विशेष लेख


Volume-37, 9-15 November, 2017

 
त्वचा : दिल और स्वास्थ्य का आइना

डॉ. राखी मेहरा

त्वचा दिल और शरीर का आइना होती है चूंकि यह सीधे वातावरण के संपर्क में आती है इसलिए त्वचा रोगजनकों के खिलाफ शरीर की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. एक औसतन वयस्क मनुष्य की त्वचा का surface area 1.5-2.0 वर्ग मीटर या 16.1 से 21.5 वर्ग फीट होता है. एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य के कुल प्रोटीन्स जीन्स की 70% अभिव्यक्ति त्वचा से ही होती है.
हर कोई चाहता है कि उसका चेहरा लाखों में एक दिखे. इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी त्वचा के बारे में जानें. मौसम के अनुसार त्वचा की देखभाल का विशेष ध्यान रखना पड़ता है. सर्दियों ने दस्तक दे दी है. ऐसे में इस मौसम में त्वचा से लेकर सेहत तक का ख्याल रखने की आवश्यकता होती है, नहीं तो त्वचा संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
मनुष्य की त्वचा शरीर की बाहरी सतह है जो Integument System का सबसे बड़ा अंग है. त्वचा, एक्टोडर्म ऊतक से बना हुआ सात परतों वाला ऐसा अंग है जो उसके नीचे स्थित रूह्वह्यष्द्यद्ग अस्थियों, लिगामेंट एवं आंतरिक अंगों की रक्षा करता है. सामान्य त्वचा रोम कूपों से युक्त होती है जब यह त्वचा वातावरण से आतंरिक अवयवों की रक्षा करती है. अत: वातावरण या बाहरी सभी जीवाणु, रोगाणु (Pathogens) से और शुष्कता के विरोध में भी शरीर के तापमान और नमी की रक्षा करती है. त्वचा से स्पर्श की अनुभूति, तापमान नियमन, रोधन, विसंवाहन, पृथक्करण, विटामिन D का निर्माण, विटामिन B फोलेटस की रक्षा, घाव का रोहण (healing), Scar बनाना और Cut, टूट-फूट को ठीक करना है. अत: त्वचा का रंग त्वचा के स्वास्थ्य की निशानी नहीं होता है त्वचा शुष्क (Dry) या तैलीय (Oily) या दोनों (Mixed) यानि कहीं तैलीय और कहीं शुष्क हो सकती है.
त्वचा के इस प्रकार से ही रोगाणु का पनपना, त्वचा की लचकता, त्वचा का सौंदर्य, त्वचा की नमता पर प्रभाव पड़ता है.
एक स्वस्थ त्वचा में तकरीबन १००० प्रजाति-जाति के बैक्टीरिया एवं १९ फाइला मौजूद होते हैं.
खाने के पहले हाथ धोना हर बच्चे, वयस्क, बुजुर्ग या कहें प्रत्येक के लिये स्वयं के प्रति प्रथम कर्तव्य है.
त्वचा में mesodermal कोशाएं होती हैं. और त्वचा का वर्ण melanin की melanocytes से होता है, जो सूर्य के प्रकाश में कुछ हद तक UV किरणों (ultraviolet radiation) से त्वचा को बचाता ही है.
त्वचा में DNA Repair एन्जाइम भी होते हैं जो ङ्क किरणों से हुये नुकसान से त्वचा को स्वस्थ करने में भी सहायक होते हैं. इसलिये ऐसी त्वचा जिसमें इस एन्जाइम के जीन्स नहीं होते उनमें त्वचा का कैंसर होने की प्रबल संभावना बन जाती है.
त्वचा की मोटाई भी शरीर में उसकी स्थिति के अनुरूप विभिन्न होती है. ये विभिन्नता भी लिंगानुसार भी पृथक-पृथक होती है और त्वचा की मोटाई का अनुपात मनुष्य की वयानुसार भी पृथक-पृथक होता है.
