विशेष लेख


Vol.26, 2017

देश में पादप संरक्षण, संगरोध और भंडारण

अरुण खुराना

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है जिसकी आबादी 1.3 अरब है जो दुनिया की कुल आबादी का 18 प्रतिशत है. विश्व की जनसंख्या 2050 तक 9 अरब के आंकड़े को पार कर जाने की संभावना है. जनसंख्या में बढ़ोतरी से खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है. बढ़ती आबादी की खाद्य पदार्थों और पोषण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक ऐसी टिकाऊ नीति अपनाना जरूरी है जिसमें उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाए जबकि हमारे खेतों का आकार कम हो रहा है और उत्पादकता कम हो रही है. नयी नीति में सभी प्रतिभागियों - किसान, सरकार और कृषि-रसायन उद्योग की ओर से मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि देश की बदलती हुई आवश्याकताओं को पूरा किया जा सके. दुनिया भर में करीब 25 प्रतिशत फसलें फसल की बीमारियों, खर-पतवार और फसली महामारियों से नष्ट हो जाती हंै जो कि हमारे सामने उपस्थित भारी चुनौतियों के लिहाज से खेती के लिए अच्छी बात नहीं है. इस तरह आने वाले समय में कृषि-रसायनों को खेती में और बड़ी भूमिका निभानी होगी.
इसी बात को संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन में दूसरे शब्दों में बताया गया है. इसके अनुसार दुनिया की जनसंख्या के रुझान के आधार पर पूर्वानुमान लगाया गया है कि 2022 तक भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ कर दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा. अपनी 1.32 अरब की वर्तमान जनसंख्या के साथ भारत दुनिया की 17.84 प्रतिशत जनसंख्या का भरण-पोषण करता है जबकि हमारे पास केवल 2.4 प्रतिशत भूमि संसाधन और 4 प्रतिशत जल संसाधन ही हैं. यह बात भी ध्यान देने की है कि 15 से 25 प्रतिशत संभावित फसल उत्पादन फसली महामारियों, खर-पतवार और अन्य बीमारियों की वजह से नष्ट हो जाता है. निश्चय ही हम बड़े चुनौती भरे वक्त से गुजर रहे हैं. बढ़ती हुई आबादी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए देश को न सिर्फ कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा, बल्कि उत्पादकता में भी वृद्धि करनी होगी तभी राष्ट्र की खाद्य और पोषाहार सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी. हमें विश्व में खेती के बेहतरीन तौर-तरीकों और नवीनतम उपलब्ध टेक्नोलॉजी को अपना कर फसलों के संरक्षण और उनकी पैदावार बढ़ाने के उपाय करने होंगे. तभी हमारी समस्याओं का समाधान हो पाएगा. फसलों को टिकाऊ आधार पर संरक्षित करने के लिए अच्छे रुझान और समाधान सामने आ रहे हैं जिनमें फसलों को संरक्षित करने वाले रसायन, सस्य विज्ञान, सिंचाई प्रणाली में रसायन मिलाकर किये जाने वाले फर्टिगेशन, बीजों का उपचार, बायो-टेक्नोलॉजी का विकास आदि शामिल हैं. देश में अगली पीढ़ी की खेती इस तरह के तमाम संभावित समाधानों में से बेहतरीन को अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपनाना होगा. कृषि क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जिनके समाधान से भारत विश्व में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले फसल संरक्षण रसायनों के उत्पादन का केन्द्र बन सकता है. हालांकि बीते वर्षों में देश में प्रति हैक्टेयर पैदावार बढक़र दुगनी हो गयी है, भारतीय कृषि को अब भी मानसून की वर्षा पर अत्यधिक निर्भरता, मौसम की तुनकमिजाजी, खेती वाली जमीन में कमी, कम प्रति हैक्टेयर पैदावार, महामारियों के प्रकोप आदि का सामना करना पड़ रहा है. उत्पादकता बढ़ाने में कृषि-रसायनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. फसल समेटने के बाद उसके संरक्षण से भी उत्पादकता का सीधा संबंध है. कृषि रसायनों को निर्दिष्ट मात्रा में पानी में घोलकर बीजों, मिट्टी, सिंचाई के पानी और फसलों पर इस्तेमाल करने से फसलों को महामारियों, खर-पतवार और बीमारियों से बचाया जा सकता है. कीटनाशक कृषि-रसायनों के अंतर्गत सबसे बड़े उपवर्ग के अंतर्गत आते हैं और बाजार में इनकी हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है. जबकि खरपतवार नाशक यानी हर्बीसाइड्स की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत और यह भारत में सबसे तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है.
