विशेष लेख


Special Article vol. 20

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद की भारत की यात्रा

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद की भारत की यात्रा गौरवशाली उपलब्धियों की गाथा है। हालांकि यह भी सत्य है कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की चुनौतियों सहित कई गंभीर चुनौतियों से अब तक निपटा नहीं जा सका है। देश ने लम्बे संघर्ष के बाद स्वाधीनता प्राप्त की थी और इस संघर्ष में सभी जातियों और धर्मों के असंख्य लोगों ने बलिदान दिया था। उपनिवेशी हुक्मरान भारत का खजाना लूटकर, उसकी सांस्कृतिक अस्मिता को मिटाकर और मैकॉले की शिक्षा नीति के माध्यम से उसके नैतिक बल को कमजोर करते हुएउसे नष्ट और अशक्त बनाना चाहते थे। इसलिए वे आक्रामक रुख अपनाते हुए शिक्षा के विस्तृत नेटवर्क की उस गौरवशाली विरासत को विकृत और नष्ट करते गये, जिसे उन्होंने उस राष्ट्र से विरासत में पाया था, जिसने उस समय विश्व को वैदिक दर्शन का पाठ पढ़ाया था, जब वह अंधेरे में भटक रहा था।

ब्रिटिश लोगों ने विरासत में क्या पाया था, इसका नमूना हैरान कर देने वाला है। 1 जुलाई, 1836 में जिला कलेक्टरों की प्रथम सर्वेक्षण रिपोर्ट में बंगाल-बिहार में बड़ी संख्या में- 100,000 स्कूल होने का उल्लेख किया गया। इसी तरह मद्रास पे्रसिडेंसी के 21 जिलों के कलेक्टरों के अनुसार, प्रेसिडेंसी में 11,575  विद्वान, 1, 57,195 छात्र और उच्च शिक्षा के 1094 संस्थान थे। उन्होंने महसूस किया कि भारत को नैतिक और भौतिक रूप से पराधीन बनाने और उसके गर्व एवं विश्वास को नष्ट करने के काम को अंजाम देने के लिए यहां के ज्ञान की परम्परा को नष्ट करना होगा। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन में रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने इसे खूबसूरत वृक्ष की बर्बादीकरार दिया।

लेकिन ब्रिटिश हुक्मरान भारत की आत्मा पर कभी विजय न पा सके, जैसा कि साहसी स्वाधीनता सेनानियों के विरोध तथा उनका साथ देने वाले उन लाखों लोगों से जाहिर होता है, जिन्होंने दौलत और ताकत के लालच को अस्वीकार कर गरीबी और तकलीफों को गले लगाया। एक दिलचस्प किस्से के माध्यम से इसे स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। जब इलाहाबाद से छपने वाले स्वराज्य अखबार ने अपने संपादक के पद के लिए विज्ञापन दिया और प्रत्येक संपादकीय के लिए एक गिलास पानी, दो रोटियां और 10 साल के सश्रम कारावास को प्रोत्साहन के रूप में दर्शाया, तो राष्ट्र की सेवा को तत्पर बड़ी तादाद में उम्मीदवार उसके कार्यालय में आ जुटे।

स्वाधीनता के बाद भी यही भावना बरकरार रही। जब भी बाहरी या आंतरिक चुनौतियों का सामना करने की नौबत आयी, भारत चट्टान की तरह मजबूती से खड़ा रहा और उसने अपने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के साथ ही साथ विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल कीं। ऐसी अबाधित प्रगति के मार्ग की रचना निस्संदेह हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी। संविधान सभा में हुई चर्चाओं से पता चलता है कि संविधान निर्माता विचारशील प्रजातंत्रवादी थे, जो यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि लोकतंत्र भारतीय समाज की विविधताओं का समावेशन करे और उसके सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जीवन के विरोधाभासों का समाधान करे। उनके प्रयासों की सफलता की छाप देश की राजनीतिक गतिविधियों में परिलक्षित होती है। वर्ष 1952 में प्रथम आम चुनावों में जहां 54 राजनीतिक दलों ने भाग लिया था, वहीं 2014 के लोकसभा चुनावों में उनकी संख्या बढक़र 464 हो गयी। भारत गर्व से इस बात का दावा कर सकता है कि निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से सबसे निचले स्तर (ग्राम सभा) से लेकर शीर्षतम स्तर (लोकसभा) तक, लोकतांत्रिक रूप से सत्ता का सहज हस्तांतरण होता है। लोकतंत्र के विस्तार के तीन आयाम हैं। पहला, जनता की भागीदारी और स्थानीय स्व- शासन के माध्यम से प्रशासन का विकेंद्रीकरण। दूसरा, सूचना का अधिकार (आरटीआई) जैसे उपायों के माध्यम से जनता का सशक्तिकरण और तीसरा, अधिकार पर आधारित दृष्टिकोण लागू करते हुए मूलभूत लोकतंत्र की दिशा में अग्रसर होना। इसके उदाहरण हैं- शिक्षा का अधिकार, मनरेगा आदि।