हाथ से कोहनी तक की त्वचा की मोटाई औसतन एक वयस्क पुरुष में १.३ mm तथा एक वयस्क महिला में १.२६ मिमी. होती है.
इस तरह संरचना की दृष्टि से देखा जाये जो त्वचा का ६.५ ष्द्व२ (वर्ग सेंटीमीटर) ६५० स्वेद ग्रंथियां, २० रक्त वाहिनियां, ६०००० मिलेनोसाइट और १००० तंत्रिकायें होती हैं.
यह तथ्य ही इंगित करता है कि शरीर के इतने अहम् sensory organ की अवहेलना करना संपूर्ण स्वास्थ्य के लिये कितना आवश्यक है. अत: प्रत्येक त्वचा की कोशाओं का स्वास्थ्य की दृष्टि से देखभाल करना एक दायित्व है. औसतन मनुष्य की त्वचा की एक कोशा का व्यास ३० micrometer होता है और वह भी कई अन्य तथ्यों से प्रभावित होता है. अत: एक कोशा का व्यास २५-४० mm2  हो सकता है.
त्वचा का संगठन:- त्वचा में मुख्यत: आधुनिक शास्त्र में ३ प्रकार तथा प्राचीन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ७ प्रकार होते हैं.
प्रकार:- एपी, डर्मिस एवं हाइपोडर्मिस
एपीडर्मिस (Epidermis)- ग्रीक शब्द एपीका अर्थ ऊपर होता है. अत: त्वचा की बाह्य परत का नाम एपीडर्मिस है.
यह जल प्रमाणित (Waterproof), संरक्षक सतह होती है जो संक्रमण से रक्षा कर squamous epithelium से बनी होती है.
इसमें रक्त वाहिनियां नहीं होती.
यह एपीडर्मिस पुन: निम्न प्रकार से सतहों में बंटी होती है-
त्वचा की सबसे बाहरी सतह Statum Corneum कहलाती है जहां डिस्क्वेमेशन के द्वारा प्रत्येक सप्ताह 25-30 सतही मृत कोशाओं का निकलना, प्राकृतिक तरीके से शरीर के जल का संचय करने तथा हानिकारक रोगाणुओं का कार्य केरेटेनाइजेशन से होता है. प्राकृतिक सुरक्षा के इन्ही नियमों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में नवजात शिशुओं की त्वचा को क्षरण सतह में सुरक्षित रखने के लिए अस्पताल में नहीं नहलाया जाता है. अब इसका ये बिल्कुल अर्थ नहीं है कि त्वचा की नियमित सफाई नहीं करनी चाहिए. वस्तुत: लगातार जमी मृत कोशाएं, रोमकूप को सांस नहीं लेने देती और संक्रमण को पनपने देती हैं.
डर्मिस : - StrainStress में गद्दी (Cushion)  का कार्य करने वाली त्वचा की अंदरूनी सतह कई तंत्रिकाओं के सिरे, तापमान, रोमकूप, स्वेद ग्रंथि, पसीने की ग्रंथि, एपोक्राइन गं्रथि से युक्त होती है. एपीडर्मिस के नीचे की त्वचा डर्मिस कहलाती है और स्ट्रेस और स्ट्रेन में कुशन का कार्य करती है. डर्मिस, एक बेसमेंट मेम्ब्रेन से एपीडर्मिस से सख्ती से बंधी होती है. ये रिक्त वाहिनियां त्वचा को पोषण पहुंचा कर उनके मल को बाहर निकालती है.
तथ्य है कि टैटू (Tatoo) की स्याही, डर्मिस में ही रहती है जो उसको स्थिरता देती है.
गर्भावस्था और मोटापा की वजह से बने Stretch Marks डर्मिस में ही स्थित होते हैं.
आयुर्वेद त्वचा की सात सतह बाताता है.
१.अवभासिनी- सबसे बाहरी जो रंग, स्वास्थ्य को दिखाती है.
२.लोहिता- जो त्वचा को रक्त प्रवाह देती है.
३.श्वेता- जो त्वचा को स्वेद देती है.