पादप संरक्षण के तरीके
फसल संरक्षण महामारियों, पौधों की बीमारियों, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली खर-पतवार और वानिकी के प्रबंधन का विज्ञान है. कृषि के अंतर्गत आने वाली फसलों में खेतों में उगने वाली फसलें (मक्का , धान, गेहूं आदि), सब्जीं वाली फसलें (बंद गोभी, आलू आदि), और फल और बागवानी वाली फसलें शामिल हैं. इसके अलावा ये सब भी फसल संरक्षण के अंतर्गत आते हैं :
*कीटनाशक आधारित तरीका जैसे खरपतवार नाशक, कीटनाशक और कवकनाशक
*महामारियों से निपटने का जैव तरीका जैसे कवर क्रॉप्सस, ट्रैप क्रॉप्स और बीटल बैंक
*अवरोध वाला तरीका जैसे एग्रोटेक्सटाइल्स और बर्ड नेटिंग
*पशु मनोविज्ञान पर आधारित तरीका जैसे पक्षियों को डराने के लिए पुतले
*बायो-टेक्नोलॉजी आधारित तरीका जैसे पादप प्रजनन और आनुवंशिक परिवर्तन
फसल संरक्षण की समस्या में 1945 के बाद नाटकीय बदलाव आया है. आज हमारे पास रसायनों की समूची शृंखला है जिनसे खेती में लगने वाली बीमारियों और महामारियों की रोकथाम की जा सकती है. मगर इसके अंतर्गत अनेक कमियां हैं. किसानों के बहुत छोटे से वर्ग को ही इस तरह की परिष्कृत तकनीकें उपलब्ध हैं. दुनिया के बड़े भाग में फसल संरक्षण का स्तर बहुत ही नीचा है. इसके अलावा फसल संरक्षण की आधुनिक विधियों की इसलिए आलोचना होती रही है क्योंकि उनमें रासायनिक नियंत्रण पर बहुत जोर दिया जाता है. जैव नियंत्रण, जिनमें प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों ही शामिल हैं, की उपेक्षा की गयी है. कुछ मामलों में तो कृषि रसायनों का दुरुपयोग भी हुआ है जिसकी वजह से इस तरह के उपायों से बचाव जरूरी हो गया है. इस बीच पहले जो महामारियां और बीमारियां स्थानीय स्तर पर होती थीं वह अब दुनिया भर में फैल रही हैं. कृषि रसायनों को पारंपरिक रूप से रासायनिक संश्लेषण से बनाया जाता रहा है. लेकिन हाल में जैव-रसायन विधियों को भी लोकप्रियता मिल रही है. आम तौर पर कृषि रसायनों में एक सक्रिय घटक गुणवर्धक रसायन के रूप में निश्चित सांद्रता में मौजूद रहता है जिससे उसका असर, सुरक्षा और उपयोगिता बढ़ जाती है. कृषि रसायनों को स्वीकृत मात्रा में पतला किया जाता है और बीजों, मिट्टी, सिंचाई के पानी और फसलों में महामारियों, खरपतवार और बीमारियों से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है. इसलिए फसलों की पैदावार बढ़ाने और महामारियों के नियंत्रण के लिए मौजूदा संदर्भ में कृषि रसायन सबसे उपयुक्त और विश्वसनीय उपाय है. कृषि रसायन वे पदार्थ हैं जिनका निर्माण रासायनिक या जैव-रासायनिक विधियों से होता है. उनमें ऐसे सक्रिय घटक निश्चित सांद्रता में अन्य पदार्थों के साथ होते हैं जिससे उनका कार्यनिष्पादन बढ़ जाता है जिससे फसल की सुरक्षा सुनिश्चित होती है. अगर अतीत की पर्यावरण संबंधी और विषवैज्ञानिक गुणों से तुलना करें तो इन रसायनों के विषवैज्ञानिक गुण काफी बढ़ गये हैं. अनुसंधानों का उद्देश्य रसायनों में ऐसे सुधार करना है  जिससे कि वे न केवल अधिक असरदार बनें बल्कि वांछित प्रक्रिया के लिए भी विशिष्ट हों और इनका पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े.
टिड्डीदल की चेतावनी और इनका नियंत्रण
टिड्डीदल चेतावनी संगठन (एलडब्यूरओ) 2 लाख वर्ग किलोमीटर के अनुसूचित मरुस्थलीय इलाके में टिड्डीदलों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखना जारी रखेगा. दसवीं योजना में जोधपुर की दूर संवेदी प्रयोगशाला की टिड्डीदल नियंत्रण क्षमता (दस सर्किल और 1 हैक्टेयर) तथा बीकानेर की टिड्डीदल अनुसंधान सुविधाओं को दसवीं योजना के दौरान सुदृढ़ किया जा रहा है. 1993 के टिड्डीदल हमले को ध्यान में रखते हुए कुछ इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गयी है. भारत खाद्य और कृषि संगठन की मरुस्थलीय टिड्डीदल नियंत्रण समिति तथा दक्षिण-पश्चिम एशिया मरुस्थलीय टिड्डी नियंत्रण आयोग का सदस्य है. इस्तेमाल किये जाने वाले कृषि-रसायनों में वांछित गुण हों, यह सुनिश्चित करने के लिए कीटनाशकों में गुणवत्ता नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी. केन्द्रीय कीटनाशक प्रयोगशाला और कानपुर तथा चंडीगढ़ की क्षेत्रीय कीटनाशक परीक्षण प्रयोगशालाओं में मौजूदा सुविधाओं को सुदृढ़ किया जा रहा है ताकि राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश प्रशासनों के संसाधन सुदृढ़ हों और वे कीटनाशकों के ज्यादा नमूनों की गुणवत्ता का विश्लेषण कर सकें जिससे किसानों को बेहतरीन किस्म के कीटनाशक उपलब्ध हो सकें.
