्तर के अनुसंधान प्रशिक्षण को सुनिश्चित किया जा सके. छात्रों का चयन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा, संयुक्त प्रवेश परीक्षा और आईआईटी द्वारा संचालित जेएएम या विश्वविद्यालय के आधार पर किया जाता है. सभी छात्रों को छात्रवृत्तियां दी जाती हैं. ये कार्यक्रम भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और कुछ विश्वविद्यालयों ने कुछ अपने निजी अध्यापन कार्यक्रम प्रारंभ किये हैं. विभाग मॉडल पाठ्यक्रम पाठ्यवृत्त तैयार कर रहा है और नियमित अंतराल पर उनमें संशोधन करता है ताकि पाठ्यक्रमों में नवीनतम प्रगति को शामिल किया जा सके और बोझिल या पुराने विषयों को हटाया जा सके. छात्रों द्वारा ऑनलाइन प्रणाली सूचना प्राप्त करने के लिए विकसित की गई है ताकि छात्र कार्यक्रमों में सुधार के लिये सूचना दे सके. कार्यक्रम के पूरा होने पर छात्रों की पहली तैनाती पर निगरानी रखी जाती है और विश्वविद्यलायों ने भी छात्रों की तैनाती में सहायता करने के लिए तैनाती कक्षों की स्थापना की है ताकि वे कैम्पस साक्षात्कार द्वारा तैनाती तलाश कर सके. छात्रों ने अपने शोध निबंधों से अच्छे प्रकाशन भी प्रकाशित किए हैं.
४. कौशल की कमी को पूरा करना : रोज़गार की संभावना को बढ़ाने और विश्वविद्यालयों द्वारा दिए गए छात्रों और उद्योगों की आवश्यकता के बीच कौशल की कमी को पूरा करने के लिए विभाग ने १९९३-९४ में जैवप्रौद्योगिकी औद्योगिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिसमें ६ महीने का औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता है. यह कार्यक्रम परस्पर लाभकारी है और छात्रों में अत्यधिक लोकप्रिय है क्योंकि यह उन्हें उद्योग में प्रवेश के प्रारंभिक अनुभव और प्रत्याशा के साथ-साथ उद्योगों के लिए एक अवसर देता है कि वे उद्योग प्रत्याशित जनशक्ति का चयन कर सके. प्रत्येक वर्ष लगभग ७०० से ८०० छात्रों को १५० से अधिक कंपनियां प्रशिक्षण देती हैं और २५ से ३० प्रतिशत छात्र इस क्षेत्र में प्रशिक्षक उद्योग अथवा अन्य उद्योग में रोजग़ार प्राप्त करते हैं.
५. अनुसंधान के अवसर : विभाग देश में अग्रणी विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्थाओं में डॉक्टोरल अनुसंधान करने के लिए अध्येतावृत्तियां दे रहा है. छात्रों का चयन, पूरे देश में संचालित की जाने वाली एक ऑनलाइन जैवप्रौद्योगिकी पात्रता परीक्षा (बीईटी) के आधार पर किया जाता है. डॉक्टोरल अध्येतावृत्ति के लिए छात्रों का चयन एक विशेषज्ञ समिति के समक्ष प्रस्तावित अनुसंधान कार्य प्रस्तुत करने के आधार पर किया जाता है. यह कार्यक्रम उन संस्थानों - जो उम्मीदवारों द्वारा अपनी पीएच.डी. करने के संस्थानों से भिन्न होते हैं, में प्रवेश लेने के लिए प्रोत्साहित करता है ये छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्र देश के विश्वविद्यालयों और संस्थाओं में नेतृत्व वाले पदों तक पदोन्नत हुए हैं.
६. लोकप्रियकरण कार्य: विभाग, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों और सिम्पोसिया के संयोजन के लिए समर्थन दे रहा है, प्रख्यात वैज्ञानिकों द्वारा लोकप्रिय लेक्चर का आयोजन कर रहा है, और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के लिए छात्रों और अनुसंधानकत्र्ताओं को भ्रमण समर्थन दे रहा है तथा उत्पाद, प्रक्रिया, प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन के लिए प्रदर्शनियों के आयोजन में सहायता दे रहा है. ये कार्यकलाप युवा छात्रों और अनुसंधानकत्र्ताओं को अग्रणी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों से मिलने का अवसर देकर उनके भावी कॅरिअर को रूप देने में उनकी सहायता कर रहा है.
जैवप्रौद्योगिकी विभाग द्वारा और अन्य निधियन एजेंसियों जैसे डीएसटी, यूजीसी द्वारा किए गए प्रणालीबद्ध एवं ठोस प्रयासों ने छात्रों को बुनियादी विज्ञानों में कॅरिअर चुनने के लिए प्रोत्साहित किया है और जैवप्रौद्योगिकी में अध्यापन, अनुसंधान, उत्पादन और विनिर्माण के लिए अपेक्षित प्रशिक्षित जनशक्ति प्रदान की है. जैवप्रौद्योगिकी छात्रों के लिए, ट्रांसजेनिक पौधों, बीज उद्योगों, टिश्यू कल्चर एककों, कृषि रसायनों जैसे जैव उर्वरक, बायोपेस्टीसाइड्स, आदि पर्यावरण उन्नयन, निदान, टीका, नये औषधियों वाले फार्मा उद्योगों, मॉलेक्यूल, नैदानिक प्रशिक्षणों वाले नैदानिक अनुसंधान संगठनों, जैव सूचना विज्ञान उद्योग आदि में अवसर दिए हैं. अनुसंधान एवं विकास, उत्पादन एवं विनिर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण विश्लेषण, प्रौद्योगिकी अंतरण एवं प्रबंधन में परामर्श, तकनीकी-आर्थिक संभाव्यता रिपोर्ट तैयार करने तथा विनियामक कार्यों जैसे विषालुता विज्ञान, पर्यावरणीय स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, जैवसुरक्षा आदि क्षेत्रों में भी शानदार अवसर विद्यमान हैं. जीएटीटी का एक हस्ताक्षरकत्र्ता बनने के साथ ही, भारत पेटेंट एवं विवाद निपटान के मामलों में अचानक तीव्रता का साक्षी है जिसके परिणामस्वरूप पेटेंट अॅटोर्नी और परीक्षकों के लिए अपार अवसर खुले हैं. इसके अतिरिक्त विज्ञान प्रबंधन, अध्यापन और अनुसंधान के लिए भी सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएसईआर, एनआईपीईआर एवं एम्स में भी हाल ही के वर्षों में अवसरों में व्यापक वृद्धि हुई है.
सरकार द्वारा, छात्रों में कौशल की कमी को दूर करने के लिए उद्योगों के साथ संयुक्त रूप में सकारात्मक प्रयास छात्रों की रोज़गार संभावना को बढ़ाने और रोज़गार परिदृश्य में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध है.
(लेखिका जैवप्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार हैं.)
व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं.
चित्र : साभार गूगल