जब इंदिरा गांधी ने 19 महीनों (1975-77) के लिए आपातकाल लगाया, तो देश में बड़े पैमाने पर चौतरफा विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्होंने 1977 के आम चुनावों में उनकी पराजय का मार्ग प्रशस्त किया। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था। भारत में लोकतंत्र कभी परास्त नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, पंचायती राज प्रणाली की सफलता इस बात का जीवंत उदाहरण है, जो यह दर्शाती है कि लोकतंत्र शीर्ष से नीचे तक नहीं है, बल्कि इसके बिल्कुल विपरीत है।

70 साल की अवधि में, भारत ने बहुत से क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत ने 1975 में अपने प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण किया और अब उसकी निगाहें 200 बिलियन डॉलर वाले लाभप्रद रॉकेट बाजार पर टिकी हैं। मंगल मिशन- 2013 दुनिया भर में अपने किस्म का सबसे किफायती मिशन होने के नाते उल्लेखनीय रूप से सफल रहा। परमाणु और मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारत गौरवपूर्ण स्थिति में है। स्वदेशी तौर पर विकसित ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल हमारे वैज्ञानिकों की योग्यता का देदीप्यमान उदाहरण है। भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजिम (एमटीसीआर) का 35वां सदस्य भी बन चुका है, जिसके लिए चीन पिछले एक दशक से प्रयासरत है।

1951 में, जीवन प्रत्याशा लगभग 37 वर्ष थी, जो 2011 में 65 वर्ष हो गयी। इसी तरह, 1951 में, भारत में केवल 0399 मिलियन किलोमीटर सडक़ें थीं, जबकि जून 2014 तक यह 45 मिलियन किलोमीटर हो गयीं। साक्षरता दर 1951 के मात्र 122 प्रतिशत से बढक़र 74 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। 1947 में, देश में मात्र 1362 मेगावाट बिजली का उत्पादन हुआ और आज हम लगभग 3, 03,118.21  मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। हालांकि यह विकास समावेशी नहीं रहा है और 20 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय लोग अब तक गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं।

गरीबी, अज्ञानता, स्वास्थ्य के खराब मापदंड, सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं, जो बड़ी संख्या में लोगों के कष्टों का कारण हैं, विकास की हमारी चर्चाओं पर धब्बा हैं। रोजमर्रा के जीवन की परेशानियों को दूर करना आज की सरकार का सबसे बड़ा कार्य है। इसमें किसी भी चीज से ज्यादा अस्थिर करने की क्षमता है।

सिक्के का दूसरा पहलु भी है। भारत में, बौद्धिक चिंतन पर एक वर्ग विशेष का आधिपत्य रहा है, जिसका व्यक्तित्व और दृष्टिकोण उपनिवेशिक विचारों के द्वारा सांचे में ढाला गया है। उन्होंने पश्चिमी प्रिज्म और माक्र्सवादी दृष्टिकोणों के जरिये भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की व्याख्या की है। इसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के समस्त वर्गों को प्रभावित किया है। हालांकि सबसे बड़ा प्रभाव राष्ट्रवाद संबंधी विमर्शों पर महसूस किया गया है। प्राचीन भारत का विज्ञान से लेकर दर्शन तक में अपने योगदान के कारण, विश्व सभ्यता में विशिष्ट स्थान रहा। चाहे औषधि हो या गणित अथवा खगोल शास्त्र, रसायन शास्त्र और भौतिकी जैसे जटिल क्षेत्र, प्राचीन भारत के योगदान अनमोल थे। उदाहरण के तौर पर, भारत की गणित की परम्परा की जड़े वेदों तक समायी हैं। भारत में ही लेखन में दशमलव मूल्य प्रणाली और शून्यके उपयोग का विकास हुआ। सुश्रुत की सुश्रुत संहिता, चिकित्सकीय ज्ञान का खजाना है, क्योंकि प्लास्टिक सर्जरी की प्रारम्भिक घटनाओं में से एक का उल्लेख इसमें पाया जाता है।