पादप संगरोध और पादप स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे
सदियों से संगरोध का इस्तेमाल हानिकारक महामारियों और खतरनाक रोग जनकों की रोकथाम के लिए किया जाता रहा है. पादप महामारियों के लिए संगरोध का उपयोग खेती से संबंधित पेड़-पौधों से फैलने वाली महामारियों के फैलाव को नियंत्रित करने या उनके कृत्रिम रूप से अपनाए जाने को रोकने के लिए किया जाता है. इस तरह के संगरोध से पेड़-पौधों, पादप उत्पादों, जीवों, जैव उत्पादों, या दूसरी वस्तुओं या सामग्री के उत्पादन, आवाजाही या मौजूदगी अथवा लोगों की गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जा सकता है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि लोगों की गतिविधियों से कुछ खास तरह महामारियों की शुरूआत या प्रसार न होने पाए. जहां खेतों में खड़ी फसलों की बीमारियां और महामारियां बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करती हैं वहीं भंडारित कृषि पदार्थों के संक्रमण का कम पता चल पाता है क्योंकि इन पर प्रकोप गुप्त रूप से फैलता है. भंडार में रखे गये अनाज का जबरदस्त नुकसान हो सकता है मगर इसे अनाज के भंडारण के आधुनिक और परिष्कृत तकनीकें अपना कर और इस बारे में भंडारों के प्रबंधन व संचालन का काम करने वालों को पर्याप्त प्रशिक्षण देकर कम किया जा सकता है. पादप संरक्षण की जिम्मेदारी के अंतर्गत व्यापार से संबंधित फाइटोसेनीटरी यानी पादप सुरक्षा के मुद्दे भी शामिल हैं. अतीत में खाद्यान्न की कमी और अकाल के पीछे पेड़-पौधों की कई तरह की बीमारियों का हाथ रहा है. किसी खास क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं के अलावा फसलों की कई महामारियां हैं जो भारत में दूसरे देशों से आई हैं क्योंकि पुराने जमाने में देश में पादप संगरोध के लिए ऐसी कारगर प्रणाली नहीं थी जिससे बाहर से आने वाले पेड़-पौधों, बीमारियों और खर-पतवार को रोका जा सके. कॉटोनी कुशन स्केल, वूली एफिड, सान जोस स्केल, आलू का गोल्डन सिस्ट नेमेटोड, विशाल अफ्रीकी घोंघा आदि कुछ ऐसे विदेशी परजीवी हैं जो बाहर से आए हैं और जिनसे भारी नुकसान हुआ है. हाल के वर्षों में पादप वस्तुओं की आयात और निर्यात की जाने वाली मात्राओं में बढ़ोतरी के कारण कीट परजीवियों और बीमारियों के उनके उत्पत्ति के स्थान से नयी जगहों पर पहुंचने की संभावना बढ़ गयी है. परजीवियों को अलग-थलग करने की विधि को कुछ कानूनी उपायों के जरिए लागू किया जाता है जिसे आम बोलचाल में क्वांरेंटाइन यानी संगरोध कहा जाता है. फ्रांसीसी के इस शब्द का मतलब है 40 दिन की अवधि. संगरोध की परिभाषा पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों और बीमारियों के दूसरी जगहों पर फैलाव को रोकने के लिए उनको लाने-ले जाने पर कानूनी रोक के रूप में की जाती है. पादप संगरोध संबंधी नियम राष्ट्रीय और राज्य सरकारों द्वारा लागू किये जाते हैं ताकि नुकसान पहुंचाने वाले कीट और पैथोजीन का दूसरे स्थानों पर प्रसार न होने पाए. पादपों और पादप उत्पादों का संगरोध के जरिए संरक्षण पिछली शताब्दी के प्रारंभ में उस समय सरकार की जिम्मेदारी बना जब दुनिया के विभिन्न भागों में विनाशकारी महामारियों और कीटों का प्रकोप फैला. दूसरे देशों से हानिकारक सूक्ष्म जीवों के नये क्षेत्रों में पहुंचने से व्यापक नुकसान होता है. इसका जीता-जागता उदाहरण है आलू का ब्लाइट (फाइटोप्थोरा इनफेंट्स) जिसकी वजह से फैली बीमारी ने इतिहास की दिशा बदल दी. 1845 में यह महामारी की तरह फैली जिससे आयरलैंड में आलू की खड़ी फसल पूरी तरह तबाह हो गयी और वहां भुखमरी से लाखों लोग मौत की नींद सो गये. 