४.ताम्र- यह रक्त प्रवाह व Sweat ग्रंथि युक्त त्वचा को संरक्षता देती है. त्वचा का संक्रमण इसी सतह पर होता है.
५.वेदिनी- यह पांचवीं सतह त्वचा को शरीर के बाकी हिस्से से जोड़ती है. इसलिये आहत होने पर तंत्रिका की अधिकता से वेदना का तुरंत भान कराती है.
६.रोहिणी- इस सतह से Healing  होती है और स्वाभाविक रूप से fibroblast आदि द्वारा Scarबनते हैं. एक संतुलित भोजन जो संपूर्ण पोषक तत्वों से युक्त होता है, रोहिणी को पोषित करता है.
७.मांसधारा- यह सबसे भीतर की सतह है जो त्वचा को स्थिरता और सघनता देती है. इस सतह के संतुलन में रहने से त्वचा जवान और स्वस्थ लगती है. एक त्वचा Product इसी सतह को पोषित करे तो त्वचा के लिए हितकर होता है. आयुर्वेदिक लेप जिसमें हल्दी, केसर आदि मिले होते हैं इसी सतह पर काम करते हंै और त्वचा के वर्ण को चमकीला के साथ-साथ स्वस्थ बनाते हैं.
Subcutaneous tissue - या हाइपोडर्मिस या सबक्यूटिस वास्तव में डर्मिस के नीचे स्थित होता है और नीचे स्थित अस्थि (bone) या muscle के साथ उसकी रक्त वाहिनियां तथा तंत्रिकाओं के साथ डर्मिस को जोडऩे का कार्य करते हैं. इसमें ढीले संयोजक ऊतक, adipose tissue एवं इलास्टिन elastin के साथ Fibroblasts, macroophages और adipocytes (त्वचा के नीचे के इस ऊतक में ५०त्न शरीर का फैट) होता है. फैट मुख्यत: पैडिंग तथा insulation का काम करता है.
त्वचा की झुर्रियां/या बुढ़ापा-  बुढ़ापा एक सत्य है लेकिन उम्र का दिखना जरूरी नहीं’. बुढ़ापे के साथ त्वचा पतली और कम लचीली हो जाती है. डर्मिस की सघनता कम होने से झुर्रियां पडऩे लगती हैं और प्राकृतिक रूप से त्वचा की healing power कम होने लगती है. जिसमें
Laxity (Sagging) या लटकना
Rhytids(Wrinkels) या झुर्रियां
Photaging (बुढ़ापा दिखने लगना)
Erythema (लालिमा) एवं
Dispigmentation (त्वचा का एक सार न होना)
Solar elastosis ( त्वचा का पीलापन)
Keratosis (अनियंत्रित शुष्कता एवं केराटिन बनना)
Poor texture (त्वचा का सौंदर्य कम होना)
कार्टिसोल कोलेजन का क्षरण करता है जिससे त्वचा को बुढ़ापा आने लगता है. त्वचा की गं्रथियों की कम सक्रियता एवं रक्त संचार का प्रवाह कम होना त्वचा को बुढ़ापे की ओर ले जाता है.
स्वाभाविक उम्र के साथ त्वचा के स्वास्थ्य में स्वाभाविक परिवर्तन तो समय की मांग होती है. लेकिन यदि यही परिवर्तन असमय हो तो जागरूकता व सचेतना जरूरी है तब उपायों को जानना
जरूरी है.
१. त्वचा की सफाई- त्वचा मृत कोशाओं, अच्छे बैक्टीरिया, तेल आदि से आवरित होने के कारण सुरक्षित होती है. अत: त्वचा की नियमित सफाई मृत कोशाओं को हटाने के लिए तो जरूरी है पर बार-बार धोने से उसके सुरक्षात्मक कवच तेल व बैक्टीरिया की भी सफाई हो जाती है. अतएव उसकी सुरक्षा भी आवश्यक है.
इसलिये पसीने का काम करने वालों को तो दो से तीन बार स्नान करना जरूरी है पर कार्यालय में कार्य करने वालों को एक बार स्नान करना पर्याप्त होता है.