हालांकि प्राचीन भारत के इन योगदानों को नजरंदाज कर दिया गया। प्राचीन भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हासिल की गयी महान उपलब्धियों का उल्लेख चंद पंक्तियों या अनुच्छेदों में कर दिया गया। इससे संस्कृति, राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन राजनीतिक, वैचारिक और अकादमिक विचार-विमर्श अनिवार्य हो जाता है। अपने वैचारिक अधिपत्य साथ ही साथ भारत के विचार को परिभाषित करने के लिए परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच टकराव होता आया है। इसके अलावा, वे भारत के लोगों की चेतना में अंतर्निहित सभ्यता के अंतर्भूत मूल्यों के सामथ्र्य को नष्ट नहीं कर पाए हैं। औपनिवेशिक अवधि के दौरान हमारे अतीत को फिर से सामने लाते हुए और प्रमुखतया सांस्कृतिक संदर्भ में राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विचारक से स्वाधीनता सेनानी बनी बाल गंगाधर तिलक, बी सी पाल, महर्षि अरविंदो जैसी विभूतियों ने इनका स्मरण कराया। हालांकि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद वाले भारत में राष्ट्रवाद को राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों से पुन: जोडऩे के लिए ज्यादा प्रयास नहीं किए गए। यहां तक कि स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उत्तरोत्तर उजागर हो रहा है। अपने प्राणों की आहुति देने वाले कुछ लोगों के नाम तक आधुनिक इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलते, जबकि कुछ लोगों को स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान के अनुपात से अधिक स्थान मिला है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की दलित स्वाधीनता सेनानी ऊदा देवी, जो रानी हजरत महल की सेना में थीं और ब्रिटिश फौज से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं, गुमनाम रहीं, ऐसा ही पूर्वोत्तर की स्वाधीनता सेनानी रानी गाइदिनल्यू के साथ भी हुआ। लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक समाज की खूबसूरतीबौद्धिक और राजनीतिक विवादों का विचार विमर्श और संवाद के माध्यम से समाधान करने में निहित है। पिछले 70 वर्षों में, भारत ने विचार, संस्थाओं और नेतृत्व के विकास में विलक्षण क्षमता का परिचय दिया है। विचार-विमर्श और विवाद भी भारतीय मानस की राजनैतिक स्वतंत्रता हेतु सर्वसम्मति के लिए अनुकूल आधार तैयार करते आए हैं। जनता की यह महत्वाकांक्षा और भावना अक्सर ऐतिहासिक फैसले में परिलक्षित होती है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव का फैसला नियति के साथ एक अन्य वादे के लिए जनादेश था। भारत ने स्वयं के सम्पन्न राष्ट्र होने का दावा करना प्रारंभ कर दिया। इसीलिए ब्रिटेन के पाक्षिक अखबार गार्जियन ने अपने संपादकीय में अपनी पश्चिमी भावनाओं को व्यक्त किया, ‘‘आज, 18 मई 2014  का दिन, इतिहास में ब्रिटेन के अंतत: भारत को छोड़ देने वाले दिन के रूप में दर्ज हो सकता है। चुनावों में नरेन्द्र मोदी की जीत एक ऐसे लम्बे युग की समाप्ति का प्रतीक है, जिसमें सत्ता के स्वरूप, सत्ता के उन स्वरूपों से ज्यादा भिन्न नहीं थे, जो ब्रिटेन द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले दिनों में हुआ करते थे। कांग्रेस पार्टी के शासन में भारत कई मायनों में ब्रिटिश राज जारी रहने के समान था।’’  ऐसा लगता है कि विश्व समुदाय भी भारत के सॉफ्ट पावर के रूप में उदय की प्रतीक्षा कर रहा था। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिसम्बर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव प्रस्तुत किया, तो भारत को व्यापक सराहना और समर्थन मिला। 177 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया गया। मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में गर्व से घोषणा की, ‘‘योग भारतीय प्राचीन परम्परा का एक बहुमूल्य उपहार है। यह परम्परा 5000 साल पुरानी है।’’

वैश्विक मामलों में भूमिका निभाने के लिए हमारी ताकत और सामथ्र्य की नैतिक व्याख्या की आवश्यकता है और सांस्कृतिक एकता की भावना के बिना यह मुमकिन नहीं है। भारत का विचारउक्ति एक खाली गिलास की तरह है, यह केवल तभी पूरा भरेगा, जब हम यह महसूस करेंगे कि भारतीय सभ्यता समावेशी और शाश्वत है। समकालीन भारत के सर्वश्रेष्ठ भारतीय चिंतकों और विचारकों में से एक- एम।एस। गोलवाल्कर समुचित रूप से वर्णन करते हैं, ‘‘इतिहास में दर्ज है कि सिर्फ इसी धरती पर, प्राचीन काल से ही, पीढ़ी दर पीढ़ी चिंतक, दार्शनिक, ऋषि और संत मानव स्वभाव के रहस्यों को सुलझाने को तत्पर हुए हैं, उन्होंने आत्मा के संसार में गहरा गोता लगाया है और एकता के महान सिद्धांत की अनुभूति के विज्ञान की खोज की है और उसे परिपूर्णता प्रदान की है।’’ भारत का नियति के साथ वादा की राह में कई रुकावटें हैं और उसे कई परीक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना है, लेकिन राष्ट्रीयता की अंतर्निहित भावना उसकी प्रगतिशील यात्रा की सहायता के लिए प्रतिबद्ध है।

 

 (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं। व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)