पादप संगरोध का वैश्विक परिदृश्य
वैश्विक स्तर पर 2015 में फसल की संरक्षा में उपयोग किये जाने वाले रसायनों की बिक्री में लगभग सभी क्षेत्रों में कमी आई. सबसे ज्यादा गिरावट यूरोप और लातीनी अमेरिका के देशों में देखी गयी. खरपतवार नाशकों की कीमतों में गिरावट, अलनीनो के असर समेत विभिन्न कारणों से मौसम में बदलाव और वर्षा में कमी आने से बिक्री में भी कमी आई. अब तक के सबसे भीषण सूखे में से एक का सामना ब्राजील और अमेरिका के कुछ इलाकों को करना पड़ा. इसके अलावा दुनिया भर में जिंसों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गयी जिससे किसानों के लिए अपनी उपज के दाम घटाना जरूरी हो गया. अमेरिकी डालर के मुकाबले कई देशों की मुद्राएं कमजोर पड़ीं. फसलों के संरक्षण में इस्तेेमाल होने वाले रसायनों की खरीद या तो टाल दी गयी या फिर हुई ही नहीं जिससे उनका उत्पादन करने वाली कंपनियों की बिना बिके माल की लम्बी फेहरिस्त से उत्पन्न समस्या का सामना करना पड़ा. इन सब की वजह से वित्त वर्ष 2015 में भारत से होने वाले निर्यात में लगभग 2.5 प्रतिशत की दर से मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गयी. फसलों की सुरक्षा में काम आने वाले रसायनों के लिहाज से भी भारत और समूचे विश्व के लिए यह साल बड़ा चुनौती पूर्ण रहा. कमजोर वर्षा/सूखे, जिंसों के दामों में भारी गिरावट और कई देशों की मुद्रा के अवमूल्यन से फसल संरक्षण में काम आने वाले रसायनों के बाजार के विकास पर असर पड़ा. इस क्षेत्र पर इन कारकों का असर अभी और कुछ वर्षों तक बना रह सकता है. भारतीय कृषि-रसायन बाजार का संचालन खरपतवार नाशकों और कवक नाशकों में बढ़ोतरी, कृषि-रसायनों के सूझबूझ से उपयोग के बारे में बढ़ती जागरूकता, ठेके पर उत्पादन और निर्यात के अवसर जैसे कारकों से होगा. इस समय भारत में कीटनाशकों की प्रति हैक्टेयर खपत दुनिया में लगभग सबसे कम यानी 0.6 कि. ग्राम प्रति हैक्टेयर है जबकि ब्रिटेन में यह 5-7 कि. ग्रा प्रति हैक्टेयर और चीन की 13 कि. ग्रा प्रति हैक्टेयर है. जागरूकता में बढ़ोतरी होने और बाजार में पैठ बढऩे से निकट भविष्य में खपत में वृद्धि के आसार हैं. इसके अलावा भी अप्रामाणिक उत्पादों की चुनौती, घरेलू निर्माताओं द्वारा अनुसंधान और विकास पर कमजोर, सप्लाई-चेन में दक्षता की कमी जैसी समस्याओं का भी प्राथमिकता के आधार पर हल निकालना भी जरूरी है.
पादप संरक्षण का राष्ट्रीय परिदृश्य
वित्त वर्ष 2015 भारत और पूरे विश्व में फसल संरक्षण में काम आने वाले रसायनों के बाजार की दृष्टि से बड़ा चुनौतीपूर्ण रहा. भारत की आर्थिक समीक्षा के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.1 प्रतिशत रही. देश को कमजोर मानसून की स्थिति का सामना करना पड़ा क्योंंकि वर्षा अनुमान से 12 प्रतिशत कम हुई. सूखे जैसी स्थिति का असर कई राज्यों को झेलना पड़ा, खास तौर पर खरीफ मौसम में. भारत के फसल संरक्षण उद्योग के लिए वित्त वर्ष 2015 ठहराव वाला साल साबित हुआ जिसमें विकास दर 2 प्रतिशत के मामूली स्तर पर बनी रही. कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी से फसल संरक्षण रसायनों की मांग में इजाफा होगा. फसल संरक्षण रसायन बनाने वाले उद्योगों के लिए आधान मूल्य फिलहाल निचले स्तर पर ही बने रहने की संभावना है जिसका असर किसानों की उपज के बिक्री मूल्यों पर पड़ता है. इसकी वजह से बाजार में मात्रा की दृष्टि से बढ़ोतरी हो सकती है, मगर लागत के लिहाज से विकास दर मामूली रहने की संभावना है. दीर्घावधि प्रेरक, जैसे बढ़ती आबादी, कीटनाशकों की मौजूदा प्रति व्यक्ति खपत का वर्तमान निम्न स्तर, खेती की जमीन में कमी, उत्पादकता पर जोर देने और लोगों की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी के इसी स्तर पर बने रहने का अनुमान है जिससे विश्व के फसल संरक्षण बाजार को बढ़ावा मिलेगा.
भारत में हर साल किसानों द्वारा उगाये जाने वाले खाद्यान्न का औसतन 15-25 प्रतिशत हिस्सा कीड़ों और बीमारियों की भेंट चढ़ जाता है. बढ़ती जनसंख्या और घटती कृषि योग्य भूमि के कारण अनाज की मांग उत्पादन के मुकाबले बड़ी तेजी से बढ़ रही है. इससे जरूरी हो जाता है कि फसल उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही फसलों के संरक्षण के तौर-तरीकों पर और अधिक जोर
दिया जाए.