२. मृदु साधन का उपयोग- त्वचा के सुरक्षात्मक कवच की रक्षा के लिए मृदु उपाय जैसे साबुन, मिट्टी (मुल्तानी, पतली चिकित्सकीय मृतिका का उपयोग नैचुरोपेथी में स्पष्ट किया गया है. आयुर्वेद में त्वचा के प्रकारानुसार विभिन्न प्रकार के लेपों का वर्णन मिलता है, जो त्वचा की सात सतहों के स्वास्थ्य को कायम रखती है.
इन मृदु उपायों की उपयोगिता से स्पष्ट है कि बहुत गरम या बहुत ठंडा पानी त्वचा को शुष्कता या रूखापन दे सकता है इसलिये मृदु तापमान का जल अर्थात् सामान्य तापमान का पानी त्वचा के लिये हितकारी
होता है.
मृदु (Soothing और Moisturizing घटक जैसे ऐलोवेरा, वानस्पतिक तेल, जड़ी बूटियां व वानस्पतिक औषधियां जैसे गुलाब, चंदन, हल्दी, केसर, परिजात, जाती आदि त्वचा के लिये अत्यंत लाभकारी कही गई हैं.
रसायन जैसे sodium Lauryl Sulfate, अल्कोहल जैसे तत्व त्वचा को रूखा बनाते हैं और हानिकारक होते हैं.
अत: ऐसे कोई भी उपाय जो त्वचा के रंग, लचीलापन, मृदुता व नमता को प्रभावित करते हों, का प्रयोग त्वचा के लिए हानिकारक होता है. अब मृदु स्नान  या धोने के बाद त्वचा को मृदु कपड़े से, मृदुता से ही पोछना चाहिये ताकि एपीथीलियम की प्राकृतिक संरचना नष्ट न हो सके. इसलिये नरम तौलिया  से प्यार से दुलार से त्वचा को पोंछना चाहिये. इससे त्वचा का प्राकृतिक तेल सुरक्षित रहता है और वातावरण में लगातार परिवर्तित होती सूर्य किरणों और प्रदूषण से रक्षा करता है. इसलिये आधुनिकता भी त्वचा की नमी को बरकरार रखने हेतु Moisturizerके प्रयोग को अहमियत देती है. इसमें शिया और कोको बटर या क्रीम, नारियल तेल आदि का भी प्रयोग बहुतायत से देखा गया है.
इसमें भी क्रीम की जगह Lotion या Gels से ज्यादा गुणवत्ता त्वचा की सतहों में जा
सकती है.
ग्रीन चाय, विटामिन सी और एलोवेरा का संगठन त्वचा की सफाई, नमी व लचीलापन के लिये अत्यंत मृदु उपाय है.
मृदु Diet :- ऋतु अनुसार उपलब्ध सब्जियां और फलों का उपयोग प्राचीनतम चिकित्सा विज्ञान-आयुर्वेद में सर्वश्रेष्ठ मृदु स्रद्बद्गह्ल के रूप में वर्णित है जो त्वचा व शरीर की रक्षा व स्वास्थ्य को कायम रखती है.
आधुनिक शास्त्र भी गहरी, हरी सब्जियां (शाक), चमकीले प्रत्येक रंग से युक्त फलों के संयुक्त रूप से सेवन को बढ़ावा देता है.
उदाहरणत: टमाटर, आंवला, नींबू, त्वचा के लिए अत्यंत हितकारी हैं.
आहार जिसमें एन्टी आक्सीडेंट, सेलेनियम, क्त-१० को- एन्जाइम और फ्लेवनाइड होते हैं वो त्वचा को चमकदार और युवा बनाये रखता है.
बेरी, मशरूम, शकरकंद, बीन्स, ओलिव तेल, एप्रीकोट, मछली, Seafood, सोयाबीन, तिल का तेल, डार्क चाकलेट, ग्रीन चाय में उपरोक्त तत्व
मिलते हैं.
आहार जिसमें विटामिन A,C एवं E बहुतायत से होते हैं वे स्वस्थ त्वचा के लिये अति हितकर होते हैं. विटामिन सी कोलेजन को बनाती है और elastic की मजबूती से त्वचा को बुढ़ापे से बचाती है. खट्टे फल, पपीता, कीवी, स्ट्राबेरी, कद्दू, अनार झुरियों को दूर करने में सहायक सिद्ध हो चुके हैं.
विटामिन ए जिसमें संतरे, हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, अंडे, विटामिन ई जिसमें बीज, जैतून, हरी पत्तेदार सब्जियां आती हैं, त्वचा के लिये लाभदायक सिद्ध हो चुके हैं.
ओमेगा-३ और ओमेगा-६ फैटी अम्ल का सेवन त्वचा को नम, चमकदार बनाये रखकर शुष्कता को और दाग धब्बों को दूर करते हैं. इसकी पूर्ति अखरोट, जैतून, कैनोला, अलसी बीज, मछली से हो
सकती है.
पानी पीना:- शरीर में ७०त्न जल होने से त्वचा को नम रखने के लिए और शुष्कता,रूखापन तथा झुर्रियां से बचाने के लिये आठ बार कम से कम दिन में पानी पीना अनिवार्य होता है.
अतिरिक्त शर्करा का सेवन न करें- त्वचा को लटकने से बचाने के लिये शर्करा या Sugar का सेवन कम करना चाहियें. क्योंकि Sugar स्वयं प्रोटीन से molecule से बंध जाती है और कोलेजन तथा एलास्टीन को नुकसान पहुचाती है. इसलिये प्राकृतिक sugar जो फलों से मिल जाती है, के अतिरिक्त लेना त्वचा के लिए हानिकारक हो जाती है.
विटामिन डी की Synthesis त्वचा से ही होने के कारण आहार में ही कैल्शियम, जिंक जैसे खनिजों की आवश्यकताएं पूरी होती हैं और इसके लिए सोया, दूध व दूध के उत्पाद लाभकारी हो जाते हैं. दही त्वचा के लिये Probiotic का कार्य करता है. एक अनुसंधान से यह साबित है कि केवल अपने रोजमर्रा के खान-पान में सुधार से ही एक व्यक्ति अपनी त्वचा को चमकदार व स्वस्थ बना सकता है.
प्रसिद्ध मायो क्लीनिक त्वचा के स्वास्थ्य के लिए पीले, हरे और नारंगी फलों तथा वनस्पतियों को, फैट फ्री दुग्ध व उसके product तथा पूर्ण अन्न (whole grain food) Fatty Fish,, मेवे को खाने की हिदायत देता है.
विहार :- प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति में आहार यानि diet management के साथ-साथ विहार यानि क्या करें क्या न करें की भी स्वास्थ्य रक्षण में अहम भूमिका होती है. इसलिए त्वचा के स्वास्थ्य में भी do और don’ts का ध्यान रखना आवश्यक है.
स्नान-सफाई या Hygiene - त्वचा की ऊपरी सतह की सफाई के लिये स्नान, धोना, लेप आदि के साथ प्रत्येक रोम कूपों की सफाई में स्वेदी करण (Sudation) स्नेहन (Oliation) Sauna bath, Steaming के साथ में Scrbing मालिश, उपनाह, उबटन, आलेप, मालिश आदि अनेक ऐसे उपाय हैं जो त्वचा की सफाई का, स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं.
इसके साथ, नीम, ऐलोवेरा आदि वनस्पतियों से त्वचा की hygiene का भी पूर्ण ख्याल रखा जा सकता है.
इसमें सिर की त्वचा की मालिश, सिकाई, सफाई के लिए नारियल, बादाम, चंदन, ब्राह्मी, आंवला आदि अनेकों तेल का वर्णन मिलता है.
इसी तरह आंवला, शिकाकाई, रीठा, हिना जैसी औषधों के प्रयोग से सिर की त्वचा व बालों को स्वास्थ्य आता है.