फसल संरक्षण रसायनों का उपयोग करके और कीटों के हमलों से फसलों के नुकसान को घटाकर उत्पादकता को 25-50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है. इसलिए खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए फसल संरक्षण रसायन भी बहुत जरूरी हैं.
भारतीय फसल संरक्षण बाजार
भारतीय फसल संरक्षण बाजार में कीटनाशकों का दबदबा है जो बाजार में फसल संरक्षण रसायनों के करीब 60 प्रतिशत के बराबर हैं. इनका सबसे अधिक उपयोग धान और कपास की फसल में होता है. कवक नाशक और खरपतवार नाशक रसायनों का उपयोग सबसे अधिक बढ़ रहा है और फसल संरक्षण रसायन बाजार में इनका हिस्सा क्रमश: 18 प्रतिशत और 16 प्रतिशत है. खरपतवार नम और गर्म जलवायु में सबसे ज्यादा पनपते हैं तथा सर्दी के मौसम में नष्ट हो जाते हैं इसलिए खरपतवार नाशकों की बिक्री मौसमी तौर पर होती है. चावल और गेहूं की फसलों में इनका व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है. बढ़ती हुई श्रम लागत और मजदूरों की कमी खरपतवार नाशकों के उत्पादन में वृद्धि के सबसे बड़े प्रेरक हैं. कवक नाशकों का उपयोग फलों, सब्जियों और धान की फसल में अधिक होता है. कवकनाशकों की वृद्धि दर के मुख्य प्रेरक हैं: खेती के तरीकों में बदलाव की वजह से नकदी फसलों की जगह फलों और सब्जियों के उत्पादन पर जोर और सरकार द्वारा फलों तथा सब्जियों के निर्यात पर जोर दिया जाना. बायो-पेस्टिसाइड्स के अंतर्गत तमाम जैव सामग्री वाले सूक्ष्मजीव आते हैं जिनका उपयोग कीड़े-मकौड़ों पर नियंत्रण के लिए किया जाता है. इस समय जैव-कीटनाशकों का भारतीय फसल संरक्षण बाजार में हिस्सा 3 प्रतिशत के बराबर है. लेकिन रासायनिक कीटनाशकों से उत्पन्न सुरक्षा एवं विषाक्तता संबंधी चिंताओं, कठोर कायदे-कानूनों और सरकारी सहयोग के कारण इनके उत्पादन में विकास की अच्छी संभावनाएं हैं. आंध्र प्रदेश (तेलंगाना और रायल सीमा समेत), महाराष्ट्र और पंजाब देश में कीटनाशकों की सबसे अधिक खपत करने वाले राज्य हैं और उनकी कुल खपत 45 प्रतिशत के बराबर है. आंध्र प्रदेश कुल खपत में 24 प्रतिशत हिस्से के साथ देश में कीटनाशकों की सबसे अधिक खपत करने वाला राज्य है. कीटनाशकों का उपयोग करने वाले सात शीर्ष राज्य देश में फसल संरक्षण रसायनों का कुल 70 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं.
भारत के फसल संरक्षण बाजार के लिए शानदार अवसर और विकास के प्रमुख प्रेरक अनुबंधित विनिर्माण और निर्यात संभावनाएं : भारत से कीटनाशकों के निर्यात में पिछले कुछ वर्षों में अच्छी वृद्धि हुई है. दुनिया में भारत कीटनाशकों का 13वां सबसे बड़ा निर्यातक है. ज्यादातर निर्यात पेटेंट के दायरे से बाहर के उत्पादों का होता है. भारत मुख्य रूप से ब्राजील, अमेरिका, फ्रांस और हालैंड को कीटनाशकों का निर्यात करता है. इस क्षेत्र में विकास को गति देने में सबसे बड़ी भूमिका कम लागत में उत्पादन की हमारी क्षमता, तकनीकी दृष्टि से प्रशिक्षित श्रम-शक्ति की उपलब्धता, मौसमी घरेलू मांग, अपनी जरूरत से ज्यादा उत्पादन की क्षमता, दुनिया में बेहतर दाम मिलने की संभावना और जेनेरिक कीटनाशकों के निर्माण में हमारी अच्छी स्थिति (भारत के पास 60 से अधिक जेनेरिक अणुओं की प्रोसेस टेक्नोलॉजी उपलब्ध है) जैसे कारकों की रही है. ऊपर बताए गये कारणों से भारत में अनुबंध आधार पर कीटनाशकों के निर्माण की अच्छी संभावनाएं हैं. सुनामी के बाद जापानी कंपनियां खतरों से बचने के लिए देश से बाहर विनिर्माण क्षमता के सृजन के प्रयास कर रही हैं. जापानी कंपनियां गोपनीयता और बौद्धिक संपदा संरक्षण के बारे में बेहद सजग होती हैं. कुछ कंपनियों को भारत में संभावनाएं नजर आ रही हंै और वे यहां अपना आधार तैयार करने में लगी हैं. सुमीतोमो और एक्सेल क्रॉपकेयर के बीच समझौता इसका एक उदाहरण है. आने वाले समय में इस तरह के और भी समझौते हो सकते हैं क्योंकि इससे भारतीय कंपनियों को टेक्नोलॉजी तक पहुंच हासिल होगी जिसकी उनको आवश्यकता है और इस तरह विश्वस्तर की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हमारे देश में फास्ट ट्रैक एंट्री मिल जाएगी. 2020 तक 4.1 अरब डालर मूल्य के कृषि रसायनों का पेटेंट समाप्त हो रहा है. जेनेरिक सेगमेंट में विशेषज्ञता रखने वाली भारतीय कंपनियों के लिए यह निर्यात का बड़ा अच्छा मौका है. दुनिया के छह शीर्ष आयातक देश भारत से निर्यात किये जाने वाले कृषि रसायनों का 44 प्रतिशत अपने यहां आयात कर लेते हैं. इससे भारतीय कंपनियों की निर्यात क्षमता का पता चलता है. निर्यात के लिए एक मजबूत आधार के निर्माण के लिए कंपनियां घरेलू कंपनियों के साथ मिलकर निर्यात वाले क्षेत्रों में विपणन कार्यालय स्थापित कर सकती हैं. कंपनियां स्थानीय कंपनियों के साथ नीतिगत गठबंधन करके अपने विपणन और वितरण का दायरा भी बढ़ा सकती हैं. विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए विलय और अधिग्रहण की संभावनाओं का पता लगाया जा सकता है. कृषि-रसायनों के प्रमुख विकास प्रेरकों में ये बातें शामिल हैं:
खरपतवार नाशकों और कवक नाशकों का विकास : श्रमिकों की कमी, श्रम की बढ़ती लागत और जीएम फसलों के विकास ने खरपतवार नाशकों के उपयोग को बढ़ाया है. 2015 में भारत में खरपतवार नाशकों की खपत 40 करोड़ डालर के बराबर रही और अगले 5 वर्षों में 15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ोतरी होने और 2020 तक इसके 80 करोड़ डालर के स्तर पर पहुंच जाने की संभावना है. दूसरी ओर भारत में कवक नाशकों का उत्पादन करने वाले उद्योगों का विकास बागवानी उद्योग की वजह से बढ़ा है जिसमें पिछले 5 वर्षों में 7.5 प्रतिशत की चक्रवृद्धि दर से बढ़ोतरी हुई है.
भारत में कीटनाशकों की कम खपत : भारत में कीटनाशकों की प्रति हैक्टेयर खपत दुनिया में सबसे कम है. हमारे यहां प्रति हैक्टेयर 0.6 किग्रा कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है जबकि ब्रिटेन में यह 5-7 किग्रा. प्रति हैक्टेयर और चीन में लगभग बीस गुना ज्यादा यानी 13 किग्रा प्रति हैक्टेयर है. पैदावार बढ़ाने और अपनी विशाल आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत में कृषि रसायनों के उपयोग में बढ़ोतरी होना निश्चित है. इसके अलावा कृषि-रसायन उद्योग के प्रमुख प्रेरकों में ये भी शामिल हैं:
*किसानों और उत्पादकों के संगठनों का गठन कर छोटी जोतों की वजह से होने वाली समस्याओं का समाधान;
*ऐसी उपयुक्त टेक्नोलॉजी की उपलब्धता और प्रसार जो अनुसंधान की गुणवत्ता और कौशल विकास के स्तर पर आधारित हो;
*कृषि और इसके बुनियादी ढांचे पर योजना खर्च के साथ साथ नीति को भी बाजार के कामकाज में सुधार और प्राकृतिक संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए;
*संस्थाओं के स्तर पर अभिशासन में सुधार जिससे ऋण और पशु स्वास्थ्य तथा बीज, उर्वरक, कीटनाशक और और फार्म मशीनरी जैसे गुणवत्ता पूर्ण आधानों की बेहतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके.
भारतीय फसल संरक्षण उद्योग और व्यापार
भारत का फसल संरक्षण उद्योग 2020 तक 6.3 अरब डालर का होने जा रहा है. इसकी विकास दर 7.5 प्रतिशत वार्षिक रहने का अनुमान है. भारतीय फसल संरक्षण उद्योग के 2014-15 में 4.4 अरब डालर का होने का अनुमान था जिसमें निर्यात का हिस्सा 47 प्रतिशत के बराबर था. इस उद्योग पर कीटनाशकों का दबदबा है जो कुल मांग में 60 प्रतिशत का योगदान करते हैं. इसके बाद कवक नाशकों और खरपतवार नाशकों का स्थान है जिनका हिस्सा कुल मांग का क्रमश: 18 प्रतिशत और 16 प्रतिशत है. कृषि-रसायन राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. देश में 2030 तक खाद्यान्नों की कुल मांग के 35.5 करोड़ टन वार्षिक के स्तर पर पहुंच जाने के अनुमान के मद्देनजर भारतीय कृषि के लिए फसल संरक्षण उत्पादों और तौर-तरीकों का दक्षतापूर्ण उपयोग आज समय की आवश्यकता है. सही क्षमता के उपयोग के लिए इस उद्योग, सरकार और विनियामक संगठनों को पूरे तालमेल से काम करना होगा और किसानों से संपर्क को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाना होगा. भारतीय कृषि क्षेत्र आज खेती की जमीन के कम होने, कृषि जोतों का आकार घटने, महामारियों के बढ़ते हमलों, प्रति हैक्टेयर पैदावार में कमी और पशु उत्पादों वाले आहार की ओर लोगों के बढ़ते रुझान जैसी कड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है. इससे देश की खाद्य शृंखला में मांग ने आपूर्ति को पीछे छोड़ दिया है. ऐसे में असंतुलन को दूर करने में कृषि रसायन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. भारत कृषि-रसायनों का दुनिया में चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और अमेरिका, जापान और चीन के बाद उसका स्थान आता है. इस क्षेत्र ने 2015 में 4.4 अरब डालर का मूल्य सृजन किया और इसके 7.5 प्रतिशत वार्षिक की दर से वृद्धि करते हुए 2020 तक 6.3 अरब डालर के स्तर पर पहुंच जाने की संभावना है. इस उद्योग की करीब 50 प्रतिशत मांग घरेलू उपभोक्ताओं से आती है और बाकी निर्यात से. इसी अवधि के दौरान घरेलू मांग के 6.5 प्रतिशत वार्षिक की दर से और निर्यात के 9 प्रतिशत वार्षिक दर से बढऩे का अनुमान है. हाल में पांच समुदायों और 10 किसानों को सरकार ने पादप जीनोम रक्षक के पुरस्कार से सम्मानित किया. भारत में टिकाऊ खेती के लिए पादप जीनोम और पीपीवी एंड एफआर अधिनियम की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेेषण करने की आवश्यकता है. केन्द्र सरकार ने किसानों की आमदनी को दुगना करने के तौर-तरीकों के बारे में सुझाव देने के लिए एक समिति गठित की है. अन्य बातों के साथ-साथ 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी करने में कृषि अनुसंधान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी. भारतीय कृषि अनुसंधान प्रणाली दुनिया में सबसे मजबूत अनुसंधान प्रणालियों में से एक है. देश के सामने आज जो चुनौती है वह नयी और सुधरी हुई किस्मों/संकर किस्मों के विकास की है जो विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हो और साथ ही जो टिकाऊ आधार पर उत्पादकता बढ़ाते हुए जैव और जैवेत्तर दबावों का मुकाबला कर सके. लेकिन अनुसंधान और परीक्षण प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं. समुदाय और व्यक्तिगत किसान भी इसमें अपना योगदान कर रहे हैं. देश के विभिन्न भागों से पांच समुदायों और 10 किसानों को संरक्षण को बढ़ावा देने और किसान किस्म केपादपों के आनुवंशिक संसाधनों के उपायोग में योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान किये गये. ये किस्में सुधरी हुई/ संकर नस्लों के विकास में बुनियाद के पत्थर का काम करती हैं और इस तरह तमाम फसलों में उच्च स्तर की उत्पादकता लाने में अपना योगदान करती हैं. हाल के वर्षों में पादप वस्तुओं के आयात और निर्यात की मात्रा में बढ़ोतरी होती रही है और कीटों और बीमारियों के अपने उत्पत्ति के स्थान से नयी जगहों में पहुंचने की स्पष्ट संभावना है. कॉटनी कुशन स्केल, वूली एफिड, सान जोश स्केल, आलू के गोल्डन सिस्ट नेमेटोड और जायंट अफ्रीकन स्नेल जैसे कुछ ऐसे कीट हैं जो हमारे देश में आ चुके हैं और जिनसे व्यापक नुकसान हो सकता है. इसलिए बाहरी कीटों, बीमारियों और खरपतवार को देश में पहुंचने से रोकने के लिए कानूनी प्रतिबंध लागू किये जाते हैं जिन्हेें आमतौर पर क्वारेंटाइन यानी संगरोध कहा जाता है. पादप संगरोध विनियामक उपाय राष्ट्रीय स्तर (घरेलू संगरोध) और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर (विदेशी संगरोध) किये जाते हैं. संगरोध के उपायों को लागू करना कानूनी अधिनियमों से समर्थित है जिन्हें संगरोध कानून कहा जाता है. यह कानून कीटों को फसलों से अलग-थलग करने में एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में कार्य करता है. कीटों के प्रबंधन के लिए संगरोध पर कारगर अमल पर जोर देने की आवश्यकता है क्योंकि इससे बाद में फसलों की उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिलती है.
भारतीय फसल संरक्षण उद्योग के समक्ष मौजूदा चुनौतियां
फसलों के संरक्षण में काम आने वाले रसायन या कृषि-रसायन फसल कटाई से पहले और उसके बाद फसल प्रबंधन को आसान बनाने तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले महत्वपूर्ण साधन हैं. कृषि-रसायन क्षेत्र के पास विकास की बहुत बड़ी ऐसी क्षमता है जिसका उपयोग होना अभी बाकी है क्योकि इस समय विश्व के अन्य देशों के मुकाबले हमारे देश में इनका बहुत कम उपयोग हो रहा है. इसके अलावा बहुत अधिक निर्यात-प्रधान भी है और 50 प्रतिशत उत्पादों का निर्यात कर दिया जाता है. इस क्षेत्र के समक्ष कई चुनौतियां हैं और इनके समाधान से भारत उच्च गुणवत्ता के फसल संरक्षक रसायनों के उत्पादन का वैश्विक केन्द्र बन कर उभर सकता है. इसके अलावा अप्रामाणिक कीटनाशकों का हिस्सा भी कोई कम नहीं है जिनमें जाली, नकली, मिलावटी या घटिया उत्पादों का हिस्सा भी कम नहीं है. उद्योग के अनुमान के अनुसार 2014 में भारत में गैर-प्रामाणिक कीटनाशकों की मात्रा बेचे गये कीटनाशकों की कुल मात्रा के 40 प्रतिशत से अधिक थी. इस तरह के उत्पाद घटिया फार्मूला के आधार पर बनते हैं और इनसे कीड़े-मकौड़े ठीक तरह से नहीं मरते. इनसे ऐसे उप-उत्पाद भी बनते हैं जिनसे मिट्टी और वातावरण को भारी नुकसान पहुंचता है. फसलों को होने वाले नुकसान और जमीन की उर्वराशक्ति के विनाश के साथ-साथ गैर-प्रामाणिक उत्पादों से किसानों, कृषि-रसायन कंपनियों और सरकार को आमदनी का नुकसान होता है. गैर-प्रामाणिक उत्पादों के उपयोग के मुख्य कारणों में किसानों में जागरूकता की कमी, असली और नकली उत्पाादों में फर्क कर पाने की असमर्थता, सप्लाई चेन संबंधी अकुशलता, कानून पर अमल की चुनौतियां और कीटनाशकों के वितरकों/फुटकर विक्रेताओं की ग्राहक को पटाने की क्षमता शामिल हैं.
क) कठोर विनियमन : दुनिया भर में पर्यावरण संबंधी कठोर नियमों से नये उत्पादों के विनिर्माण की लागत में बढ़ोतरी हो रही है और बाजार में नये उत्पादों के आने में भी देरी हो रही है. उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ में अगर किसी कृषि-रसायन को म्यूटाजेनिक या कार्सीनोजेनिक पाया जाता है या उसे इंडोक्राइन डिसरप्टर करार दिया जाता है तो उसका पंजीकरण या पुन: पंजीकरण संभव नहीं हो पाता भले ही उसे कितने ही ऊंचे स्तर पर प्रचार क्यों न मिला हो.
ख) घरेलू विनिर्माताओं द्वारा अनुसंधान और विकास पर कम ध्यान : नोवल मॉलिक्यूल की खोज के लिए अनुसंधान और विकास के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी और जनशक्ति में निवेश की आवश्यकता पड़ती है. भारतीय कंपनियां अपनी आमदनी का सिर्फ 1-2 प्रतिशत अनुसंधान और विकास पर खर्च करती हैं जबकि दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियां का इस मद में खर्च करीब 8-10 प्रतिशत तक है. इससे भारतीय विनिर्माता विश्व स्तर पर प्रतियोगिता में अक्षम साबित होते हैं खास तौर पर स्पेशलिटी मॉलिक्यूल की खोज में.
ग) किसानों में शिक्षा और जागरूकता की कमी: किसानों को उपयुक्त किस्म के कीटनाशकों, इनके भंडारण, गुणवत्ता और इनको इस्तेमाल करने की बारंबारता के बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी है. लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के भेद की वजह से किसानों से संपर्क करना आसान नहीं है. इसके अलावा फसल खराब होने के जोखिम की वजह से नये उत्पादों को अपनाने के प्रति किसानों का रवैया बहुत उत्साहजनक नहीं होता और उसमें जड़ता अधिक होती है. विनिर्माताओं और किसानों के बीच फुटकर व्यापारी संपर्क बिन्दु का काम करते हैं जिनके पास कोई तकनीकी विशेषज्ञता नहीं होती इसलिए वे किसान को उत्पाद के बारे में समुचित जानकारी नहीं दे पाते. किसानों के लिए भी यह बड़ा मुश्किल है कि वे अपनी आवश्यकताओं के बारे में विनिर्माताओं को सही तरीके से बता सकें.
घ) कुशल वितरण प्रणाली की आवश्यकता: उत्पाद का अंतिम रूप से बड़ी तादाद में उपयोग करने वाले किसान और बाजार के जेनेरिकस्वरूप को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि फसल संरक्षण बाजार के लिए एक मजबूत और कार्यकुशल वितरण नेटवर्क हो. लेकिन यह उद्योग सप्लाई-चेन की कमजोरियों की वजह से समस्याओं और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमजोरियों से ग्रस्त है जिससे फसल समेटने के बाद की हानियों के रूप में हर साल 45,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाता है. कुशल वितरण प्रणाली की कमी की वजह से कृषि-रसायन कंपनियों के लिए किसानों तक पहुंचना, अपने उत्पादों का प्रचार करना और किसानों को अपने उत्पाद के फायदों के बारे में बताना बड़ा मुश्किल हो जाता है.
(लेखक सोशल रिस्पोंसिबिलिटी काउंसिल, नई दिल्ली के संस्थापक निदेशक हैं. ई-मेल : khurana@arunkhurana.com)
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