नींद- त्वचा के स्वास्थ्य के लिए एक संपूर्ण ७-८ घंटे की लगातार रात की नींद त्वचा की नित प्रति हुई टूट-फूट को पुनर्जीवन देने का कार्य करती है. इसलिये भरपूर आवश्यक नींद त्वचा स्वास्थ्य के लिय आवश्यक है.
धूप से बचाव- सूर्य की किरणें जितनी सुबह के वक्त त्वचा से विटामिन डी का निर्माण करती हैं, उतनी ही तेज  ultraviolet किरणें त्वचा को झुलसाने का कार्य करती हैं. एक वैज्ञानिक तथ्य है कि अधिक किरणें कैंसर तक कर सकती हैं. अतएव दोपहर में इन किरणों से बचाव Sun Screen (SPF.150) लगा कर, एलोवेरा के Laye लगाकर किया जा सकता है.
दही Sun tanning को हटाकर हानिकारक  अल्ट्रा वॉयलेट किरणों से बचाता है. (सामान्यत: त्वचा के ठीक रख-रखाव के अभाव में कई प्रकार के रोग भी हो सकते हैं.
एलर्जी, एक्जिमा, एक्ने या मुहासे, परट्यूसिस, डर्मिटाइटिस, Ring Worm, टीनिया, एरिथिमिया, सेबोरिस
जबकि सोरियेसिस (Psoriasis), uitiliga atopic आदि त्वचा रोग में सहज (genetic) और auto immunity प्रतिरोधक क्षमता) तथा psychosomuatic (मनोवैज्ञानिक एवं मनोदैहिक) घटक भी अपनी भूमिका निभाते हैं.)
(त्वक संबंधी टिप्स)
(१)चेहरा व त्वचा की सफाई
(२)डिओडेरेंट के स्थान पर एन्टीपरस्पीरेंट प्रयोग
(३)तेलीय, शुष्क या मिश्रित प्रकार जान कर त्वक-Care प्रोडक्ट प्रयोग करें.
(४)अपनी त्वचा की नियमित जांच करायें. कोई धब्बा या निशान यदि अचानक दिखे और बढ़ता या लक्षण के साथ लगे तो तुरंत जांच करायें.
(५)सूर्य की प्रखर किरणों से बचाव (सनस्क्रीन ३० या अधिक SPF) से करें.
(६)छोटी चोट व शुष्कता को पेट्रोलियम जेली से ठीक करें.
(७)जूतों की Fitness पर ध्यान देकर Blisters corn से बचें.
(८)स्नान के बाद moistuizer का प्रयोग करें.
यहां यह कहना अति  आवश्यक है कि त्वचा का रंग गोरा, काला या सांवला हो लेकिन उसको जवान, खूबसूरत, चमकदार, लचीला, मृदु और सौम्य रखना अपने ही आहार-विहार एवं पूर्ण निद्रा में होता है. आवश्यकता है तो सिर्फ चेतना की, इच्छा शक्ति की और हर दृष्टि से त्वचा की देखभाल की.
(5) यद्यपि त्वचा की देखभाल के लिए बाज़ार में कई प्रसाधनों की होड़-सी लगी हुई है किंतु प्रत्येक दिन-रात किसी भी प्रसाधन संसाधन के उपयोग से पहले उसकी गुणवत्ता की परख, अपनी व्यय, व्यवसाय, वातावरण एवं अंदरूनी एवं बाह्य स्वास्थ्य को ध्यान में रखने की अत्यंत आवश्यकता है.  त्वचा की सुरक्षा के अभाव में सौंदर्य एवं स्वास्थ्य असमय अनावश्यक ही दिखने लगता है. इसलिए आज ही शुरूआत करें. ताकि कल आपका धन्यवाद दे सके.
बुढ़ापा एक सत्य है लेकिन उम्र का दिखना जरूरी नहीं आज ही शुरू करें ताकि कल आपको  धन्यवाद दे सकें
*लेखिका प्रख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं.